समकालीन जनमत
कविता साहित्य-संस्कृति

मरे हुए तालाब में लाशें नहीं विचारधाराएं तैर रही हैं

“जंगल केवल जंगल नहीं है
नहीं है वह केवल दृश्य
वह तो एक दर्शन है
पक्षधर है वह सहजीविता का
दुनिया भर की सत्ताओं का प्रतिपक्ष है वह ”

अनुज लुगुन की लम्बी कविता ” बाघ और सुगना मुंडा की बेटी ” का एक अंश। यह चर्चित कविता हमारे समय के आदिवासी संघर्ष और सलवा जुडूम की पृष्ठभूमि में लिखी गई है।
बाघ के साथ आदिवासी का प्रेम और भय का एक जटिल रिश्ता रहा है। लेकिन मानव रूपी बाघों की बात अलग है।वे बाघ के संरक्षण की योजनाएं बनाते हैं और बाघ विलुप्त हो जाता है। वे आदिवासी को ‘सभ्य’ बनाते हैं और आदिवासी उपनिवेश बन जाता है। इस परियोजना में आदिवासियों के बीच मौज़ूद कुछ मानव बाघ भी मदद करते हैं।
महाकाव्यात्मक आदिवासी नृत्य जदुर की तरह यह कविता एक मंथर दीर्घ लय में लहर दर लहर निर्मित होती है ।
यह समकाल के साथ आदिवासी संघर्ष के समूचे इतिहास को अपने आगोश में समेट लेती है ।
हिंदी के आदिवासी युवा कवि अनुज लुगुन की कविताओं में नक्सलवादी कविता की अनुगूंजें साफ सुनाई देती हैं। नक्सलवादी कविता कहने से जेहन में नवारुण भट्टाचार्य, पाश, वरवर राव, आलोकधन्वा और गोरख पांडेय जैसे कवियों की कविताएं उभरती हैं। इन कविताओं में कविता को व्यवस्था की अंतर्निहित हिंसा को ढंकने, सहलाने या चुभलाने की तजवीज़ के रूप में नहीं रचा जाता था। असल में वे ऐसी हर तजवीज़ की धज्जियां उड़ाने के क्रम में निर्मित होती थीं।
जैसे हिंसा और क्रूरता को वैसे ही कई बार प्यार, कोमलता और सुंदरता को भी कविता में सेंसर किया जाता है। कुलीन हाथों में कविता स्वयं सेंसर का उपकरण बन जाती है। नक्सलवादी कविता ने भाषा में कविता के सेंसर को उतारने का काम किया।
अनुज की कविता में यह अनुगूंज कभी गढ़चिरौली में मुठभेड़ के नाम पर हुए आदिवासियों के जनसंहार के रूप में चली आती है, कभी सहारनपुर में रचे जा रहे यातनाओं के विमर्श के बहाने, कभी रायफल चलाती मां की छवि के बहाने और कभी चाँद की खाल से जूते बनाने की चाँदचौरा के मोची की ज़िद के बहाने। यह यों ही नहीं है कि उनकी एक कविता में आलोकधन्वा की नक्सल दौर की प्रसिद्ध कविता ‘गोली दागो पोस्टर’ की स्मृति औचक चली आती है।
अगले वक़्तों के कवियों से अलग अनुज की कविता की ख़ास विशेषता यह है कि वे शब्दों और वाक्यों में कम, अनुभवों और क्रियाओं में अधिक लिखते हैं। जीवन का एक वास्तविक हरा-भरा जंगल उनकी कविताओं में रहता हैं, जिसमें कविता की टोह लेते वे लगातार घूमते रहते हैं।
भारतीय समाज में वर्ग और जाति के अन्याय हज़ारों वर्षों से रहे है। लेकिन कुछ समय पहले तक उन्हें चुनौती देनेवाली अनेक विचारधाराएं सक्रिय दिखती थीं। गाँधीवादी, आम्बेडकरवादी, लोहियावादी और मार्क्सवादी विचारों की आपसी असहमतियां और समस्याएं अपनी जगह लेकिन उनकी उत्साही सक्रियता जाति और वर्ग की सत्ता को आज की तरह निरंकुश और निर्द्वन्द्व होने से रोकती थी।
मौजूदा दौर में ये वैचारिक चुनौतियां आप्रासंगिक होने की हद तक शिथिल नज़र आती हूं। इस बदलाव की मार्मिकता को ‘मरे हुए तालाब में लाशें नहीं विचारधाराएं तैर रही हैं’ जैसी पंक्ति की वेधक व्यंजना में महसूस किया जा सकता है। यह पंक्ति विचारधारा के अंत की उद्घोषणा नहीं है, बल्कि उनकी धूमिल होती हुई प्रासंगिकता पर एक शोकगीत है।
ये पिछले महीने भर में लिखी गईं पांच कविताएँ हैं, जिनमें से एक उनकी मातृभाषा मुंडारी में हैं। :आशुतोष कुमार, दिल्ली विश्वविद्यालय

 यह दान का समय नहीं 

यह दान का समय नहीं है
कबूतरों से उनके पेड़ विस्थापित हो चुके हैं
जड़ों में पानी नहीं कि वे सूख न सकें
बारिश अब मौसम की मार झेल रही है
और एक मजदूरिन अपने स्त्री होने का गीत गा रही है

हाँ, अब यह दान का समय नहीं
दया निर्वासित है अपनी आत्मा से
धर्म हत्यारा है ईश्वर का
दयावान होना अब कोई मुहावरा नहीं
मसीहा होने के लिए भी हत्या जरूरी है

एक कबूतर के लिए एक पेड़ का दान ठीक नहीं
जड़ों को जमीन कौन दे सकता है दान में
बारिश को भला कौन दे सकता है बादल दान में
और वह मजदूरिन जो गीत गा रही है
उसे तो अब तक ठीक से उसकी मजदूरी भी नहीं मिली

माफ़ करें! सभी धर्म ग्रंथ
अपने दान का उपदेश शीघ्र स्थगित करें।
20/05/18

एक कविता सहारनपुर

जिन्हें पेड़ होना था वे आततायी हुए
जिन्हें छाँव होना था वे बंजर हुए
और जो दलित हुए
उन्हें गुठलियों की तरह रोपा जाता रहा संसदीय खेत में

मजदूरी अब विषय नहीं जाति का उत्सव है
अब हत्याओं की होड़ कारीगरी है
मरे हुए तालाब में लाशें नहीं
विचारधाराएं तैर रही हैं
जिन्हें विमर्श रुचिकर नहीं लगा
प्रति विमर्श को उन्होंने खंजर की जगह दी
यह साहित्य में है, यह चिंतन में है
यह राजनीति में है, यही सहारनपुर है

जिनकी संतानों को पेड़ होना था
जिनकी संतानों को हरा होना था
वे समाजशास्त्र के विषय में फेल हुए
और वे उठा लाये अपने पुरखों की हिंसक कब्रें
झूठी शान और स्वाभिमान का जातीय दंभ
इतना क्रूर और इतना जहरकारी कि बौद्धिक तक उससे मुक्त नहीं
खून वहीं से रिस रहा है
गोली वहीं से चल रही है

सबको होना तो पेड़ ही था
हरे होते, फूल होते, साँसे होती
लेकिन छूटता कैसे उनका अहंकार
और भूलते कैसे हम यातनाएँ
कब तक भंगी कहलाते
कब तक आदमी न कहलाते
होना था ही इतिहास में, जो हुआ सहारनपुर में
क्या कुछ नहीं हुआ हाल ही में गढ़चिरौली में?

मुक्त नहीं हैं हम विभाजन से
तटस्थ नहीं हैं हम सवालों से
हम पहचाने जाएँगे आखिर
गोली चलेगी जब
तब किधर होगा हमारा सीना
यहाँ वर्ग है, विमर्श नहीं
यहाँ वर्ण है, बहस नहीं
‘यह गोली दागो पोस्टर है’ विज्ञापन नहीं

शुक्र होगा सब यह जान जाएँ
कौन बकरी चरावे जेठ में
कौन कलेजा सेंके गुलामी में
कौन लिखे लाल इतिहास
साँवले चेहरों के नीले कंधों पर.?

यह विमर्श है यातनाओं का
जिन्हें न रुचे वह लौटे अपने जातीय खोल में
और हमें ललकारे
यह युग हमारा है,यह इतिहास हमारा है
चलेंगे साथ वे जो मानुख होंगे, खरे होंगे।
15/05/18

मेरी माँ, मैं और भेड़िये

उसके दरवाजे हमेशा जंगल की ओर खुलते रहे
और वह बीहड़ों में चलती रही
भेड़ियों की पदचाप
सबसे पहले वही सुनती है आज भी
इसी तरह कई दशकों से वह हमें सहेज रही है

नक्सलबाड़ी के ठीक समय उसका जन्म हुआ होगा
उसकी माँ एक दिन दूसरी शादी करके चली गई
वह एक पके फल की तरह धरती पर नहीं गिरी
लेकिन वह गिरते हुए लोगों को देख रही थी
कुछ लालच में गिर रहे थे और कुछ गोली खाकर
उसने यह फर्क जान लिया था
और वह जंगलों में रायफल चलाना सीख आयी

कविता में यह बेतुकी बात हो सकती है कि
एक माँ रायफल चलाती है
लेकिन आलोचकों को यह बात स्वीकार करनी चाहिए
और उसके प्रतिमानों पर बहस करनी चाहिए
कि जब जंगल में भेड़ियों से घिरे हों उनके बच्चे
तो उनकी माँ को क्या करना चाहिए

और माँ ने वही किया जो एक माँ को करना चाहिए
वह भूमिगत हुई, वारंट निकले
लेकिन उसने समर्पण नहीं किया
बच्चों के लिए इससे ज्यादा और वह क्या कर सकती थी

वह हँड़िया बेचती थी और पीट आयी वसूली करनेवाले दरोगा को
वह मुर्गी बेचती थी और आँख तरेर आयी दबंगों को
उसके पास कुछ भी नहीं बचता था हाट से घर लौटते हुए
रोज रोज वह ऐसे ही किस्से सुनाती थी हम सबको
वह कुछ और दे भी नहीं सकती थी हमें इन किस्सों के सिवाय
पिज्जा, बर्गर, वीडियो गेम, टीवी – फीवी कौन जाने
वह तो गुरिल्ला थी और क्या दे सकता है एक गुरिल्ला अपनी जान के सिवाय

उसके दरवाजे आज भी जंगलों की तरफ खुलते हैं
और वह बीहड़ों में चलती है
माँ ऐसी ही होती हैं
वह न खुद बिकती है
न अपने बच्चों को बिकने देती है
न ही खेत, खलिहान और जंगलों को बिकने देती है।

(13/05/18)

 

चाँद चौरा का मोची


चाँद चौरा का मोची
चाँद की टहनी पर अटका है
वह कभी भी गिर सकता है अनंत अमावस्या की रात में

कितनी अजीब बात है कि चाँदनी रात के लिए भी
उसके पास वही औजार होते हैं
जिनसे वह दिन में लोगों के जूते चमकाता है
सचमुच वह सनकी कलाकार है वह कला की बातें नहीं जानता
वह चमड़े से घिरा रहता है और भूख के पैबन्दों को सीता है

मैं जब भी चाँद चौरा की तरफ निकलता हूँ
मेरे सामने महाबोधि होता है और पीठ पीछे बिष्णुपद मंदिर
इन्हीं के बीच में वह हमेशा मिलता है मुझसे मेरे जूते माँगते हुए
उसकी आँखें कमजोर हो गयी हैं, हाथ काँपते हैं
फिर भी वह अपने हुनर की जिद पकड़ कर रखता है

कभी कभी वह अपनी जाति की बात ईमान से कह जाता है
कहता है चाँद चकोर की बातें हमसे न कहना बाबू
बहुत बदरंग हैं ये कितने किस्से सुनोगे इसके
क्या तुम नहीं जानते शम्बूक के सर के ऊपर आसमान के चाँद को
क्या तुम बेलछी, लक्ष्मणपुर-बाथे नहीं जानते
बहुत भोले मत बनना बाबू
हमको चाँद चौरा में चाँदनी नहीं जूते मिलते हैं

सचमुच सनकी मोची है वह कला नहीं जानता
बात-बात में उसने मेरी जात जान ली है
तिरछे मुस्का कर कहता है तुम तो मेरी बिरादरी के निकले
तुम चाँद की खाल निकालते हो कविता से
और मैं भी एक दिन चाँद के चमड़े का जूता बनाऊंगा |
12/4/18

दअ: अन्जेदो: तना
(एक मुंडारी कविता)

नई दअ: गड़ा दअ: अन्जेदो:तना
झीरी दअ: डाडी दअ: अन्जेदो:तना
ओड़े चेंड़े को तेतंगोओ तना
उरिइ मेरोम को तरासोओ तना
जपअ: रअ: गोलांची दारुयो गोसो: तना
जपअ: रअ: बाबा लोयोंगओ रोहोड़ओ तना
निमिनंग जेटे दो का सहातिंगोआ
निमिनंग सितुम दो का बुगिना

सेंगेल दअ: जअ: हिजुआ
सेंगेल दिसुम जअ: रुअड़ा
सिगिद सिगिद तन बु बुआलो:आ
रोंगोओ जकेद जअ: बु अतरो:आ

ओको हो को हो सेंगेल जुल तना
ओको हो को हो मेड़ेद गलाव तना
लुटुकुम हड़मो बंगइ:या
लुटुकुम बुडीयो बंगइ:या
खसरा कोड़ायो बंगइ:या
सिंगबोंगायो बंगइ:या
सोसोबोंगा के ओको हो या जतननेया
बुरु बोंगा के ओको मुण्डा या उम्बुललेया

निदा सिंगी, सिंग सटु:ब
लिंगी दअ: दो अन्जेदो:तना
निदा सिंगी, सिंग सटु:ब
होड़ होन को तेतंगोओ तना
ए हो मुण्डा होन बुरु सेन चिम रिड़ीन्ग केदा
ए हो बुरु होड़ सार तुईंग चिम रिड़ीन्ग केदा |
10/05/18

 

 

 

 

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