समकालीन जनमत
व्यंग्य

हम ट्रिपल आज़ाद लोग

तीसरी आज़ादी

अयोध्या में बाबरी मस्जिद तोड़ कर हासिल की गई ज़मीन पर राम मन्दिर का शिलान्यास करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने 5 अगस्त की तुलना 15 अगस्त से की।

15 अगस्त को देश को आज़ादी मिली थी। वह पहली आज़ादी थी। उसके बाद जब इंदिरा गाँधी के आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो कुछ लोगों ने कहा कि यह दूसरी आज़ादी है।

मोदी ने 5 अगस्त को आज़ादी के बराबर कहा है। यानी ये एक तरह से तीसरी आज़ादी हुई।

हिंदुस्तान शायद दुनिया का एकमात्र ऐसा मुल्क है जो सत्तर साल में तीन बार आज़ाद हो चुका है। हम लगभग हर पच्चीस साल में एक बार आज़ाद हुए हैं। यह अपने आप में किसी विश्व रेकार्ड से कम नहीं है।

हम ट्रिपल आज़ाद लोग हैं। यह सोच कर सीना 56 से 86 इंच का हो जाता है। मुझे डर है कि कुछ दिन में लोगों के सीने इतने फूल जाएँगे कि ज़मीन पर चलने की जगह ही नहीं बचेगी। सरकार को इस बात का ध्यान रखते हुए कोई योजना बनानी चाहिए।

पहली आज़ादी अंग्रेज़ों से मिली थी। दूसरी इंदिरा सरकार से। तीसरी आज़ादी किससे मिली है यह अभी समझ में नहीं आ रहा है। बाबरी मस्जिद तो तीस साल पहले तोड़ दिया था। जो था ही नहीं उससे आज़ादी कैसी?

या अब इस बात की आज़ादी मिली है कि जब चाहे कोई मस्जिद, गुरुद्वारा या चर्च तोड़ कर उस पर मन्दिर बनाने का क्लेम कर दो।

यह बात तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मान ली थी कि कोई मन्दिर तोड़ कर बाबरी मस्जिद बना हो इसका कोई सुबूत नहीं मिला है।

तो ये मनमर्ज़ी करने की आज़ादी हुई। मनमर्ज़ी वही कर सकता है जिसके पास ताक़त हो। चाहे वह सत्ता की ताक़त हो या पूँजी की। जनता के पास ये दोनों नहीं है। लेकिन ताकतवर लोगों के लठैत बन कर कुछ लुम्पेन तत्वों को ताक़त का भ्रम होने लगता है। कभी-कभार लोग भ्रम को भी आज़ादी समझ बैठते हैं।

वैसे 1947 वाली आज़ादी के बाद जब संविधान बन रहा था तब आरएसएस ने मनुस्मृति को ही देश का क़ानून बनाने की माँग की थी। वही आरएसएस आज देश पर हुकूमत कर रही है। तो क्या यह माना जा सकता है कि तीसरी आज़ादी संविधान से मिली है?

संविधान से इन अतिराष्ट्रवादियों को हमेशा से परेशानी रही है। संविधान ने मनुस्मृति के विधान को पलट दिया था। ऋषियों-मुनियों के शाश्वत देश को बराबरी, आज़ादी, सामाजिक न्याय जैसे सांसारिक विचारों की बेड़ियों में बाँध दिया था।

हालाँकि ऐसे अतिराष्ट्रवादियों और दूसरे रसूखदारों ने पिछले सत्तर साल से संविधान की जड़ों में मठा डालने का काम पूरे जतन से किया है। लेकिन काग़ज़ पर लिखे नियमों का कुछ तो बन्धन होता ही है। कुछ बदमाश लोग अधिकार-वधिकार की बात पर आंदोलन करते हैं। कोर्ट-कचहरी के मामले भी होते रहते हैं।

अतिराष्ट्रवादी सत्तर साल से इन बेड़ियों से जूझ रहे हैं। राष्ट्र को विश्व गुरु बनाने के लिए ज़रूरी था कि इन बेड़ियों को तोड़ा जाए।

संविधान के ख़िलाफ़ पिछले सत्तर साल से चल रही मुहिम में 5 अगस्त बड़ा दिन है। अतिराष्ट्रवादियों ने इस दिन संविधान के ख़िलाफ़ एक बड़ी जीत दर्ज की है।

हालाँकि अतिराष्ट्रवादियों के नायक ने इसे 15 अगस्त के बराबर कहा। वे खुल्लम-खुल्ला 5 अगस्त को 15 अगस्त से भी कहीं महत्वपूर्ण दिन घोषित कर सकते थे। ऐसा नहीं किया। तो क्या अभी भी कुछ बेड़ियाँ बची हुई हैं?

जो भी हो, कोरोना लॉकडाउन से चाहे अर्थव्यवस्था तबाह हो गई हो, बेरोज़गारी आसमान छू रही हो, हज़ारों लोगों की मौत हो चुकी हो मगर इन 56 इंची सीने वाले रणबाँकुरों ने ‘आपदा को अवसर’ में बदलते हुए देश को तीसरी आज़ादी का तोहफ़ा दिया है।

 

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