Wednesday, December 7, 2022
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सेक्युलर इंडिया से इतनी दिक़्क़त क्यों है ?

आर. अखिल

 

कर्नाटक चुनाव से फुरसत पाकर भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा सांप्रदायिक ज़हर फैलाने के अपने मुख्य अजेंडे पर लौट आया है.

और इस बार बहाना है दिल्ली के आर्कबिशप अनिल काउटो की एक चिट्ठी.

काउटो ने 8 मई को जारी एक चिट्ठी में भारतीय ईसाईयों से ‘देश के लिए’ विशेष प्रार्थना करने और उपवास रखने की अपील की है.

इसमें कहा गया है कि “हम एक अशांत राजनीतिक माहौल से रूबरू हैं, जो संविधान द्वारा स्थापित लोकतांत्रिक मूल्यों और देश के धर्मनिरपेक्ष तानेबाने के लिए ख़तरनाक है “.

” अपने देश और राजनेताओं के लिए प्रार्थना करना हमारी पवित्र रिवायत है, और यह और भी अहम हो जाता है जब आम चुनाव आने वाला हो,” चिट्ठी में आगे कहा गया है.

इसमें यह भी कहा गया है कि अगले साल देश में नई सरकार बनाने के लिए चुनाव होंगे और इसलिए लोग अपने “अध्यात्मिक नयापन” और देश के लिए हर शुक्रवार को उपवास रखें या कम से कम एक वक़्त का खाना न खाएं.

ट्विटर आज सुबह #ChurchTargetsModi ट्रेंड करता देखकर अपने कुछ ईसाई दोस्तों से बातकर मामले को समझने की कोशिश की.

ऐसी ही एक दोस्त वर्षा रानी तिर्की के मुताबिक किसी होनी-अनहोनी की सूरत में, खासकर चुनाव के समय, चर्च की तरफ से ऐसी अपील एकदम आम बात है और आर्क बिशप काउटो की चिट्ठी को ईसाई ध्रुवीकरण की कोशिश के बतौर देखना सरासर ग़लत है.

आर्क बिशप के सचिव ने भी ऐसे अपील को आम रवायत बताते हुए इसे किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में होने के आरोपों को साफ खारिज़ किया है. उनका बयान रिपब्लिक टीवी के वेबसाइट पर छपी एक खबर में देखा जा सकता है.

शांति और धर्मनिरपेक्षता से आरएसएस और भाजपा का जन्मजात बैरभाव जगजाहिर है और इसलिए इस चिट्ठी पर उनका बिदकना लाज़िमी था.

भाजपा ने एक तरफ जहां से इसे साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने वाला कदम बताया है वही आरएसएस ने भारतीय लोकतंत्र पर चर्च का सीधा हमला माना है.

“यह भारत के अंदरूनी मामले में वैटिकन का अवैध हस्तक्षेप है क्योंकि बिशप पोप के द्वारा नियुक्त किये जाते हैं और उनकी जवाबदेही देश नहीं पोप के प्रति होती है,” अंग्रेजी अख़बार डीएनए की वेबसाइट पर छपी एक ख़बर में संघ विचारक राकेश सिन्हा को यह कहते हुए कोट किया गया है.

लेकिन सवाल उठता है कि भाजपा और संघ की तरह भारतीय मीडिया के बड़े हिस्से को भी देश में शांति और धर्मनिरपेक्षता से दिक्कत है क्या ?

आखिर 13 मई को सार्वजानिक रूप से जारी और देश के लिए प्रार्थना और उपवास की अपील करती इस चिट्ठी को अब ‘सेंसेशनल’ और ‘विवादित’ बता कर ट्विटर पर #ChurchTargetsModi ट्रेंड करवाने का क्या मक़सद हो सकता है.

इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री गिरीराज सिंह के बयान से इसकी झलक मिलती है.

दैनिक जागरण में छपी एक ख़बर में मंत्रीजी के हवाले से कहा गया है कि हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और यदि चर्च फिर से मोदी सरकार न बनने देने के लिए प्रार्थना करने को कहता है तो सोचना होगा कि दूसरे धर्म के लोग भी “कीर्तन-पूजा” करेंगे.

हालांकि इसी ख़बर में मुंबई के आर्क बिशप के प्रवक्ता फादर नाइजेल बैरेट ने साफ कहा है कि दिल्ली के आर्क बिशप की चिट्ठी में “अलग” नहीं बल्कि “नई” सरकार की बात कही गई है, इसलिए किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

उन्होंने आगे जोड़ा है कि जब एक सरकार अपना कार्यकाल पूरा करती है और चुनाव के जरिए फिर से जो सरकार चुनी जाती है तो वह नई सरकार कहलाती है.

डर या लालच के मारे किसी राजनैतिक दल का पिछलग्गू हो जाना या सरकारी भोंपा बन जाना तो समझ आता है, लेकिन क्या अब भारतीय मीडिया के इस धड़े का संपादकीय नागपुर में लिखा जा रहा है.

इस मुद्दे पर संघ और रिपब्लिक टीवी की भाषाई मेल तो कुछ ऐसा ही इशारा करता है.

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