Tuesday, May 17, 2022
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रौशनी झरोखों से भी आती है

भट्ट जी, इसी नाम से पुकारते हैं हम उन्हें. वैसे उनका पूरा नाम खीमानंद भट्ट है. अल्मोड़ा में रहते हैं. वे न तो अल्मोड़ा की कोई सांस्कृतिक- राजनीतिक- सामाजिक हस्ती हैं, न ही कोई रसूखदार व्यक्ति. करीब 4 साल पहले जब मैं अल्मोड़ा आया तो उनसे पहली मुलाकात हुई. सांवला रंग, सामान्य कद- काठी, मीठा, आहिस्ता लेकिन दृढ़ता से बात करने वाले भट्ट जी, पेशे से ड्राइवर हैं. पहली बार उनसे कामकाजी टाइप की ही बात हुई. लेकिन एक बड़ी अटपटी सी लगने वाली बात पर ध्यान गया. वह था उनका पहनावा. दिसंबर का महीना था. हम लोग भारी-भरकम जैकेट, स्वेटर, जूतों में बंधे हुए थे और भट्ट जी एक सामान्य कार्टसोल की शर्ट, पैंट, चप्पल पहने दिखे. पूछने पर मालूम चला कि बर्फ़ भी पड़ रही हो तो भट्ट जी ऐसे ही कपड़ों में दिखेंगे. बात आई- गई हो गई. उनका घर परिवार अल्मोड़ा में ही रहता है. उस समय भट्ट जी 55-60 साल के बीच की उम्र में थे. 3 साल बाद फिर अल्मोड़ा आना हुआ तो कुछ और बातें हुईं, जिसने मेरी उनके जीवन के प्रति उत्सुकता जगा दी. इसी बीच मित्र रघु तिवारी, जिनकी संस्था ‘अमन’ में वह गाड़ी चलाते हैं, बताया कि भट्ट जी के एक जवान बेटे की संदिग्ध स्थितियों में मौत हो चुकी है. मरणासन्न बेटे को लेकर वह हल्द्वानी गए और उसके नहीं बचने पर अकेले ही गाड़ी चला कर, बेटे के शव को लेकर वापस अल्मोड़ा आए. जवान बेटे को बाप को कंधा देना पड़े और वह भी नितांत अकेले, यह दुख वही समझेगा जिसने उसे महसूस किया हो. इस घटना ने मुझे जितना परेशान किया, उतना ही उनके व्यक्तित्व और जीवन के बारे में जानने की इच्छा को बढ़ा भी दिया.

अभी जब जुलाई 2021 में मैं वापस अल्मोड़ा आया तो उनसे बात करने की सोच कर ही आया था. आते- जाते परिचय भी थोड़ा गाढ़ा हो चला था. पहले तो भट्ट जी को लगा कि उनके जीवन को जानकर मैं क्या करूंगा लेकिन मेरी जानने की इच्छा में उन्हें शायद कोई असामान्य बात नहीं लगी. एक और बात काम कर रही थी जिसका पता मुझे नहीं था, उसका ज़िक्र बाद में. शायद कोई सुनना ही चाहता है तो हर्ज़ ही क्या है, संभव है यही सोचा हो, तो जो पूरा किस्सा उन्होंने बयान किया, उसका कुछ हिस्सा आप तक पहुंचा पाने में मेरे शब्द कितने समर्थ होंगे नहीं जानता, फिर भी कहता हूं.

भट्ट जी का जन्म हल्द्वानी के जिला महिला चिकित्सालय में हुआ. अपने माता-पिता की पांच संतानों में वह सबसे बड़ी संतान थे. पिता दिहाड़ी मजदूर और मां गृहणी. पिता कभी खेतों में और कभी कोई और दिहाड़ी करके परिवार चलाते थे. हल्द्वानी के जज फार्म में यह लोग रहा करते थे. उनके पहले की पीढ़ियों से पहाड़ से पलायन करके आने वाले लोग भी हल्द्वानी में आसपास बसे थे. कई तो मुहल्ले में ही थे लेकिन कई पीढ़ियों के अंतराल के होते-होते वह भी एक दूसरे से परिचित नहीं रह गए थे. भट्ट जी को भी इसका पता नहीं था कि वह लोग मूलतः कहां के रहने वाले हैं ?

किशोर होते भट्ट जी ने जैसा कि गरीब परिवारों में आमतौर पर होता ही है, प्राथमिक शिक्षा के साथ-साथ एक गैराज में मोटर मैकेनिक का काम सीखना शुरू कर दिया था. काम के बदले में कोई पैसा नहीं मिलता था. सिर्फ छुट्टी के दिन काम पर आने पर ₹2 मेहनताना मिलता था. यह बात इमरजेंसी के दौर की रही होगी. इसी बीच किशोर हो रहे भट्ट जी ने एक दिन अपने माता- पिता को आपस में बात करते सुना कि वह लोग मूल रूप से पहाड़ के रहने वाले हैं और पांच पीढ़ी पहले उनके दादा के दादा यहां मैदान में हल्द्वानी आ गए थे. पलायन का ठीक-ठीक कारण तो उन्हें आज भी नहीं पता है. इसके बाद उन्होंने मां- पिता से अपने गांव और इलाके का नाम पूछा? उन्होंने यह तो बताया कि वे लोग अल्मोड़ा जिले के कठपुड़िया बाजार के पास दक्षिण की ओर 8 किलोमीटर दूर स्थित गांव बडग्ल भट्ट के रहने वाले थे, लेकिन साथ ही यह हिदायत भी दी कि उसके बारे में जानकर क्या करोगे ? अब तो वहां न जाना है, ना उसका कोई मतलब है. पता नहीं गांव अब है भी या नहीं क्योंकि इस बीच एक शताब्दी से ज्यादा का समय बीत चला था. इसके बाद भट्ट जी ने न अपने मां- पिता से कुछ पूछा न ही उन्होंने कभी बताया लेकिन उनके भीतर कहीं वहां जाने की इच्छा बस गयी थी.
भट्ट जी भी जीवन की रफ्तार के साथ कदम मिलाते कभी बरेली, कभी दिल्ली, कभी पंजाब, कभी पूना अलग-अलग तरह के काम करते हुए भटकते रहे. कभी किताब की दुकान में काम किया, कभी राशन दुकान, कभी किसी किसान के घर तो कभी किसी गैराज में, लेकिन मन कहीं जमा नहीं. वापस हल्द्वानी आए और एक स्कूटर एजेंसी में काम करने लगे. यह 80 का दशक था. एजेंसी मालिक से कुछ बकझक हुई तो काम छोड़ दिया. इस बीच मां- पिता ने शादी कर दी. यह साल 1983 रहा होगा. बात करते हुए भट्ट जी अतीत की यादों में खो जाते है. बताते हैं कि उनकी पत्नी शोभा जी भी हल्द्वानी के उसी जिला महिला अस्पताल में पैदा हुई थीं, जहां उनका भी जन्म हुआ था. शायद कह रहे हों कि हमारा मिलना पूर्व निश्चित था. शोभा जी का परिवार भी भट्ट जी के ही परिवार की तरह पहाड़ से विस्थापित होकर हल्द्वानी आया था.


मैकेनिक का काम छोड़ने के बाद भट्ट जी ने चार- पांच साल हल्द्वानी में टेंपो चलाया. स्कूल की अध्यापिकाओं को छोड़ने का नियमित काम था उनके पास. वह उन्हें भी याद करते हैं. समय के साथ एक-एक कर चार संतानों के पिता बने लेकिन अपने पुरखों की जमीन तक जाने का उनका सपना अधूरा ही था अभी. उन्हें कोई राह मिलती नजर नहीं आ रही थी.

घर में कई किस्म के पारिवारिक संकट भी पैदा हो रहे थे. पहली बेटी 5- 6 साल की उम्र में जलकर अकाल मृत्यु को प्राप्त हुई. टेंपो का कई बार एक्सीडेंट हुआ. फिर उन्होंने एक प्रेस की टैक्सी चलानी शुरू की और यह काम 1989 से लगभग 1999 तक किया. जीवन कठिन था. पत्नी काफी बीमार रहती. कठिन दिनों में आस्तिक और सामान्य आदमी के सामने ईश्वर का ही सहारा होता है शायद!

जज फार्म में ही एक बुजुर्ग सज्जन अपनी बेटी के साथ रहा करते थे और कुछ ज्ञानी- ज्योतिषी टाइप माने जाते थे. भट्ट जी उनसे मिले तो उन्होंने कहा पहाड़ की तरफ जाओ, सब भला होगा. पर सवाल था जाएं तो जाएं कहां ? लेकिन बुजुर्ग की बात ने उनकी उस पुरानी इच्छा को फिर से जगा दिया और उनके विश्वास को दृढ़ कर दिया कि उन्हें वापस पहाड़ पर जाना है. अब हम इसे आस्था कहें या बचपन से अपनी धरती अपने देस को जानने की इच्छा या संकटों से निजात पाने की क्षीण सी आशा, जो भी कहें लेकिन भट्ट जी को अभी उसका कोई सिरा पकड़ में नहीं आ रहा था. उनके इस हठ, इच्छा, विश्वास जो भी कहें, उसके बारे में सोचता हूं तो कई बार लगता है जैसे यह विस्थापन की पीड़ा है, जो अनवरत पीढ़ी दर पीढ़ी बहती चली आ रही थी. वरना विस्थापन की चौथी पीढ़ी के उनके पिता और मां, बच्चों से छिपाकर अकेले में इस पर क्यों बात करते रहे होंगे? उनकी स्मृति में भी उनका गांव घर क्यों रहा होगा? या फिर वह बुजुर्ग जिन्होंने भट्ट जी को पहाड़ लौटने की राय दी, वह भी क्या इस स्मृति से अछूते रहे होंगे ?

भट्ट जी बताते हैं कि उस समय आसपास रहने वाले पड़ोसी भी उनको मैदान का ही समझते थे इसलिए कोई रफ्त जब्त नहीं रखते थे. संयोग से एक दिन भट्ट जी को अपनी पत्नी के साथ पहाड़ की भाषा (कुमाऊंनी) में बात करते हुए पड़ोस की एक महिला ने सुन लिया. उसके बाद उन लोगों का भट्ट जी के परिवार से मिलना- जुलना बढ़ा और बातचीत होने लगी. यह वर्ष 1989 का था. एक दिन बातचीत में पता लगा कि पड़ोस के वे लोग भी उसी इलाके से आकर यहां बसे हैं, जिस इलाके के बारे में भट्ट जी ने अपने मां- पिता से सुना था. पड़ोसी भी भट्ट ही थे. यह जानने पर पड़ोसी मिसेज भट्ट अपनी सास को बुला लाईं. जब उनसे बात होनी शुरू हुई तो किसी मेलोड्रामा की स्क्रिप्ट की तरह पता लगा कि वह न सिर्फ उसी गांव की हैं बल्कि भट्ट जी के ताऊ के खानदान की हैं और रिश्ते में दादी लगेंगी. उन्होंने ही यह सूचना भी दी कि अभी हमारा गांव जीवित है, उसी जमीन पर, जहां वह था. हम मैदान के लोगों की स्मृति और वर्तमान में गांवों का शहरों- कस्बों में तब्दील होना तो है लेकिन गांव भी मरते हैं यह स्मृति शायद ही हो. पहाड़ के कठिन जीवन में यह स्मृति नहीं, जीवित अनुभव है.

इस तरह अपनी पहाड़ की पहचान तक खो देने वाले भट्ट जी को उनकी मातृभाषा अपने पहाड़ की पहचान देती है, गांव- घर- पुरखों का पता देती है, अपने लोगों का विश्वास देती है, भाषा उन्हें एक नया जीवन देती है.

अब उन्हें वर्षों से संचित अपनी इच्छा पूरी करने के लिए एक राह दिखाई पड़ने लगी थी. भट्ट जी सन 2000 में अल्मोड़ा आ गए. हालांकि यहां का जीवन भी कम कठिन नहीं रहा. पहले एक परिचित के माध्यम से दुकान लेकर गैराज खोला स्कूटर रिपेयरिंग का. मैकेनिक तो अच्छे थे भट्ट जी लेकिन व्यापार करने के लिए जिन चालाकियों और सावधानियों (जिसे आजकल कौशल कहते हैं) की जरूरत थी, वह सरल भट्ट जी जानते नहीं थे. इसलिए घाटा हुआ और एक बार फिर से ड्राइवर का पेशा अपनाना पडा़. यहीं उनके एक जवान बेटे की मौत भी हुई, जिसका जिक्र पहले कर चुका हूं. लेकिन आस्तिक भट्ट जी इसे अपनी किस्मत और ईश्वर की इच्छा मानकर झेल गए. मैं उनसे प्रतिप्रश्न करना चाहता था कि ईश्वर ने उनके लिए पहाड़ जाने पर सब भला ही सोचा था और ज्योतिषी, तांत्रिक सब पहाड़ लौटने पर सब ठीक होगा यह कह रहे थे, फिर यह आघात क्यों सहना पड़ा ? लेकिन बेटे की मौत के जिक्र पर उनकी आंखों में कोशिश करके भी न छिप सकने वाली उभरती दर्द की लकीरों ने मुझे रोक दिया. लेकिन अपने देस अपनी मिट्टी को लेकर उनका प्यार अप्रतिम है.

भट्ट जी उन्हीं मिसेज भट्ट की सास जो रिश्ते में उनकी दादी लगती थीं और अभी हाल में ही जिनका 96 वर्ष की उम्र में देहांत हुआ, के साथ पहली बार अपने गांव पहुंचे. घर तो बचा नहीं था लेकिन बाद की पीढ़ियों के लोग गांव में थे. बताते हैं कि पहले उन लोगों को लगा कि मुझे अपनी जमीन और हिस्सा चाहिए इसलिए रिश्ते की एक ताई ने बड़ा रुखा व्यवहार किया. लेकिन मुझे तो कुछ चाहिए नहीं था. मेरे लिए तो अपने पुरखों की धरती को छू पाना ही सब कुछ था. मैं जहां का था उसे देख पाया, यही बहुत था. आज भी बीस बरस का समय गुजरा, भट्ट जी साल में एक दो बार गांव जरूर जाते हैं. गांव के कुल देवता- देवियों की पूजा हो या किसी के यहां शादी -ब्याह. गांव के खसरा-खतौनी में उनके पिता या दादा का नाम नहीं है और ना ही उन्होंने इसके लिए कोई प्रयास किया. जबकि अल्मोड़ा में बरसों से वह एक किराए के मकान में ही रहते चले आ रहे हैं. अपनी माटी से यह निस्वार्थ प्रेम, हमारे समय में विरल ही है.

एक दिन ऐसे ही हम दोनों अल्मोड़ा की गेवार घाटी कही जाने वाली, इलाके के गांव में जहां आजकल मेरा अस्थाई डेरा है, बैठे रात को गप्पें लड़ा रहे थे. बातचीत अभी के समय पर हो रही थी. इसी क्रम में पहाड़ से पलायन को लेकर, बढ़ती सांप्रदायिक राजनीति आदि पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि हिंदू मुस्लिम का झगड़ा लगाना बेकार की बात है. यदि मुसलमान को आप कहेंगे कि बाहर से आए तो हम लोग भी तो पहाड़ में पीढ़ियों पहले बाहर से ही आकर बसे हैं. उनके हिसाब से मध्यकाल में कभी इधर आए होंगे. उसके पहले तो यहां के पर्वतीय समुदाय और जनजातियां ही थीं. अब यदि वह कहें कि तुम लोग बाहरी हो, हमारी धरती छोड़ो, तब कैसा लगेगा ? एक धार्मिक और जाति से ब्राह्मण भट्ट जी विभिन्न समुदायों से अपने मेल मिलाप की जानकारी भी देते हैं और साफ कहते हैं यह खराब राजनीति है. जिस समय उत्तराखंड के पहाड़ के अंदरूनी गांव तक में मुस्लिम विद्वेष की विषबेल गहरे तक जड़ जमाए दिखती है और बात-बात में जाहिर होती है, उस दौर में भट्ट जी का उसके प्रतिकार का यह अपना तर्क है.

इसी दौरान वह मुझसे पहली बार मिलने का एक रोचक प्रसंग भी सुनाते हैं, जो मेरे लिए भी आश्चर्यजनक था. लेकिन समय और जगह दोनों वह सटीक बता रहे थे. हल्द्वानी के जिस जज फार्म की कॉलोनी में वह रहते थे, वहीं लेखक- यायावर मित्र अशोक पांडे का घर भी है. ठीक-ठीक वर्ष तो नहीं याद आ रहा पर नैनीताल में युगमंच-जन संस्कृति मंच द्वारा आयोजित होने वाले नुक्कड़ नाटक समारोह में हमलोग इलाहाबाद से अपनी टीम ‘दस्ता’ लेकर 87 से 97 के बीच लगातार आते थे और इस दौरान दो-तीन बार जरूर अशोक के घर पर भी रहना हुआ. अभी अशोक के पिता जी जीवित थे और हम लोगों की सिगरेट फूंकने की आदत. रात में तो जुगाड़ सही था पर दिन में मुश्किल थी. सो कालोनी की उस समय की इकलौती दूकान, जो बिसलेरी का पानी वगैरह बेचता था, वहीं हम लोग जाकर सुट्टा मारते और गप्पें लड़ाते. भट्ट जी का कहना था कि पहली बार उन्होंने मुझे वहीं देखा था और हम लोगों की किताबों पर बातचीत सुनकर कुछ धार्मिक पुस्तकें भी मुझे दी थीं. भट्ट जी तब वहीं दुकान के पीछे किराए के एक घर में रहा करते थे. मेरी स्मृति में यह बात तो बिल्कुल नहीं है लेकिन बाकी सारी बातें सोलहो आने सच हैं. इसलिए उनकी अनुभव से तपी आंखों और स्मृति पर विश्वास न करने का कोई कारण मुझे नजर नहीं आता.

आज सोचता हूं, अपने आसपास रहने वाले ऐसे लोगों से हमारी कितनी जान- पहचान है ? कोई भट्ट जी के जीवन के इस पूरे घटनाक्रम को तथाकथित जड़ों की तलाश कह सकता है, उसे काटने के तर्क भी हैं. लेकिन जो सबसे अहम बात है जिसे हम सब भूल जाना चाहते हैं, वह यह कि एक भूमिहीन मनुष्य कैसे इस दौर में भी, जब पैसा ही सब कुछ है, वह अपनी जमीन की तलाश पैसे की खातिर करने नहीं लौटा है. उसकी अपनी भाषा, अपनी धरती, अपने देस के प्रति एक वैकल्पिक अवधारणा है. वह चाहे जितनी भी धार्मिकता के आवरण में लिपटी हो लेकिन फिर भी यह प्रेम उसे अन्य धार्मिक रीति-रिवाजों को मानने वाले लोगों को ‘दूसरा’ नहीं बनने देता. राजनीति में तो ऐसे लोगों का मूल्य सिर्फ एक वोट तक सीमित है, हाशिए पर भी शायद जगह नहीं बची है इनके लिए ? लेकिन क्या हमारी साहित्यिक- सांस्कृतिक- सामाजिक परंपरा में हमारे आस-पास के ऐसे चरित्रों को एक मूल्य के रूप में कोई स्थान हासिल है ?

5 सितम्बर, 2021, अल्मोड़ा

के के पांडेय
के. के. पाण्डेय समकालीन जनमत (प्रिंट) के संपादक हैं । Email: kkjanmat@gmail.com
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