शख्सियत

स्मृति मंगलेश डबराल: ‘आवाज भी एक जगह है’

साहित्य और विचार की संस्था लिखावट की ओर से ऑनलाइन गूगल मीट पर प्रसिद्ध कवि और गद्यकार मंगलेश डबराल की स्मृति में कार्यक्रम ‘आवाज़ भी एक जगह है’ आयोजन किया गया।
संस्था के संयोजक और चर्चित कवि व लेखक मिथिलेश श्रीवास्तव ने आरंभ करते हुए कहा कि मंगलेश डबराल अपने को हमेशा संगतकार ही मानते रहे। हम सभी के साथ बराबरी, लोकतांत्रिक और मार्क्सवादी स्तर पर। हम सबके प्रिय कवि मंगलेश डबराल जो कोरोना संक्रमण से संघर्ष करते हुए हमारे बीच से चले गए, हमें अकेला, बेसहारा और तड़पता छोड़कर | हमने उन्हें कभी भटकते नहीं देखा । उनके साथ हम बड़े हुए । उनका मानना था कि आप कविता तभी लिख सकते हैं जब आप उसमें डूबे रहें। उनके समय में जनसत्ता की आंदोलनकारी छवि थी । उन्होंने साहित्यिक पत्रकारिता को एक ऊंचाई दी । हिंदी भाषा को लेकर उन्होंने जो बातें कहीं और जिस पर विवाद हुआ, ऐसी बातों के पीछे उसके कारण हैं। उनसे बातें होती। लगातार होती। लगता है कि बहुत बातें रह गईं, जो उनसे करनी थी।
जन संस्कृति मंच उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कवि और लेखक कौशल किशोर ने उनके व्यक्तित्व और कृतित्व पर अपनी बातें कहीं। उनका कहना था कि हमें यकीन था कि मंगलेश जी जीवन की जंग जीत जाएंगे पर सभी शुभकामनाएं विफल हो गई। हम अपने प्रिय कवि को नहीं बचा पाए । ऐसे संवेदनशील कवि-व्यक्तित्व कम हुए हैं । उनकी कविता में दुख व निराशा है, अपने जमीन से विस्थापित होने की पीड़ा है, वहीं उम्मीद भी है । उनके यहां पहाड़ दुख की तरह टूटता है । लालटेन आंख है तो उसकी टिमटिमाती लौ को आग में बदल देने की अदम्य आकांक्षा है । वह ‘नए युग में शत्रु’ की पहचान करती है। अन्याय की ताकतों का प्रतिरोध इनका गुण है जिसने मंगलेश डबराल को हम सबका प्रिय बनाया। 70 के आंदोलन से उन्हें वैचारिक रोशनी मिली । निरंतर बर्बर और दमनकारी होती व्यवस्था के खिलाफ प्रतिरोध वाली कविताओं के लिए वे हमेशा याद किए जाएंगे।
कवि और आलोचक प्रोफेसर भरत प्रसाद का कहना था कि उनसे मिलने का कम अवसर मिला लेकिन जो स्मृतियां हैं, वे यादगार हैं । उनकी कलम, कविता और व्यक्तित्व के प्रति सम्मान और स्नेह का भाव हमेशा रहा। उन्होंने जेएनयू के दौर की यादों को साझा करते हुए कहा कि कविता का पाठ करते हुए वे स्वयं उसमें उतर जाते थे, अपने पात्रों को जीते हुए। वह एक्टिविज्म को जीने वाले कवि थे। यह एक्टिविज्म हिंदी कविता से गायब होती जा रही है । उन्हें हम बौद्धिक एक्टिविस्ट कह सकते हैं। वे अपनी कविता में अर्थों का संकेत करते हैं । वहां उसका विस्तार कम है। आपको कल्पना की मार्मिक बारीकी मिलेगी। उन्हें मनुष्यता के लिए प्रतिबद्ध प्रवक्ता कहा जा सकता है। वे हमारी विधा के प्रतिनिधि कवि हैं। प्रोफेसर भारत प्रसाद ने मंगलेश डबराल की स्मृति में लिखी कई कविताएं सुनाई।
कवि व्योमेश शुक्ल ने अपनी शोक संवेदना प्रकट करते हुए कहा की हमने इधर के दिनों में कई कवियों को खोया है । मंगलेश जी का जाना तो दुखी कर देने वाला ही नहीं बल्कि हम सबके लिए असह्य है। उनका व्यक्तित्व तो ऐसा था कि वे अपने दुख को पी लेते कभी उसे जाहिर नहीं करते । उनके कविता संसार में अच्छी और लाजवाब कविताओं का विपुल भंडार है। वह हमारे इतने करीब थे कि हम उनकी महानता को कभी देख नहीं पाते।
वरिष्ठ कवि व गद्यकार और ‘दुनिया इन दिनों’ के संपादक सुधीर सक्सेना ने मंगलेश डबराल को याद करते हुए कहा कि यह कविता की ताकत है कि कवि चला जाता है लेकिन उसकी कविता रहती है। उन्होंने कई क्षेत्र में काम किया पर मेरे लिए वे प्रथमत: और अंततः कवि थे। उनका जो गद्य है, उसमें भी कविता का स्पंदन है। मंगलेश छोटे कद के बड़े कवि थे। यह वह कवि है जिसने पहाड़ पर लालटेन टांगी। हिंदी कविता में मंगलेश ने पहाड़ दिखाया । वे पहाड़ लेकर आए और कविता का पहाड़ खड़ा किया। घर को कभी नहीं भूले। वहां विस्थापन, विभाजन, बाजारवाद, फासीवाद, सांप्रदायिकता, पूंजीवाद, अकेलापन, दुख, अवसाद मौजूद है । इस व्यवस्था की अभिव्यक्ति वहां मौजूद है। वे लाउड नहीं थे लेकिन अपनी बात को पूरी दृढ़ता से कहते । वहां हल्ला बोल नहीं, बल्कि गूढ़ार्थ के जरिए अपनी बात का कहना है। प्रतिरोध उनकी कविता का मुख्य स्वर है । उन्होंने असहमतियों का आदर किया। लोगों को अच्छा लगे या बुरा, कभी अपने स्टैंड को छिपाया नहीं।
कवि व आलोचक तथा जलेस राजस्थान के अध्यक्ष जीवन सिंह ने इस प्रश्न से शुरुआत की कि कवि जो शब्दों में अपने को व्यक्त करता है, क्या वह कर्म में भी उसी तरह व्यक्त होता है? शब्द और कर्म के असंतुलन पर मंगलेश के अंदर रोष था। अपने इंटरव्यू में वे खरी खरी बात करते हैं । भाषा के बारे में जिस तरह उन्होंने विचार किया, वैसा विचार नहीं हुआ। लोगों ने उसका अलग अर्थ निकाला । उनकी चिंता भाषा के न फैलने या और उसके सांप्रदायिक होते जाने की रही है । मंगलेश के संघर्ष में ईमानदारी है । कविता भाषा से बनती है । उनके यहां आवाज की भी एक जगह है । उन्होंने स्पर्श को बड़ा माना। कविता मनुष्य के निर्माण का काम करती है। उसके अंदर के मनुष्य को जिंदा रखती है। मंगलेश की कविताएं इसी मनुष्य की कविताएं हैं । उनके रचना कर्म में जीवन की विडंबनाएं हैं। ‘संगतकार’ जीवन के संगतकारों पर कविता है। यहां प्रतिरोध का रचाव है, नैतिकता बोध का सृजन है। अपनी इन्हीं खूबियों की वजह से मंगलेश हमारे लिए असाधारण और प्रेरक हैं।
अंत में 2 मिनट का मौन रख मंगलेश डबराल को श्रद्धांजलि दी गई।

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