अपने समय की आहट को कविता में व्यक्त करता कवि विवेक निराला

कविता जनमत

युवा कवि विवेक निराला की इन कविताओं को पढ़ कर लगता है मानो कविता उनके लिए एक संस्कार की तरह है-एकदम नैसर्गिक और स्वस्फूर्त! इन कविताओं में एक निर्झर-सा प्रवाह है-एक-एक शब्द, संवेदनों और शिल्प में कल-कल की ध्वनि-सा! उनकी कविता एक यत्नहीन कविता-सी है, सायास या प्रविधि जैसा कुछ भी नहीं। इस युवा कवि में अपने समय की आहट सुनने का गजब का माद्दा है। अपने समय की तमाम विसंगतियों और विद्रूपताओं को वे बहुत हौले-से, बगैर किसी काव्य-उत्तेजना के अपनी कविता में उतारते हैं। बगैर किसी आहट के हुआ यह स्थानांतरण कविता के पाठक तक एक ऊँची आवाज के साथ पहुँचता है-‘हत्यारे ही नायक थे इस वक्त/ और नायकों के साथ/ लोगों की गहरी सहानुभूति थी।’ गाँवों से हो रहे विस्थापन को विवेक निराला एक ऑब्जेक्टिव भाव से देखते है। इसके लिए वे शहरी उपादानों और नोस्टैल्जिया का अवलंब न लेकर विस्थापन की मनोवैज्ञानिक मनोभाव-भूमि की पड़ताल करते हैं-

”वे सब अपने-अपने गाँवों से शहर आ गए थे/ शहरों में प्रदूषण था इसलिए/ वे बार-बार अंतःकरण को झाड़-पोंछ रहे थे”

‘मैं लौट रहा हूँ’ कविता में वे इस दौर की साहित्यिक दुनिया पर एक गहरा कटाक्ष करते हैं।

जाहिर है अपनी ही चुनी हुई दुनिया से कवि का लौटना पलायन नहीं एक व्यथा और कलाकार वेदना को व्यक्त करता है। ‘उस स्त्री के भीतर की स्त्री’ कविता स्त्री-विमर्श को एक नए तेवर में प्रस्तुत करती है। इस कविता का क्लाईमेक्स मानो स्त्री-विमर्श के ही पक्ष में एक प्रति-विमर्श रच रहा है-

”किन्तु उस स्त्री के भीतर/ एक और स्त्री थी/ जिसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था।”

‘असुविधा’ और ‘उनके साम्राज्य में’ जैसी कविताओं में विवेक की राजनीतिक चेतना के दर्शन होते हैं।

समकालीन राजनीतिक परिदृश्य को वे ‘असुविधा के लिए खेद’ जैसे चालू जुमले के जरिये प्रभावी रूप से व्यक्त करते हैं। इन कविताओं में सत्ता का क्रूर चेहरा भी पूरी तरह बेनकाब होता है, कवि की दूरदर्शिता के जरिये। ‘पासवर्ड’ एक मार्मिक कविता है जो मनुष्य की परम्परा, उसकी निजता के साथ कथित व्यावहारिकता को अनूठे ढंग से पाठकों के समक्ष रखती है। कविता की पंच-लाइन ‘ इस पूरी निजी परम्परा में मैंने/ सामाजिकता का एक लंबा पासवर्ड डाल रखा है’ पूरी कविता को एक नए सिरे से खोलकर अपने पुनर्पाठ की मांग करती है।

इसी तरह ‘कहानियाँ’ कविता में कवि केवल तुकबंदी न रचकर परिदृश्य को एक लयात्मक व्यंग्य में रूपान्तरित करता है। ‘तबला’ एक और बेहद मार्मिक कविता है। एक कवि के भीतर उपस्थित संवेदन प्रणाली को इस कविता के जरिए बखूबी महसूसा जा सकता है। तबले की खाल के जरिए मृतक और उसके परिजनों के विषाद को कवि ने एक अंतर्मन छू लेने वाले शिल्प में ढाल दिया है। यह वही संवेदना है जो मरी हुई खाल की सांस से लोहे को भस्म कर देने का उपक्रम रचती है। ‘स्थगित’ कविता में जीवन के अनिवार्य तत्वों की अनुपस्थिति के प्रति एक विक्षोभ है। कवि ने इसे प्रकृति और दैनंदिन जीवन के उपादानों के जरिए अभिव्यक्त किया है। कविता प्रकटतः एक दार्शनिक वक्तव्य में अपना क्लाईमेक्स पाती जान पड़ती है लेकिन वस्तुतः यह उस पसरे हुए ठहराव के प्रति कवि का आंतरिक विद्रोह है।

युवा कवि विवेक निराला की संगीत के प्रति गहरी रागात्मकता है। ‘तबला’,‘सांगीतिक’ और ‘बाबा और तानपूरा’ जैसी कविताओं में उन्होंने संगीत के माध्यम से परम्परा, स्मृति और मानव वेदना को अभिव्यक्त किया है । एक समृद्ध परम्परा को अपने समक्ष मरते हुए देखने की पीड़ा भी यहाँ अपनी समूची मार्मिकता के साथ व्यक्त होती है-‘बुढ़ाते गए बाबा/ बूढ़ा होता गया तानपूरा/ झूलती गई बाबा की खाल/ ढीले पड़ते गए तानपूरे के तार।’ प्रसिद्ध चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन पर लिखी कविता ‘नागरिकता’ उन तमाम फासीवादी ताकतों के संकीर्ण सोच पर प्रभावी प्रहार है जो सर्जना की विराटता की उपेक्षा कर किसी कलाकार को देशनिकाला दे देती है। इस कविता के निहितार्थ अत्यंत व्यापक हैं।

युवा कवि विवेक निराला की कविताएँ बहुत शांत, चुप और सहज भाव से अपने समय-समाज और जीवन की पड़ताल करती है। यहाँ प्रस्तुत कविताएँ इस बात की आश्वस्ति है कि बाबा के तानपूरे के तार कभी ढीले नहीं होंगे और अगली पीढ़ी का कोई साधक उन सुरों को थाम लेगा। ये कविताएँ महाप्राण निराला के जीनोटीपिक संगठन की महत्वपूर्ण और सार्थक फीनोटीपिक अभिव्यक्ति हैं। -निरंजन श्रोत्रिय

 

विवेक निराला की कविताएँ –

  1. मैं और तुम

मैं जो एक
टूटा हुआ तारा
मैं जो एक
बुझा हुआ दीप।

तुम्हारे सीने पर
रखा एक भारी पत्थर
तुम्हारी आत्मा के सलिल में
जमी हुई काई।

मैं जो तुम्हारा
खंडित वैभव
तुम्हारा भग्न ऐश्वर्य।

तुम जो मुझसे निस्संग
मेरी आखिरी हार हो
तुम जो
मेरा नष्ट हो चुका संसार हो।

—————-

2. हत्या

एक नायक की हत्या थी यह
जो खुद भी हत्यारा था

हत्यारे ही नायक थे इस वक्त
और नायकों के साथ
लोगों की गहरी सहानुभूति थी

हत्यारों की अंतर्कलह थी
हत्याओं का अंतहीन सिलसिला
हर हत्यारे की हत्या के बाद
थोड़ी खामोशी
थोड़ी अकुलाहट
थोड़ी अशांति

और अंत में जी उठता था
एक दूसरा हत्यारा
मारे जाने के लिए।

——————

3. मरण

वे सब अपने-अपने गाँवों से शहर आ गए थे
शहरों में प्रदूषण था इसलिए
वे बार-बार अंतःकरण को झाड़-पोंछ रहे थे।

वे अनुसरण से त्रस्त थे और अनुकरण से व्यथित
इसलिए पंक्तिबद्ध होकर इसके खिलाफ
पॉवर हाउस में पंजीकरण करा रहे थे

वे निर्मल वातावरण के आग्रही थे
उनके आचरण पर कई खुफिया निगाहें थीं
वे बारहा अपनी नीतियों से मात खाते थे
और भाषा से लात
क्योंकि उनके पास कोई व्याकरण नहीं था

कई चरणों में अपनी आत्मा और स्मृतियों में
बसे देहात को
उजाड़ने के बाद वे
अपनी काया में निरावरण थे बिल्कुल अशरण।
सबसे तकलीफदेह वह क्षण था
जिसमें निश्चित था उनका मरण
और इस समस्या का अब तक निराकरण नहीं था।

—————–

4. मैं लौट रहा हूँ

कुछ लोग
युद्ध जीत कर लौटते हैं
कुछ वहीं मारे जाते हैं
जिनके लौटते हैं शव।

कुछ ऐसे होते हैं
जो पीठ दिखाकर लौटते हैं
ऐसे ही किसी संग्राम से मैं लौट रहा हूँ।

मैं लौट रहा हूँ
हिंसा से विचलित होकर नहीं
मृत्यु के भय से नहीं

अपने ही प्रिय युद्ध-क्षेत्र में
अपने न पहचाने जाने की
निःस्वार्थ अनंत इच्छाओं के साथ
मैं लौट रहा हूँ।

दोनों हाथों से अपने चेहरे को छिपाए
पिछले कर्मों पर
लीपा-पोती करता हुआ
कवियों!
तुम्हारे संसार से मैं लौट रहा हूँ।

—————-

5. चाबुक

एक चाबुक अदृश्य
हवा में लहराता है
और सटाक से पड़ता है
हमारे सपनों की नंगी पीठ पर।

उधड़ी हुई खाल से
ढेर सारा खून फैल जाता है

कौन हैं वे हाथ
जो फटकारते हैं खूनी चाबुक
नथे हुए घोड़ों से लेकर
हमारे उन्मुक्त सपनों तक?

————–

6. उस स्त्री के भीतर की स्त्री

उस स्त्री के भीतर
एक घना जंगल था
जिसे काटा
उजाड़ा जाना था।

उस स्त्री के भीतर
एक समूचा पर्वत था
जिसे समतल
कर दिया जाना था।

उस स्त्री के भीतर
एक नदी थी
बाढ़ की अनंत संभावनाओं वाली
जिसे बाँध दिया जाना था।

उस स्त्री के भीतर
एक दूसरी देह थी
जिसे यातना देते हुए
क्षत-विक्षत किया जाना था।

किन्तु उस स्त्री के भीतर
एक और स्त्री थी
जिसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था।

——————

7. असुविधा

पैदल चलते हुए
रास्ते में ही
अगर चप्पल टूट जाए तो…..

हम पैरों को घसीट कर चलते हैं
हाथ में चप्पल लेकर
उसे बनाने की नाकाम कोशिश करते हैं
हम शक करते हैं
उसके निर्माता पर
और मजबूती के बारे में
अपनी धारणा की पुनर्समीक्षा करते हैं।

हम असुविधा महसूस करते हैं

कुछ चीजें यूँ ही टूट जाती हैं
मसलन संविधान
संविधान भी बड़ी असुविधा है
कुछ लोगों के लिए

हम असुविधा के लिए खेद प्रकट करते हैं।

————

8. उनके साम्राज्य में

जहाँ पत्ते के टूटकर गिरने पर भी
गोलियों की आवाजें सुनाई पड़ती हैं
वहाँ एक बच्चा बिलख रहा है।

बिलखते हुए लोग अक्सर दया के पात्र होते हैं

रोटी के लिए बिलखना
उनके महान साम्राज्य की बदनामी है
और इसे वे बदनाम होते नहीं देख सकते
इसलिए ज़रूरतें वे गोलियों से पूरी कर देते हैं

तुम उनसे रोटी मांगोगे
वे तुमसे भजन करने को कहेंगे
तुम उनसे आवास मांगोगे
वे तुमसे विहार करने को कहेंगे

ऐसा ही होता है
कि जब वे तुमसे कुछ भी नहीं कह पाते
दबे पाँव इतिहास में दाखिल हो जाते हैं।

—————

9. भाषा

मेरी पीठ पर टिकी
एक नन्ही-सी लड़की
मेरी गर्दन में
अपने हाथ डाले हुए

जितना सीख कर आती है
उतना मुझे सिखाती है

उतने में ही अपना
सब कुछ दे जाती है।

—————–

10. पासवर्ड

मेरे पिता के पिता के पिता के पास
कोई संपत्ति नहीं थी
मेरे पिता के पिता को अपने पिता का
वारिस सिद्ध करने के लिए भी
मुकद्दमा लड़ना पड़ा था

मेरे पिता के पिता के पास
एक हारमोनियम था
जिसके स्वर उसकी निजी संपत्ति थे
मेरे पिता के पास उनकी निजी नौकरी थी
उस नौकरी के निजी सुख-दुख थे।

मेरी भी निजता अनन्त
अपने निर्णयों के साथ
इस पूरी निजी परम्परा में मैंने
सामाजिकता का एक लम्बा पासवर्ड डाल रखा है।

——————

11. तबला

किसी की खाल है
जो खींच कर मढ़ दी गई है
मढ़ी हुई है मृतक की
जीवन्त भाषा

मृतक के परिजनों का विलाप
कस गया है इस खाल के साथ

वादक की फूँक से नहीं
खाल के मालिक की
आखिरी सांस से
बज रही है वह बांसुरी
जो संगत पर है।

धा-धा-धिन-धा
और तिरकिट के पीछे
एक विषादी स्वर है।

————-

12. कहानियाँ

इन कहानियों में
घटनाएँ हैं, चरित्र हैं
और कुछ चित्र हैं।

संवाद कुछ विचित्र हैं
लेखक परस्पर मित्र हैं

कोई नायक नहीं
कोई इस लायक नहीं

इन कहानियों में
नालायक देश-काल है
सचमुच, बुरा हाल है।

————–

13. मेरा कुछ नहीं

मेरे हाथ मेरे नहीं
उन पर नियोक्ता का
अधिकार है।

मेरे पाँव मेरे नहीं
उन पर सफर लिखा है
जैसे सड़क किनारे का वह पत्थर
भरवारी 40 किमी

तब तो हृदय भी मेरा नहीं

फिर तो कुछ भी नहीं मेरा
मेरा कुछ भी नहीं
वह ललाट भी नहीं
जिस पर गुलामी लिखा है
और प्रतिलिपि से
नत्थी है मेरी आत्मा।

———————-

14. स्थगित

लोग जहाँ-तहाँ रूक गए
बंद हुआ
ईश्वर का सारा रोज़गार

न नदियों में प्रवाह रह गया
न ज्वालामुखी में दाह
एक कराह भी थम गई

प्रदक्षिणा दक्षिण में ठहर गई
और अवाम के लिए
तय बाएँ रास्ते पर
बड़े गड्ढे बन चुके हैं

एक ही भभकती लालटेन
अपने शीशे के और काले होते जाने पर
सिर धुनती निष्प्रभ पड़ी है

क्षण भर के लिए
आसमान से कड़की और चमकी
विद्युत में रथच्युत योद्धा
लपक कर लापता हुए

जीवन अब भी अपठित है
मृत्यु अलिखित
समय अभी स्थगित।

——————–

15. सांगीतिक

एक लम्बे आलाप में
कुछ ही स्वर थे
कुछ ही स्वर विलाप में भी थे
कुछ जन में
कुछ गवैये के मन में

गायन एकल था
मगर रूदन सामूहिक था
आँखों की अपनी जुगलबंदी थी
खयाल कुछ द्रुत था कुछ विलंबित

एक विचार था और वह
अपने निरर्थक होते जाने को ध्रुपद शैली में
विस्तारित कर रहा था
अनसुना-सा तराना अपनी पीछे
एक मुकम्मल अफसाना छिपाए हुए था

इस आलाप और विलाप के
बीचोबीच एक प्रलाप था।

———————

16. बाबा और तानपूरा
(निराला जी के पुत्र रामकृष्ण त्रिपाठी के लिए)

हमारे घर के एक कोने में
खड़ा रहता था बाबा का तानपूरा
एक कोने में
बाबा पड़े रहते थे

तानपूरा जैसे बाबा
बाबा पूरे तानपूरा

बुढ़ाते गए बाबा
बूढ़ा होता गया तानपूरा
झूलती गई बाबा की खाल
ढीले पड़ते गए तानपूरे के तार

तानपूरे वाले बाबा
बाबा वाला तानपूरा

असाध्य नहीं था
इनमें से कोई भी
हमारी पीढ़ी में ही
कोई साधक नहीं हुआ।

——————

17. नागरिकता
(मकबूल फिदा हुसैन के लिए)

दीवार पर एक आकृति जैसी थी
उसमें कुछ रंग जैसे थे
कुछ रंग उसमें नहीं थे

उसमें कुछ था और
कुछ नहीं था
बिलकुल उसके सर्जक की तरह

उस पर जो तितली बैठी थी
वह भी कुछ अधूरी-सी थी
तितली का कोई रंग न था वहाँ
वह भी दीवार जैसी थी
और दीवार अपनी जगह पर नहीं थी

इस तरह एक कलाकृति
अपने चित्रकार के साथ अपने होने को
और न होने के मध्य
अपने लिए एक देश ढूँढ रही थी।

——————

18. ईश्वर
(अपने गुरू सत्यप्रकाश मिश्र जी के लिए)

लेग उसे ईश्वर कहते थे
वह सर्वशक्तिमान हो सकता था
झूठा और मक्कार
मूक को वाचाल करने वाला
पुराण-प्रसिद्ध, प्राचीन

वह अगम, अगोचर और अचूक
एक निश्छल और निर्मल हँसी को
खतरनाक चुप्पी में बदल सकता है
मैं घृणा करता हूँ
जो फटकार कर
सच बोलने वाली आवाज घोंट देता है

ऐसी वाहियात सत्ता को
अभी मैं लत्ता करता हूँ।

—————-

19. विचलन

जिनके हृदय पाषाण थे
उन्होंने सारी संवेदनाओं का
एक मजबूत बाँध
बना रखा था

संवेदनाएँ ठहरी हुई थीं
इसलिए दिलों में
कवक थे, शैवाल थे
किस्म-किस्म के षड़यंत्र थे
कई तरह के जाल थे

अंतर्मन में सफाई नहीं थी
जमी हुई काई थी
काई में थी फिसलन
इसीलिए था विचलन।

———————

20. भूल-सुधार

जीवन में बड़ी-बड़ी भूलें की
और कई बार
छोटे-मोटे सुधार

मसलन पैदा होते ही रोया नहीं
तो अब वक्त-बेवक्त
रोता हूँ हर किसी के आगे
किसी को चिढ़ाया
ढेले मारे, खिझाया
अब खीझता हूँ खुद पर
बिलकुल निहत्था होता हुआ।

क्या करूँ!
वसन्त को उसकी दिशा दिखाई
शीत को ढाँप कर रखा
बारिश को सही ठिकाना बताया
गरमी को सीने से लगाकर रखा
पहले प्यार की तरह

और यह भी कर सका
महज़ भूल-सुधार की तरह।

—————–

21. गेय कविता की मांग

एक के बाद एक
तीन कविताएँ सुना चुके
समकालीन कवि से
एक शाश्वत आलोचक ने पूछा-
‘आपने गेय कविता लिखी है ?’

स्मकालीन कवि मुसकुराया
अपनी इन्कार की दाढ़ी खुजलाते हुए

थोड़ी ही देर में
धुंधलका छंट गया
आलोचक और कवि के बीच
गेय आधा-आधा बँट गया।

———————

 

(कवि विवेक निराला का जन्म 30 जून 1974, इलाहाबाद में हुआ. शिक्षाः एम.ए., डी. फिल. (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) सृजनः  कविता-संग्रह ‘एक बिम्ब है यह’ (2005) प्रकाशित, ‘निराला साहित्य में दलित चेतना’ और ‘निराला साहित्य में प्रतिरोध के स्वर’ दो आलोचना पुस्तकें प्रकाशित। वर्तमान में कौशाम्बी जनपद के एक महाविद्यालय में विभागाध्यक्ष. टिप्पणीकार निरंजन श्रोत्रिय ‘अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान’ से सम्मानित प्रतिष्ठित कवि,अनुवादक , निबंधकार और कहानीकार हैं. साहित्य संस्कृति की मासिक पत्रिका  ‘समावर्तन ‘ के संपादक . युवा कविता के पाँच संचयनों  ‘युवा द्वादश’ का संपादन  और वर्तमान में शासकीय महाविद्यालय, आरौन, मध्यप्रदेश में प्राचार्य हैं.)

संपर्क:

ई-मेलःविवेक निराला: [email protected]

निरंजन श्रोत्रिय: [email protected]

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