शख्सियत

ये हमने कैसा समाज रच डाला है?

(हिंदी के महत्वपूर्ण कवि वीरेन डंगवाल का आज जन्मदिन है। वह आज हमारे बीच होते तो 73 बरस के होते। वीरेन डंगवाल के जन्मदिन पर समकालीन जनमत उनकी स्मृति में विभिन्न विधाओं में सामग्री प्रकाशित कर रहा है। इसी कड़ी में प्रस्तुत है युवा आलोचक प्रेमशंकर सिंह का यह लेख:सं।)


आज अयोध्या फिर से चर्चा में है। आज के ही दिन कश्मीर में लोकतंत्र को बंधक किया गया था, ठीक एक साल पहले। लिखने-पढ़ने की संस्कृति से संबंध रखने वाले लोग जेल में हैं। असहमति की हर आवाज़ को अलगाव में डालने की सत्ता की कोशिश बदस्तूर जारी है। लोकतंत्र में लोक पहली बार इतना निरीह और लाचार दिख रहा है और तंत्र का शिकंजा लोगों की गर्दन पर कसता चला जा रहा है। ‘खुद को सही रखने की कोशिश’ करने वाले लोग भी सत्ता के निशाने पर है और आमजन भी। इसके बरक्स पूँजीपति, महाजनों की मौज आई हुई है। कोरोना जैसी महामारी में जबकि बेरोजगारी चरम पर है, मुनाफाखोरों में लूट की खुली होड़ लगी हुई है। हर तरीके की असहमति को कुचलने के लिए सत्ता किसी भी तरह के घृणित काम को करने से नहीं संकोच करती। विवेक की जगह उन्माद और जवाबदेही की जगह उदंडता ने ले ली है । ठीक इसी समय क्या हम फिर से पूछ सकते हैं – ‘किसने आखिर ऐसा समाज रच डाला है?’

वीरेन गहरे सरोकारों और प्रखर राजनीतिक प्रतिबद्धता के कवि हैं। उनके पहले संग्रह से लेकर अंतिम दौर की कविताओं तक इस राजीनतिक प्रतिबद्धता को साफ देखा जा सकता है। आमजन के जीवन से जुड़े सवालों को नज़रअंदाज़ करने वाली सत्ता से सीधे सवाल करने से उन्हें परहेज नहीं। बल्कि किसी भी सत्ता से वे सवाल कर सकते हैं। लोकतन्त्र में सर्वोच्च सत्ता प्रधानमंत्री से भी और उसे जनता की ताकत का एहसास भी करा सकते हैं। वीरेन की एक कविता है उनके पहले संग्रह में – ‘प्रधानमंत्री’। उसमें वे कहते हैं कि ‘ये आदमी भी एक खुर्राट चीज है प्रधानमंत्री/ पानी की तरह साफ, शफ़्फ़ाक, निर्मल और तरल।’ लेकिन आज जैसा समाज हम देख रहे हैं उसमें ‘निर्मल और तरल’ यह आदमी चौतरफा मुश्किलों से घिरा हुआ है। महामारी, भूख, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, हर मामले में जबर्दस्ती उसे ‘आत्मनिर्भर’ बनाने के लिए छोड़ दिया गया है। आम जन पर मुसीबतों का पहाड़ टूटा हुआ है और सत्ता का आमजन के प्रति उपेक्षा पूर्ण रवैया वैसे ही बदस्तूर जारी है। मज़ा यह कि देश का प्रधानमंत्री उनके सब्र की परीक्षा ले रहा है। वीरेन को इस आम आदमी से बहुत भरोसा है। वे लिखते हैं- ‘लेकिन जब वह किलबिलाता हुआ उठ खड़ा होता है/ और अपनी पारदर्शी मांसपेशियों की चोट से/ घबड़ाई-चित्त पड़ी चट्टानों को तोड़ने लगता है/ तब?/ आदमी/ याने / बहरहाल/ आपको उससे कोई ताल्लुक नहीं है प्रधान मंत्री/ आप मस्त हैं/प्रसन्न हैं/ आपकी जय-जयकार है/ सचमुच-सचमुच मैं आपसे जलता हूँ।’ जब देश में जन की बात होनी चाहिए तब देश का प्रधानमंत्री अगर मन की बात करे और उसका गला बार बार रुद्ध जाए तो इस ‘गला रुँधने की बारीकी को समझने में वीरेन की यह कविता आपकी मदद कर सकती है- ‘वह भी शरीर का ही कोई हिस्सा है/जहां से भाप की तरह तैरता आता है दुख/ आवाज़ में घुल जाने के लिए/ अंधेरे में भी पहचानी जा सकती है दुखी आदमी की आवाज़/ नकली दुखी आदमी की आवाज़ में टीन का पत्तर बजता है/ मसलन मारे गए लोगों पर/ राजपुरुष का रुँधा हुआ गला।’ घोषित आपातकाल से अघोषित आपातकाल की स्थितियाँ कुछ बेहतर हैं क्या? इस प्रसंग में एक और कविता भी देख लेनी चाहिए-
1.
तुम दिन भर सपने रहे देखते आँय-बाय
छा गई रात हौले-हौले-हौले-हौले।
2.
बना बनकर/यों फूले-फूले झूल रहे जो अमलतास/ कुछ दिन में काली सख्त फली बनकर/ चमगादड़ ऐसे फूलेंगे। (मई 2014 कविता से)

कहना न होगा कि कवि की शंका एक भयावह सच की तरह हमारे सामने है। आँय-बाँय सपने दिखाकर आई अंधेरी रात में लोगों के सपने से खेलने वाली ताकतें आज अंधेरे के पहरेदार बनी बैठी हैं और देश के भविष्य की अलगनी पर चमगादड़ की तरह ही लटक रही हैं। इस कठोर सच से बाहर निकलने का रास्ता क्या हो, वीरेन की कविता इस प्रश्न को भी अपने पाठकों के सामने छोड़ती है। देश के भीतर लोकतान्त्रिक प्रक्रियाओं का दमन, सांप्रदायिक और धार्मिक आधार पर तीक्ष्ण ध्रुवीकरण और सच को सत्ता के सामने रखने वाले बौद्धिकों-रचनाकारों का दमन यह वह सच है जिसे फासीवादी सत्ता आज बखूबी अंजाम दे रही है। वीरेन ‘उजले दिन ज़रूर’ इसी सांप्रदायिक फासीवादी सत्ता के चरित्र की शिनाख़्त उसके शुरुआती दिनों में ही करते हैं- ‘तहख़ानों से निकले मोटे-मोटे चूहे/जो लाशों की बदबू फैलाते घूम रहे/ हैं कुतर रहे पुरखों की सारी तस्वीरें/ चीं चीं चिक चिक की धूम मचाते घूम रहे।’

सत्ता जनता की समस्याओं से न सिर्फ आँख चुरा रही है बल्कि एक नकली किस्म के राष्ट्रीय उन्माद में झोंक कर रखे हुए है। अन्यथा क्या कारण था कि आपदा से जूझते देश में स्वास्थ्य सुविधाओं के बेहतर करने की योजना के बदले परस्पर ‘मंदिर का भूमि पूजन’ उसे सर्वाधिक ज़रूरी काम लग रहा है। बाबरी विध्वंस के गुनहगार जहां हर किस्म के दोष से मुक्त कर दिए गए वहीं इस उन्मादी समय में भय की राजनीति ने देश के अल्पसंख्यक समुदाय को गहरे अवसाद में डाल दिया है। बाबरी विध्वंस के बाद 5 अगस्त की तारीख देश के भीतर सद्भावना और सौहार्द को खत्म करने की दिशा में निर्णायक साबित होगी, इसमें संदेह नहीं। आज जब तमाम निर्दोषों के खून में सने एक मंदिर के लिए भूमि पूजन का मुहूर्त किया गया तब वीरेन की ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ कविता की पंक्तियाँ बरबस ही याद आ जाती है – ‘प्रार्थना गृह जरूर उठाए गए एक से एक आलीशान/मगर भीतर छीने हुए रक्त के गारे से/ वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुंबद-मीनार/उंगली से छूते ही जिनसे रिस आता है खून।’

पिछली सदी के आखिरी दशक से मंदिर आंदोलन के नाम पर जो सांप्रदायिक उन्माद देश में फैलाया गया वह हमारे देश के संवैधानिक मूल्यों और पंथ निरपेक्ष भावना के कदापि अनुरूप न था। धरम को जानबूझ कर राजनीति के केंद्र में खड़ा किया है और इस तरह से एक मध्यकालीनता का प्रसार किया गया। आवारा और अनियंत्रित पूँजी तथा तकनीकी चमत्कारों ने इसके लिए उपयुक्त अवसर प्रदान किए। नई तकनीक और दलाल पूंजी के घालमेल से जो रसायन तैयार हुआ है वह अपने नागरिकों के प्रति किस त्तरह हिंस्र है उसकी एक बानगी हम इस कविता में देख सकते हैं- ‘एक मक्खी का जीवन-क्रम पूरा हुआ/ कई शिशु पैदा हुए, और उनमें से/ कई तो मारे भी गए/दंगे और आगजनी में/ गरीब बस्तियों में भी /धमाके से हुआ देवी जागरण/लाउड स्पीकर ।’ लेकिन वीरेन की कविता एक भरोसा है कि दमन का यह दौर जल्दी ही खत्म होगा और मनुष्यता एक नई राह पर ज़रूर आगे बढ़ेगी। उनकी ‘मसला’ कविता गौरतलब है- ‘बेईमान सजे बजे हैं /तो क्या हम मान लें कि/बेईमानी भी एक सजावट है? / कातिल मजे में हैं / तो क्या हम मान लें कि कत्ल करना मजेदार काम है? मसला मनुष्य का है/ इसलिए हम तो हरगिज़ नहीं मानेंगे/ कि मसले जाने के लिए ही बना है मनुष्य।’

यथार्थ को उसके मूल किन्तु गतिशील रूप में जिस पैनी निगाह से वीरेन जी पकड़ते हैं, और उसे पूरी जटिलता के साथ जैसी सहज अभिव्यक्ति प्रदान करते है वह समकालीन हिन्दी कविता में विरल है. वीरेन यह निराला से सीखते हैं. राम निराला के भी है वीरेन के भी और आज की सत्ता को टिकाऊ और मजबूत बनाने के लिए बेहद ज़रूरी ‘काम’ लगते हैं। लेकिन निराला ने राम के संघर्ष को पहचाना, वीरेन उस राम के भीतर के संशय को और तीखा बनाते हैं. ‘स्थिर राघवेन्द्र को हिला रहा फिर-फिर संशय’ जैसी पंक्ति मानो ‘शक्तिपूजा’ से छिटककर अचानक ‘उजले दिन जरूर’ कविता में कुछ इस तरह दिख जाती है- ‘आतंक सरीखी बिछी हुई हर ओर बर्फ़ / है हवा कठिन, हड्डी-हड्डी को ठिठुराती/ आकाश उगलता अन्धकार फिर एक बार/ संशय- विदीर्ण आत्मा राम की अकुलाती.’ लेकिन ये जो राम हैं, उन्हें वीरेन न ईश्वर के रूप में याद करते है, न ही उसे मिथक की तरह बरतते है. वे राम की अकुलाहट को सीधे सूखे चेहरों और बच्चों की तरल हँसी से जोड़ देते हैं-

यह रक्तपात, यह मारकाट जो मची हुई
लोगों के दिल भरमा देने का ज़रिया है
जो अड़ा हुआ है हमें डराता रस्ते में
लपटें लेता घनघोर आग का दरिया है

सूखे चेहरे बच्चों की तरल हँसी
हम याद रखेंगे पार उसे कर जाएँगे.’

सत्ता द्वारा जो युद्ध आपाततः मनुष्यता पर थोपा गया हो, उसके प्रतिकार के लिए कविता को दुःख से मुरझाये ‘सूखे चेहरे’ और ‘बच्चों की तरल हँसी’ के बगल वीरेन डंगवाल खडा कर देते हैं. आतंक और भय का जो माहौल हमारे चौतरफा आज की फासीवादी सत्ता ने रच रखा है, उसका केंद्रीय प्रतिरोध भी ऐसे ही रचा जाना है. ये मनुष्यता की मुक्ति के लिए देखा गया एक बड़े कवि का स्वप्न है. वीरेन के ‘उजले दिन’ की आभा इसके मेल में है. वीरेन की कविताएं हिन्दी की सर्वश्रेष्ठ काव्य परम्परा और प्रगतिशील चेतना से अपना रूपाकार ग्रहण करती है और उसे एक नया आयाम भी देती है.

परम्परा’ और ‘संस्कृति’ ये दो शब्द ऐसे हैं जिन्हें पिछले कुछ वर्षों में सबसे ज्यादा मनमाने रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश हुई है. 1990 के बाद नए किस्म के उदारवाद और उसकी संगत में फल-फूल रहे सांप्रदायिक फासीवाद ने भारतीयता की धारणा को जितना कटघरे में खड़ा किया है, उतना पहले कभी नहीं देखा गया. यह ‘उस पेचीदी सरसता को’ नष्ट करने का ही अभियान है जिसे वीरेन अपनी कविता ‘जलेबी’ में खमीर के बहाने बचाए रखने की बात करते है. इस अभियान का सफल होना इस बात पर निर्भर है कि हमें, हमारी स्मृति से, हमारी प्रतिरोधी परम्परा से जितना जल्दी हो, काट दिया जाए. इसके लिए परम्परा और संस्कृति की मनमानी व्याख्याएं की जा रही हैं. यह ‘विवेक को सुन्न’ करके ‘विवेकवान’ बनाने और ‘स्मृति पर डंडे बरसाने’ का उन्मत्त समय है। वीरेन सत्ता के इस चरित्र से हमें समय रहते आगाह करने वाले कवि है- पहले उसने हमारी स्मृति पर डंडे बरसाए/ और कहा –‘असल में यह तुम्हारी स्मृति है’/ फिर उसने हमारे विवेक को सुन्न किया/ और कहा- ‘अब जाकर हुए तुम विवेकवान’/ फिर उसने हमारी आँखों पर पट्टी बाँधी/ और कहा-‘चलो अब उपनिषद पढ़ो’/ फिर उसने अपनी सजी हुई डोंगी हमारे रक्त की / नदी में उतार दी/ और कहा ‘अब अपनी तो यही है परंपरा’। लेकिन जिस कवि को जनता के विवेक और स्मृति पर भरोसा हो, वही राम की अयोध्या में घूमते हुए यह देख सकेगा कि-‘दोपहर की अजान उठी/ लाउडस्पीकर पर एक करूण प्रार्थना/किसी को भी ऐतराज न हुआ/ सरयू दूर थीं यहाँ से अभी,/ दूर थी उनकी अयोध्या।’ ऐसी ही अयोध्या में उन्हें एक ऐसा राम भी मिलता है जिसे किसी मंदिर या प्रार्थनालय की दरकार नहीं है। वह तो अन्य क्षुब्ध जनों का कोटिशः भाव है और ‘जागृत सतत ज्योतिर्विवेक का हामी है- अन्य क्षुब्ध कोटिशः जनों का एक भाव/ जनपीड़ा-जनित प्रचंड क्रोध/भर देता जिसमें शक्ति एक/जागृत सतत ज्योतिर्विवेक/ वह एक और मन रहा राम का जो न थका।/ ‘इसीलिए रौंदी जाकर भी/ मरी नहीं हमारी अयोध्या।‘

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