विश्व कविता : तादयूश रुज़ेविच की कविताएँ

  〈 तादयूश रुज़ेविच (9 अक्टूबर 1921-24 अप्रैल 2014) पोलैंड के कवि, नाटककार और अनुवादक थे। उनकी कविताओं के बहुत सी भाषाओं में अनुवाद हुए हैं। उनका शुमार दुनिया के सबसे बहुमुखी और सर्जनात्मक कवियों में किया जाता है। नोबेल पुरस्कार के लिए कई बार उन्हें नामित किया गया। सन 2000 में उनकी किताब ‘मदर इज लीविंग’ के लिए उन्हें पोलैंड का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ‘नाईक पुरस्कार’ प्रदान किया गया। रुज़ेविच की कविताओं में द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका साफ़  दिखाई देती है और उसे व्यक्त करते समय कवियों की…

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अनुज लगुन की नई कविताएँ : रोटी के रंग पर ईमान लिख कर चलेंगे

अनुज लुगुन ने जब हिंदी की युवा कविता में प्रवेश किया तो वह एक शोर-होड़, करियरिस्ट भावना की आपाधापी, सस्ती यशलिप्सा से बौराई और पुरस्कारों की चकाचौंध से जगमगाती युवा कवियों की दुनिया थी, वाचालता जिनका स्थायी भाव थी, कविता में चमत्कार पैदा करना जिनका कौशल और कुछ चुनिंदा कविताएँ लिख कर क्लासिक हो जाने का भ्रम पालना ही अंतिम लक्ष्य था। (तमाम अच्छे लेखन के बावजूद कमोबेश आज भी ऐसी स्थिति है) इन परिस्थितियों में एक अलग और नई आवाज़ के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराना किसी जोखिम से…

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वत्सल उम्मीद की ठुमक के साथ मैं तो सतत रहूँगा तुम्हारे भीतर नमी बनकर: वीरेन डंगवाल

करीब 16 बरस पहले वीरेन डंगवाल के संग्रह ‘दुश्चक्र में स्रष्टा’ पर लिखते हुए मैंने उल्लास, प्रेम और सौंदर्य को उनकी कविता के केंद्रीय तत्वों के रूप में रेखांकित किया था- यह कहते हुए कि मूलतः अनाधुनिक मान लिए गए ये तत्व दरअसल वीरेन की काव्य-दृष्टि में एक वैकल्पिक आधुनिकता की खोज करते लगते हैं। अब उनके निधन के बाद जब उनका समग्र ‘कविता वीरेन’ के नाम से मेरे सामने पड़ा है तो यह देखना मेरे लिए प्रीतिकर है कि वीरेन की कविता ने उन दिनों जो प्रभाव मुझ पर…

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मेरी तन्हाई का ये अंधा शिगाफ़, ये के सांसों की तरह मेरे साथ चलता रहा

मीना कुमारी (1 अगस्त, 1933 – 31 मार्च, 1972) का असली नाम महजबीं बानो था , इनका जन्म मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था. वर्ष 1939 से 1972 तक इन्होंने फ़िल्मी पर्दे पर काम किया. मीना कुमारी अपने दौर की एक बेहतरीन अदाकारा होने के साथ-साथ शायरा और पार्श्वगायिका भी थीं. आइए इनकी 85 वीं सालगिरह पर भारतीय सिने जगत की इस महान अदाकारा को उनकी कुछ चर्चित ग़ज़लों की मार्फ़त याद करें. मीना कुमारी की ग़ज़लें- चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा, दिल मिला है कहाँ-कहाँ तन्हा…

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अदनान को ‘क़िबला’ कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार

युवा कवि अदनान कफ़ील ‘ दरवेश ‘ को वर्ष 2018 के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा की गई है. 30 जुलाई 1994 को बलिया उत्तर-प्रदेश में जन्में अदनान इस समय जामिया मिलिया इस्लामिया, दिल्ली में एम. ए. हिंदी के छात्र हैं. तारसप्तक के कवि भारत भूषण अग्रवाल की स्मृति में 1979 में इस पुरस्कार को दिए जाने की शुरुआत की गयी थी. तब से हर साल समकालीन कविता में अपने योगदान और विशिष्ट पहचान बनाने वाले युवा कवि को यह पुरस्कार दिया जाता है. 17 जून…

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अमरेंद्र की अवधी कविताएँ: लोकभाषा में संभव राजनीतिक और समसामयिक अभिव्यक्तियाँ

( कवि-कथन : अवधी में कविता क्यों ? मुझसे मुखातिब शायद यही, किसी का भी, पहला सवाल हो। जवाब में कई बातें हैं लेकिन पहला कारण यही है कि जैसी सहजता मैं अपनी मातृभाषा अवधी में पाता हूँ वैसी कहीं दूसरी जगह नहीं। यह सहजता ‘प्रथम भाषा’ होने की सहजता है। यह सहजता वैसे ही है जैसे घर-गाँव में किसी रहवासू की होती है। नागर व औपचारिक जीवन के बरअक्स। सभ्यता के बहुत से भाषायी आवरण भी होते हैं जिनकी लपेट में भाषा अक्सर बँध जाती है। भाषायी मानकीकरण भी…

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सभ्यता का परदा हटातीं हैं आर. चेतन क्रांति की कवितायेँ

2004 में आए अपने पहले कविता  संग्रह ‘शोकनाच’ के साथ आर चेतन क्रांति ने इक्कीसवीं सदी की दुनिया के पेच शायद सबसे करीने से पकड़े। इक्कीसवीं सदी में जीने की कुंजी प्रबंधन है- सबकुछ प्रबंधित-प्रायोजित-परिभाषित है- प्रकृति हो या मनुष्य, उसकी उत्पादकता को प्रबंधन के दायरे में लाना, उसे उपयोगी बनाना इकलौता लक्ष्य है। जो इस लक्ष्य से बाहर है, इसे अस्वीकार करता है, वह विफल है, पीछे छूट जाने को अभिशप्त है। सत्ता राजनीति की हो या कविता की- यह एकमात्र सच है। उस संग्रह की पहली ही कविता…

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प्रेम के निजी उचाट से लौटती स्त्री की कविता : विपिन चौधरी की कवितायेँ

  विपिन की कवितायेँ लगातार बाहर-भीतर यात्रा करती हुईं एक ऐसी आंतरिकता को खोज निकालती हैं जो स्त्री का अपना निजी उचाट भी है और दरख्तों, चिड़ियों, पीले-हरे पत्तों से भरा पूरा एक नगर भी, जिसके अपने रास्ते हैं, गालियाँ हैं और मैदान भी . उसके यहाँ यह शब्दचित्र गठित इलाका अवसाद का नहीं, नहीं ही वह अवचेतन का ढंका तुपा कोई संस्तर है, बल्कि अपना खोजा हुआ संरचित कोना जिसे वह मन की संज्ञा देती है . इस खोजे हुए कोने में वह बार-बार प्रेम तलाशती है। उसके कितने ही…

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संजीव कौशल की कवितायेँ : प्रतिगामी विचारों का विश्वसनीय प्रतिपक्ष

जागृत राजनीतिक चेतना, समय और समाज की विडम्बनाओं की गहरी समझ और भाषा की कलात्मक पारदर्शिता के कारण संजीव कौशल की कवितायेँ नयी सदी की युवा पीढ़ी के बीच अपनी अलग पहचान बनाती हैं. कविता और अन्य सभी सृजनात्मक लेखन के लिए यह समय इस मायने में संकटपूर्ण है कि एक तरफ, धीरे धीरे हमारा समाज नवजागरण के मूल्यों को खोते हुए, प्रतिगामी विचारों से आक्रांत होकर सत्ता के उन्माद का शिकार होता जा रहा है, तो दूसरी तरफ हमारे कवि, लेखक, यानी मशालें लेकर चलनेवाले लोग ज्ञान मीमांसात्मक विभ्रम से ग्रस्त…

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प्रदीप कुमार सिंह की कविताएँ : विह्वल करने से ज़्यादा विचार-विकल करती हैं

नदी समुद्र में जाकर गिरती है, यह तो सब जानते हैं. लेकिन यह सच्चाई तो प्रदीप की कविता को पता है कि नदी अपना दुःख दूसरी नदियों को सुनाने जाती है. क्योंकि स्त्री का दुःख स्त्री ही समझ सकती है. नदी जानती है कि समुद्र में उसका अस्तित्व खो जायेगा. इसलिए अपने होने का अर्थ एक नदी को दूसरी नदी ही बता सकती है.
लोकतंत्र के नाम पर जिस तंत्र का त्रास हमारे जन-सामान्य को झेलना पड़ रहा है, प्रदीप की निगाह उस पर भी रहती है. करुणा और व्यंग्य के मेल से ऐसी कविताएँ विह्वल करने से ज्यादा विचार-विकल करती हैं

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प्रदूषण रहित दिल्ली के लिए सस्ता, सुलभ और सुरक्षित जन परिवहन ज़रूरी

किसी भी देश, राज्य या शहर में नागरिकों को सुरक्षित, सुगम, सस्ती जन परिवहन मुहैया करवाने की पहला दो शर्त है-सड़कों में पर्याप्त मुख्य परिवहन सेवा – दिल्ली के लिए जो डीटीसी बस है एवं यहाँ के कर्मचारियों को सभी बुनियादी अधिकार मुहैया करवाना लेकिन दिल्ली सरकार इन दोनों शर्तों को दरकिनार करके एवं परिवहन व्यवस्था का पूर्ण निजीकरण, ठेकेदारीकरण के बाद सिर्फ़ एक फैसिलिटेटर की भूमिका में सिमट गया।

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साक्षी मिताक्षरा की कविताएं : गाँव के माध्यम से देश की राजनीतिक समीक्षा

आर. चेतन क्रांति गाँव हिंदी कविता का सामान्यतः एक सुरम्य स्मृति लोक रहा है, एक स्थायी नोस्टेल्जिया, जहाँ उसने अक्सर शहर में रहते-खाते-पीते, पलते-बढ़ते लेकिन किसी एक बिंदु पर शहर के सामने निरस्त्र होते समय शरण ली है. वह गाँव जो छूट गया, वह गाँव जिसे छोड़ना पड़ा, वह गाँव जहाँ सब कुछ बचपन की तरह इतना सुंदर था, अक्सर कविता में आता रहा है. गद्य विधाओं में गाँव जिस तरह देश की राजनीतिक समीक्षा का आधार बना, वैसा कविता में संभवतः नहीं हुआ. इधर के नए कवियों में शहर…

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इस क्रूरता पर हम सिर्फ़ रोयेंगें नहीं: सविता सिंह

सविता सिंह  आज कल मेरी सैद्धांतिक समझ इस बात को समझने में खर्च हो रही है कि किसी देश में छोटी बच्चियों के साथ इतना घिनौना और दर्दनाक बलात्कार क्यों हो रहा है ? क्या इसे सिर्फ़ बर्बर कृत्य कहकर समझ के स्तर पर हम इससे हाथ झाड़ सकते हैं – नहीं ! यह बात तो स्पष्ट है कि हिंसा में उत्तरोत्तर बढ़ोत्तरी हमें भूमण्डलीकृत दौर में उभरे हिंदुत्व की मनोवैज्ञानिक समझ हासिल करने को प्रेरित करती है, क्योंकि इस हिंसा के केंद्र में सभ्यता विरोधी क्रूरता है. यह क्रूरता उन…

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लोकेश मालती प्रकाश की कविता : यथार्थ को नयी संवेदना और नए बिन्दुओं से देखने और व्यक्त करने की विकलता

    एक युवा कवि से जो उम्मीदें की जाती हैं, लोकेश मालती प्रकाश की कविताएं बहुत हद तक उन्हें पूरा करती हैं. उनमें ताजगी और नयापन है, यथार्थ को नयी संवेदना और नए बिन्दुओं से देखने और व्यक्त करने की विकलता है, और वह गहरी प्रतिबद्धता भी है जो अनेक बार नयी पीढी में कम होती हुई नज़र आती है. कविता की अराजनीतिक होती आबो-हवा के बीच लोकेश प्रकाश अपनी प्रतिबद्धता इस तरह दर्ज  करते हैं: ‘आज की रात मैं अनंत उकताहट/ को चीरने वाली चीख/ बन जाना चाहता…

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जलियांवाला बाग नरसंहार को याद रखना ज़रूरी है ताकि सनद रहे! : प्रो. चमनलाल

आज से 99 साल पहले इसी दिन पंजाब के अमृतसर शहर में एक ऐसी घटना हुई जो राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक लोकगाथा बन गई थी ।यह घटना थी, 13 अप्रैल 1919 को वैशाखी के हँसी-खुशी के त्योहार के अवसर पर ब्रिटिश शासकों द्वारा एक ऐसा हत्याकांड , जिसकी बर्बरता ने पूरे विश्व में उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद के असली चेहरे को दिखा दिया । जलियावाला बाग हत्याकांड इसके बाद एक उदाहरण बन गया और आज भी देश में जब किसी भी जगह से पुलिस के भयानक अत्याचारों के समाचार आते…

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कठुआ और उन्नाव की घटना के खिलाफ महिला और छात्र संगठनों ने प्रदर्शन किया

नई दिल्ली. कठुआ और उन्नाव में हुए बलात्कार के मामलों में आरोपियों को बचाने की कोशिशों के ख़िलाफ़ आज दिल्ली में महिला संगठनों और छात्र संगठनों ने संयुक्त रूप से विरोध प्रदर्शन किया. कठुआ (काश्मीर) की रहने वाली 8 साल की बच्ची के साथ बर्बर बलात्कार और हत्या के ख़िलाफ़ और साथ ही उन्नाव में एक नाबालिग़ लड़की के बलात्कार के बाद पीडिता के पिता की उत्तर प्रदेश पुलिस कस्टडी में हुई हत्या के ख़िलाफ़ दिल्ली के कई महिला संगठनों और छात्र संगठनों ने मिलकर दिल्ली के संसद मार्ग पर…

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8 अप्रैल 1929: एक दिन जिसे याद रखा जाना चाहिए : प्रो. चमनलाल

8 अप्रैल 1929 को भारत के राजनितिक इतिहास का एक ऐतिहासिक दिन था, जिसके बारे में एल.के. आडवाणी जी ने भारी तथ्य्तात्मक चूक करते हुए अपनी किताब ‘माय लाइफ माय कंट्री’ में भगत सिंह की फांसी के कारण को इस दिन से जोड़ा था, जिसके कारण उनकी इतिहास के प्रति समझदारी पर भी कई सवाल खड़े हुए. 8 अप्रैल के इस दिन के महत्व को हमें ऐतिहासिक दस्तावेजों के माध्यम से समझने और भगत सिंह और साथियों के योगदान से जुडी याद को आज भी फिर से याद करने की…

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‘ स्वायत्तता’ का आगमन अर्थात अकादमिक संस्थानों को दुकान में तब्दील करने की तैयारी

(दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर  उमा राग का यह लेख  ‘  द वायर ’ में  29 मार्च को प्रकाशित हुआ  है )   हम से छीन लिया गया कॉपी कलम किताब कैद कर लिया गया हमारे सपने को फिर हम से कहा गया तुम स्वायत्त हो हमारे अधिकारों को छीनने के लिए उन्होंने एक नया शब्द गढ़ा है ‘स्वायत्तता’ जैसे उन्होंने कभी अंगूठा काटने को कहा था ‘ गुरु दक्षिणा ‘ –प्रदीप कुमार सिंह कितनी सच है यह पंक्ति कि हमारे अधिकारों को छीनने के लिए ही अक्सर सत्ता नए-नए…

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यौन उत्पीड़न के नौ मामलों में आरोपी अतुल जोहरी को बचाने में जुटा है जेएनयू प्रशासन

  यौन उत्पीड़न के नौ मामलों में आरोपी जेएनयू के प्रोफेसर अतुल जोहरी पर एफआईआर दर्ज हुए 72 घंटे से भी अधिक हो गए हैं. बावजूद इसके उनके ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही होना तो दूर कैंपस में वे अपनी तमाम ज़िम्मेदार भूमिकाओं में न केवल कायम है बल्कि उनका फ़ायदा भी उठा रहे हैं. अतुल जोहरी इस समय विश्वविद्यालय की ‘इंटरनल क्वालिटी एश्युरेंस सेल’ के डायरेक्टर हैं, ‘ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट सेल’ के डायरेक्टर हैं, एक छात्रावास के वार्डन हैं, और कैंपस की कई समितियों में वाईस-चांसलर के पसंदीदा उम्मीदवार भी हैं.…

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