Saturday, December 10, 2022
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हम सभी के घर में गणित के जादूगर हैं: ऊषा दशोरा की कविताएँ

अरुण शीतांश


स्त्री जीवन की विडंबनाओं पर बहुत सारी कविताएँ हमने पढ़ी हैं और उनके माध्यम से उस जीवन की तमाम कही अनकही जटिलताओं से रूबरू हुए हैं। प्रकाशन की दुनिया से दूर और कलम की दुनिया से क़रीब ऊषा दशोरा की कविताओं से मुखातिब होना इस अर्थ में नया था कि उनके पास कहन की जो शैली है वह पाठक को अपनी जद से तब तक छूटने नहीं देती जब तक वह खुद को पूरी तरह संप्रेषित न कर दे। कई बार और कई तरीके से कही जा चुकी बातों को अर्थ और भाषा का नयापन दे पाना एक चुनौती है जिसे ऊषा दशोरा ने बखूबी निभाया है।

“हम सभी घर में गणित के जादूगर हैं 
जो लिंगों के आधार पर
मैथ्स के सारे फार्मूले बदल सकते हैं” 

कवयित्री ऊषा दशोरा की काव्य भाषा कविता की परतदार और कथा के बेबाकपन से बुनी हुई है, ऐसा इसलिए भी संभव हो सका कि वो एक साथ दोनों ही विधाओं में अपना दखल रखती हैं।

“विज्ञान की ऊंची डिग्री वाली प्लास्टिक की थैलियाँ हैं
कपास से कॉमेडी करने वाले सिंथेटिक कपड़े हैं
नौकरी के ख्वाब चिपकाए घूमते प्रतियोगिता दर्पण के टॉपर हैं
हम कौन हैं?”

कहा जाता है कि कुछ रचनाएँ समय के साथ अधिक प्रासंगिक हो जाती हैं, अभी रुस का यूक्रेन पर जारी आक्रमण पूरी मनुष्यता के लिए इस दौर का सबसे भयानक अध्याय है । ऊषा दशोरा ने दो साल पहले ‘युद्ध और बच्चे’ नाम की एक कविता सीरीज लिखी है । उस सीरीज की पहली पंक्ति की कविता है –“जब युद्ध की घोषणा हुई तब हँसते हुए बच्चे फूल वाले पौधे को पानी दे रहे थे…”

‘युद्ध और बच्चे’ के सीरीज के अंतिम वाक्य में ऊषा दशोरा कहती हैं- “बच्चों की हँसी बोधिवृक्ष है ,उसी की जड़ों में मिट्टी होकर बारूद के कारखानों की अब बुद्व होने की तीव्र इच्छा है.. युद्ध के समर्थकों सुनो !हमें ऐसी महान इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए।”

आज कविता का जो मिजाज़ और तेवर बन रहा है उसमें रचनाकारों का संघर्ष कम दिखाई दे रहा है इसलिए उनकी रचनाएँ भी कोई महत्वपूर्ण बात कहने में अक्सर चूक जाती हैं, लेकिन कुछ रचनाकार रचना और अवाम के प्रति अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सतर्क हैं और कुछ अर्थवान रचने की कोशिशों में निरंतर संलग्न हैं। ऊषा दशोरा की कविताएँ इसी अर्थवान कोशिश का हिस्सा हैं, यह सुखद है।

 

ऊषा दशोरा की कविताएँ

1.हस्तिनापुर की रिक्त हथेलियाँ

कहाँ दर्ज हो अमानवीय पाठ्यपुस्तक के  दाँत
कहाँ दर्ज हो  चालाकियों के दोगले धारावाहिक
कहाँ दर्ज हो धोखे की आँख में बैठे यकीन के इस्तीफे
कहाँ दर्ज हो  डिब्बाबंद इश्क के  उपभोक्तावादी डॉयलॉग
ऐसे ही नहीं उजड़ा धरती का मेरूदंड़
ऐसे ही नहीं हाँफा नदी का अस्थमा
इन धांधलियों में एक ग्राम ही सही धावा हमारी ओर से भी बोला गया है
भूतकाल की बाँहों में कैद हम सारे हस्तिनापुर की रिक्त हथेलियां हैं।

 

2.हम कौन हैं ?

नेलकटर से काटे हड़प्पा के नाखून का फालतूपन हैं
मोहनजोदाड़ो की झुर्रियों की खांसी का बुढ़ापा हैं
कालीबंगा के माथे के सलों पर बैठे अम्मा के खाली बक्से हैं
हम कौन हैं?
विज्ञान की ऊंची डीग्री वाली प्लास्टिक की थैलियां हैं
कपास से कॉमेडी करने वाले सिंथेटिक कपड़े हैं
नौकरी के ख्वाब चिपकाए घूमते प्रतियोगिता दर्पण  के टॉपर है
हम कौन हैं?
बॉनवीटा की  धोखे वाली रेडीमेड शक्ति हैं
स्टेफ्री के सेनटरी-पेड की नकली आजादी हैं
मेगी के विज्ञापन से चिपकी दो मिनिट की मूर्खता हैं
हम कौन हैं?
नेटफिल्क्स पर  कूदती- उछलती गालियों का मजा हैं
एकता कपूर के सिरियल का  जमा जमाया शतरंज बोर्ड  हैं
न्यूज एंकर का बड़बड़ करता टी आर पी वाला माइक है
हम कौन है?
हे ईश्वर! हमें  समझदारों  की पीठ से उतारो
हमें  इनसे मुक्ति दो
असमझदारों हमें बताओ
कि हम देशभक्ति का खराब पाचनतंत्र हैं
कि हम भारत माता की जय हो वाले नारे की फुंसियाँ है
कि हम उन्नीस सौ सैंतालिस की सामूहिक आत्महत्या हैं
कि दो हजार इक्कीस में फैंके गए
अमनुष्य से ज्यादा कुछ नहीं हैं।

3. ईश्वर आत्महत्या नहीं कर सकता

क्या मुझे पता होना चाहिए
ये किस रंग का ईश्वर
मेरे साथ एक रूपया घण्टा किराये की साइकिल चलाते हुए
अपने कोहनी- घुटने फोड़ लेता था
एक बदबूदार घोषणा पत्र में तुमने छापा
उनका ईश्वर आत्महत्या कर चुका है
फिर बाजार से उठाई नकली प्रार्थना की डुप्लीकेट आंखें
और उन में उगा दी अपने रंग की इमारत
उसके बाहर अपने पसंद के ईश्वर की नेमप्लेट टाँगी
एक किलो शक्कर तौलते हुए
जितने दाने दुकानदार नीचे गिराता है
ईश्वर उन्हीं से अपना पेट भरता है
कुछ पेंसिल ‘अ ‘ से अनार नहीं पहले भूख लिखती है
फूलमाला और प्रसाद में दस रूपये कम करवाने की बहस
और ज़माना कितना खराब है का रायता फैलाकर
जब तुम ईश्वर से माँगते हो नौकरी में तरक्की ,
बेटे के ज्यादा मार्क्स और महंगी गाड़ी
उसी वक्त ईश्वर हेड़फोन लगाकर,
रेत में घर बनाते हुए अपनी गुम हुई एक चप्पल ढूँढने के बाद
बच्चों के फटे हुए जूतों की मरम्मत में बैठा होता है
धरती की देह को  फोड़ कर बनाए गए सभी रंगों के प्रार्थना घरों में
ईश्वर शताब्दियों अनुपस्थित  है
अगरबत्ती की सुगंध अगरबत्ती के कारखाने में
काम करनेवाले दस साल के बच्चों के रोते हुए हाथ हैं
जिनके साथ ईश्वर  रोज अपना टिफिन खाता है
हे समझदार ईश्वर के घर का रंग अघोष झुंझुना है।

4. मैं उन्हें नहीं पढ़ाती
(आदरणीय राजेश जोशी जी से इकतरफा संवाद)

प्रिय कवि जहाँ आपने इस कविता का अंतिम वर्ण लिखा था।
उसी से आगे
मैं रोज सुबह सात बजे बच्चों को पढ़ाने निकल पड़ती हूँ।
जयपुर में गुर्जर की थड़ी पास मेट्रो पुल के नीचे
बच्चे कचरे के थैले के साथ बैठे मिलते हैं
मैं उन्हें नहीं पढ़ाती
मैं आगे बढ़ जाती हूँ
गोपालपुरा बायपास की दो सौ फिट रोड के दोनों तरफ
कई कोचिंग सेंटर हैं
वहीं पास की चाय की दुकानों पर बच्चे गिलास धोते हुए मिलते हैं
मैं उन्हें नहीं पढ़ाती
मैं आगे बढ़ जाती हूँ
पालीवाल ज्वैलर्स के पास
एक चौराहा आता है वहीं स्मार्ट सिटी का बोर्ड लगा है
लाल बत्ती पर गाड़ी रोकती हूँ
चार बच्चे शनि महाराज कहते हुए पैसे माँगने लगते हैं
मैं उन्हें नहीं पढ़ाती
मैं आगे बढ़ जाती हूँ
मेरा स्कूल आता है
मैं कक्षा में नई कविता पढ़ाती हूँ बच्चे काम पर जा रहे हैं *
व्याख्या करती हूँ
प्रश्नों का होमवर्क देती हूँ कॉपी चेक करती हूँ
परीक्षा लेती हूँ अंक देती हूँ
मैं इन बच्चों को पढ़ाती हूँ
पन्द्रह साल से मैं उसी सड़क से स्कूल आ रही हूँ
नहीं पढ़ने वाले बच्चे पुल के नीचे बैठे हैं
पढ़ने वाले बच्चे कक्षा में बैठे हैं
बच्चों के बस चेहरे व नाम बदले हैं
मैं कविता पढ़ाती हूँ बच्चे (अब भी) काम पर जा रहे हैं। *
पढ़ाती रहूँगी

5. मैं नमक पर चलने वाली स्त्री हूँ

माँ रात को चने भिगोती थी
मैं सुबह उन चनों मेंढेर पानी पी जाने वाला मुँह ढूँढती
मैंने ऐसे ही विज्ञान के हजारों बर्थडे मनाए
रसोई का विज्ञान में ट्रांसलेशन
हर लड़की की आँख में अधिकार से दमकना चाहिए
संडे सुबह आठ बजे भाई क्रिकेट खेलने जाता
सड़क से चिल्लाता लेट आऊँगा
लेट आऊँगा और लेट आऊँगी इनके मध्य दूरी
अरबों किलोमीटर है बहुत जल्दी सीखा
हम सभी के घर में गणित के जादूगर हैं
जो लिंगों के आधार पर मेथ्स के सारे फॉर्मूले बदल सकते हैं।
लहना सिंह की फ़ोटोकॉपी किसी मोहल्ले में नहीं ढूँढी “उसने कहा था’ कहानी का इश्क
किसी देह में ट्रांसफर न हो अच्छा है
कुछ ख़्वाबों का खालीपन मृत्यु तक जीना चाहती हूँ
यही खालीपन मेरे आसमानी पंखों का उड़नसूत्र रहा
भाषा के सरनेम नहीं होते
मैंने गुलाब के बिम्ब वाली जुगाड़ फैक्ट्री में मजदूरी से इनकार किया
मैं नवरात्रि में निर्भया के साथ मोमबत्ती बुझाकर
दुर्गासप्तशती में तर्क के धान रोपने वाली मजदूरन हूँ
एक नकली देवत्व मेरी हत्या की साज़िश में दुअन्नी सा लिप्त है
जान लें
मैं नमक पर चलने वाली स्त्री हूँ।

6. युद्ध और बच्चे

(i)
जब युद्ध की घोषणा हुई
तब हँसते हुए बच्चे फूल वाले पौधों को पानी दे रहे थे
उनकी हँसी के भार से डरी कई बंदूकें
पौधों के पीठ के पीछे जा छुपी
उनमें फूल के बीज होने की जिद होने लगी
जिद थी कि देह पर फूटे मीठी गंध
जिद थी कि बस फूल खिले माथे पर
दुनिया की समस्त बंदूकें फूल बन जाए
इस उम्मीद की मौत नहीं होनी चाहिए
क्योंकि अभी सींचने हैं
बच्चों को धरती के सारे फूल।

(ii)
बरसों पहले
प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध  की तारीखों को रटते-रटते
उस बच्चे ने  इतिहास की कॉपी में
इन प्रश्नों  के आस-पास
युद्ध से कभी न लौटकर वाले अपने पिता के असंख्य चित्र बनाए थे
उस दिन से आज तक  ये तारीखें
चुपचाप गीली आँखें लिए
संसार के प्रत्येक बच्चे से क्षमा  माँग रही हैं।

(iii)
सीमा परयुद्ध चल रहा था
और टी वी पर सत्ताईस सैनिकों के मरने की उन्नीस के लापता होने की खबर आई
उसी समय सातों महाद्वीपों पर
ढेर बच्चे बस्तों में  हजारों प्रार्थनाऐं भर
स्कूल बस के इंतजार में खड़े थे
ताकि वे भविष्य में
विश्व के सभ्य और शांत नागरिक बन सकें।

(iv)
आज ही युद्ध खत्म हुआ थाऔर अब बारूद के कारखानों की अंतिम इच्छा थी
कि वे खेल के मैदान बन जाएँ
उनकी छाती पर दौड़ें असंख्य मुस्कराते बच्चे
छुपम-छुपाई, पकड़म-पकड़ाई की हँसी
उनके  जले हुए काले  फेफड़ों को साँस दे
बच्चों की हँसी बोधिवृक्ष है
उसी की जड़ों में
मिट्टी होकर बारूद के कारखानों  की अब बुद्ध  होने की तीव्र इच्छा है
युद्ध के समर्थकों सुनोंहमें ऐसी महान इच्छाओं का सम्मान करना चाहिए।

कवयित्री ऊषा दशोरा मूलतः उत्तराखंड की रहने वाली हैं, जन्म उदयपुर में हुआ और वर्तमान निवास जयपुर में है। ऊषा दशोरा सर्टिफाइड माउंटेनियर है और इन दिनों चाइल्ड साइकोलॉजी पर शॉर्ट मूवी बनाने में सक्रिय हैं. दीपक अरोड़ा सम्मान के तहत बोधि प्रकाशन, जयपुर से पहला कविता संग्रह ‘भाषा के सरनेम नहीं होते’ प्रकाशित हो चुका है।
संपर्क: drushadashora@gmail.com

 

टिप्पणीकार कवि अरुण शीतांश, जन्म 02.11.1972, अरवल जिला के विष्णुपुरा गाँव में, शिक्षा -एम ए ( भूगोल व हिन्दी)
एम लिब सांईस, एल एल बी, पी एच डी

कविता संग्रह:  एक ऐसी दुनिया की तलाश में, 
 हर मिनट एक घटना है, पत्थरबाज़

आलोचना: शब्द साक्षी हैं, सदी की चौखट पर कविता संपादन: पंचदीप, युवा कविता का जनतंत्र, बादल का वस्त्र(केदारनाथ अग्रवाल पर केन्द्रित), विकल्प है कविता
सम्मान शिवपूजन सहाय सम्मान और युवा शिखर साहित्य सम्मान।

देशज नामक पत्रिका का संपादन

संप्रति: 
शिक्षण संस्थान में कार्यरत

संपर्क: मणि भवन, संकट मोचन नगर, आरा भोजपुर
802301. मो ० – 09431685589
ईमेल: arunsheetansh@gmail.com

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