एक नयी राजनीति का शुभारम्भ

खबर जनमत

दिल्ली विधानसभा में आम पार्टी की बड़ी जीत के बाद एक नई राजनीति का शुभारंभ हुआ है। यह नई राजनीति ध्रुवीकरण और राष्ट्रवाद की राजनीति के विरुद्ध है। यह काम की राजनीति है जो जुमले और हिंदुत्व की राजनीति के विरुद्ध है। दिल्ली के जागरूक मतदाताओं ने घृणा और द्वेष की राजनीति को समाप्त कर एक नया संदेश दिया है। उसे अब पहले से कहीं अधिक समझने की जरूरत है।

दिल्ली में मुसलमानों की संख्या मात्र 13 प्रतिशत है। दिल्ली भाजपा अध्यक्ष मनोज तिवारी ने राजदीप सरदेसाई को यह कहा था कि शाहीनबाग एक संयोग ना होकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का किया गया प्रयोग है। 26 जनवरी को बाबरपुर की एक रैली में गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि मित्रों बटन दबाओ, इतने गुस्से के साथ दबाना कि बटन यहां बाबरपुर में दबे करंट शाहीनबाग तक लगे। शाहीनबाग तक आवाज पहुंचनी चाहिए। बाबरपुर विधानसभा क्षेत्र में मतदाताओं ने बटन दबाया और आप पार्टी के गोपाल राय वहां से 33000 वोट से जीते। करंट शाहीनबाग में न लगकर अमित शाह और भाजपा को लगा।

ओखला विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत है शाहीनबाग। वहां से आप विधायक अम्मानतुल्लाह खान ने भाजपा प्रत्याशी को 71,827 मतों से हराया। 2015 के चुनाव में वे 64,532 मतों से जीते थे। भाजपा ने इस चुनाव में एक भी मुस्लिम प्रत्याशी खड़ा नहीं किया था। दिल्ली की 16 मुस्लिम बहुल सीटों में से उसे 4 सीट पर जीत हासिल हुई।

दिल्ली के पहले विधानसभा चुनाव, 1993 में भाजपा को 49 सीटें मिली थी। उस समय उसके तीन मुख्यमंत्री बने थे – मदनलाल खुराना, साहिब सिंह वर्मा और सुषमा स्वराज। दूसरे, तीसरे और चौथे चुनाव 1998, 2003 और 2008 में कांग्रेस को 52, 45 और 43 सीटें मिली थीं। शीला दीक्षित तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रही। उनके बाद हैट्रिक बनाने का श्रेय अरविंद केजरीवाल को है। पांचवीं विधानसभा चुनाव 2013 में भाजपा को सबसे अधिक सीट 31 मिली थी। आप पार्टी का वह पहला चुनाव था जिसमें उसे 28 और कांग्रेस को 8 सीट प्राप्त हुई थी। यह चुनाव 4 दिसंबर 2013 को संपन्न हुआ था और 8 दिसंबर को परिणाम घोषित हुए थे। उस समय इन पंक्तियों के लेखक ने अपने लेख ‘दलों के लिए चिंता का विषय है आप’ ( प्रभात खबर 23 दिसंबर 2013) में ‘आप’ के राजनीतिक प्रयोग की बात कही थी। उसके द्वारा राजनीतिक संस्कृति बदलने की बात कही गई थी।

आम आदमी पार्टी के राजनीतिक प्रयोग ने अब तक जारी राजनीतिक परंपरा के समक्ष कई सवाल खड़े कर दिए हैं। लंबे अरसे के बाद चुनावी राजनीति में एक नई हवा बह रही है। ‘आप’ एक झटके की तरह है और क्या केजरीवाल को आधुनिक भारत के क्रोध और आदर्श के रूप में देखा जाना चाहिए ? उस समय वेद मेहता और मेघनाथ देसाई ने आप की जीत को एक सुनामी के रूप में देखा था। कांग्रेस ने आप को समर्थन दिया था। 2013 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 31, आप को 29.59 कांग्रेस को 24.6 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। 2015 के छठे विधानसभा चुनाव में आप ने भाजपा को पूरी तरह किनारे किया और कांग्रेस को शून्य में ला खड़ा किया। उसे 67 सीटें मिली थी और भाजपा को मात्र तीन।

उस चुनाव में नरेंद्र मोदी ने केजरीवाल को अराजक कहकर जंगल में चले जाने को कहा था और अरुण जेटली ने चुनाव का एकमात्र मुद्दा ‘गवर्नेंस बनाम अनार्की’ बताया था। जब तक केजरीवाल आंदोलनरत थे, कांग्रेस के नेताओं ने उन्हें चुनाव लड़कर संसद में आने और कानून बनाने को कहा था। इसी के बाद आप पार्टी का जन्म हुआ जिसके अभी 10 वर्ष भी नहीं हुए हैं। 26 नवंबर 2012 को आम आदमी पार्टी का जन्म हुआ और 8 वर्ष के भीतर ही इसने भारतीय राजनीति का नरेटिव बदलने में कोई कमी नहीं आने दी।

पिछले दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले ही मैंने प्रभात खबर के 2 फरवरी 2015 के स्तंभ में दिल्ली विधानसभा चुनाव की अहमियत में लिखा था कि आप की दिल्ली विधानसभा में जीत एक निर्णायक भूमिका अदा करेगी….इस वर्ष के अंत में होने वाला बिहार विधानसभा का चुनाव सर्वाधिक प्रभावित होगा……इस चुनाव का भारतीय राजनीति पर, क्षेत्रीय दलों पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा। असहमति और विरोध के स्वर या तो उठेंगे नहीं या कम कर दिए जाएंगे।

दिल्ली विधानसभा का चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ 8 महीने बाद संपन्न होता है और उस चुनाव के बाद उसी वर्ष के अंत में बिहार विधानसभा का चुनाव होता है। 16 मई 2014 को 30 वर्ष बाद पहली बार किसी राजनीतिक दल को केन्द्र में बहुमत प्राप्त हुआ था। 16वीं लोकसभा चुनाव में भाजपा को 282 सीट मिली थी और कांग्रेस को मात्र 44। छठे दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप को 67 सीट मिली। उस समय आपको 54.3, भाजपा को 32.3 और कांग्रेस को 9.7 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। यह चुनाव 7 फरवरी को संपन्न हुआ था और नतीजे 10 फरवरी को आए थे। इस बार 8 फरवरी को चुनाव हुआ और परिणाम 11 फरवरी को आया है। पिछले चुनाव की तुलना में इस बार दिल्ली विधानसभा चुनाव में मतदान लगभग 5 प्रतिशत कम रहा। 2015 में 67.40 प्रतिशत वोट पड़े थे और इस बार 62.59 प्रतिशत मतदान हुआ। आप की सीट 67 से घटकर 62 हुई और भाजपा की 3 से बढ़कर 8 हुई। कांग्रेस ने शून्य का साथ नहीं छोड़ा।

आप के वोट प्रतिशत में 0.73 की कमी और भाजपा को 6.21 प्रतिशत की वृद्धि रही। कांग्रेस का वोट 9.7 से गिरकर 4.26 प्रतिशत हो गया। भाजपा ने 67 सीटों पर अपने प्रत्याशी खड़े किए थे और जदयू को दो और लोजपा को एक सीट दी थी। तीसरी और पांचवी विधानसभा चुनाव में जदयू को एक सीट पर जीत मिली थी। इस बार वह भी शून्य पर रही। कांग्रेस 66 सीट पर लड़ी थी और राजद को उसने 4 सीट दी थी। उन्हें शून्य मिला। इसी प्रकार मायावती की बसपा 70 सीटों पर लड़कर एक भी सीट नहीं जीत पाई।

16वीं लोकसभा चुनाव का परिणाम 16 मई 2014 को और छठे दिल्ली विधानसभा चुनाव का परिणाम 10 फरवरी 2015 को घोषित हुआ था। उस समय इन दोनों तिथियों को ऐतिहासिक बनाने का श्रेय मैंने मतदाताओं को देते हुए लिखा था – ऐसा क्या हुआ कि मात्र 9 महीने के भीतर दिल्ली विधानसभा चुनाव के नतीजों ने सारे किए-धरे पर पानी फेर दिया?…. ‘आप’ का झाड़ू और ‘स्वच्छता अभियान’ का झाड़ू भी एक समान नहीं है। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को साफ किया था और आप ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस व भाजपा को साफ किया।

भाजपा के लिए दिल्ली चुनाव के नतीजे एक नसीहत है। ऐंठ और अहंकार पतन का कारण बनता है। आप ने मोदी-शाह और भाजपा को एक सीख दी है। राजनीति में विनम्रता, शालीनता का महत्व है। दिल्ली के मतदाताओं ने जाति, समुदाय, धर्म, लिंग आदि को महत्व नहीं दिया। यह मानना कठिन है कि भाजपा दिल्ली चुनाव नतीजों के बाद अपने को बदलेगी। भाजपा को बदलने का कोई प्रश्न नहीं है। इस बार के दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद भी उसका स्वभाव और विचार पूर्ववत रहेगा। उसके समक्ष चुनाव का कोई बड़ा मुद्दा नहीं है। दिल्ली चुनाव के पहले की कुछ घटनाओं को एक साथ जोड़ कर देखने से भाजपा के चुनावी अभियान की पूर्व भूमिकाओं का पता चलेगा। जेएनयू, जामिया मिल्लिया के बाद 6 फरवरी को दिल्ली के गार्गी कॉलेज में हुई घटना को देखें। अपराधी गायब हैं।

भाजपा ने शाहीनबाग को दिल्ली चुनाव का मुद्दा बनाकर खुद मुंह की खाई। ध्रुवीकरण की राजनीति के जरिए ही वह इस मुकाम तक पहुंची है, पर वह यह समझ नहीं पाती कि यह राजनीति तात्कालिक रूप से जितनी फायदेमंद हो, इसका दूरगामी प्रभाव अहितकर है। दिल्ली के मतदाताओं ने इस चुनाव में ध्रुवीकरण की राजनीति को पटखनी दे दी। ध्रुवीकरण के विरुद्ध आपने एक नया राजनीतिक प्रयोग किया। संभवतः पहली बार किसी राजनीतिक दल ने अपने मतदाताओं से यह कहा कि वे उसको उसके काम को ध्यान में रखकर मतदान करें।

चुनाव में यह एक नया स्वर था जो उसके पहले कभी सुना नहीं गया। दिल्ली विधानसभा चुनाव को भाजपा ने राष्ट्रीय चुनाव में बदल डाला। सारी ताकत झोंक डाली। चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी का चेहरा सामने रखा गया। मोदी ने केवल दो चुनावी रैलियां की। एक केन्द्रीय राज्य मंत्री ने अपने भाषण में ‘देश के गद्दारों को…..’ कहने के बाद श्रोताओं के ऊपर उत्तर देने को छोड़ दिया। श्रोताओं ने ‘गोली मारो…… को’ कहा। संसद में एक सांसद ने ‘मुगल राज’ आ जाने की बात कह डाली। भाजपा का चुनावी अभियान आक्रामक था। 250 के लगभग सांसद, अनेक मंत्री-मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री-सबने मोर्चा संभाला था। कार्यकर्ताओं की फौज थी। ‘गोली मारा,े करंट लगाओ’ से लेकर मुख्यमंत्री केजरीवाल को ‘आतंकवादी’ तक कहा गया। हमेशा भाषा, मुहावरा, लटके-झटके और जुमलों से चुनाव नहीं जीते जाते। सीएए के विरोधी प्रदर्शनकारी राष्ट्रद्रोहियों की टोली नहीं है। भाषा की सारी मर्यादाएं इस चुनाव में भाजपा ने तोड़ दी। इसके ठीक विपरीत अरविंद केजरीवाल और आप के नेताओं ने कहीं अधिक शालीनता और राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया।

दिल्ली चुनाव के बाद क्या भारतीय राजनीति बदलेगी? दिल्ली चुनाव ने एक बार पुनः भारतीय राजनीति के एक नए ‘नैरेटिव’ रचने में पहल की है। क्या शाह-योगी की भाषा बदलेगी? क्या भाजपा अपना हिंदू कार्ड खेलना बंद कर देगी? ‘आप’ ने अपना सारा ध्यान काम और विकास पर केंद्रित कर डाला है। केजरीवाल ने मतदाताओं के सामने विकास का मुद्दा रखा। चार मुद्दों – बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य पर उन्होंने सारा ध्यान केंद्रित किया। विकास का मुद्दा लेकर मोदी आए थे। तब जनता ने उन पर विश्वास किया था। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास’ मात्र नारा रहा। भाजपा को ‘आप’ ने एक बड़ा झटका दिया है। अब ‘जय श्रीराम’ के स्थान पर ‘जय बजरंगबली’ बोला जा रहा है। केजरीवाल ने हनुमान को भी धन्यवाद दिया। अब ‘भारत माता की जय’ और ‘वंदे मातरम’ की गूंज चारों तरफ है। तिरंगे सब लहरा रहे हैं। कल तक भाजपा जिस पर अपना एकाधिकार समझती थी, अब वह नहीं है। ‘आतंकवादी’, ‘राष्ट्रद्रोही’, ‘अर्बन नक्सल’ कहना अब एक फैशन की तरह है। प्रतिरोध के स्वर मुख्यतः दो स्थलों से उठ रहे हैं। एक तो नागरिक समाज और प्रदर्शनकारियों की ओर से, दूसरे राजनीतिक दलों की ओर से, जिनमें आप सर्वप्रमुख है। 10 हिंदी प्रदेश भाजपा के गढ़ हैं जिनमें पांच राज्यों – राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, दिल्ली और झारखंड में भाजपा की सरकार नहीं है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और बिहार ;जदयूद्ध में है। दिल्ली चुनाव ने कई संदेश दिए हैं। क्या अब राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्रभक्ति का सवाल अहम होगा ? काम की राजनीत का नया नैरेटिव प्रभावकारी होगा ? उन्माद और घृणा की राजनीति घटेगी ? केजरीवाल को प्रवेश वर्मा ने ‘नटवरलाल’ और ‘आतंकवादी ’ कहा था। प्रदर्शनकारियों को ‘गद्दार’ घोषित किया गया था।

एक नई राजनीति जो प्रेम, सद्भाव और काम करने की राजनीति है का शुभारंभ हुआ है, पर यह कहना कठिन है कि अन्य राजनीतिक दल आप से प्रेरणा ग्रहण करेंगे। नीतीश कुमार ने दिल्ली चुनाव में अमित शाह के साथ मंच साझा किया था। वे भाजपा का दामन कभी नहीं छोड़ेंगे। झारखंड में बाबूलाल मरांडी की पार्टी का भाजपा में विलय हो रहा है। अब वे झारखंड में भाजपा के प्रमुख व्यक्ति होंगे। बिहार में कांग्रेस और राजद की स्थिति बेहतर नहीं है। सीएए पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की सबको प्रतीक्षा है। बसंत के मौसम में ‘आप’ की जीत हुई है। भारतीय राजनीति में ‘आप’ एक प्रभावकारी भूमिका में फिलहाल नहीं है पर जिस प्रकार केजरीवाल को देखकर कार्यकर्ताओं ने ‘पीएम पीएम’ की आवाज दी, उसे पूरी तरह इग्नोर करना कठिन है। प्रशांत किशोर उनके साथ हैं। ‘आप’ की टीम भी कुल मिलाकर ठीक है। गठबंधन की राजनीति गत 6 वर्षों में कामयाब नहीं हुई है। संभावनाएं नष्ट नहीं है। केजरीवाल ने अपने को बदला है। क्या अब मोदी और शाह-योगी भी अपने को बदलेंगे? प्रतीक्षा की जानी चाहिए। ‘आप’ की जीत उन सब की जीत है जो लूट, झूठ और अलगाववाद के विरुद्ध हैं।

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