Monday, January 17, 2022
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भविष्य के समाज की ताबीज

नहीं जानता कि महान व्यक्ति किस तरह के होते हैं लेकिन कामरेड बृजबिहारी पांडे बिना शक महान थे। उनका अहैतुक स्नेह मुझे समय समय पर मिलता रहा है । इसलिए भी उनका निधन निजी क्षति की तरह महसूस हो रहा है। उनके असमय निधन से बहुतेरे लोगों के जीवन में भारी शून्य पैदा हो गया है। उनकी दैहिक उपस्थिति मात्र के चलते क्षुद्र विषयों की चिंता भी करने में लज्जा का अनुभव होता था । किसी भी किस्म के दिमागी खलल की हालत में उन्हें फोन करके परेशान किया जा सकता था । सब समय उनका साथ सोच विचार की ऊँचाई की गारंटी होता था । ऐसे लोगों की अनुपस्थिति देश और समाज के सार्वजनिक जीवन की समृद्धि की अपूरणीय क्षति होती है ।

उनसे पहली मुलाकात कानपुर में अध्ययनरत कामरेड राजीव डिमरी के छात्रावासी कमरे पर हुई थी । सुदर्शन मुख, चाल में फुर्ती और बेहतरीन शर्ट ने पहली ही बार ध्यान खींचा था । बाद में कभी कभी कुर्ता भी पहने देखा । उनके कसे बदन पर सब कुछ शोभायमान होता था लेकिन अपने वस्त्र विन्यास के प्रति सचेत शायद ही कभी रहे हों । तब वे कानपुर में काल प्रवाह प्रकाशन की स्थापना के लिए आये थे । पढ़ने लिखने में अपनी भी रुचि होने से अच्छा लगा था । तब पार्टी भूमिगत ही थी और उनका नाम सुनील बताया गया । असली नाम जानने में कोई रुचि भी नहीं थी । मेरे पास कोई न कोई किताब हमेशा रहती थी । पढ़ाई का शौक विजय जी को भी था जिनके पते से उस प्रकाशन का काम धाम चलना था । मजदूरों के विशाल महासागर में मार्क्सवादी साहित्य के प्रचार प्रसार का एक लम्बा इतिहास कानपुर के साथ जुड़ा हुआ था । करेंट बुक डिपो पर मार्क्सवादी साहित्य की सहज उपलब्धता और रामआसरे द्वारा माओ की संकलित रचनाओं के हिंदी अनुवाद की कहानी सुनायी देती थी । अचरज होता था कि सीपीएम से जुड़े मजदूर नेता ने माओ की रचनाओं का अनुवाद क्यों और कैसे किया! कारखानों में खटने वाले मजदूरों को मार्क्सवादी साहित्य से सिर टकराते प्रत्यक्ष देखा है । फिर भी उम्र कम होने से उस प्रयास से बहुत न सीख सका ।

बाद के दिनों में कानपुर के एक मजदूर आंदोलन की खबर सुनी जिसमें कारखाने में आठ घंटे की पाली निपटाकर मजदूर रेल को जाम करने के लिए ट्रैक पर बैठे रहते थे तो वह समय याद आया जब समूचे कानपुर की हवा में मजदूर वर्ग के सवाल और उनके संघर्ष का माद्दा छाये रहते थे । उसी शुरुआती माहौल ने शायद पांडे जी को मजदूर वर्ग के इस समृद्ध जीवन में मौजूद समानांतर संस्कृति के बारे में सहज बनाये रखा । आज की नवउदारवादी संस्कृति में दीक्षित लोग उस गर्मजोशी से भरे माहौल की कल्पना नहीं कर सकते जब मजदूरों का जीवन शहरों की धड़कन हुआ करता था । उनके बारे में बाद में जाना कि मजदूरों के बीच राजनीतिक काम उनका पसंदीदा क्षेत्र था । दुर्गापुर, बोकारो, दिल्ली- जहां भी रहे मजदूर बस्तियों के साथ एकजुट रहे । कदाचित कानपुर के शुरुआती जीवन से ही यह चीज अनजाने संस्कार के बतौर मिली हो ।

बाद के दिनों में उनकी बाबत सुनता तो रहा, सम्भव है मुलाकातें भी हुई हों लेकिन उनकी याद गहरी नहीं है । एक बार की बात याद है जब उन्होंने कलकत्ते से किसी प्रकाशन का जिक्र किया जिसमें छापे की भयानक भूल थी । Marxist के लिए Marksist छप गया था । जिनकी जिम्मेदारी थी उन्होंने आपत्ति करने पर लोग समझ जायेंगे ऐसा कहा । इसे वे गलत उदाहरण के बतौर पेश कर रहे थे । शायद एक लेख के गलत अनुवाद का मामला था। डेड लेटर्स का अनुवाद गलत पते पर डाली गयी चिट्ठी हुआ था। प्रकाशन के मामले में सावधानी और पूर्णता के वे हिमायती थे। अनुवाद के बारे में सुन रखा था कि मूल अंग्रेजी को सामने रखकर वे धाराप्रवाह हिंदी अनुवाद बोलते जाते थे। इसका पता तब चला जब पार्टी के केंद्रीय स्कूल के पर्चों को प्रणय के साथ मिलकर लगातार दस दिन साथ रहकर अनूदित किया । तब उस प्रयास को अय्यूब भाई ने फ़ोर्ट विलियम कालेज का नाम दिया था । काम के उबाऊ होने के चलते बीच बीच में कभी कुछ किस्सा कहानी भी चलते रहते थे । पहली बार त्रात्सकी, ग्राम्शी और उत्तर आधुनिकता के बारे में पढ़ रहा था और लिखने वाले की प्रकांड विद्वत्ता से अचम्भित था। आज तक इन मामलों में उतना ही जानता हूं, अलबत्ता ग्राम्शी के बारे में राय कुछ बदलने की जरूरत लगती है।

दूसरा पर्चा शिवरमन का था और उसमें अर्थतंत्र तथा नव सामाजिक आंदोलनों के बारे में जो था उससे अधिक आज भी नहीं पता। जब अपना अचम्भा जाहिर किया तो उन्होंने एक विज्ञान कथा सुनायी। उसमें किसी अन्य ग्रह के जीव बादल के रूप में धरती के ऊपर छा गये थे। उनका मानसिक विकास इतना हो चुका था कि वे मष्तिष्क मात्र रह गये थे । धरती से भेजे गये संदेशों के सहारे उन्होंने मनुष्यों की भाषा सीख ली थी । तब अरिंदम सेन से परिचय नहीं हुआ था तो यह मनोरंजक किस्सा बन गया । बाद में अरिंदम जी के साथ काम करते हुए सहजता महसूस होने में इस किस्से का भी हाथ रहा होगा। इन सबसे पार्टी नेताओं की मनुष्यता का पता चला और पांडे जी के दोस्ती कायम कर लेने की क्षमता का भी अंदाजा मिला ।

इसके बाद तो अक्सर यह भी देखा कि मुश्किल से मुश्किल मोर्चे पर वे धीरज और समर्पण के साथ जुट जाते थे। सम्भव है उनकी इस क्षमता के कारण ही भूमिगत पार्टी का प्रवक्ता उन्हें बनाया गया हो । इस मामले में संसद में रामेश्वर जी और पत्रकारों का सामना करते पांडे जी का प्रदर्शन अद्भुत रहा। एकदम ही अनजानी राह पर पूरे आत्मविश्वास के साथ चलते थे। जनमत की टीम के साथ काम करना आसान नहीं था। सबके सब विद्वान, लेकिन पाडे जी दत्तचित्त होकर मोर्चा संभाले रहे। उसी दौरान अभय कुमार दुबे के संस्कृति संबंधी किसी लेख का जवाब भी उन्होंने लिखा था जिसमें गम्भीर तर्कों के साथ चुटीली हाजिरजवाबी भी थी। बांगला तो उनके लिए मातृभाषा जैसी थी ही, हिंदी और अंग्रेजी का भी उनका ज्ञान अगाध था। हिंदी में वे पर्याप्त साहित्यिक हिंदी लिखते थे । सम्भव है बांगला का अभ्यास होने से ऐसा हुआ हो या उच्च संस्कृति पर भी जनता का अधिकार होने की मान्यता से ऐसा हुआ हो । बांगला के सिलसिले में उन्होंने बताया था कि पूरावक्ती कार्यकर्ता होने के बाद ऐसा रमे कि सपने भी बांगला में देखते थे । अनुवाद का काम मैं भी पार्टी के लिए बहुत पहले से करता रहा था इसलिए उस मामले में उनका मार्गदर्शन हमेशा मिलता रहा ।

इस सिलसिले में एक सूचना साझा करना उचित होगा। ग्रंथशिल्पी के लिए उन्होंने मार्क ब्लाख की किताब ‘हिस्टारियन’स क्राफ़्ट’ का हिंदी अनुवाद ‘इतिहासकार का शिल्प’ शीर्षक से किया। मार्क ब्लाख ने सामंती समाज का अध्ययन किया था । उनकी किताब में स्वाभाविक तौर पर मध्यकालीन यूरोपीय संदर्भ आये थे। पांडे जी ने सही अनुवाद के लिए ढेर सारा शोध किया। इसी तरह ग्रंथशिल्पी से ही ‘कम्युनिस्ट पार्टी का घोषणापत्र’ की डेढ़ सौवीं वर्षगांठ पर जब मुरली मनोहर प्रसाद सिंह के संपादन में किताब छपी थी तो उसमें पांडे जी का भी लेख था । पूछने पर विनम्रता के साथ उन्होंने कहा कि दीपंकर के लेख से ज्यादातर सामग्री लेकर उन्होंने पार्टी का पक्ष प्रस्तुत करने के लिए वह लेख लिखा। ज्ञान की दुनिया पर अपना दावा ठोंकने वालों की क्षुद्रता के मुकाबले यह सहज विनम्र भाव कितना उदात्त है!

दिल्ली छोड़ने के बाद भी उनके साथ संवाद हमेशा रहा । शाहजहांपुर के कालेज की लाइब्रेरी के लिए किताब खरीदने आया तो उनसे मिला । वर्धा से दिल्ली आया तो उनसे मिला । मित्र मंडली भी पांडे जी की दीवानी थी । आपस में बातें उनके बारे में अक्सर होतीं । रेलवे के बारे में उनकी जानकारी प्रचंड थी । उसके संचालन की समूची व्यवस्था को वे जानते थे । शाहजहांपुर में रहते हुए मुझे पोस्ट व्यवस्था में पिनकोड के महत्व का पता चला था । रुचि इसीलिए हुई क्योंकि पांडे जी ने अपने चारों ओर की दुनिया को समझने की उत्सुकता पैदा कर दी थी। आज इसके बारे में दो तरीकों से सोचता हूं । एक कि रवींद्रनाथ ठाकुर ने हम भारतीयों को बौद्धिक रूप से आलसी कहा है । इसका उदाहरण यही कि हमें दुनिया की व्यापक व्यवस्था को समझने में कोई रुचि नहीं होती । दूसरे कि इन चीजों का आविष्कार वर्तमान व्यवस्था की मजबूती के लिए नहीं हुआ है । इन सभी का आविष्कार मनुष्य ने सार्वजनिक सुविधा के लिए किया है। पूंजी के वर्तमान शासन ने उनको अपने लिए अधिग्रहित तो कर लिया है लेकिन अंतत: उनका सही इस्तेमाल ऐसी ही व्यवस्था में सम्भव है जिसमें कुछ लोगों का ही उन पर कब्जा न रहे। इस अर्थ में वे भविष्य के समतामूलक समाज हेतु योग्य मनुष्यों का निर्माण अनवरत करते रहे थे ।

बौद्धिक काम में सहकारिता के उनके उदाहरण की बदौलत ही अवधेश, मृत्युंजय और मैंने गोरख पांडे के शोध का मिलकर हिंदी अनुवाद किया था । जैसा जेएनयू के उस कमरे में रहा था वैसा ही माहौल पैदा करने के चक्कर में रात बिरात पांडे जी को फोन लगाकर दार्शनिक शब्दावली का मतलब पूछते रहे थे। उससे पहले चंद्रशेखर के बिदेसिया पर लिखे शोध का अनुवाद उनसे जंचवाया गया था। जो संशोधन उन्होंने किये उनके चलते वह अनुवाद खिल गया। गोरख पांडे के शोध के अनुवाद में उनकी प्रत्यक्ष मौजूदगी न होने के चलते ही थोड़ी कमी रह गयी।

सिल्चर में नौकरी करते हुए वहां के सामाजिक जीवन में संस्कृति की जबर्दस्त उपस्थिति समझ नहीं आती थी। कोई भी राजनीतिक सभा हो, सार्वजनिक कार्यक्रम हो, नाच गाना उसका अनिवार्य हिस्सा होता था। हम हिंदी प्रदेश वालों को उसका ऐसा महत्व स्पष्ट नहीं होता। इंडियन आइडल में अपने प्रांत के गायक को जिताने के लिए राजनेता से लेकर व्यवसायी तक लग जाते थे। एक बार दुर्गा पूजा की छुट्टी में पुत्र समेत पटना गया तो लोकयुद्ध के कार्यालय में ठहरा। वापसी के एकाध दिन पहले उनसे जिज्ञासा प्रकट की तो उन्होंने अफ़सोस जाहिर किया कि जाते समय यह सवाल पूछ रहा था। बहरहाल, डी पी बख्शी पर लिखे उनके संस्मरण को पढ़ते हुए देखा कि असम में काम करने के लिए वहां की सांस्कृतिक विशेषताओं का उन्होंने बाकायदा अध्ययन किया। पांडे जी ने भी जयंत रोंगपी के साथ कार्बी संस्कृति के बारे में अपनी लम्बी बातचीत का जिक्र किया था।

यह बात हमारी पार्टी को पारम्परिक वामपंथी पार्टियों से अलगाती है । किसी भी जगह या समुदाय को समझने के क्रम में वहां की संस्कृति को भी समझना जरूरी है। कारण कि उसका निर्माण मानव समुदाय ने जीवनक्रम में सामूहिक रूप से किया है इसलिए उस पर उसका हक है । जिसे हम उच्च संस्कृति कहते हैं उस पर भी जनता का अधिकार है । यदि आज जनता उसका आनंद नहीं ले पा रही तो उसे इसमें सक्षम बनाना किसी भी गम्भीर वामपंथी आंदोलन का दायित्व है । किसी भी संस्कृति के उत्पादक समुदाय से उसको छीन लेने की क्षमता शक्तिशाली समूह का लक्षण हो सकता है लेकिन उस पर उनका हक स्वाभाविक नहीं होता। सामान्य जनता के जीवन स्तर को इतना उन्नत करना होगा कि वह इसका आनंद ग्रहण करने की रुचि और योग्यता हासिल करे। आखिर यही तो हमारे आंदोलन का लक्ष्य है ।

अपने आंदोलन को पुराने आंदोलनों की धारावाहिकता में देखने की उनकी आदत का प्रमाण झारखंड के सिलसिले में लिखा उनका एक लेख है जिसमें उन्होंने स्वामी सहजानंद सरस्वती की मार्फत यह बताया था कि झारखंड की मूल समस्या किसान समस्या है । झारखंड को आंतरिक उपनिवेश आदि बताने वालों या उसे आदिवासी समस्या समझने वालों के मुकाबले यह नजरिया वर्गीय था । जब इस बात का जिक्र अखिलेंद्र भाई से किया था तो उन्होंने पांडे जी के बहुपठित होने की तस्दीक की थी ।

सिल्चर के बाद दिल्ली आया तो प्रसन्न होकर बताया कि विश्वविद्यालय से लैपटाप मिला है। उन्होंने इसे चिंताजनक बताया और कहा कि अब आप चौबीसों घन्टे कार्यालय में ही रहेंगे । आज जिस ‘वर्क फ़्राम होम’ को नये समय का सुविधाजनक तरीका बताया जा रहा है और तमाम गुणगान किया जा रहा है उसकी शोषक असलियत को इतनी आसानी से उन्होंने समझा दिया कि मैं निरुत्तर हो गया । समाज में होनेवाले तमाम सतही बदलावों के नीचे कार्यरत बुनियादी प्रक्रियाओं और ताकतों को उनकी मर्मभेदी निगाह तुरंत पहचान जाती थी ।

वे जितना लिख सकते थे उसके मुकाबले बहुत कम लिखा । जितना लिखना चाहते थे उतना भी नहीं लिख सके। निजी तौर पर जानता हूं कि उनकी इच्छा नक्सलबाड़ी गांव पर एक किताब लिखने की थी। इसके कारण महसूस होता है कि उनका लिखा सहेजा जाना चाहिए। हमेशा ही वे पार्टी घेरे के बाहर के लोगों से भी संवाद बनाये रखते थे। जनमत के कार्यालय में एक बार यूरोपीय देशों के लेखकों के किसी प्रतिनिधि मंडल के साथ अपने साथ जुड़े लेखकों की एक मुलाकात में मैंने पंकज सिंह, पंकज बिष्ट, आनंद स्वरूप वर्मा और मंगलेश डबराल को देखा था। नवउदारवाद के जमाने में जब विदेशी कंपनियों के उपभोक्ताओं के लिए भारतीय युवक काल सेंटर में काम करते थे तो उनके बारे में भी पांडे जी को उत्सुकता के साथ बातचीत करते और इसके अर्थतंत्र पर विचार करते देखा था। एक समय जब डान ब्राउन का द विंची कोड मशहूर हुआ था तो दो घंटे में उन्होंने इस उपन्यास का कथासार सुनाया था । इसी तरह हैरी पाटर की लेखिका के घरेलू स्त्री होने और उस उपन्यास में भूतों प्रेतों के लिए प्रयुक्त प्राचीन शब्दों के उल्लेख की बात उन्होंने बतायी थी । पटना में रिया टैबलेट पर अंग्रेजी शब्द बनाने का खेल खेल रही थी । पांडे जी बोले कि अक्षर समूह देखते ही उनके दिमाग में बीसियों शब्द एक साथ आ जाते हैं ।

दुर्भाग्य से जिस समाज में हम रहते हैं उसमें मनुष्य का मूल्य उसके धन कमाने की क्षमता से आंका जाता है । ऐसे उलटे समाज में स्वाभाविक तौर पर उनके लिए पारम्परिक तरीके की कोई सम्मानित जगह न थी । तमाम ऐसे मौके आये जब उन्हें अपमानजनक स्थितियों का सामना करना पड़ा लेकिन इससे उनकी आत्मा पर कोई खरोंच नहीं पड़ी । निजी मानापमान से मुक्त होकर उन्होंने बेहतर समाज के निर्माण के लिए सदा खुद को समर्पित रखा ।

जबसे उनका निधन हुआ है तबसे शायद ही कोई दिन गुजरा होगा जब उन्हें फोन करके कोई बात पूछने की इच्छा न हुई हो । आखिरी बातचीत में उन्होंने मेरे लिखे का जिक्र किया था और मनस्तत्व के बारे में मार्क्सवादी नजरिये को समझने के लिए किताबों की बाबत जानना चाहा था । ऐसा कौन होगा जो इस तरह के विषयों के बारे में जानने और बात करने के लिए खुला हो ! कोरोना तालाबंदी खुलने के बाद कार से गिलहरियों के कुचलने की बात बतायी तो उन्होंने तालाबंदी की खामोशी में उनके जन्म लेने और इसके चलते कार की आवाज से परिचित न होने की सम्भावना जतायी थी ।

गोपाल प्रधान
प्रो. गोपाल  प्रधान अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्राध्यापक हैं. उन्होंने विश्व साहित्य की कई महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद , समसामयिक मुद्दों पर लेखन और उनका संपादन किया है
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