आज राजेंद्र यादव होते तो स्त्रियों के द्वारा लिखी जा रही कविता को लेकर उनकी धारणा जरूर बदल जाती। वर्तमान में स्त्री रचनाकारों के द्वारा लिखी जा रही कविता में स्त्री ही केंद्र में नहीं है, वहां समय, समाज और समकालीन जीवन यथार्थ अभिव्यक्त हुआ है। उनमें विचारों का आवेग है। नए और युवा स्त्री कवियों की तो अच्छी संख्या आई हैं जिनकी कविता में सामाजिक-राजनीतिक विषय, स्त्री जीवन की विडंबनाएं, सभी तरह की वर्चस्ववादी सत्ता से मुठभेड़, तथा स्त्री मुक्ति का प्रश्न आदि को अभिव्यक्ति मिली है। यही नहीं, कात्यायनी की पीढ़ी या उसके तुरंत बाद की कवयित्रियों की कविताओं में सामाजिक मुखरता तथा राजनीतिक-सामाजिक सवालों के प्रति चौतन्यता देखने में आई है। हाल के दिनों में इस तरह के कई कविता संग्रह आए हैं जैसे शोभा सिंह का ‘मां का गीला चुंबन …डरता है तानाशाह’, प्रभा मुजुमदार का ‘नकरती हूं निर्वासन’, उषा राय का ‘भीमा कोरेगांव और अन्य कविताएं’, विमल किशोर का ‘फिर खिल उठेंगे’ आदि । ये बानगी भर हैं। इस संबंध में लंबी सूची बनाई जा सकती है।
मीता दास के संग्रह ‘देशद्रोह की हांडी’ की कविताओं के केंद्र में बीते एक दशक के आसपास का समय है। यह समय है जब देश में मोदी सरकार सत्तारूढ़ हुई। दक्षिणपंथी विचारधारा को आवेग मिला। धर्म और जाति का राजनीति में स्पेस बढ़ने से देश में सांप्रदायिक विभाजन तेज हुआ। इस दौरान सीएए के विरोध में शाहीनबाग जैसा आंदोलन हुआ। कोरोना जैसी महामारी का दुनिया को सामना करना पड़ा। लॉकडाउन जैसी अप्रत्याशित स्थिति आई। ‘आपदा में अवसर’ की तलाश में सरकार के द्वारा तीन कृषि कानून लाए गए जिसके विरोध में राजधानी में किसान आंदोलन हुए। यूक्रेन-रूस युद्ध और गाजा नरसंहार हुआ। कारपोरेट लूट के खिलाफ जल, जंगल व जमीन के लिए आदिवासियों का संघर्ष तेज हुआ। वहीं, उसे सत्ता के भारी दमन का सामना करना पड़ रहा है। बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता भी निशाने पर हैं। उनके लिए ‘अर्बन नक्सल’ जैसे शब्द इस्तेमाल किए गए। मीता दास की कविताएं इस यथार्थ से रुबरु हैं। वहां भूख, गरीबी, किसान, मजदूर, जंगल, बस्तर, बच्चों से लेकर बच्चा खोर, मुर्दाखोर व आदमखोर आते हैं। कविता समयगत सवालों को टकराती है और सामाजिक द्वन्द्व को सामने लाती है। शिल्प के स्तर पर उबड़-खाबड लग सकता है लेकिन विचार की अनगढ़ता नहीं है। इस संबंध में कुछ पंक्तियां गौरतलब हैं जो कविता के मिजाज व प्रकृति तथा कवि की पक्षधरता को सामने ले आती हैंः
‘गोली मारो एक साधारण सा शब्द है
पर मतलब कई रखता है….’
‘उनकी भूख नितांत साधारण भूख ही है
पर उनकी इस साधारण भूख को लेकर
चल रहे हैं बड़े-बड़े व्यवसाय
हाट से संसद तक
उनकी भूख राशन कार्ड में है जप्त’
‘बच्चों ने दी शहादत
गाजा आज खाली है शिशु, बच्चों और किशोरों से
इजरायली टैंक घूम रहे हैं सरपट, बच्चा खोर की तरह’
‘एक वक्त ऐसा आएगा
जब किसान ही धान की जगह
रोप देंगे प्रतिरोध के बीज’
‘उन्होंने कूची से बदल ली है
अपनी बंदूकें और स्टेन गन’
मीता दास की कविताओं में जहां सत्ता-व्यवस्था के शोषण-दमन का बर्बर रूप है, वहीं साहस के साथ इसके विरोध में डट जाने का भाव है। संग्रह की पहली कविता ‘किसान काटो गेहूं भी’ में यह सवाल कि ‘मैं कहती हूं यह कोई मरे लोगों का देश है क्या ?’ में जागृति का आह्वान है। इस सवाल से गुजरते ही नवारुण भट्टाचार्य की कविता ‘यह मृत्यु उपत्यका नहीं है मेरा देश’ की याद आ जाती है। किसान गेहूं, धान आदि फसल पैदा करके देश का पेट भरता है। उसके साथ क्रूर मजाक कि कहने को वह धरती पुत्र है पर हकीकत में कर्ज से इस तरह दबा है कि उसके पास कोई राह नहीं है। वह शहर की ओर भागता है और शहर भी क्या है? उसके लिए ‘श्मशान का चक्रव्यूह’ । वह आत्महत्या को मजबूर हो जाता है। विरोध करे तो उसका स्वागत लाठी और गोलियों से होता है, जैसा देश की राजधानी में किसानों के साथ सरकार ने किया। यह संवेदनशील कवि का आक्रोश है जो यूं व्यक्त होता हैः
‘धरती पुत्रों के लहू से रंगी है धरती आज
अगले बरस चावल लाल और गेहूं पिसने के बाद
हो जाएगा लाल हर किसी की थाली में पहुंचते ही’
और
देखो तुम्हें तुम्हारा मरा हुआ वर्तमान
मरा हुआ भविष्य पुकार रहा है, कम से कम…
लकड़ी के ठूठ ही डाल आओ उनकी चिताओं में’
‘देशद्रोह’ शब्द का सामान्यीकरण हुआ है। वर्तमान सत्ता का विरोध करने वालों तथा असहमत विचार रखने वालों के लिए आज धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। मीता दास बताती हैं कि ‘देश द्रोह की हांडी’ में हर कुछ चूरा जा रहा है, पकाया जा रहा है। इस लोकतंत्र में कोई अधिकार मांगता है, तो उसे देशद्रोही घोषित कर इस ‘हांडी’ में चूरा जाता है। चूरे जाने का आशय दमन, उत्पीड़न तथा सत्ता की संविधान विरोधी करगुजारियों से है। बलात्कार, हत्या, हिंसा आम बात है। भीड़, भेड़ और भेड़िया आज का रूपक है। जनता को पहले भीड़ फिर भेड़ और अंत में भेड़िया बना देने की परियोजना है। इसका इस्तेमाल उन लोगों के विरुद्ध हो रहा है जो न्याय के पक्ष में हैं और सत्ता से तर्क और सवाल करते हैं। मीता दास की टिप्पणी है ‘मीठा जहर पूरे देश में फैल रहा है’। वे सवाल करती हैंः
‘देशद्रोह के बंदी कई हैं
पर वास्तव में देशद्रोही कहकर जिन्हें ठूंसा जा रहा है हवालात में
वे क्या देशद्रोही हैं?’
मीता दास का भावनात्मक लगाव उन शख्सियतों से है, जो न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं या जिन्होंने संघर्ष किया है। मणिपुर की इरोम शर्मिला चानू उन्हीं में है। उन्होंने विशेष शस्त्र बल कानून (आफ्सपा) के खिलाफ 16 साल तक भूख हड़ताल की। मीता दास अपनी कविता ‘इरोम’ में उस मार्मिक क्षण को जीवंत करती हैं जब इरोम शर्मिला ने अपनी भूख हड़ताल को खत्म किया। उन्होंने अपनी जिंदगी के खूबसूरत समय दिया जिसमें उम्मीद थी कि आफ्सपा जैसा जन विरोधी कानून खत्म होगा । वह तो नहीं हुआ बल्कि मणिपुर उस वक्त से कहीं ज्यादा आज ज्वलनशील हो गया। वह सरकार की उपेक्षा कल ही नहीं आज भी झेल रहा है। मीता दास पाठकों को आज के मणिपुर से भी रूबरू कराती हैं।
बस्तर काफी समय से चर्चा में है। यह बस्तरियों का यानी आदिवासी बहुल क्षेत्र है जो अपनी धरती के अंदर बहुमूल्य खनिज संभाले हैं। इस पर कॉर्पोरेट की गिद्ध दृष्टि लगी है। उसकी लूट जारी है। जंगल आदिवासियों का घर है। यही उनकी आजीविका का साधन है। खनिजों की लूट, जंगल की कटाई, आदिवासियों का विस्थापन और दमन का क्रूरतम रूप ही बस्तर की सच्चाई है। मीता दास बस्तर में जारी बर्बरता को यूं व्यक्त करती हैंः
‘खनिज के बहाने झांकते हो हमारे घरों में
घर की गीली दीवारों और छतों पर लगाते हो सेंध
झोंकते हो हमारे चूल्हों में अपनी काठ
भूनते हो हमारा हाड़-मांस और
चिचोड़ते हो हमारी गृहस्थी….
कभी हमारा देह ढ़ो रहा होता है
तुम्हारा मैल और कभी ढ़ो रहा होता है तुम्हारी वासना’
मीता दास के संग्रह में अनेक ऐसी कविताएं हैं जिनमें पृथ्वी, प्रकृति, स्त्री, बसंत, महुआ, वन, जंगल आदि हैं। इससे कविता का कैनवस बड़ा हुआ है। यह प्रकृति है जो धरती को सुंदर बनाती है। प्रकृति और प्रेम को अलगाया नहीं जा सकता है –
‘जब कुलांचे भरता है प्रेम
गीतों में भी उतर आता
महुआ संग बसंत
तब वह गाती प्रेम के गीत
अपनी अलमस्त चाल से।’
यह समय है जिसमें समाज में विभाजन तेज हुआ है और नफ़रत को मूल्य के रूप में प्रतिष्ठा मिल रही है, मीता दास की कविता में हमे छलछलाते प्रेम का दर्शन होता है। हर शख्स के अंदर प्रेम की धारा बहे, यह उनकी इच्छा आकांक्षा है। प्रेम करने की सीख उन्हें प्रकृति से मिलती है –
‘प्रकृति तुम रोपती हुई
अद्भुत लगती हो
पलाश वन
सेमल वन
और शाल वन को
धरती की कोख में /
और मैं/रोपती हूं, प्रेम
धरती के हर एक शै में।’
प्रेम और प्रकृति जीवन की अनिवार्यता है। लेकिन विडंबना यह है कि प्रकृति हो या प्रेम दोनों दुख के साए में हैं। मीता दास की कविता में स्त्री पीड़ा की गहन अनुभूति है। ‘कुंवारी लड़कियां पत्थर हो रही हैं’। उनके सपनों का अपहरण हो गया है। एक तरफ लोगों की कुत्सित निगाहें, वहीं सौदा करने के लिए बाजार – इन स्थितियों ने लड़कियों को पत्थर बना दिया है। स्त्री कोई खेत, युद्ध भूमि, जमीन-जायदाद नहीं है। ऐसा कहते हुए मीता दास पुरुषवादी समाज और स्त्री विरोधी समय को कटघरे में खड़ा करती हैं जो स्त्रियों के लिए लक्ष्मण रेखा/सीमा रेखा खींचता रहा है और पासे से उस पर दांव लगाता रहा है। मीता दास का पितृसत्तात्मक व्यवस्था के प्रति उनके अंदर का यह विद्रोह है जो यूं व्यक्त होता है –
‘हे वीर पुरुष
मेरी ही गलती थी कि
तुम्हें जन्म देते वक्त
बल के संग जो वीर्य भी तुम्हें सौंपा था
उसे जल बना क्यों न दिया!’
और आगे यह उनकी घोषणा है-
‘हे नारी तुम उनकी देवी नहीं
खुद की देवी बनो
तुम पुरुषों को जन्म देना ही निरस्त कर दो’
मीता दास ‘क्या बचेगा!’ कहती हैं तो यह उस आसन्न फासिस्ट खतरे से रूबरू कराना है। 75 साला गणतंत्र में सेंध लग चुकी है। जिनके हाथ में सत्ता की बागडोर है, उसने भ्रम भी पैदा किया है। उसे ‘जननायक’, ‘प्रजानायक’, ‘राष्ट्रनायक’ और पता नहीं क्या-क्या नायक के रूप में प्रचारित किया जा रहा है। उसे देश की कोई चिंता नहीं है। वह ‘परिधान नायक’ बना है और अधिनायक ही नहीं खलनायक की भूमिका में है। मीता दास के अनुसार यह रक्त रंजित समय है। ‘क्या बचेगा?’ का ज़वाब संघर्ष के रास्ते पर चलकर ही मिलेगा। खतरे हैं पर इसी से मुक्ति की राह भी निकलेगी । अपनी कवि बिरादरी से उनका कहना हैः
‘हे कवि इस रक्तरंजित समय में ही तो
लिखी जाती है धारदार कविता
हाथों में कलम वाली तलवार लिए
कई बार यही तलवार
आपकी भी गर्दन खच्च से उतार लेती है
इस धारदार समय में।’
- समीक्षित कविता संग्रह: ‘देश द्रोह की हांडी’
प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन, नई दिल्ली
मूल्य: रुपए 225/-

