समकालीन जनमत
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भय, दिग्विजय और नामवरीय ‘विडंबना’

(हिन्दी आलोचना के शिखर पुरुष नामवर सिंह नहीं रहे । उन्हें समकालीन जनमत की तरफ से विनम्र श्रद्धांजलि ।)

यह एक ऐसा प्रसंग है, जिससे नामवर सिंह की आलोचकीय नज़र और ईमानदारी की सबसे साफ झलक मिलती है।

राष्ट्रवाद का जो कोलाहल इन दिनों सुनने को मिल रहा है, वह उस तूफान के सामने कुछ भी नहीं है, जो भारत चीन युद्ध के दौरान देखने को मिला था। बड़े बड़े प्रगतिशील कवि भी भावनाओं के उस ज्वार में तिनके की तरह बह गए। इनमें शमशेर जैसे शिखर कवि भी थे।

पर उन्ही दिनों एक नया नौजवान कवि भी था, जिसके पांव विवेक की जमीन से जरा भी नहीं डिगे । सिर्फ उसी की कविता समय के उस सच को कह सकी, जिसे छिपाने के बड़े बड़े उपक्रम किए जा रहे थे। नामवर सिंह की आलोचना न होती तो शायद ही उसकी तरफ किसी का ध्यान जाता।

ज्ञानोदय में नामवर सिंह का लेख छपा – “नंगी और बेलौस आवाज़।” यह लेख इस आलोचकीय परिघटना का दस्तावेज़ है। इस लेख का यह अंश आज के दौर में बार बार और हर बार बहुत ध्यान से पढ़ा जाना चाहिए।

”और एक गूँज रह जाती है शोर के बीच जिसे सब दूसरों से छिपाते हैं, नंगी और बेलौस। कहते हैं, वह सत्य है और कविता ही है जो उस सत्य को व्यक्त करने का जोखिम उठाती है। यह दावा कवि का तो रहा ही है, लोग भी शुरू से कुछ ऐसा ही विश्वास करते आये हैं — बावजूद इस ऐतिहासिक तथ्य के कभी-कभी कवि भी उस ‘सब’ में शामिल रहे हैं, यहाँ तक कि जिसे सबने नहीं भी छिपाया उसे कवि छिपा गए और इस तरह कविता के इतिहास में एक सत्य एकदम अनकहा चला गया।

दिक्कत कहाँ आती है, यह प्रश्न है और आज का शायद सबसे ज्वलन्त प्रश्न ! शोर फिलहाल चीनी हमले का ही है, इसलिए सत्य की खोज की शुरुआत इसी शोर के बीच। और सत्य ही खोजने निकले हैं तो सबसे आकर्षक है ‘सत्यमेव जयते’ शीर्षक कविता, मई, ‘६३ की ‘कल्पना’ में प्रकाशित, श्री शमशेर बहादुर सिंह की।

‘बात बोलेगी हम नहीं’ के कवि शमशेर से पहले ही से कौन आश्वस्त न होगा कि वे शोर मचानेवालों में नहीं हो सकते ! ‘मौन’ का कवि और शोर ! आकर्षण स्वाभाविक है। कविता में भी ‘सत्य’ और ‘सच्चाई’, कवि का प्रिय शब्द एक बार नहीं, अनेक बार। इतने पर भी कोई कमी दिखे तो कविता का अन्त देखिए : सत्यमेव जयते, सत्यमेव जयते, सत्यमेव जयते का तीन बार जयघोष ! नाटकीयता की पराकाष्ठा, भाषण-कला का उच्चतम आदर्श !

लेकिन कविता के अन्दर ‘तुम मूर्ख हो’, ‘धन्यवाद पशु’, ‘आवारा प्रेत’, ‘मार्क्स को जला दो’, ‘लेनिन को उड़ा दो’ वगैरह-वगैरह। इस प्रकार कवि कुछ कहता है और कविता कुछ! पाठक किसका विश्वास करें?

कहते हैं, थोथा चना बाजे घना ! कवि को स्वयं बोलना पड़े तो समझिए कि कविता की वाणी को पक्षाघात है ! यह कैसा ‘रेटरिक’ कि भाषा शब्द से अपशब्द के स्तर तक स्खलित हो गई ! ‘सत्यमेव जयते’ की पुष्टि तो बाद में होगी यहाँ तो ‘काव्यमेव जयते’ में ही सन्देह है !

यदि स्वयं कविता की शब्द-योजना, रूप-विन्यास और अर्थ-संगति के अन्दर से ही ‘सच्चाई’ की उपलब्धि नहीं होती तो फिर कवि के मन की सच्चाई को लेकर क्या होगा? और फिर कविता के अलावा कवि की उस आन्तरिक सच्चाई को जानने का दूसरा साधन भी क्या है? और यदि वह दूसरा साधन सुलभ भी कर लिया जाए तो इस कविता के मूल्यांकन में उसकी क्या प्रासंगिकता है?

सवाल यह है कि एक समर्थ कवि भी सत्य-कथन से विचलित होकर शोर में कैसे शामिल हो गया? किसी भय से? कहने की आवश्यकता नहीं कि ये तमाम प्रश्न परस्पर सम्बोधित हैं, खास तौर से उस स्थिति में जबकि एक रचना सत्य-कथन से स्खलित होने के साथ ही काव्य के स्तर से भी स्खलित हुई हो। इस प्रकार काव्यात्मक प्रश्न अन्ततः नैतिक प्रश्न हो जाता है।

वस्तुस्थिति पर कवि की पकड़ ढीली होती है, तो अभिव्यक्ति में शब्द अस्पष्ट-से आते हैं, कहीं धराऊँ शब्द तो कहीं मुँह-भराऊँ शब्द। कविता कहीं नारा हो जाती है तो कहीं वक्तव्य, कहीं उपदेश तो कहीं गाली, भाव-व्यंजना के स्थान पर भावुकता प्रकट होती है और आवेश में काव्य टूटने लगते हैं, लय लड़खड़ाने लगती है। और कुल मिलाकर उपलब्धि कवि के लिए एक रिक्ति और पाठक के लिए विरक्ति। कहाँ का सत्य और कहाँ की वास्तविकता!

लेकिन इस शोर के बीच भी कुछ एक कण्ठों से दूसरे ढंग के स्वर उठे जो या तो सुनाई नहीं पड़े या किसी वजह से दब गए।

जिस समय चारों ओर दिग्विजय की ललकार मची हुई थी, उस समय काशी के एक नितान्त नए कवि धूमिल के मुँह से मैंने ये पंक्तियाँ भी सुनीं : मुझमें सारे समूह का भय चीख़ता है दिग्विजय ! दिग्विजय !!

भय चीख़ता है दिग्विजय ! भय और दिग्विजय। क्या इस विडम्बना में कोई वास्तविकता नहीं है? इन तीन पंक्तियों में जितनी बड़ी विडम्बना को व्यक्त कर दिया गया है वह लम्बे-लम्बे दर्जनों वीर-गीतों से कहीं अधिक काव्यात्मक है।”

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