समकालीन जनमत

Category : साहित्य-संस्कृति

साहित्य-संस्कृति

‘  हाशिए के समाज के लेखक थे प्रो.चौथीराम यादव ’

समकालीन जनमत
मऊ। राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ और जन संस्कृति मंच के संयुक्त तत्वावधान में संत साहित्य व दलित विमर्श के व्याख्याता काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के हिन्दी...
कविता

श्रुति कुशवाहा की कविताओं में स्त्री विमर्श एक आक्रामक तेवर के साथ उपस्थित है।

समकालीन जनमत
निरंजन श्रोत्रिय स्त्री विमर्श जब ठंडा-सा हो तो वह स्त्री के पक्ष में खड़ा ज़रूर नज़र आता है लेकिन उसकी निर्णायक भूमिका संदिग्ध ही होती...
कविता

केतन की कविताएँ वैचारिकी और परिपक्व होते कवित्त का सुंदर समायोजन हैं

समकालीन जनमत
अणु शक्ति सिंह कविताओं से गुजरते हुए एक ख़याल जो अक्सर कौंधता है वह कवि की निर्मिति से जुड़ा होता है। वह क्या है जिससे...
जनमतपुस्तक

ज़ीरो माइल अयोध्या

अयोध्या, पिछले दिनों हुए लोकसभा के आम चुनाव के परिणाम आने के बाद, फिर से चर्चा में आ गया। पिछले सात दशकों से राष्ट्रीय स्वयंसेवक...
साहित्य-संस्कृति

‘ याद ए तश्ना’ कार्यक्रम में ‘तज़किरा’ त्रैमासिक पत्रिका का विमोचन

लखनऊ। जन संस्कृति मंच की ओर से मशहूर अवामी शायर तश्ना आलमी के सातवें स्मृति दिवस के अवसर पर इप्टा दफ़्तर कैसरबाग में ‘ याद...
कविता

आदित्य रहबर की कविताएँ सामाजिक-मानवीय मुद्दों की व्याख्या हैं

समकालीन जनमत
अंशु चौधरी आधुनिक सभ्यता का जब भी आकलन किया जाता है, तब उसकी प्रगति और विकास की कहानी के साथ-साथ, उसके भीतर का विडंबनात्मक संघर्ष...
कविता

कायनात शाहिदा की कविताएँ शीरीं लफ़्ज़ों की छोटी सी दुनिया है।

समकालीन जनमत
नाज़िश अंसारी पत्नी पर बेहिसाब चुटकुले बनने के बाद जिस विषय का सबसे ज़्यादा मज़ाक़ उड़ाया गया/ जाता है, वो है कविता। मुक्त कविता (आप...
कहानीजनमतसाहित्य-संस्कृति

पंकज मित्र की कहानियाँ: पूंजी और सत्ता की थम्हायी उम्मीद के बियाबान में भटकते लोगों की दास्तान 

दुर्गा सिंह
1991 में आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के लागू होने के बाद भारतीय समाज और संस्कृति में ऐसे परिवर्तन शुरू हुए, जो सतत विकास से अलग...
जनमतपुस्तकसाहित्य-संस्कृति

स्त्री-पुरुष संबंध पर विमर्श का एक और आयाम

समकालीन जनमत
आलोक कुमार श्रीवास्तव   उपन्यास, साहित्य की एक प्रमुख विधा है। इसमें समय-समय पर नये-नये प्रयोग होते रहते हैं और इन प्रयोगों की विशेषताओं के...
कविता

कविताओं के अनुभवों का आयुष

समकालीन जनमत
आज शेखर जोशी जीवित रहे तो 92 साल के हुए। जीवन के अंतिम दो दशकों में उन्होंने फिर से कविताएँ लिखीं और 2012 में ‘साहित्य...
स्मृति

‘ आर के सिन्हा वैचारिक स्कूल थे ’

समकालीन जनमत
लखनऊ, 9 सितंबर। मार्क्सवादी चिन्तक और जन संस्कृति मंच (जसम) के राज्य पार्षद तथा लखनऊ इकाई के उपाध्यक्ष आर के सिन्हा का विगत 27 अगस्त...
कविता

रहमान की कविताएँ प्रेम में बराबरी की पैरोकार हैं

समकालीन जनमत
मेहजबीं “मेरे जीवन में तुम सरई का फूल हो।” युवा कवि रहमान की अभिव्यक्ति के केन्द्र में प्रेम है। काव्य कला की बात करें उनकी...
कविता

रुचि बहुगुणा उनियाल की कविताओं में मानवीय रिश्तों की मिठास और गर्माहट है

समकालीन जनमत
गणेश गनी ‘बिछोह में ही लिखे जाते हैं प्रेम-पत्र’ रुचि बहुगुणा उनियाल उत्तराखंड से सम्बद्ध हिंदी कवयित्री हैं। विभिन्न विषयों पर कविताएँ लिखने वाली रचनाकार...
कविता

संजीव गुप्त की कविताएँ फैन्टेसी, इमेजरी और वैज्ञानिक प्रसंगों का सर्जनात्मक समुच्चय हैं।

समकालीन जनमत
निरंजन श्रोत्रिय साहित्य में वायवीयता होती है। कल्पना रचनात्मक साहित्य की प्रकृति है लेकिन किसी भी रचना की विश्वसनीयता के लिए यह आवश्यक है कि...
पुस्तक

कला में प्रतिरोध

गोपाल प्रधान
  2023 में लेफ़्टवर्ड से ब्रह्म प्रकाश की किताब ‘ बाडी आन द बैरीकेड्स: लाइफ़, आर्ट ऐंड रेजिस्टेन्स इन कनटेम्पोरेरी इंडिया ’ का प्रकाशन हुआ।...
कविता

चित्रा पँवार की कविताएँ कातर स्त्री मन से बूंद-बूंद रिसती ध्वनियाँ हैं

समकालीन जनमत
अणु शक्ति सिंह मैं चित्रा पँवार की कविताएँ पढ़ रही थी। उन कविताओं को पढ़ते हुए कई बार खयाल आया कि इन कविताओं का एक...
साहित्य-संस्कृति

 जुमई खां ‘आजाद’ की कविताओं में है वर्ग चेतना की विश्वसनीय और धारदार अभिव्यक्ति 

समकालीन जनमत
गिरिडीह। जन संस्कृति मंच, गिरिडीह और ‘ परिवर्तन ‘ पत्रिका के साझे प्रयत्न से गिरिडीह कॉलेज, गिरिडीह के न्यू बिल्डिंग में अवधी भाषा के प्रगतिशील कवि...
साहित्य-संस्कृति

‘ प्रेमचंद का लेखन विषमता, साम्प्रदायिकता, तानाशाही, अंधराष्ट्रवाद के खिलाफ लड़ाई जारी रखने की प्रेरणा देता है ’

समकालीन जनमत
बलिया। जन संस्कृति मंच की बलिया इकाई ने 11 अगस्त को पीडब्ल्यूडी के कर्मचारी हॉल में ‘ प्रेमचंद और आज का समय ’ विषय पर...
कविता

उज़्मा सरवत की कविताएँ व्यवस्था द्वारा निर्मित यथार्थ का आईना हैं।

मेहजबीं उज़्मा सरवत की कविताएँ समकालीन समय की आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक परिस्थितियों और पूंजीवादी व्यवस्था द्वारा निर्मित यथार्थ का आईना हैं। बहुत नपे-तुले शब्दों में...
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