2025 में द यूनिवर्सिटी आफ़ शिकागो प्रेस से अमिताभ घोष की किताब ‘ वाइल्ड फ़िक्शंस : एसेज आन लिटरेचर, एम्पायर, ऐंड द एनवायरनमेन्ट ’ का प्रकाशन हुआ । लेखक के मुताबिक संग्रह में शामिल लेखों की विषयवस्तु की विविधता के बावजूद पिछले तीन सौ साल से चले आ रहे समय की टूट फूट की गवाही इन्हें आपस में जोड़ती है । इस समय की शुरुआत अठारहवीं सदी में हुई थी । इसमें आधुनिकता और औद्योगिक क्रांति का जन्म हुआ। इसी दौरान ब्रिटेन के नेतृत्व में पश्चिम ने लगभग पूरी दुनिया को अपनी गिरफ़्त में ले लिया। इसका नतीजा अमेरिका के एकमात्र महाशक्ति बनने में फलीभूत हुआ। सोवियत संघ के पतन के साथ एकध्रुवी दुनिया का निर्माण हुआ और 2001 के बाद से तमाम तबाहियों का सिलसिला चल निकला। इनमें से बहुतेरी के गवाह लेखक भी रहे।
श्री लंका की एक घटना से उन्होंने जिक्र शुरू किया है। उन्हें वहां 2001 में तमिल समुदाय के एक उदारवादी वकील की याद में कोलम्बो में भाषण देना था। उदारवादी होने के कारण वे लिट्टे के निशाने पर थे और 1999 में बम हमले में मारे गये थे। भाषण दूसरी सालगिरह पर होना था लेकिन उसके पांच दिन पहले कोलम्बो के हवाई अड्डे पर लिट्टे के चौदह आत्मघाती लोगों ने हमला किया। इसमें सात सैनिक मारे गये और छब्बीस विमान बरबाद हो गये। सुबह से ही दुनिया भर में इसकी तस्वीरें साया होने लगीं। यात्रा के बारे में दुविधा उठी लेकिन इस मौके पर उस तमिल उदारवादी वकील को याद करना अधिक जरूरी हो गया। सौभाग्य से उड़ानें शुरू हो गयीं और लेखक भी निर्धारित समय पर कोलम्बो पहुंच गये। हवाई अड्डे पर ही जले और पिघले हवाई जहाज और हेलीकाप्टर नजर आये। 1960 के दशक में लेखक कोलम्बो रह चुके थे। तब श्री लंका भारतीय उप महाद्वीप का सबसे विकसित देश हुआ करता था। साक्षरता और स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में वह अव्वल था। हवाई अड्डे को देखकर उन्हें लगा कि आधुनिकता का प्रगति और वृद्धि का वादा कुल मिलाकर छलावा ही साबित हुआ।
इसके छह सप्ताह बाद 11 सितम्बर 2001 को वे सपरिवार ब्रुकलिन में थे। दस साल की पुत्री का दाखिला विश्व व्यापार केंद्र के बगल के नये स्कूल में हुआ था। पत्नी ने पुत्री को स्कूल में छोड़ा और बाजार चली गयीं। हमले के समय लेखक घर में आठ साल के पुत्र के ही साथ थे। पुत्र का हाथ पकड़कर वे पुत्री को स्कूल से लेने भागे। सड़क पर लोगों की भीड़ थी। वे स्वप्न में चलते महसूस हो रहे थे। ढेर सारे लोग तो इमारत के मलबे में दबे ही रह गये । पुत्री और उसके सहपाठियों ने इतिहास की कक्षा की खिड़की से वह भयानक नजारा देखा था। लेखक ने खुद तो नहीं देखा लेकिन भारत, अमेरिका और मध्य पूर्व में वे इसी तरह की घटनाओं के गवाह रहे । यह सब उन्हें ऐतिहासिक प्रतीत हुआ। बीस साल पहले मानवशास्त्र के विद्यार्थी के बतौर उन्होंने मिस्र का दौरा किया और लगातार जाते रहे । उन्हें वहां के बदलाव अपशकुन की तरह महसूस हुए थे। जो आशंका थी वही न्यू यार्क में दरवाजे पर दस्तक देती महसूस हुई ।
हवाई हमले का नेतृत्व जिस व्यक्ति ने किया था वह मिस्र के उसी क्षेत्र का रहने वाला था जहां लेखक अक्सर जाते रहे थे । उसके पुश्तैनी गांव का तो लेखक ने सर्वेक्षण भी किया था। तब उन्हें ग्राम्शी की बात याद आयी कि जब पुराना युग मर रहा होता है और नया पैदा होने की प्रक्रिया में होता है तो वह समय शैतानों का होता है। ग्राम्शी के दिमाग में जिन राजनीतिक शैतानों की धारणा थी उन्हें फ़ासीवादी कहते हैं। हमारे समय में ये शैतान मौसम की घटनाएं भी हैं । तूफान, अकाल और भारी बारिश ही आज के बम हैं । पुराने समय में इनको प्राकृतिक परिघटना ही माना जाता लेकिन फिलहाल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जलवायु विध्वंस में उसकी भूमिका को देखते हुए प्राकृतिक और राजनीतिक परिघटनाओं में अंतर की बात नहीं की जा सकती। दावानल और तूफानी बारिश जैसी चीजें राजनीति से जुड़ी हैं क्योंकि ये ऐसी ऐतिहासिक प्रक्रियाओं का सह उत्पाद हैं जिनसे मुट्ठी भर मनुष्यों को तो अकूत लाभ होता है लेकिन दुनिया की बड़ी आबादी उसकी कीमत चुकाती है । यही बात नीतियों और शासकीय फैसलों के बारे में कही जा सकती है जो प्राकृतिक और सामाजिक के बीच भेद पैदा करते हैं ।
इस समय की शुरुआत लेखक ने अपने उपन्यास हंग्री टाइड से माना है । इसके लिए सुंदरबन में शोध करते हुए उन्हें पर्यावरण बहुत महत्व का विषय महसूस हुआ । उपन्यास की पृष्ठभूमि में समुद्री तूफान आया हुआ है जिसमें पानी की ऊंची ऊंची लहरें किनारे के पेड़ों से होते हुए द्वीप के भीतर जाती हैं । 2004 में यह उपन्यास छपा । साल के अंत में 25 दिसम्बर को लेखक कलकत्ता आये हुए थे। आंख खोलते ही उनको सुनामी के दृश्य नजर आये । इसकी वजह सुमात्रा में समुद्र के भीतर का भूकम्प था। ऊंची लहरें सुंदरबन में घुस गयी थीं। उपन्यास की लहरें सुनामी की जगह चक्रवात से पैदा हुई थीं । लगा जैसे उनकी कल्पना की लहरें असल में पैदा हो गयी हों। यह बात ही ऐसी विचित्र लगी कि लेखक सुनामी प्रभावित निकोबार द्वीप समूह चले गये ।
इस घटना के आठ महीने बाद न्यू ओरलिएन्स में कटरीना तूफान आया। तब लेखक मारीशस में शोध के लिए गये हुए थे । वह देश बेहद छोटा है औरअक्सर समुद्री तूफानों की ज़द में आ जाता है लेकिन उससे मौतें बहुत कम होती हैं क्योंकि लोगों को इन तूफानों से निपटना आता है । उन्हें दुनिया के सबसे ताकतवर देश द्वारा कटरीना से प्रभावित मामलों से निपटने में अनाड़ीपन पर अचरज हो रहा था । तब लेखक को नायपाल द्वारा मारीशस को पिछड़ा, आबादी के आधिक्य से जूझता और बरबादी के मुहाने पर चित्रित करना याद आया । नायपाल हमेशा ही किसी भी देश की तुलना अमीर पश्चिमी देशों से करते हैं और तब उस देश के बारे में अपना फैसला सुनाते हैं । इस मामले में तो प्रकृति ने ही उन्हें गलत साबित कर दिया था । कटरीना से निपटने में अमरीकी सरकार की अक्षमता ने नवउदारवाद के असर में अमेरिकी प्रशासन के क्षरण को जाहिर कर दिया था । कटरीना को पर्यावरणिक आपदा नहीं थी बल्कि उसके साथ ही अधिसंरचना का अभीव, गरीबी, सरकारी उपेक्षा और ढांचागत नस्लवाद का मिला जुला हमला था।
लेखक को महसूस हुआ कि यूरोप केंद्रित आधुनिकता का युग समाप्त हो चला है और सुशासन तथा राजनीतिक इच्छाशक्ति का पैमाना तय करना अब पश्चिम के वश में नहीं रहा। आगामी वर्षों में उनकी इस धारणा की पुष्टि बार बार हुई । बार बार अमेरिका को अपने एकमात्र महाशक्ति होने का सबूत देना पड़ा। लेकिन इस दौरान उसने जो भी परियोजना हाथ में ली उन सबमें उसे असफलता ही हाथ लगी । इसका प्रमाण अफ़गानिस्तान और इराक में उसके हस्तक्षेप रहे । ऐसा ही उदाहरण यूरोपव्यापी प्रवासी संकट है जिसकी तह में 2011 का सीरिया युद्ध है । इन तीनों देशों के लोग यूरोप के विभिन्न देशों में शरण हेतु गये और प्रवासी समस्या ने राजनीतिक तौर पर विस्फोटक स्वरूप ग्रहण कर लिया । इसने सरकारों को अस्थिर कर दिया और यूरोपीय संघ से ब्रिटेन के बाहर जाने का कारण बनी । पश्चिमी मीडिया ने यूरोप पहुंचने वाले इन प्रवासियों को मध्य पूर्व और अफ़्रीका के युद्धरत देशों से आया बता रही थी लेकिन प्रवासियों की भीड़ में भारतीय उपमहाद्वीप के भी लोगों की तादाद अच्छी खासी निकली ।
लेखक के मन में सवाल उठा कि आखिर इस इलाके के युवा प्रवास हेतु इतना कठिन और खतरनाक रास्ता क्यों अपना रहे हैं । इसे जानने के लिए 2017 में उन्होंने इटली की यात्रा की और तमाम शरणार्थी प्रवासियों से बात की । इससे गन आइलैंड का जन्म हुआ । फिर उन्होंने इस अनुभव को दर्ज करने के लिए कथेतर का सहारा लिया और प्रवास के बारे में लिखा और इसे वैश्विक संकट माना । तबसे पश्चिम की राजनीति में प्रवास बड़ा मुद्दा बना हुआ है । इसमें लफ़्फ़ाजों और दक्षिणपंथी आंदोलनों को भारी समर्थन मिल रहा है। इन नव फ़ासीवादी आंदोलनों के पीछे अपने आपको शिकार बताने का झूठ काम करता है । अमीर देश ही इस बात का रोना रोते हैं कि अश्वेत विदेशी उनके देश पर हमला बोले हुए हैं और इसका प्रतिरोध किया जाना चाहिए । तथ्य यह है कि इस बड़े पैमाने के प्रवास के हालात पश्चिमी देशों ने ही पैदा किये । उन्होंने दूसरे देशों में घुसपैठ की और तख्तापलट को अंजाम दिया ताकि एकध्रुवीय दुनिया का अपना सपना पूरा कर सकें ।
असल में शीतयुद्ध का अंत इतनी तेजी से हुआ कि अमेरिकी राजनीतिक वर्ग को अपनी सर्वोच्चता का पूरी तरह निश्चय हो गया । उनको लगा कि यह सर्वोच्चता स्थायी है और अब उनको कभी कोई चुनौती नहीं पेश कर सकता। इस दौर में अमेरिका और समूचे पश्चिम को यूरोपीय साम्राज्यवाद के बेहतरीन समय को भी पार करने का उन्माद छा गया। अमेरिकी राजनेताओं को यूरोपीय और आंग्लभाषी जगत के पिछलग्गुओं समेत यह खब्त सवार हुई कि वे बेवजह भी सारी दुनिया पर अपनी मनमर्जी थोप सकते हैं। नतीजे के तौर पर पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान से लेकर इराक, सीरिया, यमन और लीबिया तक तबाही फैल गयी ।
नाटो द्वारा लीबिया की बमबारी को लेखक ने पश्चिम के नेताओं की दूर तक न देख पाने की कमजोरी का पक्का सबूत माना है । वहां करोड़ो अफ़्रीकी और एशियाई प्रवासी रहते थे । जब सरकार का पतन हो गया और वहां गृहयुद्ध छिड़ गया तो इन प्रवासियों के पास भूमध्य सागर छोड़कर और कोई रास्ता नहीं बचा। नाटो के नेताओं को इस बात का अंदेशा होना चाहिए था लेकिन उनकी अहंकारी घोषणाओं से लगता नहीं कि उन्हें यह भविष्य नजर आया था। लगता है इन नेताओं का माथा इतना खराब हो चुका है कि उन्हें अपने कारनामों के नतीजों की उम्मीद ही नहीं होती। इसी भ्रम से राजनीतिक कुलीन तबके को हमेशा सही होने का यकीन बना रहता है । वे किसी भी वैकल्पिक नजरिए को सुनना ही नहीं चाहते। उन्हें ऐसी राय गलत, तथ्यहीन या दुर्भावना से प्रेरित लगती है । लेखक को इसका निजी अनुभव भी हुआ जब इराक युद्ध के समय एक संपादक ने उन्हें अमेरिका के परदुख कातर होने का यकीन दिलाना चाहा । लेखक द्वारा पुर्तगाली साम्राज्य से लेकर अब तक के प्रत्येक यूरोपीय साम्राज्य की इस आत्मछवि का तर्क संपादक को सुनायी ही नहीं पड़ा । इस घटना के बाद लेखक ने मुख्य धारा की मीडिया में लिखना व्यर्थ समझकर बंद कर दिया । इसके बाद से उन्होंने जो कुछ लिखा वह या तो अपने ब्लाग के लिए या किसी आमंत्रित व्याख्यान के लिए लिखा। इस लेखन में उन्हें मेहनत करनी पड़ी लेकिन कभी छपाने को नहीं सोचा क्योंकि यह लेखों से पूरी तरह भिन्न विधा का लेखन था । जब इस जखीरे पर उन्होंने नजर मारी तो अच्छा लगा इसलिए उनका ही संग्रह यह किताब बन गयी है ।
इस समय के शैतानों के बारे में लिखने के लिए लेखक को अपनी सोच का विस्तार करना पड़ा और रुचियों में बदलाव लाना पड़ा । उन्हें मौसम विज्ञान, भूगर्भशास्त्र, वनस्पतिशास्त्र तथा इसी तरह के विषय पढ़ने पड़े। इस अध्ययन से पता चला कि इस समय को वैज्ञानिक जगत में एंथ्रोपोसीन या समाज विज्ञान की दुनिया में कैपिटलोसीन भी कहा जाता है । हमारे इस समय के लिए तरह तरह के नामों से अंदाजा मिलता है कि इस परिघटना के बारे में अध्ययन के लिए ज्ञान के बहुतेरे अनुशासन इस्तेमाल किये जा रहे हैं । लेखक को इसी वजह से इतिहासकारों, वैज्ञानिकों और दार्शनिकों से संवाद बनाना पड़ा । लेखक की तरह वे भी अपने अनुशासनों से बाहर निकलकर इस परिस्थिति को समझना चाहते हैं। इसका सबूत पेश करते हुए लेखक ने सूचित किया कि उन्हें हाल के दिनों में जलवायु वैज्ञानिकों और साहित्य आलोचकों की सभाओं में बोलने के लिए बुलाया गया ।
किताब के अंत में लेखक ने पश्चलेख शामिल किया है। वे बताते हैं कि हम एक युग से दूसरे युग में प्रवेश कर रहे हैं और ऐसे समय में ग्राम्शी के मुताबिक शैतान जाग जाते हैं। खास बात यह कि संक्रमण के इस समय उन सम्भावनाओं पर भी सोचा और उन्हें भी अपनाया जा सकता है जिनको आधुनिकता के युग में खारिज कर दिया गया था ।

