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पीछे लौटना ठीक नहीं है मोदीजी !

ए. शास्त्री

 

भारत की जनता जब कोई आयातित वस्तु खरीदती है, तो उसे खरीदने में डॉलर खर्च होता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय व्यापार, लेनदेन डॉलर में ही होता है। ये वही डॉलर होते हैं जो रिज़र्व बैंक के विदेशी मुद्रा भंडार के रूप में रखे जाते हैं। इस प्रकार कुछ आयात करने के लिए पहले रुपये से डॉलर खरीदा जाता है, फिर उस डॉलर से आयातित वस्तु खरीदी जाती है।

जैसे भारतीय लोग विदेशी सामान खरीदते हैं, वैसे ही विदेशी लोग भी कुछ भारतीय सामान खरीदते हैं। वे भी इस खरीद के लिए डॉलर का इस्तेमाल करते हैं। वे डॉलर देकर रुपया खरीदते हैं, फिर उस रुपये से भारतीय सामान। इस तरह भारत को रुपये के बदले डॉलर मिलता है जो हमारे विदेशी मुद्रा भंडार का हिस्सा बनता है।

भारत को डॉलर विदेशी निवेश के माध्यम से भी मिलते हैं। जब कोई विदेशी, भारत में कोई व्यवसाय शुरू करता है, तो भारत के लिए यह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) होता है और इससे भारत को डॉलर मिलते हैं। जब कोई विदेशी, भारत के शेयर बाजार की सूचीबद्ध कम्पनियों के शेयर खरीदता है, तब भी भारत को डॉलर मिलते हैं। भारतीय सूचीबद्ध कम्पनियों के शेयरों की खरीद की यह प्रक्रिया विदेशी पोर्टफोलिओ निवेश (FPI) कहलाती है।

1991 के आर्थिक सुधारों के बाद से स्थितियाँ कुछ ऐसी बनी हैं, कि भारत सामान्यत: आयात ज्यादा करता है और निर्यात कम। इस स्थिति को चालू खाता घाटा (Current Account Deficit – CAD) कहते हैं। भारत का चालू खाता घाटा हमेशा ही बना रहता है। इस घाटे का संतुलन होता है विदेशियों द्वारा भारत में किए जाने वाले निवेश से। यह भी 1991 के बाद की स्थिति की ही सच्चाई है कि भारतीय लोग विदेशों में जितना निवेश करते हैं, उससे कहीं ज्यादा निवेश, विदेशी लोग भारत में करते हैं। यह स्थिति भारत के लिए फायदेमंद होती है, क्योंकि भारतीयों के विदेश में निवेश के मुकाबले विदेशियों के भारत में निवेश की अधिकता के कारण सरप्लस की स्थिति बनती है। भारत में अधिक विदेशी निवेश से मिलने वाला यह सरप्लस Capital Account Surplus (CAS) कहलाता है और इस सरप्लस का संतुलन चालू खाता घाटा (CAD) से होता है। Capital Account Surplus (CAS) का Current Account Deficit (CAD) से अधिक होना भुगतान संतुलन सरप्लस (Balance of Payment Surplus) कहलाता है।

जब तक यह भुगतान संतुलन सरप्लस बना रहता है, आरबीआई अपने पास डॉलर के रूप में विदेशी मुद्रा भंडार बनाए रखता, जो ज़रूरत के समय काम आता है, या फिर वह इसका उपयोग करके रुपये की विनिमय दर को मजबूत बनाता है।

भुगतान संतुलन सरप्लस के विपरीत, कभी-कभी भुगतान संतुलन घाटे की स्थिति भी बन जाती है। ऐसे में या तो रुपया कमजोर होता है या फिर भारत का विदेशी मुद्रा भण्डार घटता है। आरबीआई के पास यह विकल्प रहता है कि वह या तो रुपये को कमजोर होने दे या फिर डॉलर बेचकर रुपये की विनिमय दर को बेहतर बनाए, लेकिन इसकी कीमत विदेशी मुद्रा भंडार को चुकानी पड़ती है।

अफ़सोस की बात है कि लगभग पिछले दो साल से भारत का भुगतान संतुलन सरप्लस लगातार कम हुआ है और चालू खाता घाटा घटने का नाम नहीं ले रहा है। ऐसे में कुल मिलाकर हम भुगतान संतुलन घाटे की स्थिति में हैं।

अब विदेशी मुद्रा की चुनौती से निपटने के तरीकों पर विचार करें। एक तरीका है कि हम आयातित वस्तुओं का उपभोग करना ही बंद कर दें या बहुत कम कर दें जो कि व्यावहारिक नहीं है। दूसरा तरीका है कि विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लिए कुछ ठोस काम किया जाए। कहने का मतलब यह है कि भारत अपनी उत्पादन क्षमता और उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाए ताकि निर्यात बढ़े। मौजूदा परिस्थितियों में मोदीजी ने सिर्फ पहले तरीके को ही समाधान की तरह पेश किया है, जब कि ज़रूरत दूसरे वाले तरीके पर फोकस करने की थी। भारत में बड़ी युवा आबादी और भारी बेरोजगारी को देखते हुए यह रास्ता व्यावहारिक और सबके लिए फायदेमंद भी है।

जबकि मोदीजी की अपील के मुताबिक अगर सभी भारतीय अपने उपभोग में ही कटौती कर देंगे तो देश की अर्थव्यवस्था, घरेलू बाजार और अंतत: जीडीपी का क्या होगा? जीडीपी घटेगी, बाजार में मंदी होगी। तमाम व्यवसाय, रोजगार और बाजार की गतिविधियाँ ठप पड़ जाएंगी।

इस तरह देखें तो साफ हो जाता है कि अचानक उपभोग में कटौती करने से कोई स्थायी समाधान नहीं निकलना है। हमें देश को उत्पादक बनाना होगा। हमारे उत्पाद विश्व बाजार की प्रतियोगिता में खड़े हो सकें, उन्हें इस लायक बनाना होगा। युवाओं को रोजगार देकर इस रास्ते पर आगे बढ़ा जा सकता था, लेकिन अफ़सोस, कि मोदीजी पीछे की ओर लौटना शुरू कर चुके हैं। अब उनसे कौन कहे – ‘पीछे लौटना ठीक नहीं है मोदीजी!’

अर्थशास्त्र, ज्ञान के सबसे व्यावहारिक और गतिशील अनुशासनों में से एक है। किसी देश की अर्थव्यवस्था को किसी भावुकता या आदर्शवाद से नहीं चलाया जा सकता। बात अगर देश की अर्थव्यवस्था की हो तो हमें दुनियां भर की अर्थव्यवस्थाओं की चाल भी देखनी होगी। इसीलिए देश का शासन चलाने के लिए सिद्धांत और व्यवहार दोनों की समझ बहुत ज़रूरी होती है। लेकिन अफसोस की बात है कि इन दिनों हमारा देश इस समझ से वंचित है। विदेशी मुद्रा बचाने और स्वदेशी उत्पादों का इस्तेमाल करने की कोरी भावुक अपीलें इसी नासमझी का नमूना हैं। अवध के गाँवों में ऐसी ही नासमझी पर एक लोककथा प्रचलित है – एक किसान के बेटे ने अर्थशास्त्र की पढ़ाई की। उसमें उपलब्ध संसाधनों का योजनाबद्ध और अधिकतम इस्तेमाल की सैद्धांतिक बात थी। किसान के बेटे ने इसे अपने घर में ही लागू करने का निश्चय किया। फसल कटाई के फौरन बाद उसने अनाज को नाप-तौलकर और घर के लोगों की खुराक की गणना करके यह तय पाया कि खेत में जितना अनाज हुआ है, वह पूरे वर्ष के लिए पर्याप्त नहीं है, कुछ दिनों के लिए अनाज की कमी पड़ेगी। फिर क्या था, उसने उपलब्ध संसाधनों का योजनाबद्ध और अधिकतम इस्तेमाल का सिद्धांत लगाया और तय किया कि अनाज के अलावा जो भूसा है, उसका भी खाने में उपयोग किया जाएगा और अनाज से पहले भूसे को खाकर खतम किया जाएगा। बस, इतनी ही कथा है। घर में भरपूर अनाज होने के बावजूद किसान के बेटे की इस एक नासमझी ने पूरे परिवार की जान ले ली।  फिलहाल खतरा उस पूरे देश पर है जिसके पास आज भी संसाधनों की कोई कमी नहीं है।

 

फ़ीचर्ड इमेज गूगल से साभार 

 

 

 

 

 

 

 

 

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