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साहित्य-संस्कृति

विस्थापन के दर्द को उकेरती हैं उमेश पंकज की कविताएं

लखनऊ, 6 अक्टूबर। कवि उमेश पंकज  के पहले कविता संग्रह ‘एक धरती मेरे अन्दर’ का आज यहां स्थानीय कैफ़ी आज़मी एकेडमी में लोकार्पण हुआ। कार्यक्रम का आयोजन जन संस्कृति मंच और लोकोदय प्रकाशन द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था। इस मौके पर उमेश पंकज ने ‘रचना’,  ‘आग पेट की’, ‘मल्लाह’, ‘मेहतर’, ‘उन्मादी भीड़’, ‘क्या साहब  तानाशाह हैं’, ‘चिड़िया’, ‘घास हूं मैं’, ‘विरासत’’, ‘घसियारी औरत’, ‘एक धरती मेरे अन्दर’ आदि कई कविताएं सुनायी और साहित्य सुधि श्रोताओं को अपनी कविता के विविध रंगों से रू ब रू कराया।
अध्यक्षता कवयित्री व एक्टिविस्ट वन्दना मिश्र ने की। उन्होंने कहा कि उमेश पंकज की कविताएं विस्थापन के दर्द को उकेरती हैं। इसका दंश सबसे अधिक औरतों को झेलना पड़ता है। उन्होंने इस संबंध में ‘घसयिारे टोले की औरतें’ तथा कई अन्य कविताओं की चर्चा की। वन्दना मिश्र ने भाषा और प्रू्फ की त्रुटियों की ओर भी ध्यान दिलाया।
लोकार्पण के बाद परिसंवाद का कार्यक्रम था। बांदा से आये युवा आलोचक उमाशंकर सिंह परमार का कहना था कि उमेश पंकज की कविताओं में जमीन से अलगाव के द्वन्द्व व पीड़ा की अभिव्यक्ति है। वे गांव को उसके मूल रूप में देखना चाहते हैं। यहां  विस्थापन का दर्द है तो पर्यावरण को नष्ट किये जाने की चिन्ता है। कवि व आलोचक चन्द्रेश्वर ने कहा कि इनकी कविताएं विचार और संवेदना से पूर्ण है। संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए लगता है कि यहां गांव की संवदेना बची हुई है। इनमें लोकतांत्रिक वास्तविकता है कि किसके पक्ष में खड़ा होना है और किससे के प्रतिपक्ष में।
संग्रह पर अपनी बात रखते हुए जसम उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष कौशल किशोर
बीज वक्तव्य युवा आलोचक अजीत प्रियदर्शी ने दिया उनका कहना था कि ये कविताएं जन प्रतिबद्धता, प्रतिरोध और जन सरोकार की कविताएं है जो बदतर हालत और जनता के टूटे सपने के लिए सत्ता की जनविरोधी नीतियों को मानती हैं। इनमें विषय का फैलाव है। कहन में स्वाभविकता है। अन्तर लय है। 
जसम के प्रदेश अध्यक्ष व कवि कौशल किशोर का कहना था कि ये जीवन बदलने से अधिक जीवन बचाने की कविताएं हैं। इनमें अनुभव, संवेदना और विचार की त्रिवेणी है। यह राजनीतिक समय है, उससे आज का रचनाकार बच नहीं सकता, उसे मुठभेड़ करना होगा। इसके स्वर भी यहां हैं। आगे ये स्वर और मुखर होंगे, हमें उम्मीद करनी चाहिए। भगवान स्वरूप कटियार ने कहा कि उमेश पंकज की कविताओं में समय का विदृूप चेहरा हैं। इनकी कविताएं लम्बी न होकर छोटी है। वहीं सार्थक भी। लोकजीवन के तत्व है। बदलाव की उम्मीद को नहीं छोड़ती। 
उषा राय का कहना था कि इनकी कविताओं में गांव छाया है। गांव का पूरा परिवेश यहां सजीव है। आज सवाल करना राजद्रोह हो गया है। इनकी कविताएं सवाल करती है और कहती है कि साहब क्या तानाशाह हैं ? लेखक व पत्रकार अरूण सिंह ने कहा कि उमेश जी की कविताओं में नष्ट होकर भी उगने की उत्कट आकांक्षा है। यहां विरासत को बचाने की बात है। इसे कमजोर करके लड़ाई आगे नहीं बढ़ाई जा सकती। युवा कवि व आलोचक आशीष सिंह का कहना था कि उमेश पंकज की कविता की जमीन पुरानी है पर अभिव्यक्ति नयी है। कविता दबावों के बीच पनपना चाहती है। यह स्मृतियों में जाती है तो वहीं वर्तमान से टकराती भी है।
कार्यक्रम का सफल संचालन कवि व कथाकार फरहान महदी ने किया। 
इस मौके पर रमेश दीक्षित, अजय सिंह, विजय राय, सुभाष राय, राजेश कुमार, वीरेन्द्र सारंग, संध्या सिंह, दयानन्द पाण्डेय, महेन्द्र भीष्म, बंधु कुशावर्ती, दीपक कबीर, राजा सिंह, प्रकाश चन्द्र गिरि, राम बहादुर मिसिर, अलका पाण्डेय, आभा खरे, विमल किशोर, मन्दाकिनी राय, रंणु बाला, ज्योति राय, नीतीन राज, आर के सिन्हा, मधुसूदन मगन, राजीव गुप्ता, सुधांशु बाजपेई, पियूष सिंह, अनिल कुमार, मोहत पाण्डेय, सीमा सिंह, प्रदीप आदि मौजूद थे।
(कवि, विचारक व सांस्कृतिक ऐक्टिविस्ट कौशल किशोर जन संस्कृति मंच, उत्तर प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष हैं ।)

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