स्मृति

86वें जन्मदिवस पर


‘मरूंगा नहीं…/क्रान्ति का इतिहास इतनी जल्दी नहीं मरता/बलिदान के रक्त की ललाई को/न धूप सुखा सकती है/न हवा और न वक्त/….इसलिए, मैं कहता हूं – मैं जिन्दा हूं, जिन्दा रहूंगा/भेष बदल सकता हूं/उद्देश्य नहीं/चित्र बदल सकता हूं/चरित्र नहीं….’।

ये काव्य पंक्तियां कवि व गद्यकार ब्रहमनारायण गौड़ की है। वे बी एन गौड़ के नाम से जाने जाते थे। जीवित होते तो आज 9 जुलाई को 86वां जन्मदिन उनके साथ हम मना रहे होते। इस साल के शुरू में 3 जनवरी को उन्होंने हमारा साथ छोड़ा। उनका निधन हुआ। हर साल जन्मदिन पर चाहे उनके राजाजीपुरम आवास पर या लेनिन पुस्तक केन्द्र में उनके इस दिन को हम आयोजित करते। उस दिन हम उनसे सुनते और कुछ अपनी सुनाते। उनके अस्सी साल पूरा करने पर एक बड़ा समारोह हुआ जिसमें इलाहाबाद से कवि-आलोचक प्रो राजेन्द्र कुमार, लेखक व पत्रकार कृष्ण प्रताप आदि शामिल हुए।

बी एन गौड़ ‘विप्लव बिड़हरी’ उपनाम से भी ख्यात थे। ‘बिड़हरी’ जहां उनकी मिट्टी की पहचान थी तो ‘विप्लव’ उनके विद्रोही चरित्र की। वे जब तक जिन्दा रहे, इस पहचान को बनाये रखा। उनका लेखन शौकिया नहीं था। एक बेचैनी उनके अन्दर थी। यह समाज के दुख-दर्द से पैदा हुई बेचैनी थी। लेखन के पीछे क्या उद्देश्य है, इसे अपनी कविता में उन्होंने इस तरह बयान किया है – ‘मैं नहीं लिखता कि लूटूँ/वाह.वाही आपकी/लिख रहा हूँ क्योंकि दिल में/आग जलती है सदा/जी रहे हैं जो फफोलों की कसक मन में लिए/दर्द उनका हूँ, उन्हीं का स्वर, उन्हीं का हूँ पता’। और भी – ‘मेरी पसन्द क्या है/क्यों पूछते हैं आप/मैं ध्वसं चाहता हूँ/निर्माण के लिए/मैं चाहता हूँ आग लगे सारे विश्व में/निष्प्राण भी संघर्ष करें प्राण के लिए’।

अम्बेडकरनगर {तत्कालीन फैजाबाद} जिले के ऐतिहासिक परगना बिडहर के सुतहरपारा गांव में नौ जुलाई, 1934 को उनका जन्म हुआ। 1955 में बिहार के मुजफ्फरपुर स्थित लंगट सिंह डिग्री कालेज से बीए कर ही रहे थे कि उन्हें रेलवे में नियुक्ति मिल गई। वे दक्षिण पूर्व रेलवे के कर्मचारी थे। वहां के संघर्ष में शामिल हुए। 1968 में ग्यारह दिनों के लिए तथा 1974 की ऐतिहासिक रेल हड़ताल के दौरान 46 दिनों तक जेल में रहे। इस संघर्ष ने उन्हें माक्र्सवादी बनाया। उनके जीवन की धारा ही बदल डाली। आगे चलकर माक्र्सवाद लेनिनवाद ही उनके जीवन का प्रकाशस्तम्भ बन गया। यह उनके जीवन की पहली पारी थी जिसमें उनका ट्रेडयूनियनिस्ट और आंदोलनधर्मी रूप प्रधान था।

1992 में 31 जुलाई को रेलवे की सेवा से निवृत्त होने के बाद उनकी दूसरी पारी पूरी तरह साहित्य और संस्कृति को समर्पित थी। आम या कि श्रमजीवी जनता से जुड़े आर्थिक, सामाजिक व सांस्कृतिक मुद्दों पर वाम नजरिये से लेखन व संघर्ष का उन्हें जुनून-सा था। इस सम्बन्ध में उन्होंने ढेर सारी यात्राएं कीं। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन में वे सक्रिय रहे। जन संस्कृति मंच, भाकपा माले और लेनिन पुस्तक केन्द्र से जुड़े। इनके द्वारा सम्मानित भी किये गये।

पहली रचना पुस्तक ‘शहीद ऊधम सिंह’ प्रकाशित हुई । उसके बाद तो लिखने का अनवरत सिलसिल शुरू हो गया। फिर कविता संग्रह आया ‘अर्ध शती’। उनका मानना था कि यह दुनिया श्रम करने वालों ने बनाई है पर वे ही सबसे ज्यादा वंचित व उपेक्षित हैं। उनके हिस्से में भूख, गरीबी, शोषण.उत्पीड़न है। उन्हें आशा रही कि स्थितियां बदलेंगी। उनके अन्दर का यही आशावाद वैचारिक लेखों के संग्रह ‘आयेंगे अच्छे दिन जरूर’ के रूप में सामने आया।

गौड़ जी का मानना था कि इतिहास मानव जीवन का संघर्ष है। विचारधाराएं इसी संघर्ष की उपज हैं। विचारहीनता के इस दौर में उन्हें लेनिन प्रकाशपंुंज के रूप मे दिखते थे और उनके विचार व जीवन को कविता में बांधने की कोशिश में उन्होंने ‘क्रान्तिरथी’ जैसा महाकाव्य रच डालां। उन्होंने इतिहास के पात्रों पर भी काम किया। द्रोपदी के माध्यम से उन्होंने नारी पीड़ा, नारी संघर्ष को अभिव्यक्त करने वाली कृति ‘द्वापर द्वारिका द्रोपदी’ की रचना की। ‘मैं अट्ठारह सौ सŸाावन बोल रहा हूँ’ बी एन गौड़ का चंपू प्रबन्ध काव्य था। इतिहास को कविता की विषय.वस्तु बनाना हमेशा से कठिन और दुरुह कार्य रहा है। लेकिन गौड़जी की विशेषता थी कि वे इतिहास के प्रसंगों, घटनाक्रमों और ऐतिहासिक पात्रों को अपनी कविता की विषय वस्तु बनाते है, इतिहास के गतिशील व प्रगतिशील पक्ष को सामने लाते हैं तथा बड़े ही तार्किक तरीके से उसे वर्तमान से जोड़ने की कोशिश करते हैं। ऐसी ही गद्य रचना है ‘शब्दों को बाजार के हवाले नहीं करेंगे’। यह बाजारवादी व्यवस्था से शब्दों व विचारों को बचाने का संघर्ष है। उन्होंने इतिहास के महत्वपूर्ण विचारकों, लेखकों, राजनीतिज्ञों के विचारों, उक्तियों व उद्धरणों को संकलित करने का काम किया। ‘कुछ सीप, कुछ मोती‘ उनके द्वारा संपादित ऐसा ही संकलन है।

जीवन के अन्तिम दिनों में वे पंजाबी के क्रान्तिकारी कवि अवतार सिंह पाश की कविताओं के अन्तर्पाठ अर्थात कविताओं की सरल सहज-व्याख्या में जुटे थे। उद्देश्य था कि पाश की कविताओं को मौजूदा समय के परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित किया जाय और उसके भाव को आम पाठकों तक पहुंचाया जाय। उम्र का उन पर प्रभाव हो रहा था। वे स्मृति लोप के शिकार हुए। इसकी वजह से बीते साल अप्रैल के महीने में वे घर से निकले और रास्ता भटक गये। चार दिन वे भटकते रहे। जब मिले, तो जो कहा वह किसी कविता से कम नहीं था – ‘मेरे आस-पास/मेरे इर्द-गिर्द/जितने भी हैं/उनमें बसता हूं मैं/रहता हूं मैं/ढ़ूंढ़ना है मुझे/तो इन्हीं में ढ़ूंढो/मिल जाऊँगा मैं’।
मो: 8400208031

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