Monday, January 17, 2022
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महिला आंदोलन की अगुआ के रूप में हमारी स्मृतियों में हमेशा रहेंगी कमला भसीन

लैंगिक समानता के लिए आजीवन संघर्षरत रहीं कमला भसीन जिन्होंने दक्षिण एशिया में अपने ऐक्टिविज़म, लेखों, कविताओं, किताबों, गीतों और नारों से महिला आंदोलन को मज़बूती दी 25 सितंबर को उनका कैंसर से निधन हो गया। उनका जन्म 24 अप्रैल 1946 में शहीदांवाली पंजाब में हुआ था जो अब पाकिस्तान में है। उनके पिता पेशे से चिकित्सक थे।

कमला भसीन की परवरिश और एम. ए. तक की पढ़ाई राजस्थान विश्वविद्यालय से हुई। आगे की पढ़ाई उन्होंने समाजशास्त्र विषय से की जिसके लिए वे फेलोशिप पर म्यूएन्स्टर यूनिवर्सिटी, पश्चिमी जर्मनी गईं। यहाँ अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वे जर्मनी में ही जर्मन फाउंडेशन फॉर डेवलपिंग कंट्रीज़ में शिक्षक हो गईं। कुछ समय बाद वे भारत लौट आईं और यहाँ चार साल ग्रामीणों के मुद्दों पर सक्रिय सेवा मंदिर नाम के एन.जी.ओ. में काम करने के बाद वे खाद्य और कृषि संगठन(FAO) से जुड़ीं, जहाँ से 2002 में सेवा निवृत्त होने के बाद 2004 में उन्होंने ‘जागो री’ (दिल्ली स्थित महिला अधिकारों के लिए काम करने वाला संगठन, जिसे उन्होंने ही 1984 में अपने अन्य सहयोगियों की मदद से बनाया था ) के सहयोग से साउथ एशियन फेमिनिस्ट नेटवर्क ‘संगत’ की स्थापना की। सन 1970 से ही महिला सवालों के साथ उनका गहरा जुड़ाव बन गया जिसके बाद देश और दुनिया के तमाम बड़े महिला आंदोलनों की वो प्रमुख सहयोगी रहीं।

कमला भसीन एक जिंदादिल और हरदिल अज़ीज़ शख्सियत रहीं लेकिन उनका व्यक्तिगत जीवन कई गहरे धक्कों से चोटिल भी रहा है। उनकी बेटी मीतो भसीन मालिक ने क्लीनिकल डिप्रेशन के कारण 2006 में आत्महत्या कर ली थी। उनका बेटा जिसे प्यार से छोटू बुलाया जाता है, वो एक साल की उम्र में ही गलत वैक्सीन के प्रभाव से हमेशा के लिए सेरेब्रल पाल्सी का शिकार हो गया। ज़िंदगी से मिले इतने बड़े झटकों के बाद भी कमला भसीन के कदम मानवाधिकारों और महिला सवालों की दिशा में बिना थके मज़बूती से बढ़ते रहे।

80 और 90 के दशक में दहेज़ हत्या, बलात्कार और यौन हिंसा के खिलाफ़ सभी महत्वपूर्ण आंदोलनों और निर्णायक लड़ाइयों का वो हिस्सा रहीं। लिंग के आधार पर समाज में गहरे बसे भेदभाव को ताउम्र चुनौती देती रहीं – “ कुदरत भेद बनाती है भेदभाव नहीं। समाज कुदरत के बनाए भेद के आधार पर भेदभाव करने लगता है’’ उनकी कहन जितनी सरल रही उतनी ही प्रभावशाली भी, आगे वे कहती हैं- “ कुदरत ने मर्द और औरत में फ़र्क कम दिए समानताएं ज़्यादा। मर्द और औरत में फ़र्क केवल प्रजनन के लिए दिए हैं, ये कुदरत ने नहीं बताया था कि कौन नौकरी करेगा और कौन खाना बनाएगा ”   

उन्होंने लैंगिक भेदभाव, आसमान शिक्षा, मानव विकास और महिला सम्मान पर कई महत्वपूर्ण पुस्तकें, लेख और कविताएं लिखीं। नारीवादी आंदोलन को सड़क के साथ साथ अकादमिक जगत में भी महत्वपूर्ण पहचान दिलाने का काम कमला भसीन ने किया। कमला भसीन की यह खासियत रही कि स्त्री विमर्श की गंभीर सैद्धांतिकी को उन्होंने आम फ़हम की भाषा और रोज़मर्रा के उदाहरणों से इतनी सहजता कहा और लिखा कोई भी उसके प्रभाव से अछूता नहीं रह पाता.  ‘पितृसत्ता क्या है’ और रेड फेयरी’ जैसी बहुचर्चित किताबों के साथ साथ उनके टॉक शोज भी काफी सराहे जाते थे। इस संदर्भ में कमला भसीन को याद करते हुए ऐपवा की राष्ट्रीय सचिव कविता कृष्णन कहती हैं कि “उनकी सबसे खास बात मुझे ये लगती है की वह जिस भाषा में बोलती थीं, वह ऐसी भाषा होती थी कि बच्चा भी समझ सकता है। मैंने भी उनसे इसी मामले में प्रेरणा लेने की कोशिश की है की कैसे सरल ढंग से कठिन से कठिन बात बोली जा सकती है”

समकालीन जनमत के पाठकों के लिए पर उनके एक बेहद लोकप्रिय टॉक शो का लिंक यहाँ दिया जा रहा है

https://www/talks/kamla_bhasin_there_s_miles_to_go_before_you_sleep?utm_campaign=tedspread&utm_medium=referral&utm_source=tedcomshare

कमला भसीन का जाना समूचे नारीवादी आंदोलनऔर मानवाधिकार आंदोलन के लिए एक कभी न भरे जा पाने वाले वैक्यूम की तरह है। कमला भसीन की विराटता का अंदाज उनकी विनम्रता से लगाया जा सकता है। उम्र और अनुभव के इस पड़ाव में भी लगातार सीखते रहने और उसे साझा करने की ललक उन्हें और अधिक प्रेरक बनाती है। 25 सितंबर को उन्हें उनके चाहने वालों, सहयोगियों और परिजनों ने भारी मन से लेकिन उन्हीं के अंदाज़ में उनके द्वारा लिखे गए गीतों को गाकर उन्हें विदाई दी।

इंडियन एक्सप्रेस में अपने एक लेख में उर्वशी बूटालिया लिखती हैं “हमारी पितृसत्तात्मक दुनिया में, किसी नारीवादी के गुजर जाने को शायद ही कभी समाज के लिए नुकसान के रूप में देखा जाता है। पिछले कुछ महीनों में, हमने ऐसी कई शख्सियतों को इस दुनिया को अलविदा कहते हुए देखा हैं: गेल ओमवेट जिनके लेखन और एक्टिविज़म के बिना जाति के बारे में हमारी समझ अधूरी रहती; सोनल शुक्ला, जिन्होंने कमला की तरह, मस्तमौला पन के साथ जीना, पढ़ना, गाना, नृत्य करना और अपने काम के केंद्रीय मुद्दे की पहचान करना सीखा; रति बार्थोलोम्यू, जिन्होंने रंगमंच को अपना जीवन दिया और अब कमला भसीन. ये लोग एक ऐसी दुनिया को पीछे छोड़ कर चले गए हैं, विशेष रूप से महिला आंदोलन की दुनिया, जो इनके योगदान के कारण समृद्ध हुई और अब इनके न रहने पर उस सबसे वंचित भी हो गई है जो ये और दे सकते थे। बड़ी उम्र के लोगों से लेकर युवाओं और कच्ची उम्र के बच्चों तक बड़ी सरलता से पहुँच बना लेने वाली कमला भसीन एक अपने चेहरे पर उसी मस्तमौलापन और व्यवहार में कभी न थकने वाली जुझारू कॉमरेड के रूप में हमेशा हमारी स्मृतियों और महिला आंदोलन की अगुआ के रूप में याद की जाएंगी। जन संस्कृति मंच/समकालीन जनमत की ओर से हम उनको श्रद्धांजलि प्रस्तुत करते हैं।

कमला भसीन की एक कविता

उमड़ती लड़कियाँ

हवाओं सी बन रही हैं लड़कियाँ

उन्हें बेहिचक चलने में मज़ा आता है

उन्हें मंज़ूर नहीं बेवजह रोका जाना

फूलों सी बन रही हैं लड़कियाँ

उन्हें महकने में मज़ा आता है

उन्हें मंज़ूर नहीं बेदर्दी से कुचला जाना

परिंदों सी बन रही हैं लड़कियाँ

उन्हें बेख़ौफ़ उड़ने में मज़ा आता है

उन्हें मंज़ूर नहीं उनके परों का काटा जाना

पहाड़ों सी बन रही हैं लड़कियाँ

उन्हें सर उठा कर जीने में मज़ा आता है

उन्हें मंज़ूर नहीं सर को झुका कर जीना

सूरज सी बन रही हैं लड़कियाँ

उन्हें चमकने में मज़ा आता है

उन्हें मंज़ूर नहीं पर्दों से ढका जाना

उमा राग
उमा राग दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक हैं और समकालीन जनमत के सम्पादक मण्डल की सदस्य हैं।
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