समकालीन जनमत
कविता

यातना का साहस भरा साक्षात्कार हैं लाल्टू की कविताएँ

धरती प्रकृति ने बनाई है. लेकिन दुनिया आदमी ने बनाई हैं. दुनिया की बीमारियाँ , पागलपन और विक्षिप्तियाँ भी आदमी ने बनाई हैं. लेकिन कविता, सुन्दरता और इंसानियत का तसव्वुर भी आदमी ने ही बनाए हैं.

दुनिया की विक्षिप्ति और इस दुनिया में ‘इंसान’ होने की यातना को बरतने के लिए कविता की जरूरत होती है. इसे विज्ञान के सूत्र और गद्य के सुगठित वाक्य नहीं बरत सकते . बरतने का मतलब है – सामना करना, सहना और एक नई सतह पर फिर से रचना. लाल्टू की कविताएँ यह काम बखूबी करती हैं.

लाल्टू की कविताओं का सफर कष्टसाध्य है . वे अक्सर एक बालसुलभ मासूमियत, निश्छल अवलोकन, आश्चर्य, और जिज्ञासा से शुरू होती हैं. मगर जल्दी ही यह प्रक्रिया एक वैज्ञानिक के व्यवस्थित और पारदर्शी किन्तु जटिल अवलोकन में बदल जाती हैं.

निजी अनुभूति सार्वजनिक अनुभव के वृहत्तर आयामों से जुड़ने लगती है. समय अपनी छुपी हुई तहों को उद्घाटित करने लगता है . एकाकीपन के मायावी पर्दों को हटा कर मनुष्य की यातना अपने वास्तविक स्वरुप में उभरने लगती है .

बीसवीं सदी के बड़े सपनों के मलबे पर खड़ी इक्कीसवीं सदी के कवि की एक बड़ी चुनौती है नाउम्मीदी से नज़रें न चुराते हुए कविता जैसी उम्मीद की खोज करना. अकेलेपन की अपरिहार्यता से इनकार न करते हुए प्यार की अनिवार्यता को स्थापित करना.

लाल्टू इसी अर्थ में इक्कीसवीं सदी के कवि हैं. उनकी कविताओं में अगले वक्तों की कविता की तरह बचाओ-बचाओं की करुण पुकार नहीं है. जैसे दुनिया तो नष्ट हो ही रही है, कवि का काम है, जो कुछ बच सके उसे बचा ले . यह आत्मदया , यह प्रेरित जगत-करुणा, लाल्टू का इलाका नहीं है . यहाँ यातना का साहस भरा साक्षात्कार है . इस साहस से उपजी उम्मीद है.

यहाँ प्रस्तुत लाल्टू की शुरुआती पाँच कविताएँ बज़ाहिर महामारी- काल की कविताएँ हैं. लेकिन ये सिर्फ ताज़ा महामारी की कविताएँ नहीं हैं. वे विक्षिप्त सभ्यता की स्थायी महामारी की कविताएँ भी हैं. यहाँ प्रस्तुत उनकी अन्य कविताएँ उनकी काव्य संवेदना की विभिन्न आयामों का प्रतिनिधित्व करती हैं।

इंसान को आंकड़ों में कब बदला गया. इंसान की फ़िक्र आंकड़ों की चिंता में कब बदल गयी. क्या महामारी के आंकड़े आंकड़ों में बदले जा रहे मनुष्य की नियति से भी ज़्यादा डरावने हैं? लेकिन सड़कों पर भूखे -प्यासे चलने वाले लोग , लोग हैं , आंकड़े नहीं.

“गणित की महामारी है
महामारी का गणित है

तिरछी लकीरें मुड़ती जाती है और-और
हर कुछ एक्स्पोनेंशल है
बदन पर घावों की गिनती है
और कुछ है जो उन पर नमक छिड़क रहा है”

आप महामारी के बारे में कितने भी शोधपूर्ण आलेख पढ़ लें , लेकिन उसके मानवीय सत्य का यह दंश आपको अन्यत्र नहीं मिलेगा. लेकिन लाल्टू की कविता आपको इसी दंश के साथ छोडकर आगे नहीं बढ़ जाएगी. महामारी के अकेलेपन से गुजरते हुए भी ज़िंदगी के रंग आपके सामने खुलते जाएंगे.

अकेले में धरती और सूरज से इतना प्यार करना सीखा है, जितना पहले से मैं चाँद से करता रहा हूँ। काला गड्ढा, सफेद बौना अजीब नाम हैं, जो हमारे प्यारे तारे सूरज की नियति हैं। अकेले में जाना है कि सुंदर मेरे चारों ओर है।

चारों ओर पसरी यातना के बीच चारों ओर मौजूद सुंदर का साक्षात्कार ही, असल में, लाल्टू की कविता है.

लाल्टू की कविताएँ

1. गणित का बसंत

बसंत ऐसा भी होता है।

हवा कुछ कहती सी है कि अब गणित हमारे खिलाफ है
बहुत सारे लोग – अनगिनत, जिनकी गिनती नहीं हो सकती
कहीं जा रहे हैं
वे चुप हैं पर हर कोई कहता है
कि वे कुछ गा रहे हैं

गणित की महामारी है
महामारी का गणित है

तिरछी लकीरें मुड़ती जाती है और-और
हर कुछ एक्स्पोनेंशल है
बदन पर घावों की गिनती है
और कुछ है जो उन पर नमक छिड़क रहा है
खुलते दरवाजों के आगे बटेर हैं
कुछ और आगे मोर हैं
दरख्तों से कोयल की कूक
बसंत तो है

और दिन भर खबरें कि और कितने बीमार हुए कितने मरे
अंजाने ही मजदूरों का बसंत दिखता है
और खयाल आता है कि बसंत
सदियों से ऐसा ही रहा है। यह पहली बार नहीं
कि आस्मान पर जंग के बादल छाए हैं
यही मानव इतिहास है

मौत के साए में जीवन
यही इंसानी तारीख़ है

छोटे कद के जिस्म से तीखे औजार निकालते टिड्डे
धरती को रौंदते चले जाते हैं
जैसे कोई हिंसक यौनिक खेल हो
कौन कह सकता है कि बसंत में कभी धूप भी खिली है
क्या ज़िंदा लाशों की धूप को दिन कहा जा सकता है?

दुनिया हमेशा ही गोल थी
तुम आज इसे जान रहे हो
बसंत के गणित को कब तक सुलझाओगे
उठो कि यह बसंत बदलना है।

2. स्नैप शॉट्स

स्नैप शॉट्स
मजलूमों का हुजूम
ज़ुल्म और ज़ुल्म फिर और ज़ुल्म
और हत्यारे की आभासी शक्ल

यह महज मंज़र नहीं है
होता तो इसे फ्रेम में बाँध लेते
कहीं किसी दीवार पर टाँग देते
कील कमज़ोर होती तो किसी कुर्सी पर चढ़कर
हथौड़े से ठोंकते

सब कुछ इतना सच है
जितना झूठ कभी नहीं हो सकता

सब कुछ गीले सपनों सा तरल है
मक़तल कहाँ है कोई हर पल पूछता है।

3. दीवारें मुझे सुन-सुन कर थक गई हैं

दीवारें मुझे सुन-सुन कर थक गई हैं
हवा थमती नहीं है,
कहीं कोई हथौड़ा बजा रहा है
ऐसे में खुद से गुफ्तगू न करूँ तो और क्या करूँ?

कोई साया है जो मेरा ही है
दरारों में आवाज़ पहुँचती है
सन्नाटा है भी और नहीं भी
कुमार विकल से पूछूँ
कि कैसे जाना कि ‘मार्क्स और लेनिन भी रोए थे’

आवाज़ माथे से उतरी है
सीने पर टिक सी गई है
जैसे वापस चढ़ने का प्लान बना रही है
या कि हाथ बढ़ा कर हवा को पकड़ने की कोशिश में है
हवा भी जानती है
कि कोई नहीं बचेगा
न अहले-हकम और न उनके प्यादे

यह बहते पानी सा क्या सुनता है
बस पानी है जो बहता है
नींद में हूँ या कि जगा हुआ हूँ
सुनता रहता हूँ कि पानी बह रहा है
क्या सभी यादें सभी प्रेम साथ बह जाएँगे
इतने दिनों के बाद लिखा भी तो क्या लिखा
कि रोने के बाद जगा नहीं रह सकता
ओ हत्यारो, मुतमइन रहो कि मैं कुछ नहीं कर पाऊँगा
खुद से गुफ्तगू करता चला जाऊँगा

पर उनसे डरो
वे जो काँपते पाँव समूची धरती की परिक्रमा पर निकल चुके हैं
हर घर हर चप्पे से उठ रही बददुआएँ उनके पाँवों में जम चुकी हैं
हवा भी उनके साथ हो चली है
डरो कि वे लौटेंगे

मेरी बेखुदी का ख़ौफ न रखो
मैं तु्म्हारे बनाए गड्ढों में गिरता जा रहा हूँ
मेरी आवाज़ जो साथ गिर रही थी
ख़ौफ का बवंडर बन निकल पड़ी है
वह अंतरिक्ष में आकृतियाँ तराश रही है
उन आकृतियों से डरो कि वे
मूर्त-अमूर्त सत्ताओं को तहस-नहस करती बार-बार उठ खड़ी होती
अकाल आत्माएँ हैं
उन से डरो

डरो कि वक्त लौटता है
बेरहम बेइंतहा दर्द की रेंगती धार सा रीढ़ की हड्डी से गुजरता है
तब चारों ओर काली बूँदों की बारिश होती है
बंद आखों यह नज़ारा देखो
और डरो।

फिलहाल मैं और क्या करूँ?

4. कौन है जो ऐसी तस्वीरें बनाता है

‘कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं
गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं’

कौन है जो ऐसी तस्वीरें बनाता है
हुसेन, रज़ा, वगैरह छोटे पड़ जाते हैं,
सारी ऑएल पेंटिंग्स खंगाल लो, इतना ख़ौफ़नाक मंज़र न दिखेगा

जो चल रहे हैं, इंसान हैं
औरतें हैं, छातियाँ दिखे न दिखें
बच्चे तो कद से पहचाने जा सकते हैं

कब कहा था मैंने कि अब जीवन में हर साल बदतर ही आना है
हँसते रहना है जब दहाड़ मार कर रोने का वक्त है
पाँव छिल जाएँ, घाव रिसने लगें,
सड़कों पर ठोकर-दर-ठोकर चलते जाना है
यह जान-बूझ कर कि कुछ भी सही नहीं है
हर काम सही वक्त पर सही ढंग से करना है
जब घोर हताशा के बादल ज़हन और आँखों के बीच मँडरा रहे हों
सुनते रहना है कि पॉज़िटिविटी का जमाना है

देर से देर तक सोचते रहना है
कि यह तस्वीर मैंने नहीं चाही थी
मैं किसी और कायनात के सपने देखता रहा हूँ
खुद से नफ़रत का यह बेअंत दौर कैसे आ पहुँचा?

5. सपने उनको भी आते हैं

सपने उनको भी आते हैं
वे कुत्ते-बिल्ली नहीं हैं

इश्क-मोहब्बत तो जानवर भी करते हैं
इधर-उधर सूँघते थके-अघियाए जब सो जाते हैं तो सपने देखते हैं

उनके सपने तितर-बितर हैं
आदतन उनके साथ ऐसा होता है
उनके इश्क अधूरे रहने को ही पनपते हैं
उन्हें याद भी नहीं कि वे कभी तीखी जलन से गुजरे हैं

हरियाली में उन्हें वैसा सुख न मिलता हो
धरती उनके लिए भी हरी है
उन्हें रंगों के विन्यास की समझ है या नहीं
इस पर बहस करने की गुंजाइश नहीं है

उन्हें भी तय करने होते हैं ज़हनी सफर
जब उनके पाँव लंबे सफर पर निकले होते हैं
वे भी चाहते हैं कि साथ रहें
कभी एक दूसरे को न छोड़ें

काला-सा धुँआ जो उठता है
उस में से सुनहरी चमकती धूप उन्हें भी दिख जाती है।

अकेला ब्रह्मांड

सच बतलाऊँ, मुझे अकेले रहने की आदत है। जब अकेला नहीं होता हूँ,

बेचैन होता हूँ। हाल के बरसों में अक्सर महीने भर अकेले रहा हूँ।

बिल्कुल अकेले नहीं, मतलब खाना वाना तो चाहिए न! अकेले में

थोड़ी-थोड़ी देर बाद आम बातें याद करते हुए बहुत सारा वक्त निकल

जाता है, मसलन बुखार की दवा खत्म तो नहीं हो गई, फिर थोड़ी देर बाद

विटामिन सी या ओ आर एस…। कभी किसी की मेल देखता हूँ

या फेसबुक। निजी और दफ्तरी मामले गड्ड-मड्ड।

अकेले होना दुनिया जहान के बारे में जानना भी है और नहीं भी। जैसे धूप

आती है तो मैं उसे छूता हूँ, हालाँकि धूप को अपने अकेलेपन से फुर्सत नहीं है।

अकेले आदमी के बारे में लोगों को फिक्र रहती है कि पता नहीं ढंग से खाया-पिया

कि नहीं, पर नहीं, मैं परेशान रहता हूँ कि

जिस्म की रूटीन से अलग हो पाना मुमकिन नहीं है। खाना बनाओ,

खाओ, फिर खाना बनाओ, फिर खाओ। थोड़ी देर के लिए अकेलेपन से निकलो तो रंग-रंग के दुख हैं। तज़ुर्बों की भरमार, किसलिए? दु;ख का पलड़ा

भारी होना ही जीवन है, तो तज़ुर्बों की भरमार किसलिए? घर बैठे हर चीज़ रंगीन है। प्रधान मंत्री रंगीन,

हजार मील चल पड़ा मजदूर रंगीन। रोता-बिलखता बच्चा रंगीन।

नेटफ्लिक्स की फिल्म के बीच में खबरें रंगीन।

मौत रंगीन है। तज़ुर्बों की भरमार, किसलिए?

अकेले में धरती और सूरज से इतना प्यार करना सीखा है, जितना पहले से मैं चाँद से करता रहा हूँ। काला गड्ढा, सफेद बौना अजीब नाम हैं, जो हमारे प्यारे तारे सूरज की नियति हैं। अकेले में जाना है कि सुंदर मेरे चारों ओर है। वह आबिदा के गायन में है, दीवार पर मातीस के दूसरी ओर टँगी बेटी की बनाई तस्वीरों में है। वह हर कहीं है। ऐसी बातों से एकबारगी दुखों के रंग में भी सुंदर देखने का मन करता है।

नहीं है। जो दुख इंसान के बनाए हैं, वे पीले नहीं, पीलिया में रंगे हैं।

लॉक-डाउन के पहले मेरी बैल्कनी से सौ मीटर दूर नए मकान बनाने के लिए चट्टानों को तोड़ा गया, दरख्त उखाड़े गए। एक ब्रह्मांड हमेशा के लिए खत्म हो गया। मैं वह साँप था जो बड़ी चट्टान के नीचे रह रहा था। मोर थे, जो रोज आकर उसे पकड़ने की आस लिए चट्टान पर बैठते थे। गया, वह यूनिवर्स गया।

विराम चिह्न बदल कर देखूँ, शायद रंग बदल जाएं!

नहीं बदलते। जो दुख इंसान के बनाए हैं, वे पीले नहीं, पीलिया में रंगे हैं।

6. सब कुछ नॉर्मल है

सब कुछ नॉर्मल है

बसें बसों जैसी चल रही हैं

फिल्म बनाने वाले फिल्म बना रहे हैं
तुम हर रोज दफ्तर जा रहे हो

सब वैसा ही है जैसा हमेशा था
फिर भी तुम परेशान हो
कि सेना में कोई गुब्बारे उड़ाने वाला नहीं बचा
कि नॉर्मल नीमबेहोशी है
और लगातार सामूहिक बेहोशी की ओर बढ़ रहे हालात हैं
जिन्हें मेरा राज्य छोड़कर जाना था वे पहले ही मर खप गए
बाक़ियों को धमकियाँ जारी हैं

यही नॉर्मल है
कि आदमी जानवर को नहीं आदमी को खाए
तुमने इतिहास भूगोल सब पढ़ा और कवि बन गए
इसकी आखिर क्या दवा की जाए
अपनी परेशानी के सबब तुम खुद ही हो
इसलिए चेहरे पर से तिरछी मुस्कान हटा लो
सँभाल रखो कि कहीं और काम आए

अभी बहुत कुछ होना है
जंगें लड़ी जानी हैं
जल थल नभ में मेरी लपलपाती जीभ की कौंध देखनी है तुमने
पहली दूसरी आलमी जंग क्या चीज़ थी स्मार्ट युग की नई जंग देखो।

मुझे तुम्हारी तिरछी मुस्कान रास नहीं आ रही
इसे पोंछ लो इसके पहले कि मैं चुप हो जाऊँ
मेरी चुप्पी मेरे कुछ कहने से ज्यादा खतरनाक है।

7.  इस बार

दौड़ रहा है आइन्स्टाइन एक बार फिर
इस बार बर्लिन नहीं अहमदाबाद से भागना है

चिंता खाए जा रही है
जो रह गया प्लांक उसकी नियति क्या होगी

अनगिनत समीकरण सापेक्ष निरपेक्ष छूट रहे हैं
उन्मत्त साँड़ चीख रहा कि वह साँड़ नहीं शेर है
किशोर किशोरियाँ आतंकित हैं
प्रेम के लिए अब जगह नहीं
साँड़ के पीछे चले हैं कई साँड़
लटकते अंडकोषों में भगवा टपकता जार जार

आतंकित हैं वे सब जिन्हें जीवन से प्यार है
बार बार पूर्वजों की गलतियों को धो रहे हैं
ड्रेस्डेन के फव्वारों में

आइन्स्टाइन एक बार फिर दौड़ रहा है
इस बार बर्लिन नहीं अहमदाबाद से भागना है।
(‘सुंदर लोग’ शृंखला से)

8. खबर

उस आदमी को मार देंगे यह खबर पुरानी थी
उसे मारना ग़लत होगा यह खबर धीरे-धीरे बढ़ी
दिन-दिन खबर की रफ्तार बढ़ती चली
और तब एहसास होने लगा कि कोई खबर है

वरना आजकल आदमी को मारना
खबरों जैसी खबर कहाँ होती है
यह उस ऱफ्तार का असर था
जैसे कोई इंतज़ार करता है नए चाँद का
कि वह आकाशपथ में मार दिया जाएगा

जो दाढ़ी नहीं बनाते वे सोचने लगे कि दाढ़ी बना लेनी चाहिए
दाढ़ी बनाने वाले भूल गए कि उनको दाढ़ी बनानी है
अजीब हालात थे कि दिन गुजरते जा रहे थे
और हम रातों को गिनते थे दिन

जिन्हें दिखलाना था कि ग़लत होना है होकर रहेगा
इंतज़ार में थे
जो खौफ़ज़दा थे कि ग़लत होना है होकर रहेगा
इंतज़ार में थे

इस तरह एक दिन आया वह दिन
हम सोकर उठे तो घोषणा हुई कि उसे मारा जा रहा है
फिर वह वक्त गुजरा कि वह मार दिया गया
वह दिन गुजरा
जिन्हें दिखलाना था कि ग़लत होना है होकर रहेगा
वे सो गए
जो खौफ़ज़दा थे कि ग़लत होना है होकर रहेगा
वे सो गए।

9.  आन फ्रांक, आखिरी बार मर जाओ

आन फ्रांक, तुम्हारी डायरी कब रुकेगी!
मैं सत्य-कथाएँ नहीं पढ़ता
कभी तो लिखना बंद करो
तुम लिखती हो तो मेरी बेटी लिखती है

कि चारों ओर हँसते खेलते लोग
छंद-लय में नाचते-गाते लोग
खलनायक बन जाते हैं
अब और नहीं सहा जाता
लिखना बंद करो
आखिरी बार मर जाओ
भूल जाएँ हम तुम्हें
याद रखें कि कोई था जिसे हम भूलना चाहते हैं

डरता हूँ कि तुम मेरी बेटी हो।

10. सब ठीक हो जाएगा

पानी साफ हो जाएगा
मसालों में मिलावट नहीं होगी
न घर न दफ्तर में तनाव होगा
रात होते ही चाँद आ गुफ्तगू करेगा
सब ठीक हो जाएगा

बसंत साथ घर में रहने लगेगा
गर्मी कभी भटकती-सी आकर मिल जाएगी
खिड़की के बाहर बारिश रुनझुन गाएगी
हमेशा गीत गाओगे जिनमें ताज़ा घास की महक होगी
बेवजह मुस्कराते हुए गले मिलोगे दरख्तों से
सब ठीक हो जाएगा
फिलहाल सुबक लो।

11. नींद

वे अक्सर सोने से पहले कपड़े बदलते हैं
और बीच रात उन्हें कभी सोए कपड़ों को जगाना पड़ता है
कि गोलाबारी में सपने घायल न हो जाएँ

कोई शाम महक लिए आती है
जरा सी छुअन को आतुर कोई पागल गीत गाता है
कोई चारों ओर के मलबे में से उफनती आती
हसरत के घूँट पीता है

नींद उनको भी आती है जो
जंग के माहौल में पलते हैं।

12. उन के साथ हुसैनीवाला सरहद पर

मैं उन के साथ हुसैनीवाला सरहद के नाके पर खड़ा था
पास उन तीनों की समाधियाँ हैं, जिनको साथ फाँसी पर चढ़ाया गया था
जहाँ वाघा सीमा से थोड़ा कम नाटकीय अंदाज़ में हिंद-पाक के झंडे उतारे जाते हैं। पूरब की ओर एक उदास शहर जिसे दशकों पहले कह दिया गया था कि वह सपने देखना बंद कर दे।
थोड़ी देर पहले घी में चुपड़ी रोटियाँ और तड़का लगाई दाल खाई थी। थालियाँ पास के नल में से बहते पानी से धो लीं और हम पास के दरख्तों की ओर देख रहे थे। नल बंद न कर पाने की तकलीफ हमारी नज़र को बीच-बीच में उस ओर कर देती थी।
वे बोले – पानी।
मैं चाहता था कि वह फिर बोलें पानी। चुप्पी में बह चुके वक्त का एहसास था। पानी साथ बहा ले गया है वक्त, उदासी के पहले के दिन, सपने।
पानी में बहता हिंदुस्तान। बहती ज़ुबानें। गीत-संगीत। हमारी नज़रें आपस में टकरा जाती तों वे हल्की-सी मुस्कान लिए मेरी ओर देखते।
पूछा – देश क्या है?
वह चुप। अमेरिका में ट्रंप खुद को देश कहता है, हिंदुस्तान में मोदी, रुस में पुतिन।
उन्होंने झुक कर पैरों के नीचे से थोड़ी सी धूल उठाई और हवा में उड़ा दी। उड़ती धूल पल भर में बिखर गई। हमने एक दूसरे की ओर देखा। मुस्कराए।
‘धरती सबको अपने अंदर समा लेती है। कोई जलकर राख बनता है तो कोई पिघलकर। हमने यह बात बहुत पहले जान ली थी, धरती से हमें इश्क हो गया था। हमने उसे माँ कहा, माशूका कहा, बेटी कहा और हम मोहब्बत पर कुर्बान हो गए।’
मेरे अंदर कोई चीख रहा था – भगत सिंह, भगत सिंह, भगत सिंह।
‘धरती इनसे बदला लेगी। नदियों को देखो, सारा मैल बहाकर ले जाती हैं। देखो हवा कैसे ज़हर बहा ले जाती है। इन नदियों की, इस हवा की सौगंध है, मैं फिर-फिर जनम लूँगा। भूलना मत कि हम बावफा-आशिक हैं, हमें ज़िंदगी से प्यार है। हम-तुम प्यार की सौगंध लिए हुए हैं।”
किसानों-मज़दूरों के जुलूस आ रहे हैं। मज़लूमों का समवेत गान सरहद के दोनों ओर गूँज रहा है। मेरी मुट्ठी अंतरिक्ष में दूर तक उठती है। इंकलाब-ज़िंदाबाद।

(10 दिसंबर 1957 को कोलकाता में जन्मे लाल्टू कविता, कहानी, पत्रकारिता, अनुवाद, नाटक, बाल साहित्य, नवसाक्षर साहित्य आदि विधाओं में समान गति से सक्रिय हैं. उनके अब तक आठ कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं. ये कविता संग्रह हैं – एक झील थी बर्फ की (आधार: 1990); भैया ज़िंदाबाद (बाल कविताएँ; आधार: 1992), डायरी में तेईस अक्तूबर (रामकृष्ण: 2004); लोग ही चुनेंगे रंग (शिल्पायन: 2010); सुंदर लोग और अन्य कविताएँ (वाणी: 2012); नहा कर नहीं लौटा है बुद्ध (वाग्देवी: 2013); कोई लकीर सच नहीं होती (वाग्देवी: 2016) और चुपचाप अट्टहास (नवारुण: 2017). लाल्टू ने अंग्रेज़ी, पंजाबी और बांग्ला से महत्वपूर्ण रचनाओं का अनुवाद भी किया है. उनके हिंदी, पंजाबी और अंग्रेज़ी में कई अखबारों और पत्रिकाओं में समसामयिक विषयों और विज्ञान पर सौ से अधिक आलेख और पुस्तक समीक्षाएँ प्रकाशित हुए हैं और शिक्षा आदि विषयों पर कई शोध-आलेख पुस्तकों में शामिल किये गए हैं .रसायन शास्त्र में अध्यापन करने के साथ –साथ वे शिक्षा के मुद्दे पर भी बहुत सक्रिय हैं. उनके ब्लॉग ‘आइए हाथ उठाएँ हम भी’ – laltu.blogspot.com से देश –दुनिया की जरुरी खबरें मिलती रहती हैं. संपर्क : [email protected] )

 

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