समकालीन जनमत

Category : साहित्य-संस्कृति

कविताजनमतसाहित्य-संस्कृति

सहज काव्‍य‍कथाओं सी हैं अदनान की कविताएँ

समकालीन जनमत
अदनान की कविताओं से गुजरना अपने समय के लोक से गुज़रना और उसकी त्रासदियों को जानते हुए उसकी लाचारी को अपनी लाचारी में बदलते देखना...
जनमतसिनेमा

काला : फ़ासीवाद की पहचान कराती फ़िल्म

आशुतोष कुमार
सुपरस्टार रजनीकांत की जानी पहचानी शैली की फ़िल्म होते हुए भी महज एक कल्ट फ़िल्म नहीं है. यह देश के वर्तमान राजनीतिक माहौल का नाटकीय...
कविताजनमतसाहित्य-संस्कृति

कुमार मुकुल की कविताएँ : लोकतंत्र के भगवाकरण की समीक्षा

समकालीन जनमत
30 वर्षों से रचनारत कुमार मुकुल के कविता परिदृश्य का रेंज विशाल और वैविध्य से भरा है , प्रस्तुत कविताओं में आज के समय को...
पुस्तक

राजनीति में अतिवादी मध्य मार्ग

गोपाल प्रधान
2015 में वर्सो से तारिक अली की पतली सी किताब ‘ द एक्सट्रीम सेन्टर: ए वार्निंग’ का प्रकाशन हुआ । पतली होने के बावजूद किताब...
स्मृति

मेरी स्वतंत्रता किसके पास है

समकालीन जनमत
राजकिशोर एक प्रखर आधुनिक चिंतक थे. मनुष्य मात्र की स्वतंत्रता का अधिकार उनका सबसे प्यारा सरोकार था. स्वतंत्रता की उनकी अवधारणा व्यापक और मूलगामी थी....
नाटक

भिखारी ठाकुर लिखित ‘ गबरघिचोर ‘ के मंचन के साथ नाट्योत्सव का समापन

समकालीन जनमत
भोजपुरी के नामी कवि-नाटककार भिखारी ठाकुर का यह नाटक अभी भी प्रासंगिक है. ‘गबरघिचोर’ सामाजिक संरचना में स्त्री की जगह, महिला-पुरुष सम्बंध और विभिन्न क़िस्म...
नाटक

‘ जो बंदिशें लगाते हैं, वे लगाएँगे, जो उन्हें गाते हैं, वो गाएँगे ’

समकालीन जनमत
' बंदिश ' नाटक पुराने और नए कला परिदृश्य के बीच बदलते सांस्कृतिक संसार की झलक तो उभारता ही है, साथ ही वह संस्कृति और...
कवितासाहित्य-संस्कृति

‘ चन्द्रेश्वर की कविताएं सरल पर लिखना उतना ही कठिन ’

समकालीन जनमत
चन्द्रेश्वर प्रेम और प्रतिरोध के कवि हैं. ऐसी कविताओं की जरूरत थी. ये अपनी रचना प्रक्रिया और कन्टेन्ट में समकालीन कविताएं हैं. यहां व्यंग्य चित्र...
कविताजनमतसाहित्य-संस्कृति

विहाग वैभव की कविताएँ : लोक जीवन के मार्मिक संवेदनात्मक ज्ञान की कविताएँ हैं- मंगलेश डबराल

समकालीन जनमत
  युवा कवि विहाग वैभव की कविताओं में क्रांति, विद्रोह, विरोध, निषेध के तीखे स्वर हैं और वह प्रेम भी है जिसे संभव करने के...
साहित्य-संस्कृति

‘ इप्टा के लोगो का सरकारी इस्तेमाल जन सांस्कृतिक परंपरा और उसकी क्रांतिकारी छवि के साथ शरारतपूर्ण छेड़छाड़ है ’

समकालीन जनमत
इप्टा के प्रतीक चिह्न का अनधिकृत इस्तेमाल जान-बूझ कर इप्टा की जन सांस्कृतिक परंपरा और उसकी क्रांतिकारी छवि के साथ शरारतपूर्ण छेड़छाड़ है. बिहार सरकार...
कविताशख्सियतसाहित्य-संस्कृति

जनकवि सुरेंद्र प्रसाद की 84वीं जयंती मनाई गई

समकालीन जनमत
बी. आर. बी. कालेज , समस्तीपुर के सभागार में 17 मई, 2018 को जन संस्कृति मंच और आइसा के संयुक्त तत्वावधान में मिथिलांचल के दुर्धर्ष...
साहित्य-संस्कृति

‘कुच्ची का कानून’ के मंचन के साथ ‘कोरस’ का ‘आज़ाद वतन-आज़ाद जुबाँ’ नाट्योत्सव प्रारंभ

मृत्युंजय
आसिफ़ा की याद में ‘कोरस’ नाट्य समूह द्वारा ‘आज़ाद वतन-आज़ाद जुबाँ’ नाट्योत्सव की शुरुआत आज से महिलाओं का सवाल सिर्फ़ महिलाओं का नहीं, वरन पुरुषों का भी है, पूरे समाज का: प्रो. डेजी नारायण अभिव्यक्ति की...
कविता

‘ मृत्युंजय की कविताएं आम अवाम की बेचैनी, क्षोभ, अवसाद, दुख, पीड़ा और गुस्से का इजहार हैं ’

समकालीन जनमत
जन संस्कृति मंच की ओर से छज्जूबाग, पटना में युवा कवि मृत्युंजय के काव्यपाठ और बातचीत का आयोजन हुआ. मृत्युंजय ने ‘यां’, ‘नश्वर-सी सुंदरता’, ‘...
कविता

एक कविता: दोष नहीं कुछ इसमें [अद्दहमाण]

मृत्युंजय
विद्वानों के मुताबिक़ अद्दहमाण [अब्दुल रहमान] का काल 12वीं सदी के कुछ पहले ही ठहरता है। यहाँ कुछ छंद उनके ग्रंथ ‘संदेस–रासक‘ से चुने गए...
कवितासाहित्य-संस्कृति

मरे हुए तालाब में लाशें नहीं विचारधाराएं तैर रही हैं

आशुतोष कुमार
“जंगल केवल जंगल नहीं है नहीं है वह केवल दृश्य वह तो एक दर्शन है पक्षधर है वह सहजीविता का दुनिया भर की सत्ताओं का...
साहित्य-संस्कृति

इप्टा के 75 साल , पूरे साल चलेंगे आयोजन

समकालीन जनमत
भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) लखनऊ ने इप्टा के 75 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में स्थापना दिवस जनगीतों एवं नाटक ‘हवालात’ की प्रस्तुति के...
साहित्य-संस्कृति

चंद्रबली सिंह ने जनवाद को परिभाषित करने का काम किया

समकालीन जनमत
 ‘हमारा समय और चंद्रबली सिंह की आलोचना दृष्टि’ विषय पर लखनऊ में संगोष्ठी  प्रसिद्ध आलोचक चंद्रबली सिंह की पुण्य तिथि पर कैफ़ी आज़मी एकेडमी में ‘हमारा...
चित्रकला

जनसंस्कृति की वाहक कला और सपना सिंह की रचना

” द ट्रु आॅफ हाफ वर्ल्ड “ सपना सिंह के, एक चित्रण श्रृंखला का शीर्षक है.  इस तरह के विषय के चयन की परंपरा चित्रकला...
मीडिया

सेक्युलर इंडिया से इतनी दिक़्क़त क्यों है ?

समकालीन जनमत
डर या लालच के मारे किसी राजनैतिक दल का पिछलग्गू हो जाना या सरकारी भोंपा बन जाना तो समझ आता है, लेकिन क्या अब भारतीय...
कविता

एक कविता : मेट्रो-महिमा : वीरेन डंगवाल

मृत्युंजय
नवारुण प्रकाशन से वीरेन डंगवाल की समग्र कविताओं का संग्रह 'कविता वीरेन' छपने वाला है जिसमें उनके सभी संग्रहों और उसके बाद की अन्य कविताएँ...
Fearlessly expressing peoples opinion