प्रसिद्ध कवयित्री अनामिका: अपने जीवन संघर्ष, स्त्री संघर्ष और कविताओं पर {काव्य पाठ भी}

Gepostet von Chorus-The Unsung Songs am Sonntag, 14. Juni 2020
साहित्य-संस्कृति

हर वर्ग की स्त्रियों की समस्याएँ अलग हैं लेकिन शोषण एक सा: ‘स्त्री संघर्ष का कोरस’ में अनामिका

कोरस के साप्ताहिक फेसबुक लाइव कार्यक्रम ‘स्त्री संघर्ष का कोरस’ में 14 जून की शाम 6 बजे वरिष्ठ कवि व लेखक अनामिका जी लाइव हुईं | उन्होंने अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मृत्यु पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए अपना पूरा लाइव सेशन सुशांत को समर्पित किया | इस कार्यक्रम को एक निश्चित बिन्दु पर केन्द्रित करने के लिए कोरस टीम द्वारा पाँच सवाल अनामिका जी को भेजे गए थे |  उन्होंने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से एक-एक प्रश्न को उठाते हुए अपनी बात रखी तथा संबन्धित प्रसंग से जुड़ी अपनी कविताओं का पाठ किया |
पहला प्रश्न था कि एक स्त्री होने के चलते आपको जीवन में किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा मसलन शिक्षा ,कैरियर ,विवाह आदि के संदर्भ में ? इसका जवाब देते हुए अनामिका जी ने कहा कि मेरे माता-पिता दोनों साहित्य से जुड़े थे अतः घर के पढ़ाई-लिखाई वाले वातवरण में मेरा बचपन बहुत ही सुरक्षित तरीके से बीता | मैं जब इस सुरक्षित घेरे से बाहर निकलकर उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली आई तब पहली बार मेरे सामने एक ऐसी दुनिया थी जो एकदम मेरे अनुभव से परे थी | इस अनुभव को व्यक्त करने के लिए अनामिका जी बड़ा ही खूबसूरत रूपक देती हैं – चिड़िया के बच्चे का पहली बार घोंसले से निकलकर आकाश में जाते वक्त जब हवा के थपेड़ों से सामना होता है तो उसका एक-एक रोंआ काँप जाता है | यह समझिए कि यदि आपके हर रोम में आँख है तो सारे रोम कूप अचानक से खुल जाते हैं, इसमें चोट बहुत लगती है | उन्होंने कहा कि उन जैसी तमाम मध्यमवर्गीय लड़कियों को इस चोट से गुजरकर ही दुनिया की सच्चाईयों से रूबरू होना पड़ता है | यहाँ वे एक मध्यमवर्गीय लड़की की इस पूरी प्रक्रिया से गुजरते हुये जो मनःस्थिति होती है, उसको व्यक्त करती दो कविताओं ‘चुटपुटिया बटन’ और ‘चुनाव’ का पाठ करती हैं |
दूसरा सवाल था कि एक स्त्री होने के चलते आपको साहित्य जगत में किन समस्याओं का सामना करना पड़ा ? इस प्रश्न के उत्तर में वे कहती हैं कि केवल साहित्य ही नहीं किसी भी कला के क्षेत्र में जब कोई स्त्री अपना मक़ाम पाने के लिए आगे बढ़ रही होती है तो हमारा समाज कोहनियाँ मारकर उसकी योग्यता और क्षमता पर तमाम प्रश्न खड़ा करता है | इतना ही नहीं वह स्त्री के काम के बारे में बात न करके उसके कपड़े, उसकी आवाज, उसके सौंदर्य आदि के तंग घेरे में ही उसे सीमित कर देता है | आज जब स्त्रियाँ शिक्षित होकर आगे बढ़ रही हैं, नए कीर्तिमान रच रहीं हैं तब भी उनको उनके नैतिक कद-काठी का साथी हमदर्द बमुश्किल ही मिल पाता है |
राजनीति में स्त्रियों की सहभागिता के प्रश्न पर अनामिका कहती हैं कि स्त्रियों कों विभिन्न क्षेत्रों में एक खास तरह की महिला विरोधी कामुक दृष्टि का सामना करना पड़ता है और यह राजनीति में तो सबसे ज्यादा है, इसलिए जब तक उनका अपना कोई वहाँ न हो वे राजनीति के क्षेत्र में जाने से बचती हैं | दूसरी बात, भले ही महिलाएं मेट्रो लेवल की राजनीति में शामिल न होती हों लेकिन माइक्रो लेवल की राजनीति में वे हमेशा सक्रिय रहती हैं ,वे हर तरह के वर्ग, वर्ण और समुदाय की स्त्रियों के साथ एक बहनापा विकसित करती हैं | यह इसलिए संभव होता है कि स्त्री चाहे वो जिस धर्म, जाति या समुदाय की हो देह उनके शोषण का प्राइम साइट है | तीसरा यह कि स्त्री अपना एक अलग संसार चुनती है जिसमें उसके अगल –बगल के सभी लोग मसलन दूध वाले, सब्जी वाले आदि शामिल होते हैं | इनकी वह लगातार देख-रेख करती है | इस माइक्रो लेवल की पॉलिटिक्स को और स्पष्ट करने के लिए वे अपनी एक कविता कूड़ा बीनते बच्चे सुनाती हैं-

उन्हें हमेशा जल्दी रहती है
उनके पेट में चूहे कूदते हैं
और खून में दौड़ती है गिलहरी!
बड़े–बड़े डग भरते
चलते हैं वे तो
उनका ढीला-ढाला कुर्ता
तन जाता है फूलकर उनके पीछे
जैसे कि हो पाल कश्ती का !
बोरियों में टनन–टनन गाती हुई
रम की बोतलें
उनकी झुकी पीठ की रीढ़ से
कभी-कभी कहती हैं-
“कैसी हो”, “कैसा है मंडी का हाल?”
बढ़ते-बढ़ते
चले जाते हैं वे
पाताल तक
और वहाँ लग्गी लगाकर
बैंगन तोड़ने वाले
बौनों के वास्ते
बना देते हैं
माचिस के खाली डिब्बों के
छोटे- छोटे कई घर
खुद तो वे कहीं नहीं रहते,
पर उन्हें खूब पता है घर का मतलब!
वे देखते हैं कि अकसर
चींटे भी कूड़े के ठोंगों से पेड़ा खुरचकर
ले जाते हैं अपने घर!
ईश्वर अपना चश्मा पोंछता है
कागज की पन्नी उनसे ही लेकर |

बहनापे के संबंध को बहुत ही गझिनता से व्यक्त करने के लिए वे एक और बहुत ही मार्मिक कविता ‘राबिया’ सुनाती हैं जो पास में रहने वाली दरजिन की संघर्ष गाथा है –

मैं राबिया अनवर
मुझको पहचाना नहीं क्या ?
क्या इतना बदल गया है मेरा चेहरा
गौर से देखिये जरा
इस चेहरे पर छपा है
आपकी ही दुनिया का नक्शा
तेजाब फेंका गया मेरे मुंह पर
लेकिन मैं ठीक-ठाक हूँ
मेरा काम चल रहा है
मैं अच्छी दरजिन हूँ
चाक गिरेबान सिलाना हो तो आयें
हाथ साफ है मेरा
ऐसे तो किरदार भी साफ है
पर उड़ती ही रहती हैं अफवाहें मेरे बारे में
इधर –उधर उड़ती हुई रंगीन कतरनों जैसी अफवाहें
मैं उनको यूं ही बुहार के एक थैली में जमा करती जाती हूँ
अक्सर तो लग जाती है उनकी चिप्पी
आ जाती है काम किसी का फटा ढंकने में
कभी-कभी फूलदार पैचवर्क ओढनी बनाती हूँ उनकी ही
जो बातें मुझको चुभ जाती हैं
मैं उनकी सुई बना लेती हूँ
चुभी हुई बातों की सुई से ही मैंने
टांके हैं फूल सभी धरती पर
हरे-भरे सारे नजारे
आसमान के ये सितारे
मुझसे ही टँकवाए थे उस खुदा ने
मेरा पुराना मेहरबान है वो खुदा
सच पूछिये तो है मेरा एकलौता आशिक वही
बाकी तो सब बाल-बुतरु हैं
मैं उनकी चिल्ल-पों कान नहीं धरती
रहती हूँ मस्त और किसी से नहीं डरती |

 

विवाह संस्था के संबंध में पूछे गए सवाल के जवाब में अनामिका कहती हैं कि इसको एक नेससरी एविल (आवश्यक बुराई ) ही माना जा सकता है, जैसे कि हमारी परीक्षा –पद्धति | समय बदलने के साथ धीरे-धीरे पति-पत्नी के सम्बन्धों में भी परिवर्तन हो रहा है और आज का पुरुष पहले के मुक़ाबले ज्यादा संवेदनशील है | पहले तो न जाने कितनी पत्नियाँ रोज थाली-बर्तन का पटका जाना झेलते हुए सिर झुकाये जीती जाती थीं और इसी संदर्भ में वे अपनी एक कविता पतिव्रता सुनाती हैं –

 

जैसे कि अँग्रेज़ी राज में सूरज नहीं डूबा था,
इनके घर में भी लगातार
दकदक करती थी
एक चिलचिलाहट ।

स्वामी जहाँ नहीं भी होते थे
होते थे उनके वहाँ पँजे,
मुहर, तौलिए, डण्डे,
स्टैम्प-पेपर, चप्पल-जूते,
हिचकियाँ-डकारें-खर्राटे
और त्यौरियाँ-धमकियाँ ,गालियां खचाखच
घर में घुसते ही
ज़ोर से दहाड़ते थे मालिक और एक ही डाँट पर
एकदम पट्ट
लेट जाती थीं वे
दम साधकर,
जैसे कि भालू के आते ही
लेट गया था
रूसी लोककथा का आदमी
सोचता हुआ कि मर लेते हैं कुछ देर,
मरे हुए को भालू और नहीं मारेगा ।
एक दिन किसी ने कहा
‘कह गए हैं जूलियस सीजर
कि बहादुर मरता है केवल एक बार,
कायर ही करते हैं,
बार-बार मरने का कारोबार ।

जब तुमने ऐसी कुछ ग़लती नहीं की,
फिर तुम यों मरी हुई बनकर क्यों लेटी ?’
तबसे उन्हें आने लगी शरम-सी
रोज़-रोज़ मरने में…
एक बार शरमातीं, लेकिन फिर कुछ सोचकर
मर ही जातीं,
मरती हुई सोचतीं
‘चिड़िया ही होना था तो शुतुरमुर्ग क्यों हुई मैं,
सूँघनी ही थी तो कोई लाड़ली नाक मुझे सूँघती
यह क्या कि सूँघा तो साँप ।’
और कुछ दिन बीते तो किसी ने उनको पढ़ाई
…गाँधी जी की जीवनी,
सत्याग्रह का कुछ ऐसा प्रभाव हुआ,
बेवजह टिटने के प्रतिकार में वे
लम्बे-लम्बे अनशन रखने लगीं।
चार-पाँच-सात शाम खटतीं वे निराहार
कि कोई आकर मना ले,
फिर एक रात
गिन्न-गिन्न नाचता माथा
पकड़े-पकड़े जा पहुँचतीं वे चौके तक
और धीरे-धीरे ख़ुद काढ़कर
खातीं बासी रोटियाँ
थोड़ा-सा लेकर उधार नमक आँखों का ।
तो, सखियो, ऐसा था कलियुग में जीवन
पतिव्रता का…
आगे कथा
सती के ही मुख से
सती की व्यथा
‘नहीं जानती कि ये क्या हो गया है,
गुस्सा नहीं आता ।
मन मुलायम रहता है
जैसे कि बरसात के बाद
मिट्टी मुलायम हो जाती है कच्चे-रस्ते की !
काम बहुत रहता है इनको ।
ठीक नहीं रहती तबीयत भी ।
अब छाती में इतना ज़ोर कहाँ
चिल्लाएँ, झिड़कें या पीटें ही बेचारे !
धीरे-धीरे मैं भी हो ही गई पालतू ।
बीमार से रगड़ा क्या, झगड़ा क्या,
मैंने साध ली क्षमा ।
मीठे लगते हैं खर्राटे भी इनके ।
धीमे-धीमे ही कुछ गाते हैं
अपने खर्राटों में ये ।
कान लगाकर सुनती रहती हूँ
शायद मुझे दी हो सपनों में आवाज़ ।
कोई गुपचुप बात मेरे लिए दबा रखी हो
इतने बरसों से अपने मन में
कोई ऐसी बात
जो रोज़ इतने दिन
ये कान सुनने को तरसे…
कोई ऐसी बात जिससे बदल जाए
जीवन का नक़्शा,
रेती पर झम-झम-झमक-झम कुछ बरसे…..

समाज के अन्य हाशिये के वर्गों के संघर्ष के साथ स्त्री-संघर्ष के संबंध पर बात करते हुए वे फिर बहनापे की बात दोहराती हैं तथा मानती हैं कि हर वर्ग की स्त्रियों की समस्याएँ अलग-अलग होती हैं लेकिन उन सबके शोषण का सबसे महत्वपूर्ण कारण उनका शरीर ही होता है | चाहे वह कन्या भ्रूण-हत्या हो, चाहे बिना भाव संभोग या यांत्रिक संभोग हो या साफ-सुथरे प्रसव की समस्या हो या इसी तरह के अन्य अपराध, इन सबको स्त्री मात्र को झेलना पड़ता है |

(प्रस्तुति: डॉ. कामिनी)

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