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हुड़किया बौल पहाड़ की संस्कृति नहीं, बेगार प्रथा का अवशेष है

आजकल कई लोग पहाड़ में पहले होने वाले हुड़किया बौल की नकल करते उसे पहाड़ की संस्कृति के रूप में प्रचारित करते रहते हैं।
हुड़किया बौल (श्रमिकों से हुड़के की थाप पर खेतों में बिना मजदूरी काम कराना) को पहाड़ की संस्कृति के रूप में प्रचारित नहीं करना चाहिए। कारण यह वहां के आम जन का कोई सामूहिक उत्पादन के साथ जुड़ा सांस्कृतिक कर्म नहीं था, जैसा अब प्रचारित किया जाता है।
यह पहाड़ के जमींदारों, मालगुजारों, थोबदारों या बड़ी जमीनों के मालिक लोगों द्वारा अपने खेतों में ग्रामीण गरीबों से कराई जाने वाली बेगार प्रथा (बिना मजदूरी भुगतान का श्रम) का हिस्सा था। चूंकि इनके पास एक ही जगह में जमीन की बड़ी मात्रा होती थी, इसलिए अपने प्रभाव व अपनी ताकत के प्रदर्शन के रूप में उनके द्वारा यह हुड़किया बौल आयोजित किया जाता था।
मैंने भी बचपन में ऐसे आयोजन देखे हैं। कहीं भी सामूहिक खेती या गरीब व छोटे किसानों के खेतों में इसका आयोजन नहीं होता था। इस लिए इसे पहाड़ की संस्कृति के रूप में प्रचारित नहीं करना चाहिए। यह मनोरंजन के साथ श्रमिकों के शोषण का एक सामंती प्रभुत्व जताने वाला आयोजन है।
“पलटा” सामूहिक श्रम का हिस्सा है जबकि “हुड़किया बौल” श्रम के शोषण का।
“बौल” सामूहिक श्रम या श्रम नहीं है। मैं पहले तो यह बता दूं कि ‘बौल’ शब्द का वहां के लोक जीवन में वो अर्थ नहीं है, जैसा कुछ मित्र समझाने का प्रयास कर रहे हैं। हमारे इन मित्रों का कहना है कि बौल का मतलब सामूहिक श्रम या श्रम है। जी नहीं! बौल का अर्थ लोकोक्तियों में बिना मजदूरी भुगतान के या बल पूर्वक कराया जाना वाला श्रम है। जैसे “मैं किलै करूं, मैं क्वे त्यार बौली छुं रे?” (मैं क्यों करूं, मैं कोई तेरा बौल करने वाला हूँ रे ?)।
“बौली नि छुं मि त्यर” (मैं तेरा बौल करने वाला नहीं हूँ)। मतलब साफ है। आज भी पहाड़ के आम बोलचाल में बौल का अर्थ सामूहिक श्रम या श्रम नहीं है। बल्कि बिना पारिश्रमिक के या बल पूर्वक कराया जाने वाला श्रम है।
यह बौल करने वाली श्रेणी मानव समाज में कृषि व पशुपालन पर आधारित मानव जीवन के शुरुआती जनजातीय संघों में नहीं थी। वहां तो सामूहिक स्वामित्व और सामूहिक श्रम का बोलबाला था। यह तो उन जनजातीय संघों के विघटन से पैदा वर्ग विभाजित समाज बनने के साथ अस्तित्व में आई श्रेणी है।
यानी दास समाज और सामंती समाज के उत्पादन संबंधों के दौरान यह श्रेणी पूरी तरह वजूद में रही है। लेकिन जमींदारी विनास कानूनों के लागू होने के बाद, ग्रामीण जीवन में आधुनिक पूँजीवादी उत्पादन संबंधों के प्रवेश ने इस श्रेणी को अब स्वतंत्र मजदूर की श्रेणी में बदल दिया है। जो अपने श्रम के मूल्य का मोलभाव भी कर सकता है। इस लिये आप देखेंगे कि पहाड़ में जमीन्दारी विनाश कानूनों के क्रियान्वयन के बाद ही यह ‘हुड़किया बौल’ की प्रथा दम तोड़ने लगी।
इन गीतों का कृषि व पशुपालन पर आधारित अर्थव्यवस्था से सम्बंध
अब हम ‘हुड़किया बौल’ के साथ गए जाने वाले गीतों को लेते हैं। ये ज्यादातर गीत पहाड़ की पुरानी कृषि व पशुपालन पर आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था वाले जीवन से जुड़े हैं। इनका शुरुआती वैदिक काल के उस लोक जीवन से ज्यादा जुड़ाव दिखता है, जहां अपनी सामूहिक समृद्धि के लिए यानी अन्न की बेहतर पैदावार और पशुधन बढ़ाने के लिए ऋत यानी प्रकृति का आह्वान किया जाता था।
जरूर इसमें बाद के नए देवता और नई भाववादी प्रार्थनाएं भी जोड़ी गई। पर ज्यादातर प्रकृति से जुड़ी हैं। जिनमें अच्छी वर्षा, काम के दौरान आसमानी छांव, अच्छा पानी, अच्छी फसल के लिए भूमि देवता, इंद्र देवता, वरुण देवता, सूर्य देवता आदि का आह्वान होता है। पर इसमें सब इहलौकिक है। लोगों की इच्छा भी और देवता भी। कुछ भी परलौकिक नहीं है।
इन गीतों का सिर्फ “हुड़किया बौल या गुड़ौल” से ही सम्बन्ध नहीं
हुड़किया बौल और गुड़ौल गीत दोनों एक ही तरह के हैं। ये गीत ऐसे नहीं हैं जो सिर्फ हुड़के की थाप पर ही गए जाते हों। अकेले-अकेले अपने खेतों में काम कर रही महिलाएं या जंगल में घास काट रही महिलाएं भी इनकी अलग-अलग लाइनों को गाते हुए गीत पूरे करती हैं। इन गीतों में मेहनतकश जीवन जीने वाली ये कृषक महिलाएं जमीन्दारों और राजाओं की कोमल शरीर वाली रानियों की भी चर्चा करती थी। उदाहरण के लिए-
कुस्यारु क ड्वक जसि, सुरज कि जोति.
छोलियाँ हल्द जसि, पालङा कि काति
सितो भरि भात खायोत उखालि मरन्यां
चूल भरि पॉणि खायोत नङछोलि मरन्या
(जेठ में आडू से लदे डोके जैसी, सूर्य की ज्योति जैसी, कच्ची हल्दी जैसी, पालक की कली जैसी, हियाँ रानी इतनी नाजुक है कि सीते भर भात (चावल का एक पका हुआ दाना) भी खा ले तो उल्टी कर देती है अंजुली भर पानी पी ले तो उसे जुकाम हो जाता है).
हुड़किया बौल और पलटा प्रथा एक नहीं।
कुछ मित्र पहाड़ में खेती के काम में सदियों से चल रही पलटा प्रथा को ही ‘हुड़किया बौल’ समझने की गलती कर रहे हैं। पलटा प्रथा में आप अदल-बदल कर एक दूसरे के काम में हाथ बटाते हैं। यानी आज हमने आपकी मदद की कल आप हमारी मदद को आएंगे? यह प्रथा आज भी पहाड़ के गावों में जीवंत है। क्योंकि यह उनके अब तक बचे सामूहिक जीवन के अवशेषों की अभिव्यक्ति है। पर ‘हुड़किया बौल’ को पलटा बताने वाले एक भी ऐसा उदाहरण नहीं दे सकते जिसमें मालगुजार, थोबदार या पधान कभी हुड़का बजाने वाले या उनके खेतों में काम करने वाले गरीब किसानों के खेतों में काम करने गया हो।
“काम के बदले अनाज” मजदूरी नहीं बल्कि ‘कुली उतार प्रथा’ थी
कुछ मित्रों का कहना है कि तब लोगों को काम के बदले अनाज दिया जाता था। हां, जरूर कुछ कामों के बदले फसल पर अनाज देने की प्रथा थी। यह प्रथा अभी 20-25 साल पहले तक पूरी तरह अस्तित्व में थी। इसमें लोहार, रूड़ीया, तेली, दास-दर्जी, हलिया जैसी  शिल्पकार (दलित) जातियों और जागर लगाने वाले, वैद्य या समारोहों में खाना पकाने वाले गरीब ब्राह्मण वर्ग के लोग भी शामिल थे। पर इन्हें भी काम के बदले अनाज की जो मात्रा दी जाती थी, वह उनके काम के बदले तय की गई मजदूरी का हिस्सा नहीं होती थी। इसमें काम कराने वाले ही खुद अपनी मर्जी से इन कामगारों को फसल पर अनाज दिया करते थे। यह प्रथा ‘कुली उतार प्रथा’ थी। जिसमें काम करने वाले को मेहनताना तो मिलता था, पर बिना मूल्य तय किए मालिक की मर्जी के अनुसार।
तब ज्यातातर कृषि भूमि पर राजाओं, मालगुजार, थोबदार, पधानों का स्वामित्व था।
इस सब में एक बात जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह है भूमि का मालिकाना, जिससे तय होगा कि ‘हुड़किया बौल’ सामूहिक कर्म था कि नहीं।  जमीन्दारी विनाश कानून लागू होने से पूर्व पहाड़ की ज्यादातर कृषि भूमि राजाओं, मालगुजारों, थोबदारों, पधानों के मालिकाने में थी। पक्के खायकारों को छोड़कर अगली पीढ़ी को भूमि हस्तांरण का भी अधिकार ज्यादातर गरीब किसानों को नहीं था। अंग्रेजों ने भी यहां अपने 132 वर्षों के शासनकाल में इस व्यवस्था से कोई छेड़छाड़ नहीं की। क्योंकि उन्हें इसी प्रभुत्वशाली वर्ग के जरिये नीचे तक अपना शासन चलाना था। शिल्पकारों (दलितों) की 99 प्रतिशत आबादी तब भूमिहीन थी और उनमें से ज्यादातर आज भी भूमिहीन ही हैं। ऐसी स्थिति में पहाड़ की ज्यादातर ग्रामीण आबादी तब इन राजाओं, मालगुजारों, थोबदारों, पधानों के रहमो करम पर थी और न सिर्फ उनका बल्कि बाद में उनके माध्यम से अंग्रेजों का भी बौल्या बनने को मजबूर थी।
(लेखक अखिल भारतीय किसान महासभा के राष्ट्रीय सचिव व विप्लवी किसान संदेश पत्रिका के संपादक हैं)

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