समकालीन जनमत
शख्सियत

बहुत हो गया…मैं जल्दी बरेली आऊंगा…अब जो होगा वहीं होगा

(हिंदी के महत्वपूर्ण कवि वीरेन डंगवाल का आज जन्मदिन है। वह आज हमारे बीच होते तो 73 बरस के होते। वीरेन डंगवाल के जन्मदिन पर समकालीन जनमत उनकी स्मृति में विभिन्न विधाओं में सामग्री प्रकाशित कर रहा है। इसी कड़ी में प्रस्तुत है पत्रकार शालिनी बाजपेयी का यह लेख:सं।)


तब मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी से बीए कर रही थी। फाइनल इयर में आई तो लिखने का शौक लग गया। अक्सर सामाजिक मुद्दों पर लिखती थी। अब लिखने का शौक लगा तो छपने की इच्छा भी होने लगी। मैंने अख़बारों में पत्र भेजने शुरू किए। तब मैं पत्र भेज कर ही संतुष्ट नहीं हो जाती थी, अख़बारों के दफ्तर में फोन भी कर देती थी। अमर उजाला में तो मैं बाकायदा वीरेन दा को ही फोन कर देती थी। फोन करती और उनकी आवाज सुनने के साथ ही बेझिझक एक सांस में कहती, सर मैं शालिनी बोल रही हूं…सर, मैंने पत्र भेजा था, शायद आपको मिल गया होगा, छपवा दीजियेगा…। वीरेन दा मुझसे कुछ कहने से पहले फ़ोन पर ही दफ्तर के साथियों से कहते, भाई देखो जरा…. शालिनी ने पत्र भेजा होगा। ये कहने के बाद बड़े प्यार से मुझसे कहते….ठीक है शालिनी….छप जाएगा।

उस उम्र उनका वो ‘छप जाएगा’ कहना सुनकर ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहता था। और शायद उनका ये आश्वासन ही वो प्रोत्साहन था जिसके सहारे मैं पत्रकारिता के क्षेत्र में चली आई। ‘छप जाएगा’ का ये सिलसिला यूं ही चलता रहा। फिर 2007 में लखनऊ के जसम फ़िल्म फेस्टिवल में उनसे मिलना हुआ। कार्यक्रम का अन्तिम दिन था, बाल्मीकि रंगशाला से बाहर निकली ही थी कि देखा  वीरेन दा घास के एक ऊंचे टीले पर बैठे सहारा के दयाशंकर जी से बातें कर रहे हैं। मैं तुरन्त वहां गई, उन्हें अपना परिचय दिया। उन्होंने तो जैसे फोन पर होने वाली हमारी छोटी-छोटी बातचीत से ही मुझे जान लिया था। वही ‘छप जाएगा’ वाला प्यार और अत्मीयता का भाव। विदा लेने लगी तो उन्होने बातें करते-करते बड़े प्यार से मेरे सिर पर हाथ रखा। मुझे महसूस हुआ कि जैसे मुझे कोई मार्गदर्शक मिल गया। इसके बाद भी हमारा ‘छप जाएगा’ वाला संक्षिप्त संवाद बना रहा।

जून 2010 में, मैं अमर उजाला, बरेली में इंटरव्यू देने आयी। जब सब काम निपट गया तो शाम को मैं अपने एक मित्र के साथ वीरेन दा के घर पहुंची। वे मुझे देखते ही बोले…इंटरव्यू देने आई थी, बताया नहीं। मैंने कहा; सर, सबकुछ इतना जल्दबाजी में हो गया कि मौका ही नहीं मिला….देखिए क्या होता, अगर बरेली में काम करने का मौका मिला तब तो आपसे खूब मिलना होगा।

जुलाई 2010 में मैंने अमर उजाला ज्वाइन कर लिया। ज्वाइन किए अभी हफ्ता भर ही हुआ था कि वीरेन दा बरेली कॉलेज से रिटायर हो गए। कॉलेज में उनकी फेयरवेल पार्टी थी। मुझे वो कार्यक्रम कवर तो नहीं करना था, लेकिन मैं उनकी वजह से उस कार्यक्रम में गई। कार्यक्रम में सभी रिटायर्ड शिक्षकों को भगवतगीता देकर और शाल ओढ़ाकर सम्मानित किया जा रहा था। जब वीरेन दा की बारी आई तो उन्होंने कहा, भाई मुझे गीता मत दीजिए। मैं कोई सांसारिक माया मोह त्यागने नहीं जा रहा हूं…सांसारिक माया मोह में तो अब आया हूं…अब खूब लिखूंगा…माया मोह ही त्याग दूंगा तो लेखन का काम कैसे कर पाऊंगा। उनकी ये बातें सुनकर उन्हें गीता देने की हिम्मत किसी की नहीं हुई, सिर्फ शॉल ओढ़ाकर ही सम्मानित किया गया। मेरे लिए वो कार्यक्रम एक यादगार है।

वो पत्रकारिता में मेरे शुरुआती दिन थे। बरेली मेरे लिए अनजान शहर था, किसी को जानती भी नहीं थी। डेस्क पर थी, तो जब भी मौका मिलता वीरेन दा से मिलने चली जाती। एक बार मुझसे बोले, शालिनी ये तुम्हारे नेचर का शहर नहीं है, फिर मन ही मन कुछ सोच के ज़ोर से हंसे और बोले….अरे…मेरे तो कुछ कुकर्म रहे होंगे जो मैं यहां रुक गया, तुम नहीं रुक पाओगी। उनकी बात और बोलने का अंदाज देख मैं भी अपनी हंसी नहीं रोक पायी।

मैं जब-जब उनके घर जाती तो देखती कि तमाम लोग पहले से ही बैठे हैं। कोई अखबार से इस्तीफा देने के बाद उनके घर आया है, कोई दूसरे अखबार में ज्वाइन करने के बाद उनका आशीर्वाद लेने आया है तो कोई संस्थान में प्रताड़ित होने पर अपना दुखड़ा रोने आया है। समय कारण कोई भी हो उनके चाहने वालों को उनसे मिलने का सिर्फ एक बहाना चाहिए था। वो लोगों की सिफारिश करने में जरा भी हिचकते नहीं थे, कोई भी कहता, दादा जरा फलाने से कह दीजिएगा, आपके तो अच्छे परिचित हैं, वे तुरन्त कहते, हाँ बात करता हूँ। उन्होंने जाने कितने बेरोजगार युवाओं को जीने का सहारा दिया। मैं भी अक्सर ही उनसे मिलने जाती। वो चाहते थे कि मैं डेस्क पर नहीं, बल्कि रिपोर्टिंग में काम करूँ। वो हमेशा कहते कि ऊर्जावान युवाओं को रिपोर्टिंग में ही काम करना चाहिए। मैंने उनसे कई बार कहा, अभी इस शहर के बारे में मैं कुछ जानती भी नहीं हूं। मेरे लिए एकदम नया शहर है। इस पर वह बोले, माहौल सब सिखा देता है। कोई भी सीखकर नहीं आता है। काम कराने वाला शख़्स काम करा लेता है।

दिसंबर की कड़कड़ाती ठंड में एक शाम मैं और मेरे एक साथी भारत, उनके घर पहुंचे। घर पर कोई और नहीं था, वे अकेले थे। बोले, तुम लोग बहुत ठंड में आए हो, बैठो, मैं चाय बनाकर लाता हूँ। मैंने कहा, आप बैठिए मैं चाय बनाकर लाती हूँ। बोले, जितनी देर में तुम चाय की पत्ती और चीनी कहां रखी है पूछोगी, उतनी देर में तो मैं चाय बना लूंगा। ये कह कर वो किचन की ओर चल दिए, मैं भी उनके पीछे-पीछे किचन में चली गई। उनके साथ चाय बनवायी। चाय बनाने के बाद वो ब्रेड के साथ हाफ फ्राई एग भी बनाने लगे। मैं देखती रही, कुछ बोली नहीं। इसके बाद मैं बैठक में चाय ले लाई और वो दो प्लेट में ब्रेड और हाफ फ्राई एग ले आए। एक प्लेट मेरे सामने सरकाई और दूसरी भारत के सामने। मैंने हाफ फ्राई के चारों ओर की ब्रेड निकालकर खा ली और भारत से कहा कि वो हाफ फ्राई खा ले। दरअसल मैं तब अंडा नहीं खाती थी। ये देखकर वो बोले, शालिनी तुम अंडा खाती हो। मैंने कहा, हाँ सर… मैं अंडा नहीं खाती। वे जोर से हंसे और बोले….. अरे मैं तो पूछना ही भूल गया। मैंने कहा, नहीं सर….. ऐसी कोई बात नहीं है……. चाय और ब्रेड तो खा ही ली मैंने…. इस समय चाय की ही सबसे ज्यादा जरूरत थी।

हमेशा इसी तरह से सबका स्वागत और मदद करने वाले वीरेन जी को जब बीमारी ने अपनी चपेट में लिया तो उनके चाहने वाले भी उदास हो गए। जब भी कोई उन्हें फोन करता या मिलता तो उनका हाल पूछता लेकिन वह अपने बारे में कोई बात नहीं करते। इसके बजाय सामने वाले की ही खैर खबर ले डालते। जब बीमारी सर चढ़कर बैठ गई, तब भी उन्होंने खुद को कभी बीमार नहीं माना। जब ऑपरेशन कराकर बरेली आए तो मैं उन्हें देखने घर गई, लेकिन वह अपने बेटे को स्टेशन छोड़ने के लिए तैयार खड़े थे। घर पर सभी लोग उन्हें अकेले ड्राइव करने से रोक रहे थे, लेकिन वह किसकी सुनने वाले थे। जब मैं घर पहुंची तो मुझे देखते ही बोले, देखो! शालिनी आ गई। अब तो जा सकते हैं। शालिनी साथ में चलेगी। मुझे साथ लेकर खुद ड्राइव करते हुए वह बेटे को रेलवे स्टेशन तक छोड़ने गए। हालांकि वह काफी कमजोर हो गए, लेकिन खुद को बीमार मानने को तैयार नहीं थे। वह गजब के जिंदादिल इंसान थे।

आखिरी बार 31 जुलाई 2015 को उनसे दिल्ली में मुलाकात हुई थी। वे जसम के राष्ट्रीय सम्मेलन में आए थे। उन्हें देखकर मन उदास हो गया था। दरअसल वो बहुत कमजोर दिख रहे थे। मैंने उन्हें इस तरह से कभी नहीं देखा था। उन्हें देखकर कुछ कहने की हिम्मत ही नहीं हुई बस देखती रही। लेकिन वह तपाक से बोले, मोटी हो गई हो। मैंने उनकी बात पर बस जबरदस्ती मुस्कुरा दिया। हँसने का तो मन ही नहीं कर रहा था। लेकिन उनमें वैसी ही ऊर्जा थी। कार्यक्रम के बाद जब वापस जाने लगे तो गाड़ी में बैठते हुए बोले, शालिनी…. अब बहुत हो गया…. मैं जल्दी ही बरेली आऊंगा। अब जो होगा वहीं होगा। उन्होंने वादा निभाया और बरेली लौट आए। मैं एसआरएमएस मेडिकल कॉलेज उन्हें देखने गयी थी पर वे आईसीयू में भर्ती थे। मुझे ‘छप जाएगा’ का आश्वासन देने वाला उजले दिनों की तलाश में अनन्त यात्रा पर निकल गया, मैं इतना पास होते हुए भी उससे मिल नहीं पायी, इसकी टीस मुझे हमेशा सालती रहेगी…..

 

(लखनऊ विश्वविद्यालय से बीए और इतिहास विषय में परास्नातक  शालिनी  ने  काशी विद्यापीठ से पत्रकारिता व जनसंचार में परास्नातक  पढ़ाई  की . अमर उजाला, बरेली व हिंदुस्तान, दिल्ली में पत्रकारिता का अनुभव. सम्प्रति एक राष्ट्रीय चैनल में संवाददाता.)

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