समकालीन जनमत
कविता

जावेद आलम की कविताएँ मानवता के पक्ष में निर्भीकता से खड़ी हैं

अशोक कुमार


“स्याह वक्त कि इबारतें” युवा कवि जावेद आलम खान का पहला संग्रह है, जिसे दीपक अरोड़ा स्मृति सम्मान के तहत बोधि प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

जावेद की कविताओं के परिचय से पहले यह बताना बेहद जरूरी है कि जावेद के पास भाषा के रूप में समृद्ध हिंदी-व्यवहार, ठीक-ठाक आंचलिकता, संस्कार में मिली उर्दू की मिठास, साहित्य के गंभीर विद्यार्थी होने का गुण और समसामयिक घटनाओं पर पैनी नज़र रखने का हुनर है, और ये सभी कारण मिलकर उनकी हर कविता में एक अलग तरह के सौन्दर्य का सृजन करते हैं।

जावेद की कविताओं की विशेषता उनमें विषयों की विविधता तो है ही, किंतु प्रतिरोध उनकी कविताओं का प्रमुख स्वर है। प्रकृति, प्रतिरोध, प्रेम और दार्शनिकता से लबरेज़ इन कविताओं से गुजरते हुए जावेद की क़लम के मुरीद हो जाना बहुत स्वाभाविक है।

जावेद आलम खान देश की लगभग सभी महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में छपने वाले कवि हैं। यदि मैं यह कहूं कि युवा कवियों में इतनी सारी पत्रिकाओं में छपने वाले वे अकेले कवि हैं तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी।

इस संग्रह से गुजरते हुए हम कवि के भीतरी अंतर्द्वंद, उसकी बेचैनी, उसकी संवेदनाओं और उसके मन में कहीं किसी गहरे कोने में दबी हुई असुरक्षा की भावना के साक्षी बनने लगते हैं। जावेद आलम खान अपनी बेचैनियों को कविता में ढालने का गज़ब का हुनर रखते हैं। जावेद की कवितायेँ बात-बात पर आहत होने वाली छद्म भावनाओं के इस दौर में आहत होने के बजाए सवाल पूछती हुई वे अभिव्यक्तियाँ हैं जो देश से प्रेम करने वाले प्रत्येक भारतीय का स्वर बनते हुए नफरत के माहौल में प्रेम और विश्वास का एक दीया जलाती हैं।

संग्रह की भूमिका में वह लिखते है कि “मेरी कवितायेँ मेरी नाकामियों की उपज हैं”। अपनी रचनाओं को अपनी नाकामियों कि उपज कहने के लिए जिस साहस और आत्मस्वीकारोक्ति कि जरूरत है उसी साहस और आत्मस्वीकारोक्ति को हम जावेद कि कविताओं में पृष्ठ दर पृष्ठ प्रतिबिंबित हुआ पाते हैं। अपनी कविता “उम्र गुजरती गई मे वह लिखतें है”:

“जिस उम्र में जलालुद्दीन मोहम्मद
गद्दीनशीन होकर अकबर ए आज़म कहलाए
उस उम्र में मुझे आकर्षित कर रहे थे
पीत पत्रकारिता के अश्लील इश्तहार

जिस उम्र में माराडोना के पंजे
फ़ुटबाल के मैदान को जादू सिखा रहे थे
मैं उस उम्र में फ़िकरेबाज़ लौंडों की सोहबत में
भदेस भाषा का व्याकरण लिख रहा था”

वर्तमान की परिस्थितियों में खुद को विवश पाने वाला कवि अपनी विवशता को और अपने मधवर्गीय जीवनसंघर्ष को बड़ी संजीदगी से व्यक्त करते हुए हमारे सामने इस तरह से रखता है कि कुछ न कर पाने कि यह विवशता कवि की निजी न होकर हमारी सामूहिक विवशता में बदलती हुई नजर आती है। घर-परिवार और सामाजिक जिम्मेदारियों से जूझता हुआ हर भावुक व्यक्ति, जिसके भीतर समाज में व्याप्त या फिर हालिया दौर में उपजी समस्याओं के लिए कुछ न कर पाने कि छटपटाहट है वह इन कविताओं से खुद को जुड़ा हुआ महसूस करता है। पंक्तियाँ देखिए:

“इष्ट कि चाह में प्राप्य का हंता हूँ
मेरी आँखों पर चढ़ा है मेरा अदृष्ट
मेरी चेतना निर्वात में बदल चुकी है
इक उम्र थी जो गल चुकी है
दुनिया से घबरा के जब भी अपने में लौटता हूँ
खुद को किसी अंधकूप में पाता हूँ
शिखंडी की नींद में जागता हूँ
गांधारी की जाग में सो जाता हूँ
बाहर से धृतराष्ट्र, भीतर से अश्वत्थामा हो जाता हूँ”

प्रतिरोध इनकी कविताओं का मुख्य स्वर होते हुए भी इनके पास प्रेम को व्यक्त करने की एक खूबसूरत भाषा है। भावुक व्यक्ति जब कवि हो जाता है, तब वह प्रेम को भी अपनी कविता में ही व्यक्त करता है। अपनी जुबान से प्रेम को व्यक्त न कर पाने की कसक को वह इस तरह से कहते हैं कि:

“ओह मैने तुमसे बहुत कुछ नहीं कहा
शायद प्यार जताने का हुनर मुझे आया ही नहीं
मुझे कवियों की तरह
आपबीती को जगबीती बनाने का हुनर भी नही आया
मेरी भाषा कही और अनकही के बीच
बिन मांझी नाव बनी हिचकोले खाती रही
तुम्हे वेलेंटाइन पर कभी गुलाब नही दिया
एनिवर्सरी पर पहाड़ ले गया
मगर मुँह से मुबारकबाद नहीं बोला गया”

इस संग्रह से गुजरते हुए हम आप उन तमाम प्रश्नों से रूबरू होते हैं जिन्हे आप कभी न कभी समाज से, सत्ता से, ईश्वर से या फिर खुद से पूछना चाहते हैं। एक कविता में वह लिखते हैं कि “बच्चे का मर्द बनना इंसानी इतिहास कि सबसे क्रूर घटना है” इनकी कविताओं कि खूबसरती यह है कि इन्होंने सिर्फ दुनिया से ही सवाल नहीं पूछे बल्कि खुद से भी पूछे हैं। उन्होंने लगभग हर समस्या पर सवाल उठाने कि एक सफल कोशिश कि है। वह लिखते है; “छूना महज छूना भर नहीं होता, एक अंधड़ साथ लेकर चलता है एक अप्रत्याशित स्पर्श”

जावेद कि कविताओं के प्रत्येक चित्र हमारे आसपास के हैं जिन्हे खोलना इतना मुश्किल नहीं हैं। मुझ जैसे गैर साहित्यिक पृष्ठभूमि वाले पाठक को संग्रह की भाषा में तत्सम शब्दों का प्रयोग थोड़ा ज्यादा लग सकता है किन्तु मुश्किल नहीं। कुछ कविताओं को छोड़कर, कविताएं सपाट नहीं हैं। भाषा कि जादूगरी जावेद बहुत अच्छे से जानते हैं। किसी भी विषय को व्यंजना में कहना उन्हें खूब आता है।

“वे अर्ध विकसित आस्थाएँ थीं
जिन्हें मोती की तरह सीप में पलना था
लेकिन उन्होंने आसमानी चाह में अंड गर्भ को चुना
और समय पूर्व जन्मी आशंकाओं के रूप में निकली”

वैसे तो जावेद के भीतर का कवि गहन संवेदनाओं से परिपूर्ण उम्मीद का कवि है किन्तु उनकी कविताओं में अल्पसंख्यक होने से उपजी असुरक्षा का भाव भी कभी-कभी झलक पड़ता है। वह कहते हैं कि:

मेरे अंदर एक धार्मिक अल्पसंख्यक का खौफ है
जो दंगों की अफवाह उड़ते ही
घर के दरवाज़े पर मोटे ताले जड़ देता है।
घर की महिलाओं को धमाता है जहर की शीशी
सहमी हुई आँखों और कँपकँपाते हाथों से
सब्जी काटने वाली छुरी को थामकर
दरवाजे पर कान लगाए रहता है।
और हर आहट के साथ अपने अंदर मरता जाता है”

जावेद कि कविताओं में बचपन कि मीठी यादें हैं जिनमे वह माँ के पानदान को याद करते हैं, उनमें समाज में बढ़ते हुए महिला विरोधी अपराधों को देखते हुए बेटियों के पिता होने की चिंता है, प्रेम का इजहार न कर पाने की कसक है, रूढ़ियों पर चोट है, आत्मग्लानि के भाव हैं और इन सबसे उबर जाने का हौसला और उम्मीद भी हैं। इस संग्रह में आत्मास्वीकारोक्तियाँ हैं, दाम्पत्य प्रेम है, वात्सल्य से लबरेज़ संवेदनाएं हैं, स्त्रीमन को समझता एक पुरुष है, सवाल उठता हुआ एक रीढधारी जागरूक युवा है, रुढियों पर सवाल करता एक प्रगतिशील बुद्धिजीवी है, महामारी को दर्ज़ करता एक जिम्मेदार साहित्यकार है और कभी न झुकने का प्रण लिए हुए एक जिद्दी कवि है. कुल मिलाकर यह संग्रह पढ़ा जाना चाहिए। इस संग्रह से कुछ कविताएं आप सबकी पेश-ए-नज़र हैं।

 

जावेद आलम की कविताएँ

 

1.देश
महज जमीन का टुकड़ा नहीं है देश
दीवार पर कीलों से ठुकी कोई तस्वीर भी नहीं
जिसे देखकर की जाए सियासी तक़रीर
देश नहीं होता कागज़ पर लिखी तहरीर
कि पढ़कर वतनपरस्ती के मुबाहिसे किए जाएँ।
कोई अफ़ीम की गोली नहीं कि खाएँ
और उन्माद में जिए जाएँ।

देश खेतों में जुटे किसान की पीड़ा में बसता है।
देश दिल्ली की संसद में नहीं
धूल में लिपटे बच्चों की क्रीड़ा में हँसता है
हल, गैती, कुदाल और हसिये से बनता है।
देश दौड़ता है अपने कारखानों की गति में
मुस्कुराता है अपनी प्रकृति में।
देश है तो हम है इस दौर का सबसे प्रचलित अर्द्धसत्य है
हम सब अधूरे हैं इस वाक्य के साथ
क्योंकि देश अधूरा है मानवता के बिना
पूर्णता के लिए जरूरी है इस वाक्य का मुकम्मल होना
कि देश हैं तो हम हैं हम हैं तो देश है
देश बनता है आदमियों से
और साँस लेता है आदमीयत में।

 

2. बार बार बोलूंगा

भाषा के तराजू में भावों को खूब तोला
छंदों का पिटारा खोला वाणी में शहद घोला
लेकिन शब्द करेले बने रहे
तुम्हे करेले पसंद नहीं
और पसंद की भाषा मैं सीख न सका
इसलिए गर्दभ को गधा बोला।

ठीक कहते हो महाकवि
मैं तुम्हारे दौर का सबसे बदतमीज़ आदमी हूँ
निष्कासित कर दो मुझे अदब की बज़्म से
गीत से ग़ज़ल से कविता से नज़्म से
खोखले किरदारों की गांठें हज़ार खोलूंगा
बोलूंगा बोलूंगा और बार बार बोलूंगा।

 

3. फैमिली मैन

मैं उस धूमकेतु का वंशज हूँ
जो खुद के पैरों में उजालों को बांधकर
भीड़ की रहनुमाई की तख्ती को थामकर
अपनी आँखों के लिए रोशनी के दो क़तरे जुटा नही पाता
और जाका गुरु भी आंधला की व्यंग्योक्ति कान में धरकर
अनजाने अँधेरे में गिरता जाता है।

बच्चे मुझे सुपरमैन समझते हैं
लेकिन असल में मैं एक संशयग्रस्त फैमिली मैन हूँ

मैं ही वह दलित हूँ
जो हज़ार सालों से दूध से हाथ जलाते जलाते
अब छाछ से भी डरने लगा है

मैं ही वह ब्राह्मण नौजवान हूँ
जो तमाम रोशनखयाली के बावजूद
ब्राह्मणवाद के ताने झेलने को मजबूर है।
शोषक का ठीकरा होता बेगारी मजदूर

मेरे अंदर एक धार्मिक अल्पसंख्यक का खौफ है
जो दंगों की अफवाह उड़ते ही
घर के दरवाज़े पर मोटे ताले जड़ देता है।
घर की महिलाओं को धमाता है जहर की शीशी
सहमी हुई आँखों और कँपकँपाते हाथों से
सब्जी काटने वाली छुरी को थामकर
दरवाजे पर कान लगाए रहता है
और हर आहट के साथ अपने अंदर मरता जाता है।

बहन बेटियों वाले परिवार का अकेला आदमी हूँ।
जो स्त्रियों को पढ़ाना तो चाहता है
मगर अकेले स्कूल भेजने से डरता है।

ख़ानदानी रईसी खोया ज़मींदारों का वंशज हूँ
जो चौपाल पर बैठने से बचता है।
और दरवाज़े पर फकीर की सदा आते ही सहम जाता है

उस मध्यवर्गीय परिवार का मुखिया हूँ
जो अश्लील विज्ञापन के डर से
टीवी का रिमोट हाथ में पकड़े रहता है।
जो पूरे परिवार को बंद मुट्ठी में रखना चाहता है।
मगर किसी पर भरोसा नहीं कर पाता
जो सब कुछ बच्चों के नाम लिखना तो चाहता है
मगर बुढ़ापे की फ़िक्र में रुका रहता है
जिंदगी के कहकहों को अनसुना करके
आसन्न मृत्यु की प्रतीक्षा में कुम्हलाया रहता है।

 

4. मैं मीठा नहीं हूँ

मेरे गीत को सुनकर तुमने एक बार कहा था
तुम्हे मिठास की ज़रूरत नहीं
तुम्हारी आवाज़ में नमक घुला है
मैं इस नमक को पी जाना चाहती हूँ।

उसी दिन से मैंने मधुरता से बैर ठान लिया
मैंने अपने भीतर का सारा मधु निचोड़ दिया
मधुमास में प्रणय गीत लिखना छोड़ दिया
उदास रातों में दर्द से कराहती आँखें
कभी नम नहीं होती
इसलिए नहीं कि मेरे आँसू सूख चुके हैं
बस इन्हें एक वादा निभाना है
कुछ और बचे न बचे भीतर का नमक ज़रूर बचाना है।

 

5. वह जो मैं हूँ

किसी वीरान खँडहर का धन हूँ
किसी जन्मांध का काला स्वप्न हूँ
आज़ादी के लिए छटपटाती इच्छाओं का कोष्ठक हूँ
मैं ख़ुद ही अपनी उमंगों पर लगा पूर्ण विराम हूँ।

वह कवि हूँ जो अपनी कविताओं का भ्रूण हत्यारा है
वह योद्धा हूँ जो बिना लड़े हारा है
वह चालक रहित जहाज़ हूँ जो बे किनारा है
वह तारा जो ख़ुद किस्मत का मारा है।
बहती नदी जिसका सारा पानी खारा है।

इष्ट की चाह में प्राप्य का हंता हूँ
मेरी आँखों पर चढ़ा है मेरा अदृष्ट
मेरी चेतना निर्वात में बदल चुकी है
इक उम्र थी जो गल चुकी है
दुनिया से घबराकर जब भी अपने में लौटता हूँ
ख़ुद को किसी अन्धकूप में पाता हूँ
शिखंडी की नींद में जागता हूँ
गांधारी के जाग में सो जाता हूँ
बाहर से धृतराष्ट्र, भीतर से अश्वत्थामा हो जाता हूँ।

 

6. जलालाबाद

एक अरसा हुआ दिल्ली में रहते
यहां घर है नौकरी है बच्चों के स्कूल है
उनके हमउम्र दोस्त हैं और खेलने के लिए
अपने घर की छत और सामने का पार्क

यहां मेरे करियर को उड़ान मिली है
मेरे काम को पहचान मिली है

फिर भी अक्सर सोच में पड़ जाता हूं
कि दिल्ली ने मुझे मेरा पता और पहचान दिलाई है
या मेरी पहचान को लील लिया है

आखिर क्या वजह है
जो हर रोज बेटी से जलालाबाद की बाते करता हूं
हर किस्से में कहीं न कही जलालाबाद आ ही जाता है
रात में बनती कूण्डों की टिकियो में
मोहल्ले भर की औरतों का जुटान
पटा बेलन पर मोटी रोटी की तरह बेले गए
घी और किमाम मिले आटे को
ग्लास से गोल गोल काटना
महिलाओं के बहुमत में लड़कों की उपलब्धि होता था

मस्जिद में इफ्तार के लिए कई घरों से आई थालियां
छोटी ईद बड़ी ईद के जुमा मस्जिद पर लगे एक दिनी मेले
और मेलों में चाट पकौड़ी खिलौनों की दुकानें लगाए
गैर मुस्लिम दुकानदारों का हक और अपनेपन से पूछना
बड़ी दरगाह वाले अपने उर्स के कै दिन रह गए भैया
बढ़िया दुकानदारी दशहरे, उर्स और मोहर्रम के
कई दिन चलने वाले मेलों में ही होती है

जाऊं सौ बार मैं तुम पे वारी
आज मेंहदी है कासिम तुम्हारी
मोहर्रम में इस मर्सिये को सुनकर कई बार रोया हूं
गम और उदासी के इस आलम में भी
कछियाने से लेकर तहसील रोड तक की गलियां
ताजियों की चकाचौंध से गुलजार रहती थी
आखिरी रोज कि जिस दिन हुसैन की शहादत हुई थी
उसे याद करते हुए पटेबाजी के साथ
खिरनी वाली मस्जिद से उठता था ताजियों का जुलूस
और गौसनगर, यूसुफजई, बड़ी दरगाह,गुनारा होकर
करबला में जाकर खत्म हो जाता था
जगह जगह लगती थीं शरबत की सबीलें
कहीं हलीम बंटता था तो कहीं चावल की तहरी
तबररूख जात और मजहब नहीं पूछता था

जन्माष्टमी में सजे मंदिर देखने के लिए
दोस्तों के साथ पूरी रात जागा हूं
चौक चौराहों पर जगह जगह चलते थे
रामायण और महाभारत के सीरियल
दशहरे के दस दिन तक चलने वाले मेले
रामलीला और डांस पार्टियां सब साथ में देखते थे
एक खास दिन कलाइयों पर नाजुक धागों की गांठें
और पूरे हाथ पर खिल जाते थे छोटे छोटे सूरज

वे छोटे छोटे सूरज जिनकी तमाम किरणे
रोज जलालाबाद की अटारी से उठकर
मेरी स्मृति में चमकती हैं
वहगुल और रामगंगा की लहरें
जैसे मेरे भीतर उमगती हैं
मेरी आवाज में घुल गई है रामभरोसे की मिठाई
मैने दिशाओं का ज्ञान सीखा है
चौराहे पर लगी अंबेडकर प्रतिमा की उंगली से
मैने तहजीब सीखी है अपनी गली के पुराने महल से
मेरे खून में बहती है सत्तावन की जंग में
बारह पत्थर पर अंग्रेजी हुकूमत से फांसी पाए अहमद यार खां की शहादत
मेरे इतिहास को संपन्न बनाते है प्रेम किशन खन्ना

काकोरी शहीद, नगरिया, रामललीले की बगिया
जैसे रोज मुझसे पूछते है खेलना नही है क्या
और मेरे जेहन में घूम जाता है जलालाबाद
एक कस्बा जो आम कस्बों की तरह ही है
जिसे मैंने छोड़ दिया पर जिसमे मुझे कभी नहीं छोड़ा
जलालाबाद जिसने तीस साल तक मुझे बनाया
अब बारह सालों से लगातार मेरे भीतर बन रहा है
बनता जा रहा है
और न जाने क्या बात है
कि मैं उसे बनने देना चाहता हूं
और एक बना हुआ कस्बा
महानगर के बच्चों को सौंप देना चाहता हूं

 

7. बेसलीका

हम जितने हुनरमंद थे उतने बेसलीका
हमारी कविताएं पाश की घास थी
जिन्हे महफिल के आदाब पर जमने से
जबरन रोका गया

समुंदर को देखती हमारी पनीली आंखें
नदी और नालों को साथ लेकर चलती थीं
हमारे बहते हुए शब्दों को
नगर और नहर सभ्यता के कोतवालों द्वारा
कर्मनाशा बताकर टोका गया

जम्हूरियत बहाल करने की ज़िद पकड़े
जख्मी हाथों के पागलपन से परेशान
सरकारी इदारों की मंशा पर
समाजवाद के बैनर ढोते अक्खड़ इरादों को
अदालत की भट्टी में झोंका गया

हम बारह इंची रिंच थे
जो बहुद्देशीय परियोजनाओं में हमेशा काम आए
धार को रोकना और बिजली पैदा करना
हमारे बांए हाथ का काम बन गया
जी हुजूरी के खिलाफ निकले नुकीले शब्दो को
तानाशाही झंडों के ताबूतों में
कील बनाकर ठोका गया

हम ऐसे अभागे थे कि जिनके
आक्रोश के गर्भ में क्रांति की अग्नि पली
उच्छवासों की फूंक से जनवाद की मशालें जली
हमारी कविताओं में प्रेम की बेकद्री ऐसी हुई कि उनको
फूलों के सीने पर
कटार की तरह भोंका गया

और हम देखते रहे खुली सूखी आंखों से
दरअसल हम सिद्धांत नहीं थे एक तरीका थे
हम सचमुच हुनरमंद थे मगर बेसलीका थे

 

8. आइडेंटिफाइड अजनबीयत

वे जानते हैं
कि विषुवत के ताप में अभ्यस्त हुए
वर्षा वन के जो पात
जून में दावानल के सामने तनकर खड़े रहते हैं
उन्हे दिसंबर सुखा देता है पाले के झुलसाव से

गांधी की मूर्ति पर माला चढ़ाते
हत्यारे जान चुके है यह सूत्र
फूलों को कुचलना उनकी कीर्ति को अमर कर देना है
सियासत में आग से ज्यादा महत्वपूर्ण है हवा
जो फूल धूप में नही सूखते
उन्हे सुखाया जाता हवा के सहलाव से

तर्क और संस्कृति का कबड्डी मैच देखती
आस्तिक जनता से
निष्पक्षता की उम्मीद करना बेमानी है
वे इस तथ्य से वाकिफ हैं
उनकी निगाहें बीच की लकीर के उस पार
अग्रिम पंक्ति में खड़े योद्धाओं पर लगी हैं
जिन्हे भीड़ के दबाव से दाँए पाले में खींचकर
आसानी से नेतृत्वहीन किया जाता है बाँया पाला
और मन रीत जाता है जीत के भाव से

गैर बराबरी के मुद्दों पर पिछड़ों, दलितों आदिवासियों और महिलाओं की आवाज बनकर
उम्र भर सत्ता के सामने आंदोलन का झंडा उठाए
उस अध्यापक से पूछो
स्टाफ रूम में मुसलमानों के ख़िलाफ़
उगले जाते जहर पर उसकी चुप्पी की वजह
तुम्हे नही मालूम पर वे जानते हैं इस बेबसी को
कि जो पैर नदी की धार में नही डिगते
वे उखड़ जाते हैं भावनाओं के बहाव से

वे फासिस्ट हैं नकली सोशलिस्ट है
भक्तों के इष्ट हैं चेलों के अभीष्ट हैं
चुडैलों के उजले दुपट्टे है
सब एक ही थैली के चट्टे बट्टे हैं
वे एक जैसे हैं अपने ही रचाव से
आंतरिक दबाव से यशेषणा के भाव से
उन्हे आता है लकीर को छोटा करने का मंत्र
कि मुफलिसी के घूर पर उगी प्रतिभाओं को
आंखें दिखाकर खामोश नही कराया जा सकता
वे खूब जानते हैं कि इन्हे निपटाया जा सकता है
महज अजनबीयत और अलगाव से

 

9. कवि का बयान

हतकांत नर्तकी के क्षत नूपुरों से
आहत पगों का अंतराल चीन्हता समय हूं मैं
मृदभांड सी काया वाली गणिका की मृदु स्मित में रूपजीविता अहंकार और लास्य का प्रस्फोट हूं मैं
रक्तप्रभ सांध्य गगन से तमस के सागर में
समाधि लेता आज का जनवाद हूं मैं
उजले कपोत के सजल चक्षुओं में झांकता मूक संवाद हूं मैं

मनुष्यता के घावों से रिसते मवाद पर रखे
उम्मीदों के फाहों में मैं ही हूं
स्वर्ग की अमर विलासिता को ठोकर लगाने एल
क्रोधित मुनि की उद्दंड खड़ाऊ सी
तलवों को जमीन से दो इंच ऊपर रखती
प्रगतिशील परंपरा की निगाहों में मैं ही हूं
मृग नाभि के स्पर्श से सुगंधित वायु में उड़ते
कस्तूरी कणों में प्रस्रत अप्सरा की आहों में मैं ही हूं

प्रस्तर खंड पर अंकित सभ्यताओं की दास्तान का पहला शब्द मैने ही दिया
युद्ध की दुंदुभी में नकार का भाव लिए
अवांछित मृत्यु का उद्घोष मैने ही किया
क्षत्रियों को अठारह वर्ष जीने की ललकार सुनाने वाला अभिशाप भी मैने ही जिया

वासुकी की कुंडली में फंसा पर्वत
मेरी छाती कुचलता है
मेरे मस्तिष्क में रोज होता है समुद्र मंथन
मेरी अकर्मण्य देह में लपलपाती जिह्वा में
घुले हैं अमृत और हलाहल

हे कालचक्र!अपनी परिभाषा को सुधारो
मेरे विषय में पुनः सोचो पुनः विचारो
मेरी खूबियों को समझो सीमाओं को स्वीकारो
इतिहासविदों मुझे मात्र कवि न पुकारो

 

10. खुशियां रिफ्लेक्ट होती है पार्टनर

नवंबर में किसी छुट्टी वाले दिन
सभी काम स्थगित करके
परिवार के साथ बैठ जाना
छत पर फैली गुनगुनी धूप में

कभी बच्चों की जिद पर
उनके खेल में शामिल हो जाना
और उनसे हारकर उन्हें खुश होते हुए देखना

मतदान अधिकारी रहते हुए
लंबी लाइन में लगकर
पहली बार वोट डालने आई लड़की की इल्तिजा पर
सोशल मीडिया की सेल्फी के लिए
उंगली पर स्याही को कुछ गाढ़ा लगा देना
घोर व्यस्तता के बीस अतिरिक्त सेकंड निकालकर

कभी उठना ड्राइंग रूम में रखी टी वी के सामने से
बाहर निकलकर ढूंढना जलते हुए अलाव को
और उसके इर्द गिर्द बैठे लोगों में घुल मिल जाना

जाओ उस बुजुर्ग के पास बैठो कुछ देर
जिसकी जीवनसंगिनी इस दुनिया में नही है
आत्मीयता से सुनना उसकी अलिफ़ लैला
और देखना कि कैसे खुशियां
एक की आंखों से दूसरे के चेहरे पर उतरती हैं

मोबाइल में कब तक उंगलियां चलाते रहोगे
किताबों में कब तक सर खपाते रहोगे
कब तक ढूंढोगे किसी शिविर में
किसी पाठ्यक्रम में किसी समाधि में

खुशियां रिफ्लेक्ट होती है पार्टनर
यह पहाड़ी घाटियों से लौटी तुम्हारी ही आवाज है
यह दर्पण में झांकता तुम्हारा ही अक्स है
यह दरिया में फेंकी हमारी ही नेकियां है दोस्त

 

11. एक अराजक कविता

झूठे हैं तुम्हारे दावे
अगर प्रेम की भाषा मौन होती
तो दुनिया गूंगों पर लुटाती सबसे ज्यादा प्यार
अगर अहसास ही वाहक होते प्रेम के
सचमुच होते आत्मा के आंख कान आवाज
तो जोकर कभी प्यार से महरूम न रहते
तो क़ाबील ने हाबील का कत्ल न किया होता
तो दुनिया को गले लगाने के लिए फैली बांहे
कील ठोककर सलीब पर नही चढ़ाई जाती

तुम्हारा महापुरूष होना तुम्हारी सफगोई से ज्यादा
हाथ की सफाई से तय होता है
तमाम मोजज़े इत्तिफाक की बुनियाद पर खड़े हैं
अपनी हवस को जरूरत का नाम देना
मानव विज्ञान का प्राथमिक सिद्धांत है
दुनियावी तहजीब की पहली शर्त है
और दुनिया का सबसे आसान काम

यह कहना कि जानवरों से हिफाजत के लिए
संगताराशी पर हसीनतरीन मुजस्समे गढ़ने वाले
हाथों ने पत्थरों के नुकीले हथियार बनाए थे
पहचान लेना इसे कहने वाले धूर्त हैं
यह उतना ही बड़ा झूठ है
जितना गांधी हत्या को वध कहना

अराजकता के दौर में
जब कविता कहकर कत्ल हो रही थी कविता
तब प्रतिभाओं को निगलते हुए अजगरों के वंशज
भाव और भाषा में संबंध जोड़ने के बजाय
मंचों से संबंध बिठाने में लगे थे
वे कविता के नही मंचों के सगे थे
जो लिख रहे थे वे दर्शक थे चुप थे ठगे थे

न प्रेम की भाषा मौन है
न सच बोलने वाला महापुरूष है
न भावों का उच्छलन कविता है
जिनके लिए गीत उपन्यास हैं गजल मर्सिया हैं
उनके लिए प्रेम, महानता, कवि और कविता
दरअसल रिश्तों और शब्दों में
जोड़ तोड़ की अंतहीन प्रक्रिया है

 


 

कवि जावेद आलम खान, जन्म – 15 मार्च 1980, जन्मस्थान – जलालाबाद, जनपद- शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश)
शिक्षा – एम. ए. हिंदी , एम. एड, नेट(हिंदी)। सम्प्रति – शिक्षा निदेशालय दिल्ली के अधीन टी जी टी हिंदी

कविता संग्रह – स्याह वक़्त की इबारतें (बोधि प्रकाशन से दीपक अरोड़ा स्मृति योजना में चयनित)

कई पत्रिकाओं और ऑनलाइन पोर्टल आदि में रचनाएँ प्रकाशित

संपर्क  – javedalamkhan1980@gmail.com

 

 

टिप्पणीकार अशोक कुमार, निवास मूलतः : जिला चम्बा हिमाचल प्रदेश. शिक्षा: MA B.ED.

जन्मतिथि : 05 जून 1981. वर्तमान पता: म.न.-17, पाकेट-5, रोहिणी सेक्टर-21 दिल्ली-110086

सम्प्रति: दिल्ली के सरकारी स्कूल में गणित के अध्यापक के पद कार्यरत

प्रकाशित संग्रह: “मेरे पास तुम हो” बोधि प्रकाशन से, हिमतरू प्रकाशन हि०प्र० के साँझा संकलन “हाशिये वाली जगह” में कविताएँ प्रकाशित.

 कई पत्रिकाओं और वेब पोर्टल्स पर कविताएँ प्रकाशित,

संपर्क: 9015538006

ईमेल :akgautama2@gmail.com

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion