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राष्ट्रहित के भेस में देशद्रोह

तमिलनाडु में स्टरलाइट के ‘ग्रीन कॉपर’ परियोजना के लिए प्रधान-मंत्री ने ‘राष्ट्र-हित’ का झण्डा बुलंद किया!

एम कल्याणरमन 

थुटुकुड़ी का स्टरलाइट कॉपर-प्लांट पिछले 8 सालों से बंद पड़ा है। 2018 में पुलिस ने वहाँ प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई थी जिसमें 13 लोगों की मृत्यु हो गई थी और लगभग 100 लोग घायल हो गए थे। तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने उस इकाई को चालू रखने का अपना आदेश वापस ले लिया था। बाद में राज्य सरकार ने उसे बंद कर देने का आदेश जारी कर दिया था।

पर्यावरण-मानकों के लगातार उल्लंघन और 2013 में सल्फर डाइ-ऑक्साइड गॅस के रिसाव के लिए इस कंपनी को जिम्मेदार ठहराते हुए मद्रास उच्च-न्यायालय ने इस इकाई के बंद किए जाने के आदेश को विधि-सम्मत करार दिया। बाद में उच्चतम न्यायालय ने भी इस आदेश का समर्थन किया। अब तमिलनाडु के अधिकांश लोगों के लिए स्टरलाइट एक बंद अध्याय बन चुका था।

फिर भी, इस साल 10 मई को प्रधान-मंत्री नरेंद्र मोदी ने स्टरलाइट की लाश में यह कह कर नई जान फूँक दी कि इस इकाई की बंदी के पीछे कोई साजिश थी। उनका कहना था कि “एक समय था जब भारत कॉपर का निर्यात किया करता था। परंतु आज भारत को उसका आयात करना पड़ रहा है। हमारे देश में हड़तालों और प्रदर्शनों के चलते कॉपर प्लांट्स को बंद करना पड़ा है।“

स्टरलाइट कॉपर की प्रति-वर्ष परिष्कृत-कॉपर की उत्पादन क्षमता 4 लाख टन थी, जो भारत की स्थानीय मांग और निर्यात का 40% था। इसके बंद होने से भारत परिष्कृत-कॉपर का  निर्यातक होने के स्थान पर केवल आयातक बन कर रह गया है।

स्वदेशी स्मेल्टिंग हेतु पर्याप्त अयस्क की उपलब्धता के बावजूद 4 लाख टन परिष्कृत-कॉपर का आयात करने में लगभग 3.5 बिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा देश से बाहर चली जाती है। यह कंपनी लगभग 350 छोटी कंपनियों की जरूरतों को पूरा करती थी जिनमें से अधिकतर एमएसएमई (अति-लघु, लघु एवं मध्यम) श्रेणी के उपक्रम हैं, इसके बंद होने से परिष्कृत-कॉपर की आपूर्ति-शृंखला बाधित हो गई है और नतीजतन उनके दाम चढ़ गए हैं।

विद्युत-चालित वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा-प्रणालियों और विद्युत-प्रेषण अधोसंरचना में कॉपर की महती भूमिका के कारण उसे बढ़ते हुए सामरिक महत्व की धातु के रूप में देखा जा रहा है। इस इकाई के बंद होने से कॉपर केन्द्रित आयात के क्षेत्र में काम करने वाले थुटुकुड़ी बन्दरगाह पर और साथ ही स्थानीय अर्थव्यस्था पर भी बहुत व्यापक प्रभाव पड़ा है।

दीर्घकालीन प्रदर्शन 

हांलाकि 90 के दशक के मध्य में, अपनी शुरुआत से ही स्टरलाइट कारख़ाना दीर्घकालीन प्रदर्शनों की जद में आ चुका था। प्रारम्भ में मछुआरों ने, इस आशंका में कि कारखाने का गंदा पानी समुद्री जीव-जंतुओं और उससे जुड़ी हुई उनकी जीविका को प्रभावित करेगा, इसके खिलाफ प्रदर्शन किया परंतु बाद में शहर के लोगों और पर्यावरण के प्रति सजग कार्यकर्ताओं ने उसकी बागडोर अपने हाथों में ले ली। अब चिंता का दायरा बढ़कर भूजल-प्रदूषण, ठोस अपशिष्ट-निस्तारण और वायु-प्रदूषण तक फैल गया था और अदालतों ने अपने फैसलों में इनका जिक्र भी किया था। 2013 का गैस-रिसाव विशेष रूप से संवेदनशील मुद्दा था।

2018 के आखिरी दौर के प्रदर्शन की चिंगारी उठी थी कंपनी की क्षमता-वृद्धि की योजना से और इसका नेतृत्व किया था कारखाने के आसपास रहनेवाले ग्रामीणों ने। इस प्रदर्शन को अनेक राजनीतिक दलों और कार्यकर्ता-समूहों का समर्थन प्राप्त था और 100वें दिन यह अपने चरम पर आ गया था। बाद में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के वयोवृद्ध नेता और पूर्व-सांसद एम अप्पादुरई ने टिप्पणी की थी कि किसी जन-आंदोलन में जनता की ऐसी भागीदारी उन्होंने कभी नहीं देखी थी। इस प्रदर्शन की परिणिति हुई 22 मई, 2018 की  पुलिस-फायरिंग में।

बंदी के बावजूद इस कारखाने को दुबारा चालू करने के वेदांता के प्रयास जारी रहे। इस कंपनी ने निर्माण-विधि के सुधार के पश्चात ‘ग्रीन कॉपर’ के उत्पादन का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। स्टरलाइट के अनुसार नई विधि में नवीकरणीय ऊर्जा के प्रयोग, सल्फर डाइ-ऑक्साइड गैस के रिसाव पर उन्नत-नियंत्रण, बेहतर जल-पुनर्चक्रण और जल-स्रोत के रूप में समुद्र के निर्लवणित-जल के प्रयोग किए जाने की साफ-सुथरी तकनीक से पर्यावरणीय-दुष्प्रभाव को सीमित कर दिया जाएगा। इसमें जिप्सम अपशिष्ट पैदा करनेवाली फॉसफोरिक एसिड इकाई को बंद कर दिये जाने का प्रस्ताव भी शामिल है।

तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आवेदन-पत्र 

वेदांता ने इस साल 9 जनवरी को तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को आवेदन-पत्र दिया कि उसे थुटुकुड़ी कार्यस्थल पर प्रस्तावित ग्रीन कॉपर कारखाने को चलाने की अनुमति प्रदान की जाय लेकिन बोर्ड ने 27 जनवरी को उस आवेदन-पत्र को निरस्त कर दिया।

इसपर स्टरलाइट ने यह कहते हुए मद्रास उच्च-न्यायालय का रुख किया कि उन्हें कोई नोटिस जारी किए या सुनवाई का मौका दिये बगैर उनका आवेदन-पत्र मनमाने ढंग से निरस्त कर दिया गया। मुख्य न्यायाधीश मणींद्र मोहन श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति जी अरुल मुरूगन की पीठ ने तमिलनाडु के अतिरिक्त महाधिवक्ता को निर्देशित किया कि वह ‘ग्रीन कॉपर फैसिलिटी’ के लिए अनुमति दिये जाने की संभावना का आकलन करने हेतु एक विशेषज्ञ-समिति के गठन के लिए राज्य सरकार की स्वीकृति प्राप्त करें।

इन हालात में मोदी जी की यह टिप्पणी अति-महत्वपूर्ण हो जाती है। हैदराबाद में उन्होंने कहा कि “मैं अदालतों से यह भी अनुरोध करूंगा कि जब कभी ऐसे हालात पैदा हों उस समय प्रयास यह होना चाहिए राष्ट्र-हित को सर्वोपरि रखते हुए ही कोई समाधान दिया जाय।“

हमेशा के लिए नहीं 

स्टरलाइट द्वारा न्यायिक मार्ग अपनाने पर टिप्पणी करते हुए उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता संजय हेगड़े ने कहा कि मूल परियोजना की बंदी के अपने अंतिम न्यायिक परिणति को प्राप्त हो जाने का यह मतलब नहीं है कि न्यायालय का यह आदेश हमेशा के लिए बाध्यकारी हो गया। किसी अन्य प्रक्रिया का प्रयास करने का स्टरलाइट का अधिकार अक्षुण्ण है।

नए आयाम

उन्होंने कहा कि “न्यायालय को जाँचना चाहिए कि क्या वास्तव में किसी नए आयाम की स्थापना की जा रही है या पुरानी परियोजना को ही झाड़-पोंछ कर और नया जामा पहना कर प्रस्तुत किया जा रहा है।“

हेगड़े ने आगे कहा कि राष्ट्र-हित में एक नया स्मेल्टर लगाए जाने को लेकर मोदी जी की सोच ठीक हो सकती है। पर सवाल यह है कि क्या राष्ट्र-हित को समस्त पर्यावरणीय चिंताओं पर तरजीह दी जा सकती है।

“यह जो भी हो रहा है वह एक विस्तृत एजेंडे का हिस्सा है जिसमें कहा जा रहा है कि पर्यावरणवाद विकास की राह का रोड़ा है और इसे सिरे से ख़ारिज़ कर दिया जाना चाहिए। जब भी राष्ट्र-हित का प्रश्न उठाया जाय तो उसे ज्यों का त्यों मान लिया जाना चाहिए, उसकी तफसील में नहीं जाना चाहिए। यह किस किस्म का राष्ट्र-हित है?“

‘द हिन्दू’ दिनांक 07.06.2026 से साभार अनुवाद: दिनेश अस्थाना

 

फ़ीचर्ड इमेज गूगल से साभार 

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