समकालीन जनमत

Category : साहित्य-संस्कृति

स्मृति

‘अल्लाह-ओम् ’ : पंडित जसराज की याद

समकालीन जनमत
देवराज त्रिपाठी    ‘आया है सो जाएगा ’…..सूरज उगा है तो अस्त होगा ही. लेकिन ढलते सूरज की रोशनी में कुछ पल ठहरकर ये सोचना...
फ़ोटोग्राफ़ी

2400 वर्ग फ़ीट की तस्वीर  

संजय जोशी
( प्रतिरोध का सिनेमा अभियान अपनी घुमंतू सिनेमा यात्राओं की वजह से भी आम लोगों के बीच अर्थपूर्ण सिनेमा को सार्थक तरह से  पहुंचाने में...
सिनेमा

औरतों की बहुत सी कहानियाँ हमारा इंतज़ार कर रही हैं

समकालीन जनमत
(कोविड -19 की त्रासदी ने हमारे जीवन के सभी पहलुओं पर असर डाला है . हमारी सिनेमा बिरादरी के क्रियाकलाप पर भी इसका बहुत प्रभाव...
व्यंग्य

हम ट्रिपल आज़ाद लोग

तीसरी आज़ादी अयोध्या में बाबरी मस्जिद तोड़ कर हासिल की गई ज़मीन पर राम मन्दिर का शिलान्यास करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने 5 अगस्त की...
कविता

अनुराधा अनन्या की कविताएँ आधी आबादी के पूरे सच को उजागर करती हैं

समकालीन जनमत
निरंजन श्रोत्रिय   युवा कवयित्री अनुराधा अनन्या की कविताओं में स्त्री-विमर्श किन्हीं सिद्धान्तों या भारी भरकम वैचारिक जुगाली के बजाय एक व्यावहारिक और यथार्थ रूप...
भाषा

उर्दू की क्लास : जामिया “यूनिवर्सिटी” कहना कितना मुनासिब ?

समकालीन जनमत
( युवा पत्रकार और साहित्यप्रेमी महताब आलम  की श्रृंखला ‘उर्दू की क्लास’ की तीसरी क़िस्त में जामिया के मायने के बहाने उर्दू भाषा के पेच-ओ-ख़म...
व्यंग्य

 चंद तस्वीर-ए-बुताँ

समकालीन जनमत
 उर्दू के प्रसिद्ध लेखक मुश्ताक़ अहमद यूसुफ़ी का यह हास्य-व्यंग्य लेख उनकी पुस्तक ख़ाकम बदहन (मेरे मुँह में ख़ाक ) से लिया गया है. अनुवाद ...
स्मृति

आंदोलन-संघर्ष के मोर्चे पर हमेशा याद आएंगे त्रेपन भाई

इन्द्रेश मैखुरी
यह 1998 का साल था. उस साल उच्चतम न्यायालय ने 02 अक्टूबर 1994 को उत्तराखंड आंदोलन के दौरान गठित मुजफ्फरनगर कांड के संदर्भ में 1996...
स्मृति

कौमी एकता और आम अवाम के जनतांत्रिक संघर्षों की आवाज थे राहत इंदौरी : जसम

समकालीन जनमत
जन संस्कृति मंच ने सुविख्यात शायर राहत इंदौरी की कोरोना संक्रमण के दौरान हृदयाघात से हुई मौत को देश की साझी संस्कृति और हिंदुस्तानी साहित्य...
पुस्तक

विनोद पदरज के ‘देस’ की कविताओं में भारतीय लोक अपनी विडंबनाओं व ताकत के साथ व्यक्त हुआ है

कुमार मुकुल
  ‘देस’ में संकलित विनोद पदरज की कविताएँ इंडिया से अलग भारतीय लोक की सकारात्‍मक कथाओं को उनकी बहुस्‍तरीय बुनावट के साथ प्रस्‍तुत करती हैं। इन...
भाषा

उर्दू की क्लास : “क़मर” और “कमर” में फ़र्क़

समकालीन जनमत
( छापाखाने के आविष्कार के बाद तमाम चीज़ें  काग़ज़ के पन्नों में छपकर किताब की शक्ल में आने से भाषा एक नयी चाल में ढलने...
कविता

गौरव भारती की कविताएँ अपने समय और सियासत की जटिलताओं की शिनाख़्त हैं

समकालीन जनमत
निशांत कोई कवि या कविता तब हमारा ध्यान खींचती है, जब वो हमारे भीतर के तारों को धीरे से छू दे । हमारे भावलोक में...
पुस्तक

पूंजीवाद का संक्षिप्त इतिहास

गोपाल प्रधान
2017 में बाडली हेड से यनाइस वरफ़काइस की किताब ‘टाकिंग टु माइ डाटर एबाउट द इकोनामी: ए ब्रीफ़ हिस्ट्री आफ़ कैपिटलिज्म’ का प्रकाशन हुआ। ग्रीक...
चित्रकलासाहित्य-संस्कृति

कला के बदलते स्वरूप में अरबिन्द कुमार सिंह की रचनाशीलता

कलाकार बनना बहुत आसान है मगर पुरस्कार, प्रसिद्धि , पैसा कमाना बहुत मुश्किल और उससे भी अधिक मुश्किल है किसी सार्थक कलाकृति की रचना करना।...
कहानी

दास्तानगोई परंपरा और स्त्रियों की भूमिका

समकालीन जनमत
बीते रविवार ‘कोरस’ के फेसबुक लाइव ‘स्त्री संघर्ष का कोरस’ में ‘दास्तानगोई परंपरा और स्त्रियों की भूमिका‘ विषय पर कोरस की साथी समता ने सुप्रसिद्ध...
कहानी

लाॅकडाउन

समकालीन जनमत
हेमंत कुमार  (लाॅकडाउन, हेमंत कुमार की नयी कहानी है। हेमंत कुमार ने समकालीन ग्रामीण यथार्थ को कहानियों में पुनः स्थापित किया है। ‘रज्जब अली ‘...
पुस्तक

अनिल अनलहातु का पहला काव्य संग्रह ‘बाबरी मस्जिद तथा अन्‍य कविताएँ’ विकास के विडम्बनाबोध की अभिव्यक्ति है

कुमार मुकुल
अपनी विश्‍व प्रसिद्ध पुस्‍तक ‘सेपियन्‍स’ में युवाल नोआ हरारी संस्‍कृति और तथाकथित मनुष्‍यता पर सवाल उठाते लिखते हैं- …हमारी प्रजाति, जिसे हमने निर्लज्‍ज ढंग से...
सिनेमा

काली स्लेट पर सफेद चॉक से लिखी दोस्ती की इबारत

समकालीन जनमत
  मनोज कुमार    आदर्श विद्यार्थी के जो पाँच लक्षण हमें बताए गए थे उन लक्षणों में सिनेमा देखना नहीं शामिल था| बगुले की तरह...
सिनेमा

मार्गरीटा विद ए स्ट्रॉ: ज़िंदगी मुख़्तसर सी मिली थी हमें, हसरतें बेशुमार ले के चलें !

आशीष कुमार
यह ‘लैला'(कल्कि कोचलिन)की दुनिया है।लैला यानी ‘सेरेब्रल पॉल्सी’ की शिकार।वह शतरंज खेलती है।फेसबुक चलाती है। संगीत सुनती है। धुने बनाती है। डांस भी करती है।...
भाषा

उर्दू की क्लास : नुक़्ते के हेर फेर से “ख़ुदा” “जुदा” हो जाता है

समकालीन जनमत
( छापाखाने के आविष्कार के बाद तमाम चीज़ें  काग़ज़ के पन्नों में छपकर किताब की शक्ल में आने से भाषा एक नयी चाल में ढलने...
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