साहित्य-संस्कृति

‘ इप्टा के लोगो का सरकारी इस्तेमाल जन सांस्कृतिक परंपरा और उसकी क्रांतिकारी छवि के साथ शरारतपूर्ण छेड़छाड़ है ’

 

भारतीय जननाट्य संघ (इप्टा) की बिहार राज्य परिषद् ने बिहार सरकार द्वारा इप्टा के प्रतीक चिह्न (लोगो) के इस्तेमाल पर कड़ी आपत्ति की है और इसे जान-बूझ कर इप्टा की जन सांस्कृतिक परंपरा और उसकी क्रांतिकारी छवि के साथ शरारतपूर्ण छेड़छाड़ बताया है.

इप्टा ने जारी बयान में कहा है कि 1 जून 2018 को पटना के कई दैनिक अख़बारों में कला, संस्कृति एवं युवा विभाग, बिहार सरकार तथा बिहार संगीत नाटक अकादमी के संयुक्त आयोजन ‘रंगयात्रा श्रृखंला कार्यक्रम 2018’ का विज्ञापन छपा है, जिसमें देश के जन सांस्कृतिक आन्दोलन का प्रतीक एवं प्रतिष्ठित संस्था ‘इप्टा’ के प्रतीक चिह्न (लोगो) का प्रमुखता से इस्तेमाल किया गया है। इस विज्ञापन को देखकर कोई भी भ्रमित हो सकता है कि इप्टा इस सरकारी आयोजन का सहभागी है। जबकि इप्टा का न केवल इस आयोजन से दूर-दूर तक संबंध नहीं है बल्कि वह भाजपा के नेतृत्व में चल रही राजनीति का मुखर विरोधी भी है।

बयान में कहा गया है कि हम इसके पीछे एक खास पैटर्न देख रहे हैं। वर्ष 2014 से जब से केन्द्र में भाजपा की सरकार आई है और जबसे महागठबंधन को छोड़कर नीतीश कुमार भाजपा के साथ आयें हैं, तब से राष्ट्रीय स्तर के प्रतीकों, धरोहरों, संस्थानों के साथ छेड़-छाड़ सुनियोजित तरीके से लगातार चल रही है। ‘सत्याग्रह’ जैसी संघर्ष की महान विरासत को ‘स्वच्छाग्रह’ में डायल्युट करना; गाँधी की पूरी संघर्ष परंपरा को कुंद करना; नेहरू-भगत सिंह के छवि को विकृत करना; एन०सी०ई०आर०टी० की किताबों में चतुरता से परिर्वतन करना; एतिहासिक तथ्यों के साथ छेड़-छाड़ करना; अंधविश्वास और अवैज्ञानिकता को बढ़ावा देना – दरअसल इस सब का एक खास छुपा मकसद है।

आज अखबारों में छपे विज्ञापन में इप्टा के प्रतीक चिह्न (लोगो) के इस्तेमाल को भी हम इसी कड़ी में देख रहे हैं। हम इसका स्पष्ट विरोध करते हैं। बिहार सरकार ने इप्टा के प्रतीक चिह्न का अनधिकृत इस्तेमाल किया है, यह जान-बूझ कर इप्टा की जन सांस्कृतिक परंपरा और उसकी क्रांतिकारी छवि के साथ शरारतपूर्ण छेड़छाड़ है। यह इप्टा के प्लैटिनम जुबली का वर्ष भी है। इसका राष्ट्रीय आयोजन 27-31 अक्टूबर 2018 को पटना में ही प्रस्तावित है। पूरे देश में इसकी जोर-शोर से तैयारी भी चल रही है। ऐसे में यह घटना और भी चिंता में डालती है। सरकार तुरंत इस विज्ञापन को वापस ले। उन सारे अख़बारों में, जिनमें यह विज्ञापन छपा है, उनमें इस कृत्य के लिए उसी प्रमुखता के साथ खेद प्रकट करे। यह काॅपीराईट उल्लंघन का भी मामला बनता है, यदि सरकार ने समय रहते लिखित रूप से खेद प्रकट नहीं किया तो संस्कृतिकर्मी अदालत का दरवाजा खटखटायेंगे।

 

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