रायपुर. ” आज देश की बागडोर उन हाथों में चली गई है जिनका न तो आज़ादी के आंदोलन में कोई योगदान रहा है और न ही उन्होंने श्रमिकों के संघर्ष से अपना कोई रिश्ता कायम किया है. हाल के दिनों में गुड़गांव-मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, पानीपत जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में मज़दूरों, बुद्धिजीवियों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ जो कुछ भी घटित हुआ वह यह बताने के लिए काफ़ी है कि फासीवादी ताकतें न्याय और अधिकार की हर आवाज़ को कुचलने के उपक्रम में लगी हुई हैं. लेकिन फासीवादी ताकतें यह भूल जाती है कि जब-जब हमला तेज़ होता है तब-तब संघर्ष भी तेज़ होता चलता है “.
यह बात जन संस्कृति मंच द्वारा अंतरराष्ट्रीय मज़दूर दिवस के मौके पर आयोजित ‘ मज़दूर ज़िंदाबाद ‘ कार्यक्रम में जसम छत्तीसगढ़ की अध्यक्ष रूपेंद्र तिवारी ने कही. उन्होंने कहा कि संगठित श्रम जब भी शोषण की बुनियाद पर सवाल खड़े करते हुए अधिकार की मांग करता है तब-तब सत्ता असहज हो उठती है. असली प्रश्न केवल रोटी का नहीं है बल्कि सम्मान, सुरक्षा और गरिमा का है जो हर श्रमिक का बुनियादी अधिकार है.
इस मौके पर जसम रायपुर के सदस्यों ने जन कवि वासुकी प्रसाद उन्मत्त और मजदूर साथी भागीरथी वर्मा का गमछा पहनाकर सम्मान किया. वासुकी प्रसाद उन्मत ने रेलवे में खलासी रहने के दौरान अपने अनुभव को सुनाया वहीं भागीरथी वर्मा ने बताया कि बोनस और छुट्टी की मांग करने पर कैसे एक फैक्ट्री के मालिक उन्हें नौकरी से निकाल दिया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और केस लड़कर अपना अधिकार हासिल किया और आज वे उसी फैक्ट्री में काम कर रहे हैं जिस फैक्ट्री ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया था.
कार्यक्रम में देश-दुनिया के मेहनतकशों के श्रम को याद करते हुए गीत-गज़ल और कविताओं का पाठ भी किया गया. जसम की साथी सुनीता शुक्ला ने जन कवि गोरख पाण्डेय के सुप्रसिद्ध गीत- ‘ तू हव श्रम के सुरुजवा हो… हम किरिनीयां तोहार ‘ की मार्मिक प्रस्तुति दी. समीक्षा नायर ने ब्रजमोहन के चर्चित गीत-‘ अपना पसीना बहाने वाले भाई रे… उठ तेरी मेहनत को लूटे है कसाई रे…’ को गाकर समां बांधा. अजुल्का सक्सेना ने मज़दूर-किसान के कठिन संघर्षों को दर्शाने वाली शमशेर बहादुर सिंह की सुप्रसिद्ध कविता- ‘ फिर वह एक हिलोर उठी ‘ की शानदार शास्त्रीय प्रस्तुति दी.

कवियित्री नीलिमा मिश्रा ने चावड़ी पर बैठे मज़दूरों की दिनचर्या को दर्शाने वाली कविता में खास तौर पर इस बात को रेखांकित किया कि तमाम तरह के अवसादों से गुजरने के बावजूद भी मज़दूर नीड़ के निर्माण के लिए सजग रहते हैं. डॉ. संजू पूनम ने अपनी कविता में उस बारात का झकझोर देने वाला दृश्य प्रस्तुत किया जिसमें कोई सलमा पेट भरने के खातिर रोशनी को अपने सिर पर लादकर चलती है. कवि आलोक विमल ने ‘ अब मैं क्या करता हूं… और अब कुछ नहीं होता ‘ जैसी कविता के जरिए यह बताने का प्रयास किया कि अन्याय के ख़िलाफ़ कोई सार्थक हस्तक्षेप रचनाशीलता के जरिए भी किया जा सकता है.
जसम के वरिष्ठ साथी अजय शुक्ला ने अपनी कविता ‘आग’ के माध्यम से यह बताया कि कभी आग से चूल्हे जलते थे. चेहरों पर चमक आती थी और भूख मिटती थी, लेकिन अब चौतरफा काली आग लगी हुई है जो बुझने का नाम नहीं ले रही है. अपने खास तरह के तेवर के लिए चर्चित कवि कमलेश्वर साहू ने भी अपनी रचना में मज़दूरों के साथ होने वाले अन्याय को लेकर आवाज़ उठाई. शायर जावेद नदीम और सुखनवर ने भी अपनी ग़ज़लों में मजदूरों के श्रम और सौंदर्य को याद किया.
युवा रचनाकार मोहद अल्तमश ने पीपल का पेड़ और कंटीली झाड़ियों को ध्यान में रखकर लिखी गई कविता में यह बताने का प्रयास किया कि कांटे कुछ समय के लिए कोमल पत्तियों को लहूलुहान कर सकते हैं, लेकिन छांव देने वाले पेड़ कभी किसी को निराश नहीं करते.
कार्यक्रम के अंत में गुड़गांव-मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, पानीपत में हुए आंदोलन की आड़ में बुद्धिजीवियों, लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी को लेकर जसम रायपुर की तरफ से निंदा प्रस्ताव पारित किया गया. जसम के सदस्यों ने एक स्वर में कहा कि सत्यम वर्मा और अन्य साथियों की रिहाई अविलंब होनी चाहिए.
हमारे खौफ़नाक समय को अपने लेखों में प्रतिवाद के जरिए दर्ज करने वाली लेखिका सनियारा खान ने कार्यक्रम का कुशल संचालन किया. आभार संस्कृतिकर्मी राजकुमार सोनी ने प्रकट किया.
कार्यक्रम में जनवादी लेखक संघ छत्तीसगढ़ के महासचिव पीसी रथ, सामाजिक कार्यकर्ता अखिलेश एडगर, मोहित जायसवाल, जसम रायपुर के सचिव इंद्र कुमार राठौर, कथाकार और उपन्यासकार किशन लाल, सक्षम सिन्हा, पकंज सिन्हा, शायर इमरान अब्बास, वीना राठौर, संस्कृतिकर्मी निसार अली, चित्रकार सर्वज्ञ नायर और जीवेश प्रभाकर सहित अनेक प्रबुद्धजन मौजूद थे.

