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बिहार के मतदाताओं से प्रगतिशील लेखक संघ, जनवादी लेखक संघ और जन संस्कृति मंच की अपील

मतदाता बन्धुओं,

बिहार में हो रहा मौजूदा विधानसभा चुनाव आजादी के बाद से अब तक का संभवतः सर्वाधिक महत्वपूर्ण चुनाव है। इस वक्त देश का संविधान, लोकतंत्र और लोकतंत्र के सारे स्तंभ खतरे में हैं। इस वक्त सत्ता के संरक्षण में जातिवादी-लैंगिक और सांप्रदायिक उत्पीड़न और हिंसा पिछले किसी भी दौर से ज्यादा संगठित और नृशंसतम रूप में जारी है। रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, श्रम का वाजिब मूल्य, अन्नदाता किसानों के जीवन की बेहतरी, महिलाओं और दलित-वंचित समुदायों के मान-सम्मान और सुरक्षा के सवालों को नजरअंदाज करके सरकारें कारपोरेट लुटेरों, मुनाफाखोरों, माफियाओं और अपराधी गिरोहों का हित साधने में लगी हुई हैं। बिहार की नीतीश सरकार हो या केंद्र की मोदी सरकार- दोनों जनतांत्रिक आंदोलनों की आवाज नहीं सुनतीं और तानाशाहीपूर्ण व्यवहार करती हैं। निजीकरण की नीतियों के कारण महंगाई बढ़ती जा रही है। आम आदमी की जिंदगी निरंतर मुश्किलों से घिरती जा रही है। एनडीए की सरकारें जहां कहीं भी हैं, वहां वे झूठ, दमन, बलात्कार, हत्या और उन्माद को बढ़ावा देने में लगी हुई हैं। उत्तर प्रदेश तो भाजपा सरकार संरक्षित दमन, बलात्कार और हत्या की कलंकित मिसाल बन चुका है। आज एनडीए की सरकारों से जुड़े भ्रष्टाचारियों, घोटालेबाजों और दंगाइयों को कोई सजा नहीं होती, बल्कि उन्हें सम्मानित किया जाता है। बिहार इससे बिल्कुल अलग नहीं है। मुजफ्फरपुर के शेल्टर होम में बच्चियों के रेप और हत्या, सृजन घोटाला आदि इसी तरह के उदाहरण हैं। कोरोना जैसी महामारी के दौरान बिहार की मेहनतकश जनता के साथ जो अमानवीय व्यवहार बिहार और केंद्र की सरकार ने किया है, वह पूरी इंसानियत के लिए कलंक है। विकास का ढोल पीटने वाली ये सरकारें वास्तव में विनाश, नफरत, सामाजिक-आर्थिक विषमता और अन्याय फैलाने में लगी हुई हैं जबकि युवा रोजगार मांग रहे हैं, कलाकार-लेखक-संस्कृतिकर्मी अपने लिए रोजगार और आर्थिक सुरक्षा की अपेक्षा रखते हैं, महिलाएं अपनी सुरक्षा के साथ-साथ घर की आर्थिक स्थिति की बेहतरी चाहती हैं, खेती करने वाले किसान कब से मदद की बाट जोह रहे हैं। बिहार में नये कल-कारखाने खुलें, खेती का विकास हो, नए स्कूल-काॅलेज और अस्पताल खुलें, बिहार के लोगों को रोजगार के लिए पलायन न करना पड़े, बिहार की सेकुलर और गंगा-जमुनी तहजीब की रक्षा हो, सामाजिक-आर्थिक समानता हो, इसके लिए यहां सरकार का बदलना जरूरी है। हम लेखक-संस्कृतिकर्मी आपसे अपील करते हैं कि महागठबंधन को वोट दें और ऐसी सरकार को सत्ता में लाएं जो आम अवाम की आवाज को सुने तथा जिस पर जन-आकांक्षाओं को पूरा करने का दबाव हो।

-रवीन्द्रनाथ राय, महासचिव, प्रगतिशील लेखक संघ, बिहार
-विनीताभ, सचिव, जनवादी लेखक संघ, बिहार
-सुधीर सुमन, सचिव, जन संस्कृति मंच, बिहार

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