संजू: इसे बायोपिक की तरह न देख कर देखिए

फ़िल्म संजय दत्त की ज़िंदगी की तमाम सचाइयों को दिखाती हो या नहीं, जिस कहानी को वह सचमुच दिखाती है, वह भरोसेमंद, मार्मिक और इतिहास-संगत है या नहीं ? फ़िल्म के मूल्यांकन की सही कसौटी यह होनी चाहिए.

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उन्नीस की बलिवेदी पर कश्मीर

कश्मीर को एक बार फिर चुनावी राजनीति की बलिवेदी पर चढ़ा दिया गया है. कश्मीर की निरन्तर जारी त्रासदी का सबसे बड़ा कारण यही है कि भारत और पाकिस्तान दोनों ही देशों में यह चुनावी वैतरणी का सबसे बड़ा सहारा बना रहा है.

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काला : फ़ासीवाद की पहचान कराती फ़िल्म

सुपरस्टार रजनीकांत की जानी पहचानी शैली की फ़िल्म होते हुए भी महज एक कल्ट फ़िल्म नहीं है. यह देश के वर्तमान राजनीतिक माहौल का नाटकीय रूपक बनने की भरपूर कोशिश करती है और इसमें दूर तक सफल भी होती है.

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मरे हुए तालाब में लाशें नहीं विचारधाराएं तैर रही हैं

“जंगल केवल जंगल नहीं है नहीं है वह केवल दृश्य वह तो एक दर्शन है पक्षधर है वह सहजीविता का दुनिया भर की सत्ताओं का प्रतिपक्ष है वह ” अनुज लुगुन की लम्बी कविता ” बाघ और सुगना मुंडा की बेटी ” का एक अंश। यह चर्चित कविता हमारे समय के आदिवासी संघर्ष और सलवा जुडूम की पृष्ठभूमि में लिखी गई है। बाघ के साथ आदिवासी का प्रेम और भय का एक जटिल रिश्ता रहा है। लेकिन मानव रूपी बाघों की बात अलग है।वे बाघ के संरक्षण की योजनाएं बनाते…

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राज़ी : नागरिकता और मनुष्यता का अन्तर्द्वन्द्

नेशन फर्स्ट भूमण्डलित दुनिया का नया फैशन है। अमरीका से लेकर रूस तक इसी नारे पर चुनाव जीते जा रहे हैं। भारत में भी इन दिनों इसी का बोलबाला है। यह एक नई नैतिकता है जिसे हर तरह की नैतिकता के ऊपर बिठा दिया गया है। इस सुपर नैतिकता के पीछे भी एक डर है- देश के टूट जाने का डर। ये डर ही सभी पूर्वग्रहों, नफरतों और पागलपन की जड़ है।

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‘ राष्ट्रीय खलनायक ’ राजिंदर सच्चर

  राजघाट पर वह सन दो हज़ार बारह के मार्च की एक सुबह थी. सोरी सोनी के पुलिसिया उत्पीड़न का विरोध करने के लिए वहाँ कुछ लोग गांधीवादी कर्मकर्ता हिमांशु कुमार के साथ भूख हड़ताल पर बैठे थे. इनमें से एक लगभग नब्बे बरस के जस्टिस राजिंदर सच्चर भी थे. वे दो नौजवानों के कंधों का सहारा लेकर धीरे धीरे चलते हुए वहाँ आए थे. देख कर कुछ क्षण को ऐसा लगा जैसे ख़ुद महात्मा गांधी अपनी समाधि से उठकर चले आ रहे हों. सत्य की रक्षा के लिए सब…

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मानसा में सखी सुल्तान

  इस 23 मार्च को पंजाब के मानसा कस्बे में भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की तीन ख़ूबसूरत मूर्तियों का अनावरण किया गया. अनावरण  भाकपा माले महासचिव कॉमरेड दीपांकर भट्टाचार्य के हाथों हुआ. इसी के साथ माले के पांच दिन चलने वाले राष्ट्रीय सम्मेलन की शुरुआत हुई लेकिन यह आलेख सम्मेलन के बारे में नहीं है. ऊंची टँकी वाले जिस छोटे-से साफ सुथरे पार्क में ये मूर्तियां स्थापित हैं, वहां से एक ऊबड़-खाबड़ सी सड़क घूम कर गेहूं की कच्ची फसलों के लहराते समंदर के किनारे स्थित सम्मेलन-स्थल की तरफ़…

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