समकालीन जनमत
शख्सियत

वीरेन डंगवाल की कविता: बृजराज

(आज वीरेन डंगवाल का जन्मदिन है। वह हमारे साथ होते तो आज 73 बरस के होते। उनके जन्मदिन पर समकालीन जनमत विविध विधाओं में सामग्री प्रकाशित कर रहा है। इसी कड़ी में प्रस्तुत है बृजराज का यह लेख: सं।)


वीरेन डंगवाल का पहला संग्रह ‘इसी दुनिया में’ 1991 में प्रकाशित हुआ था। इसमें कुल मात्र 39 कवितायें थीं। इस संग्रह में जो सबसे पुरानी कविता सम्मिलित है, वह 1970 की लिखी हुई है। अर्थात लगभग बीस साल बाद उनका पहला संग्रह आ पाया था, वह भी ज्ञानरंजन और नीलाभ के सहयोग से। समीर पाठक ने एक बार जब उनसे कहा कि आपकी कुछ कवितायें मुझे कमजोर-सी लगती हैं; तब उन्होने अपने चिर-परिचित अंदाज में कहा कि-‘प्यारे मुझसे कुछ न कहो, पूछो ज्ञान और नीलाभ से, उन्होंने ही छापी छपवाई थीं, मैंने तो सिर्फ लिखी भर हैं।’ इसी निस्पृहता के साथ वे कविता लिखते थे। बीस सालों में सिर्फ चालीस कविता। उसके बाद उनका दूसरा संग्रह ‘दुष्चक्र में स्रष्टा’ 2002 में और तीसरा संग्रह ‘स्याही ताल’ 2010 में प्रकाशित हुआ। इसके अलावा उनकी कविताओं का एक चयन ‘कवि ने कहा’ नाम से भी प्रकाशित हुआ है। इस तरह देखा जाए तो चालीस-पैंतालीस सालों के काव्य जीवन में मात्र तीन काव्य-संग्रह हैं। इन संग्रहों में भी कविताओं की संख्या थोड़ी कम ही है। किसी भी संग्रह का आकार बहुत बड़ा नहीं रहा। इससे दो बातें पता चलती हैं, या तो वे कवितायें कम लिखते थे या उनके प्रकाशन से परहेज करते थे। उन्हें अपनी कविताओं के प्रकाशन से संबन्धित उत्कंठा नहीं रहती थी। पंकज चतुर्वेदी ने उनकी इस आदत को रेखांकित करते हुए लिखा है- ‘तुममें कविता के प्रकाशन की उत्कंठा नहीं रहती थी और अपने इस संकोच पर तुम किंचित् गर्व करते थे।’ कवि न सिर्फ शब्दों के मामले में मितव्ययी होता है बल्कि संनवेदनाओं के प्रस्तुतीकरण में भी कृपण होता है। इसीलिए वह अपनी किसी भी मार्मिक अभिव्यक्ति को तब तक अपने हृदय से बाहर बाह्य जगत का हिस्सा नहीं बनने देना चाहता है जब तक कि उसे यह विश्वास न हो जाए कि उसका ज्ञानात्मक संवेदन सबका संवेदनात्मक ज्ञान बनने की काबिलियत प्राप्त कर लिया है। समकालीन हिन्दी कविता में मुख्य धारा के कवियों में सबसे कम उन्होंने ही लिखा है। यही बात उन्हें उनके समकालीनों से अलग करती थी। इसीलिए उन्होंने अपने काव्य-लेखन के प्रति मोह नहीं दिखलाया। उन्होंने एक अलग रास्ता चुना जिसे वे अपने अंतिम प्रकाशित संग्रह स्याही ताल में कहते भी हैं-

दरअसल मैंने तो पकड़ा ही एक अलग रास्ता
वह छोटा नहीं था न आसान
फकत फ़ितूर जैसा एक पक्का यकीन
एक अलग रास्ता पकड़ा मैंने

वीरेन की मृत्यु 28 सितम्बर 2015 को हुई थी। यह हम सब जानते हैं कि वे अपने अंतिम दिनों में कैंसर जैसी असाध्य और तकलीफदेह बीमारी से जूझ रहे थे। लगातार सर्जरी और कीमोथेरेपी की दर्दनाक प्रक्रिया से गुजरते हुए भी वे निराश या दुखी न दिखने का प्रयास करते रहे। उनसे मिलने वालों में से कई लोगों ने इस बात को महसूस किया कि उनमें वही पहले वाली ज़िंदादिली और बेफिक्री तब भी थी जब वे अस्पताल के बिस्तर पर अंतिम घड़ियाँ गिन रहे थे। अंतिम संग्रह के प्रकाशित होने के बाद उनकी कुछ कवितायें इधर इधर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुईं। कुछ अप्रकाशित रहीं। इन सभी कविताओं को एकत्र कर नवारुण प्रकाशन से प्रकाशित ‘कविता वीरेन’ में संकलित किया गया है। ऐसी अड़तीस कवितायें शामिल की गयी हैं। लगभग उतनी ही जितनी वीरेन के किसी एक संग्रह में होती थीं। इसमें ज़्यादातर कवितायें 2014-15 की हैं। यह वही समय है जब वे दिल्ली में कैंसर का इलाज करा रहे थे। उन्हें अड़सठ साल का जीवन मिला। उनका जीवन सफल और सार्थक दोनों कहा जा सकता है। वे निराश नहीं थे। उनकी नज़र में निराशा जीवन-जगत के संघर्षों से विरत होकर अपने सुविधा की खोल में घुस जाना था। क्योंकि निराशा में कोई प्रश्न बेचैन नहीं करता। प्रश्नों के हल नहीं खोजने पड़ते। वह एक ऐसा बहाना है जहां आप अपने से पूछे जाने वाले प्रश्नों से बचाकर छुप सकते हैं। चूंकि आप निराश हैं, इसलिए किसी भी बदलाव के संघर्ष में शामिल नहीं होंगे। उनकी इन कविताओं को अधिकांश लोगों ने निराशा और मृत्यु के आसन्न संकट के दुख की कविता कहा है। यहाँ हम लोग उनकी इन कविताओं की प्रकृति और उनके संदेश को जानने की कोशिश करेंगे। यह पता लगाने की कोशिश करेंगे कि दुनिया को ‘आएंगे उजले दिन जरूर आएंगे’ की दिलासा देने वाला कवि क्या अपने अंतिम दिनों में निराश हो गया था। वे पूरी तैयारी से हैं, वे जानते हैं कि उनके स्वप्न अब सदैव अधूरे ही रहेंगे फिर भी निराशा के जंगल में जाने से पहले अपने जूते के फीतों को खूब कसकर बांधते हैं। कवि दैवीय शक्तियाँ लेकर नहीं आता। वे जानते थे निराशा उन्हें अपने बाहुपाश में लेगी ही लेगी; इसीलिए वे तैयारी करते हैं। उन्हें निराश होकर बैठ जाना मंजूर नहीं। इसीलिए जब बीमारी उन्हें चारों ओर से घेरने लगती है तब वे पुनः कविता की ओर लौटते हैं। जितनी कवितायें उन्होने 2014-15 के बीच लिखीं उतनी शायद पहले कभी इतने कम समय में नहीं लिखी होंगी। इसका अर्थ है कि उन्हें अंतिम क्षणों तक कविता से उम्मीद बनी हुई थी। बीमारी के बहाने प्रश्नों से भागना कवि को मंजूर नहीं था। फिलहाल उन्हीं की एक कविता मेरी निराशा की कुछ पंक्तियाँ जिससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि वे अपने उन दिनों में भी केवल निराश नहीं थे, बल्कि उससे जूझने के रास्ते की तलाश कर रहे थे।
यही अच्छी बात है निराशा के साथ
उसमें कोई समस्या नहीं होती
जिसका हल तलाशना परेशान करे

वे निराश भले नहीं थे, लेकिन अपनी मृत्यु को बहुत नजदीक से महसूस कर रहे थे। उन्हें इस बात का अहसास हो गया था कि अब चलने की तैयारी कर लेनी चाहिए। फिर भी वे निराशा के सागर में जल समाधि लेना नहीं चाहते थे। वे दुखी होकर मरना नहीं चाहते थे। आसन्न मृत्यु की अंतिम घड़ी को भी उन्होंने अपनी एक कविता में दर्ज़ किया है; जहां वे कह रहे हैं कि उन्हें पता है कि उनके जाने का समय हो गया है, लेकिन ऐसे नहीं जाऊँगा। नहा-धोकर, कपड़े बदल लेने के बाद ही चलूँगा। कौन होगा ऐसा भला जो मृत्यु से कहे कि थोड़ी देर रुको मुझे अभी कुछ काम है। जीवन से लबालब भरा हुआ कवि, मृत्यु से भय नहीं खा सकता। वे इस अंतिम यात्रा पर भी अपनी तैयारी कर के जाना चाहते हैं। मौत के पहले कई बार नहीं मरना चाहते थे। मृत्यु तो निश्चित है, गालिब ने अपने एक शेर में कहा है कि मौत का एक दिन तो निश्चित ही है फिर उसके डर से रातों की नींद क्यों गायब है अर्थात मौत से पहले ही हज़ार बार क्यों मरा जाए।

मौत का एक दिन मुय्यन है
नींद क्यूँ रात भर नहीं आती

इसी बात को वीरेन अपने चिर परिचित खिलंदड़ेपन के साथ कहते हैं, कि चलना तो है ही लेकिन कुछ उबले आलू रख लूँ। पता नहीं देवलोक में आलू मिले न मिले। वे मृत्यु और उसके देवता का मज़ाक भी उड़ा देते हैं। मानो कह रहे हों कि और कुछ भले ही मिल जाए लेकिन देवलोक में चप्पल तो शर्तिया नहीं मिलेगा, इसलिए मुझे चप्पल पहन लेने दो।

मैं नहीं तनहा
भोर के तारों
तुम्हारे साथ हूँ मैं,
वक्त गाड़ी का चला है हो
मुझे मालूम है ये
बस ज़रा सा नहा ही लूँ और कपड़े बदल डालूँ रात के
चप्पल पहन लूँ
साथ रख लूँ चार उबले हुए आलू

कैंसर से पीड़ित व्यक्ति की मनोदशा कैसी होती होगी। वह जानता है कि यह लाइलाज बीमारी है। हमारे शरीर में प्रत्येक कोशिका का एक निश्चित कार्य होता है। रेडियोथेरेपी एवं कीमोथेरेपी की विधियाँ बेहद कष्टप्रद और दर्द से भरी होती हैं। मरीज के लिए यह रोज रोज के मरने जैसा होता है। इतना कष्ट सहन करने के बावजूद इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि कैंसर ठीक ही हो जाएगा। कई बार शुरुआती लक्षण उत्साहजनक होने एवं बहुत हद तक बीमारी ठीक हो जाने के बावजूद भी कैंसर की कोशिकाओं के दुबारा से पनप जाने का अंदेशा बना रहता है। अस्पताल के बिस्तर पर लेटे, ऑपरेशन थिएटर में बड़ी बड़ी लाइटों के नीचे या रेडिओलोजी विभाग में अपनी सिकाई कराते हुए मरीज को यही महसूस होता है कि वह मृत्यु के दरवाजे पर खड़ा है। इसे वीरेन ने अपनी एक कविता में बड़े ही मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है कि वे किस तरह रोज रोज मृत्यु के दरवाजे तक जाते हैं और उसे धता बताते हुए लौट आते हैं। वे कहते हैं कि धराशायी होने के पहले तक यह खेल चलता रहेगा इसलिए हिम्मत नहीं हारनी है।

दौड़ते हुए जाना है उस दीवार तक
उसे छूकर दौड़ते हुए लौट आना है
धराशायी होने तक चलते रहना है यह खेल।

लेकिन उन्हें यह ताकत कहाँ से मिलती है। मृत्यु और दर्द के इस कठिन समय में भी वे निराशा से लड़ना जानते हैं। इसका रहस्य है उन्हीं की एक कविता में। सन्निपात जीवन के आसन्न संकट से बेसुध हो जाने की अवस्था है। चेतना के निष्क्रिय हो जाने की स्थिति है। वीरेन पर मृत्यु अपना डेरा डाले बैठी है, वे जानते थे मृत्यु तय है। वीरेन मृत्यु को बहुत निकट से महसूस कर रहे थे, लेकिन वे सन्निपात की अवस्था में जाना नहीं चाहते। वे अपने लोगों की ओर लौटते हैं। क्योंकि इस विषम परिस्थिति से लड़ने का साहस वहीं से मिलेगा। स्मृति से मिलेगा। वीरेन अपनी कविताओं में बार-बार स्मृति को एक औज़ार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। इसकी चर्चा अन्य प्रसंग में की जाएगी। वे अपने लोगों और अपने पहाड़ की ओर लौटते हैं क्योंकि वे जानते हैं कि वहीं से वह खाद-गोबर मिलेगा जिसके बल पर इस लड़ाई को लड़ा जा सकता है। उनके इस लौटने की क्रिया को उनके संघर्षों के साथी प्रसिद्ध कवि मंगलेश डबराल ने बहुत करीब से महसूस किया है और एक जगह लिखा है कि-“गंभीर बीमारी और सर्जरी के बावजूद वीरेन ने लिखना जारी रखा और उनकी जो भी अब तक असंकलित कवितायें हैं, वे दो बदलाओं का संकेत करती हैं : वे संवेदना और अनुभव के उन श्रोतों की ओर मुड़ रहे थे जिनमें या तो स्थानीयता और कुछ पहाड़ीपन था या जिनसे ‘रामसिंह’ जैसी जुझारू कविता संभव हुई थी।” इस बात की पुष्टि वीरेन के अंतिम दिनों की इस कविता से आसानी से हो जाएगी। पलाश विश्वास के लिए कविता लिखते हुए लिखते हैं कि
सन्निपात में हो जैसे
अपनी निरंतर बड़बड़ाहट में रचता है वह
अपने सपनों और कामनाओं का स्वच्छलोक
जो लिया हुआ है पोखर की मिट्टी और गोबर से

वीरेन को निराला बहुत पसंद हैं, निराला की अनेकों छवियाँ वीरेन के यहाँ मिल जाएंगी। पहले की कविताओं में भी कई जगह निराला उपस्थित से जान पड़ते हैं और बाद की कविताओं में भी निराला मौजूद हैं। कुछ कवितायें निराला को याद करते हुए भी लिखी गयी हैं। इन बाद की कविताओं में भी एक कविता निराला की एक कविता जिसका बंगला भाषा में कवि ने गायन सुना था, उसकी स्मृति से ‘तिमिर दारण मिहिर’ शीर्षक कविता लिखी गयी है। जिस तरह से निराला अपने अंतिम दिनों के लिए लिखते हैं ‘आ रही मेरे दिवस की सांध्य बेला’, वैसे ही वीरेन अपने उजले दिन पर घिर आई संध्या को स्पष्ट देखते हैं और उसे अभिव्यक्त भी करते हैं। यह साहस और हुनर दोनों उन्होंने निराला से सीखा था। काव्य में इसका रूपान्तरण आसान नहीं है। इसी तरह निराला अपने गाढ़े दिनों में या पराजय के क्षण में जिस तरह से स्मृति का उपयोग शस्त्र के रूप में करते हैं ठीक उसी प्रकार वीरेन भी अपनी कई कविताओं में स्मृति पर अटूट विश्वास जाहिर करते हैं। जीवन का वह क्षण जिसमें चरम अंधकार व्याप्त हो उसमें स्मृति का यह आलोक स्वाभाविक है। राम की शक्ति पूजा में निराला लिखते हैं। राम पराजय से भयभीत हैं। कोई उपाय नहीं सूझ रहा। उस क्षण उन्हें सीता का स्मरण होता है। उस स्मरण से उन्हें शक्ति मिलती है और फिर से युद्ध के लिए उद्धत होते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं कि राम विजयी होते हैं, लेकिन वीरेन की पराजय पूर्वनिर्धारित है।

ऐसे क्षण अंधकार घन में जैसे विद्युत
जागी पृथ्वी-तनया-कुमारिका-छवि, अच्युत

वीरेन के सामने स्वयं के जीवन का संकट है। वे सिर्फ कविता नहीं लिख रहे थे, सचमुच अपने दिवस की सांध्य बेला को देख रहे थे। ऐसे मुश्किल क्षणों में, अंधकार के समय में उन्हें भी सहारा मिलता है, स्मृति से ही। वे कहते हैं कि अब तक जो जीवन की गाड़ी खींच कर यहाँ तक ले आया हूँ, यह डॉक्टरों की प्रतिभा का परिणाम है या तुम्हारे प्यार का इसे मैं जग-जाहिर नहीं करना चाहता। निराला के राम भी अपनी प्रिया का स्मरण करते हैं, वीरेन भी अपनी प्रियतमा का ही स्मरण करते हैं। वे अपनी कविता में भले ही कहें कि ‘नहीं बताऊँगा’ लेकिन यह स्पष्ट है कि इस अंधेरे में तेज रोशनियों ने उतना नहीं बचाया है जितना तुम्हारे प्यार ने।

इस अंधेरे में तेज रोशनियों ने बचाया है मुझे
या अक्टूबर की ओस से आभासित
चाँद की स्मृति ने या तुम्हारे प्यार ने
मैं नहीं बताऊँगा
इस बीमारी में
अब तक दवाओं और डॉक्टरों ने बचाए रखा मुझे
या किसी उम्मीद ने
या तुम्हारे प्यार ने
मैं नहीं बताऊँगा

दुनिया के अधिकांश बड़े कवियों ने प्रेम पर जरूर कवितायें लिखी हैं। न सिर्फ सामान्य कवियों ने बल्कि लगभग सभी क्रांतिकारी कवियों ने भी प्रेम की कवितायें लिखी हैं। वीरेन अपने अंतिम दिनों में जिस यातना और मर्मांतक पीड़ा से जूझ रहे थे, वह किसी भी कठोर से कठोर हृदय वाले व्यक्ति को भी तोड़ देने एवं अवसाद से भर देने वाला था। वे बार बार अपने लोगों तक पहुँचने की कोशिश करते रहते थे। उन्होंने अपनी लड़ाई बड़ी हिम्मत के साथ लड़ी। वे आखिरी आखिरी दिनों में भी किसी किसी सभा गोष्ठी में पहुँच जाते थे। कहने की आवश्यकता नहीं कि उनकी पहले की प्रेम कविताओं की अपेक्षा इन कविताओं का प्रेम लौकिक की बजाय पारलौकिक ज्यादा है। यह प्रेम इंद्रिय प्रेम से थोड़ा अलग एक आध्यात्मिक किस्म का प्रेम है। क्योंकि यह प्रेम का ताजा अनुभव नहीं है, बल्कि स्मृति जन्य है। ताजा का आशय यह है कि कवि आशिक नहीं है, जिसे प्रेमिका से बिछुड़ने का दर्द हो, बल्कि उसके पास प्रेम की थाती है। संचित प्रेम-धन है जो इस कठिन क्षणों में संबल बन रही है। इसीलिए इसमें शारीरिक तुष्टि के बजाय आत्मिक तुष्टि की लालसा अधिक है। रागात्मक स्मृति से वर्तमान के कष्ट की त्वरा को कुछ कम करने की कोशिश थी। ऐसा देखा गया है निराश से निराश व्यक्ति भी अपने दुर्दिन में स्वजनों की स्मृति होते ही जीवन संग्राम से जूझने को उद्धत हो जाता है। वीरेन ने जो प्रेम कवितायें लिखी है वह उनके अकेलेपन और जीवन-संकट के भय से उपजी निराशा के पलों में आंशिक राहत भर हैं। अक्सर ऐसा देखा गया है कि व्यक्ति इन दिनों में शिकायती हो जाता है। प्रेम में भी या तो उलाहना देता है या शिकायत करता है। प्रेम के पूर्ण न होने की अवस्था में तो यह और भी जरूरी क्रिया बन जाती है। वीरेन अपनी सभी ज्ञानेन्द्रियों से स्मृति का काम ले रहे थे। स्मृतियों में कुछ सुखद हैं तो कुछ दुखद भी, लेकिन स्मृति से पीछा छुड़ाना आसान नहीं है। मनुष्य का स्वभाव है कि जिंदगी पर जब भी खतरा आता है, वह अतीत की स्मृति में चला जाता है। जीवन-जगत के आसन्न खतरे को भाँप कर चौंकन्ना होता है और अतीत कि स्मृति में खो जाता है। यह उसके लिए ढाल की तरह होती है। स्मृति से जुड़कर मनुष्य के भीतर आत्मविश्वास पैदा होता है और इसी आत्मविश्वास से वह दुनिया के तमाम झंझावातों को झेल लेता है। ‘दो प्रेम कवितायें’ में वे इस बात को बड़ी साफ़गोई के साथ स्वीकार करते हैं, लेकिन वे यह भी जानते हैं कि स्मृतिविहीनता सबसे बड़ी सजा है।

एक यातना है स्मृति जिसके बगैर गुजर नहीं
स्मृतिविहीनता हर सजा से बड़ा एक रोग है

इसलिए वे इस यातना और कष्टों के अंतहीन सिलसिले के बाद भी स्मृति का दामन नहीं छोड़ना चाहते। वे अपने अंतिम दिनों की कविताओं में अपनी जड़ों की ओर लौटने के उतावलेपन को बड़ी शिद्दत से महसूस कर रहे थे। वे उन श्रोतों की ओर मुड़ रहे थे जहां से उन्होंने अपनी रचनाशीलता खाद-पानी लिया था। कुछ कुछ कर्ज-सा महसूस कर रहे थे, जिसे अभी चुकता नहीं कर पाए थे। वे अपने पहाड़ को तो याद करते ही हैं, साथ ही पहाड़ी दोस्तों को भी बड़ी मासूमियत और शिद्दत से याद करने लगते हैं। यह मृत्यु से पहले का मोह भी हो सकता है। वह पलाश विश्वास को याद करते हैं, उत्तराखंड आंदोलन के मशहूर गीतकार गिर्दा को याद करते हैं, शाल वनों, लंगूरों, पहाड़, नदी, जंगल और सबसे ज्यादा उनके अपने लोगों को मोहासिक्त भाव से याद करते हैं। याद इसलिए भी कराते हैं कि वे इन्हें नष्ट होते हुए देखने के लिए विवश थे। पूंजीवाद के नृशंश खेल को देख रहे थे, वे देख रहे थे कि किस तरह पूंजीवादी शक्तियाँ मुनाफे के लिए प्राकृतिक संपदाओं का दोहन कर रही हैं। उससे न सिर्फ प्रकृति का विनाश हो रहा था बल्कि पूरी पारिस्थितिकी तंत्र को तहस नहस कर रहा था। वन्य जीवों के बेबस जीवन को भी अपनी कविता में जगह देते हैं। अपनी एक कविता लंगूर में वे इन वन्य जीवों की बेबसी को जगह देते हैं और काहते हैं कि इस पूंजीवादी व्यवस्था ने इन वन्य जीवों का जीवन कितना बेबस कर दिया है। अपने इस दुख और गुस्से को को वे अपनी के कविता में दर्ज करते हैं।

देखो तो चबा रहे ये हमारे पहाड़ों को…
गुड़ की भेली की तरह
खा रहे सब हमारे जंगल
हमारी भरी-पूरी नदियों को पी जा रहे रेऽ ऽ
पर इनकी भूख-प्यास मिटती नहीं
असली भूत-प्रेत-मसाण-राक्षस तो यही हुए
इनका नाश हो

वीरेन डंगवाल ’70 से कवितायें लिखना प्रारम्भ कर चुके थे। जाहिर है उनकी पीढ़ी के कई अन्य कवियों की भांति उनपर भी नक्सलबाड़ी आंदोलन और समाजवादी स्वप्न का गहरा प्रभाव पड़ा था। नक्सलबाड़ी आंदोलन न सिर्फ पूंजीवाद-सामंतवाद के गठजोड़ एवं किसान-मजदूर के शोषण के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध था बल्कि समाजवादी-साम्यवादी व्यवस्था का स्वप्न एवं किसानों-मजदूरों के संगठित होने और नए भारत के निर्माण का नारा भी था। यह नितांत स्थानीय विद्रोह बहुत जल्द अखिल भारतीय हो गया। इसकी प्रेरणा श्रोत दुनिया भर में चल रहे जनक्रांति के उदाहरण बने। वीरेन जब लिखना प्रारम्भ कर रहे थे उसके ठीक पहले देश में यह आंदोलन प्रारम्भ हुआ था। युवा वीरेन पर इसका प्रभाव न पड़ा हो यह नहीं कहा जा सकता क्योंकि बंगाल के बाहर पूरे भारत में इसका असर छात्रों और युवाओं पर पड़ा। युवावस्था के इस स्थायी प्रभाव से लेकर उनकी सक्रियता के सबसे सघन दिनों अर्थात 90 के दशक में सोवियत संघ के विघटन से जो असंतोष, मोहभंग एवं कर्तव्य परायणता में चूक कि आत्मग्लानि से जो निराशा उत्पन्न हुई थी वह धीरे धीरे भारतीय समाज एवं राजनीति में सांप्रदायिक एवं फासीवादी ताकतों के उभार एवं विकास को देखने के लिए अभिशप्त हो गयी। इस बीच कई अन्य ऐसे आंदोलन हुए जो फासीवाद के खतरे का परिचय देते रहे थे। अंतिम दिनों की इन कविताओं में 2014 के बाद फासीवाद के उभार, स्थायित्व एवं सत्ता पर उसका काबिज होने की विवशता भी दिखाई देती है। यह चार-पाँच दशक पुराने उस स्वप्न के टूटकर बिखर जाने जैसा था जिसमें दुनिया के सुंदर बनते जाने का दृश्य था। अब रही सही उम्मीद भी खत्म हो गयी। अचानक से सांप्रदायिक दंगों में बढ़ोतरी, आर्थिक उदारीकरण के नाम पर गरीब किसान मजदूर आदि का शोषण, सार्वजनिक सरकारी उपक्रमों की बजाय निजीकरण को बढ़ावा, जनता को उसके मूल मुद्दों से भटका कर धार्मिक उन्माद आदि में व्यस्त रखना; ऐसे कई हथकंडे थे जिन्होंने बेहतर दुनिया के स्वप्न और उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया।

उनके अंतिम दिनों की कविताओं में यह अनेक छवियाँ देखने को मिलती हैं। इनमें से अधिकांश कविताओं का वर्ण्य विषय उनकी पूर्ववर्ती कविताओं से मिलता जुलता है। पहले भी वे आलू, समोसा, पपीता, इमली आदि पर कवितायें लिखी थीं, यहाँ उन्होने ‘लहसुन’ पर कविता लिखी। अपने आसपास रहने वालों लोगों पर वीरेन ने पहले भी कई कवितायें लिखी हैं। इन कविताओं में भी अशोक भौमिक, पलाश विश्वास, सुबोध, कैथरीन, जयकिशन ढौंडीयाल आदि पर भी कवितायें लिखीं। बच्चों के ऊपर वीरेन ने कई कवितायें पहले भी लिखी हैं और इन असंकलित कविताओं में भी एक कविता ‘गोली बाबू और दादू’ है। इसके अलावा इन कविताओं में समकालीन जन जीवन की अनगिनत दुश्वारियाँ, सत्ता और ताकतवारों के बीच की दुरभिसंधियाँ, राजनीतिक छल-कपट, वैचारिक स्वप्नों के बिखर जाने का दर्द, दुनिया के क्रमशः असुंदर होते जाने की विवशता, अकेलापन, पूंजीवाद का मकड़जाल, शारीरिक कष्ट और उसकी दुश्चिंताओं के अलावा इन कविताओं में आश्चर्यजनक रूप से स्थानीयता के तत्व दिखाई देते हैं। वे पहाड़ों, जंगलों वहाँ के लोगों के अलावा पहाड़ी लोक कथाओं के पुनर्प्रस्तुति की भी कोशिश करते हैं। इन कविताओं में वे पहाड़ और उसकी पारिस्थितिकी के बिखरने और बर्बाद होने से दुखी भी नजर आते हैं। कुछ विशेष कविताओं को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश कविताओं का रूप विन्यास पूर्ववत ही है। उनका अभिव्यंजना कौशल विशिष्ट है और वह इन कविताओं में भी देखने को मिलता है। वे शब्दों के रूप सौंदय एवं अर्थ सौन्दर्य के विशेष संयोजन से कविता में आवश्यक लय उत्पन्न करते हैं, इसीलिए उनकी कवितायें पाठक को आसानी से संप्रेषित हो जाती हैं। यह लय उनकी अंतिम दिनों की कविताओं में साफ देखी जा सकती है।

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