समकालीन जनमत
शख्सियत स्मृति

‘ राष्ट्रीय खलनायक ’ राजिंदर सच्चर

 

राजघाट पर वह सन दो हज़ार बारह के मार्च की एक सुबह थी. सोरी सोनी के पुलिसिया उत्पीड़न का विरोध करने के लिए वहाँ कुछ लोग गांधीवादी कर्मकर्ता हिमांशु कुमार के साथ भूख हड़ताल पर बैठे थे. इनमें से एक लगभग नब्बे बरस के जस्टिस राजिंदर सच्चर भी थे. वे दो नौजवानों के कंधों का सहारा लेकर धीरे धीरे चलते हुए वहाँ आए थे. देख कर कुछ क्षण को ऐसा लगा जैसे ख़ुद महात्मा गांधी अपनी समाधि से उठकर चले आ रहे हों. सत्य की रक्षा के लिए सब कुछ दांव पर लगा देने का माद्दा दोनों में एक जैसा था.

हिंदुत्व अफ़साने का विखंडन

पिछले कुछ्ह दशकों में ‘ हिंदुत्व ‘ के सिपहसालारों ने जिन जीवित लोगों के खिलाफ़ सब से ज़्यादा नफरत फैलाई है, उनमें तीन जज हैं. बी एन श्रीकृष्ण, मनमोहन सिंह लिब्रहान और राजिन्दर सच्चर. लिब्राहन आयोग ने बाबरी मस्जिद के विध्वंस की जांच की थी. पाया यह था कि यह कोई आकस्मिक घटना न थी. इसे हिंदुत्व-वादी संगठनों ने योजनाबद्ध ढंग से अंजाम दिया था. श्रीकृष्ण आयोग ने विध्वंस के बाद मुंबई में हुए भीषण दंगों की जांच की थी. पाया यह था कि ये दंगे भी सुनियोजित थे. अल्पसंख्यकों के कत्लेआम के लिए शिवसेना और सरकारी मशीनरी ने मिलजुल कर काम किया था.

दो हज़ार छह में बने सच्चर आयोग ने हिन्दुस्तान में मुसलमानों की वास्तविक हालत का आकलन किया था. इससे पता चला कि मुस्लिम तुष्टीकरण का जुमला एक निहायत झूठा जुमला है . आज़ाद भारत में मुसलमानों की हालत हर लिहाज से बद से बदतर होती गई है. आर्थिक दृष्टि से मुसलमान इस देश की तलछंट हैं. सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से नितांत शक्तिहीन है. सत्ता के निकायों में उसकी आवाज़ लगभग अनुपस्थित है.

हिंदुत्ववादी फासीवादी राजनीति अपना काम करती रही. उसकी ताक़त दिन ब दिन बढ़ती गयी है. लेकिन इन तीन आयोगों के काम ने हिंदुत्व के अफ़साने की हवा निकाल दी है. भविष्य में जब कभी यह देश सन्मति की तरफ़ लौटेगा, वह इन तीन जजों का शुक्रगुजार होगा. इनके ठोस काम के चलते वे तमाम झूठ हमेशा झूठ ही बने रहेंगे, जिन्हें सच की तरह चलाने की हर मुमकिन कोशिश की गयी.

मुस्लिम मिथकों का उन्मूलन

इस देश में साम्प्रादायिक उन्माद की राजनीति दो अफ़वाहों के सहारे चलती रही है. एक तो यह कि वोटबैंक के लिए मुसलमानों का तुष्टीकरण किया जाता रहा है. इसके चलते हिन्दुओं के सामने अस्तित्व का ख़तरा पैदा हो गया है. दूसरे मुसलमान धार्मिक रूप से इतने कट्टर हैं कि परिवार नियोजन को नहीं मानते. वे हम चार, हमारे चालीस में विश्वास करते हैं. हिन्दुओं को अल्पसंख्यक बना देने पर आमदा हैं. इन्ही दो अफ़वाहों के सहारे हिन्दुओं को डरा-डरा कर उन्हें हिंदू वोटबैंक के रूप में संगठित किया गया है. इस हद तक डराया गया है कि वे भयानक बेरोजगारी , मंहगाई , भ्रष्टाचार और सीमा पर असुरक्षा जैसे मुद्दों को भूलभाल कर दक्षिणपंथी पार्टियों के चुनावी चारे बने हुए हैं.

सच्चर समिति ने तथ्यों, आंकड़ों और उनके तर्कसंगत विश्लेषण के आधार पर प्रामाणिक रूप से न दोनों अफवाहों की धज्जियां उड़ा दीं. पता चला कि परिवार नियोजन अपनाने के मामले में मुसलमानों का रिकार्ड दूसरे कई समुदायों से बेहतर है. उनकी दुर्दशा का मुख्य कारण गरीबी और अशिक्षा है, जो राजनीतिक और सामाजिक भेदभाव की उपज है.

सच्चर समिति को नियुक्त करने वाली मनमोहन सरकार ने इन निष्कर्षों को आम जनता तक पहुंचाया होता और उसके सुझावों पर तनिक भी गम्भीरता से अमल किया होता तो आज का राजनीतिक परिदृश्य अलग होता. लेकिन इसके लिए सरकार के पास न तो इच्छा शक्ति थी, न ही नैतिक साहस था.

तो भी भारत के अल्पसंख्यकों की वास्तविक स्थिति सामने आ चुकी थी. सजग भारतीयों को शर्मसार के लिए यह जानकारी बहुत थी कि घोषित सेक्युलर मुल्क भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की हालत कट्टर इस्लामी देश पाकिस्तान से बेहतर न थी.

जस्टिस सच्चर भारत के उन यशस्वी जजों में हैं , जो हमेशा सत्ता के विरुद्ध सत्य के साथ रहे। उन्होंने इमरजेंसी के दौरान सरकारी लाइन का समर्थन करने से इनकार किया और तबादला भुगता. सन चौरासी के गुनाहगार नेताओं के ख़िलाफ़ एफ़ आई आर करने की पहली पुरजोर सिफारिश की. भारत से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक उन्होंने मानवाधिकारों के संघर्ष को बौद्धिक और विधिक नेतृत्व दिया.

एक ईमानदार बौद्धिक

यह कहना जरूरी है कि गांधीजी और जस्टिस सच्चर की शख्शियतों में एक बुनियादी भेद था. गांधीजी ने हमेशा ‘ अंतरात्मा की आवाज़ ‘ पर जोर दिया. जीवन व्यवहार को अंतरात्मा की आवाज़ के मुताबिक़ ढालना उनकी राजनीति का बुनियादी सूत्र था. लेकिन जस्टिस सच्चर के लिए अंतरात्मा की आवाज़ जैसी किसी रहस्यमय चीज का महत्व न था, उनकी सजग बौद्धिकता का था. उन्होंने अपनी चेतना की आवाज़ सुनी. किसी भी दबाव में अपनी चेतना के साथ समझौता नहीं किया.

ऐसे बौद्धिक आज विरले हैं. जजों की हालत यह है कि साथी जजों के आर्तनाद और इम्पीचमेंट की उठती गुहार के बावजूद सत्ता का रुख देखकर हास्यास्पद फ़ैसले देने से भी नहीं हिचक रहे. ऐसे उन्मादी दौर में एक ऐसे व्यक्ति का होना अत्यंत मूल्यवान था, जो अपनी चेतना की गरिमा की रक्षा के लिए राष्ट्रीय खलनायक बना दिए जाने की संभावना से भी विचलित न होता था .

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