समकालीन जनमत
ग्राउन्ड रिपोर्टसिने दुनिया

आदिवासियत : एक यात्रा (आखिरी किस्त)

(अखड़ा राँची और औराविल फिल्म इंस्टिट्यूट की ओर से चौबीस दिवसीय डॉक्यूमेन्ट्री रिट्रीट एंड वर्कशॉप “आदिवासियत” की यह रिपोर्ट केवल सिनेमा वर्कशाप की रिपोर्ट नहीं है बल्कि झारखंड के जन जीवन के विविध पहलुओं की व्यापक ग्राउंड रिपोर्ट भी है जिसे इस कार्यशाला की एक प्रतिभागी श्रद्धा ने लिखा है. रिपोर्ट की यह आखिरी किस्त है: सं.)

श्रद्धा श्रीवास्तव

डूम्बरपाठ
19 मार्च 2026 – 21 मार्च 2026
डूम्बरपाठ में सुषमा ठिठीयों और इग्निस ठिठीयों की मेजबानी के दौरान जो अनुभव सामने आए, वे इस संकट को और गहरा करते हैं। खनन के लिए जमीन दी गई, पर खनन के बाद न तो समतलीकरण हुआ, न ही शुद्ध पानी, बिजली, सड़क या स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध कराई गईं। हिंडाल्को जैसी बड़ी कंपनी का वहाँ होना, उनके हिस्से में चकाचक उजाला और डूम्बरपाठ में दो सप्ताह से ट्रांसफॉर्मर जला होना और बिजली का अभाव—इस बात का प्रतीक है कि कॉर्पोरेट विकास स्थानीय जीवन-स्थितियों से कितना कटा हुआ है।
जब मैं दोपहर में कचनार की सब्जी का स्वाद पहली बार ले रही थी, तब “हमें विकास की धूल नहीं, फूल चाहिए”—बिज्जू टोप्पो के एक पोस्टर का यह नारा मेरी स्मृति में कौंध रहा था, जो केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक विकास-दृष्टि का घोष है। यहाँ ‘धूल’ उस विनाशकारी, प्रदूषणकारी, विस्थापनकारी विकास का प्रतीक है, जबकि ‘फूल’ जीवन, प्रकृति, संतुलन और सामुदायिक समृद्धि का।
पूरे दो दिन हम अपनी पैनी नज़र और कैमरे की नज़र लिए माइनिंग एरिया में मंडराते रहे। हम माइनिंग अधिकारियों से मिलना चाहते थे, पर वे मिले नहीं। क्या पता यह व्यस्तता एक बहाना हो? सरकार और पूँजीपतियों का चरित्र भी हमारे सामने आया। हिंडाल्को का एक कर्मचारी, चरण सिंह, जो पंजाब से थे, कह रहा था—“अरे साहब, बहुत विकास हुआ। ये लोग कपड़े नहीं पहनते थे, हमने कपड़ा पहनना सिखाया।”
झट मैंने सवाल दागा—चरण सिंह जी, क्या कपड़ा पहनाना विकास है? उसकी पूरी बातचीत से दंभ झलक रहा था और आदिवासियों के प्रति उसकी धारणा प्रबल थी कि ये लोग शराबी हैं, नशे के सिवाय कुछ नहीं करते। दिहाड़ी पर कितने ऐसे होते हैं, जिन्हें हमें भगाना पड़ता है। उनसे कोई पूछे—आपने पता किया शराब कहाँ से आ गई? आप तो चाहते ही हैं न कि वे नशे में धुत्त रहें और आपका कारोबार चलता रहे।
इस पूरे परिदृश्य में सरकार और पूँजीपतियों का संबंध परस्पर-निर्भर (symbiotic) दिखाई देता है—राज्य (सरकार) की भूमिका, भूमि अधिग्रहण को वैधता प्रदान करना, नीतिगत ढील (policy relaxation) देना, पुनर्वास और पर्यावरणीय नियमों के पालन में शिथिलता, आदिवासी समुदायों की आवाज़ को दबाना।
“एक दिन में कितने ट्रक बॉक्साइट का निकाल लेते हो और जिनकी जमीन है उनको क्या मिलता है?” इस पर उन्होंने कहा—हर दिन का तीस परसेंट हम सरकार को देते हैं, तो क्या सरकार का दायित्व नहीं बनता? क्या यहाँ एक बार भी आदित्य बिरला आए होंगे?
मेरी यह धारणा और पक्की हुई—पूँजीपति (कॉर्पोरेट कंपनियाँ) अधिकतम संसाधन दोहन (resource extraction) करती हैं और न्यूनतम सामाजिक दायित्व (CSR का औपचारिक निर्वाह) निभाती हैं। पर्यावरणीय क्षति की अनदेखी, स्थानीय रोजगार के वादों का केवल विज्ञापन तक पालन करती हैं। सवाल उठता है—क्यों नहीं प्राकृतिक संसाधन या हस्तकला की कोई ट्रेनिंग दी जाए?
कुल मिलाकर कहा जा सकता है—बरपाठ और डूम्बरपाठ के अनुभव यह स्पष्ट करते हैं कि आदिवासी क्षेत्रों में विकास का वर्तमान मॉडल एकतरफा, असंतुलित और अन्यायपूर्ण है। पीटर बेंग जैसे लोग, जो दस्तावेजों के साथ अपनी लड़ाई जारी रखे हुए हैं, वे केवल अपने अधिकारों के लिए नहीं, बल्कि एक न्यायपूर्ण विकास मॉडल के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
शाम को बड़ी मुश्किल से जनरेटर की व्यवस्था कर “जहाँ चींटी लड़ी हाथी से” का फिल्म प्रदर्शन हुआ। यही पर सरहुल उत्सव व अपने लोकनृत्य की बानगी भी देखने को मिली।
यह पूरा परिदृश्य हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि—
क्या विकास केवल खनिज निकालने का नाम है?
या वह मनुष्य, प्रकृति और संस्कृति के बीच संतुलन स्थापित करने की प्रक्रिया भी होना चाहिए?
मेरे मन की गहराई में एक कहानी गहरी कि सादरी में सुनी उस कहानी को बिज्जू की मदद से एक बार और बांचा और वो प्रस्तुत है मेरी अपनी हिंदी में – डूम्बरपाट में आंगनवाड़ी में लोग अपनी जमीन के 40 साल से माइनिंग के कारण छले जाने की दास्ताँ बयाँ कर रहे थे, तब सुनायी गयी।
जो पुरखा साहित्य से आती है और इस तरह की कहानियाँ क्या मायने रखती हैं, बताइयेगा। – कहानी बाघ और गिरगिट की है। –
जंगल था, घना जंगल। जंगल में साल के पेड़ थे, महुए की खुशबू थी, पंछियों की बोली थी। उसी जंगल में एक बाघ रहता था।
एक दिन बाघ बहुत भूखा था। सुबह से घूम रहा था, दोपहर हो गई, फिर भी कोई शिकार नहीं मिला। न हिरन मिला, न सूअर, न खरगोश। भूख से उसका पेट गुड़गुड़ा रहा था।
इधर देखा, उधर देखा। तभी एक पत्थर पर एक गिरगिट बैठा मिला। वह आराम से धूप सेंक रहा था। कभी हरा होता, कभी पीला, कभी भूरा। बाघ की आँख चमकी। वह बोला,
“चलो, आज छोटा ही सही, पेट तो भरेगा।”
वह धीरे-धीरे दबे पाँव पहुँचा और पंजे से झपट्टा मारा, गरजकर बोला,
“ए गिरगिट! आज मैं तुझे खाऊँगा।”
गिरगिट गिड़गिड़ाते हुए हाथ जोड़कर बोला, कहा –
“महराज, आप मुझे खा लीजिए। बस एक विनती है।”
बाघ बोला,
“बोल!”
गिरगिट बोला,
“मुझे चबाइएगा मत, सीधा निगल लीजिए।”
बाघ बोला,
“ठीक है बच्चू!”
उसने मुँह खोला और गिरगिट को निगल गया।
अब जैसे ही गिरगिट गले में पहुँचा, उसने बाघ को जोर से काट लिया।
बाघ चिल्लाया,
“हाय रे!”
गिरगिट गले में अटक गया। वही फँस गया। अब न नीचे जाए, न ऊपर आए। बाघ इधर भागे, उधर भागे। कभी जमीन पर लोटे, कभी पेड़ से गर्दन रगड़े, कभी पानी में मुँह डाले।
इतने में एक अहीर उधर से गुजर रहा था। वह बांसुरी बजा रहा था। वह अपनी गाय-भैंस चरा रहा था। कंधे पर लाठी थी।
बाघ ने उसे देखकर कहा,
“भाई मेरे, मेरी मदद कर दो। मेरे गले में एक गिरगिट फँस गया है। तुम मेरे मुँह में हाथ डालकर गिरगिट निकाल दो।”
अहीर बोला,
“अरे महराज!
मैं आपके मुँह में हाथ डालूँ? आप मुझे खा जाओगे!”
बाघ बोला,
“नहीं खाऊँगा। मैं वचन देता हूँ।”
अहीर ने सोचा, बाघ राजा वाकई संकट में है! संकट में पड़े को तो बचाना चाहिए। उसने धीरे से हाथ बाघ के मुँह में डाला और गिरगिट को बाहर निकाल दिया।
गिरगिट से कहा – भाग।
गिरगिट बाहर आते ही भाग गया। पीछे मुड़कर भी नहीं देखा।
बाघ को बड़ी राहत मिली। उसने चैन की लंबी साँस ली।
फिर सोचने लगा,
“अगर यह अहीर गाँव में जाकर कह देगा कि बाघ एक पिद्दी से गिरगिट से परेशान हो गया, हार गया, तो सब हँसेंगे।”
उसने कहा,
“देखो, तुम इस घटना के बारे में किसी से मत कहना।”
अहीर बोला,
“ठीक है, नहीं कहूँगा।”
वह घर चला गया। पर रास्ते भर उसे हँसी आती रही।
लेकिन पाँच कदम बाद—
“ही ही ही…”
दस कदम बाद—
“हिहिहिहि…”
रास्ते भर उसे हँसी आती रही।
वह सोचता रहा, बताओ बाघ एक गिरगिट से डर गया।
घर पहुँचा तो उसकी पत्नी ने पूछा,
“आज इतने खुश क्यों हो?”
पर उसने नहीं बताया।
खाना खाते-खाते वो हँस रहा था।
पत्नी ने फिर पूछा।
खाना खाया, खाट पर लेटा, फिर नींद में भी हँसने लगा—
“हिहिहि… बाघ… गला… गिरगिट…”
पत्नी झल्ला गई—
“अब बताओ भी!”
आखिर उसने पूरी कहानी सुना दी। पत्नी भी हँसते-हँसते दोहरी हो गई।

उधर बाघ को पहले से शक था। वह उसके पीछे-पीछे घर तक आ गया था।छुप-छुप कर अहीर का पीछा कर रहा था . दूसरे दिन जैसे ही वह घर से बाहर निकला, उसने दबोच लिया।
बाघ गरजकर बोला,
“मैंने मना किया था, फिर भी तुमने बता दिया!”
अहीर डर गया, डर के मारे उसकी सांस ऊपर-नीच हो रही थी।
बाघ ने पूछा – तुम्हारी सांस क्यों फूल रही है?
बाघ उसे वहाँ नहीं खाया, वो उसे जंगल ले गया।
बाघ ने देखा कि उसका पेट भी फूला हुआ है, निकला हुआ है। उसने पूछा,
“तुम्हारा पेट इतना बड़ा क्यों है?”
अहीर बोला,
“मेरे पेट में चार सौ गिरगिट हैं।”
बाघ दंग रह गया।
अहीर बोला,
“नहीं, शायद सात सौ होंगे!”
यह सुनते ही बाघ घबरा गया। उसने सोचा,
“एक गिरगिट ने मेरा यह हाल कर दिया। अगर इसको खाऊँगा तो सात सौ गिरगिट मेरा क्या हाल करेंगे?”
उसने तुरंत अहीर को छोड़ दिया और बोला,
“जा, भाग जा!”

22–23 मार्च को टूटुवापानी पहुँचना किसी आयोजन में शामिल होना भर नहीं, बल्कि एक जीवित स्मृति में प्रवेश करना है। जुरिपोखर होते हुए जब हम वहाँ पहुँचे, तो लगा जैसे रास्ते ही हमें याद दिला रहे हों कि यह यात्रा बाहर की नहीं, भीतर की भी है। टूटुवापानी फिर से लोगों की पदचापों से भर उठा था। हर वर्ष की तरह इस बार भी लोग जुटे थे—गाँव-गाँव, बस्ती-बस्ती, टोले-टोले से—पर यह जुटान संख्या का नहीं, संबंध का था।
“जान देंगे, जंगल नहीं देंगे”—यह नारा वहाँ हवा में नहीं था, लोगों की चाल में था, उनकी आँखों में था, उनके बैठने के ढंग में था। पेड़ों के नीचे धरना चल रहा था, पर वह धरना किसी ठहरे हुए समय की तरह नहीं, एक बहती हुई चेतना की तरह अनुभव होता था। जमीन पर बैठा हर व्यक्ति जैसे यह कह रहा हो—जमीन किसकी और फैसला किसका?
यहाँ समाज अपने पूरे विस्तार में उपस्थित था—बूढ़े जिनकी स्मृतियों में इस संघर्ष की शुरुआत दर्ज है, जवान जिनकी आँखों में उसका विस्तार है, शोधार्थी और वैज्ञानिक जो इसे समझने आए हैं, कलाकार जो इसे अभिव्यक्त कर रहे हैं, और बच्चे—जो शायद अभी शब्द नहीं जानते, पर इस संकल्प की भाषा सीख रहे हैं। पेड़ों के नीचे ही चूल्हे सुलग रहे थे। वहीं खाना पकता, वहीं बाँटा जाता—जैसे जीवन और संघर्ष के बीच कोई अलगाव नहीं, दोनों एक ही प्रक्रिया के हिस्से हों।
मंच से नेतरहाट फील्ड फायरिंग रेंज के खिलाफ आंदोलन की शुरुआत से लेकर आज तक की कथा सुनाई जा रही थी—विस्थापन के खतरे, उसे रोकने के प्रयास, और बार-बार अपने ही अस्तित्व को बचाने की जिद। यह सुनना भर नहीं था, अपने समय को पहचानना था। बिज्जू टोप्पो की फिल्में जब चलीं, तो लगा जैसे इस संघर्ष की आवाज़ अब दृश्य बनकर हमारे सामने खड़ी है। फिल्म में दिखाया कैसे निहत्थी जनता ने, उसमें भी महिलाओं ने, बन्दूक की नाल से धकियाए जाने के बाद भी अडिग रही। यहाँ आंदोलन का हिस्सा रहे, जो आज नहीं हैं, उनको भी याद किया गया।
जेराम जेराल्ड कुजूर को सुनते हुए यह स्पष्ट होता गया कि यह लड़ाई किसी एक पीढ़ी की नहीं, समय के लंबे विस्तार में फैली हुई है। केंद्रीय जनसंघर्ष समिति के ही वरिष्ठ सदस्य अनिल मनोहर ने कहा कि पिछले तीस वर्षों से यह विश्व-प्रसिद्ध आंदोलन पूरी मजबूती के साथ जारी है। उन्होंने याद दिलाया कि जनशक्ति के दबाव के कारण ही सरकार को 11 मई 2022 को प्रस्तावित फायरिंग रेंज की अवधि समाप्त करने और परियोजनाओं को स्थगित करने पर मजबूर होना पड़ा था। मंच से कई गीत और नृत्य की प्रस्तुतियाँ भी चल रही थीं।
नृत्य और गीत यहाँ विराम नहीं थे, वे इस पूरे अनुभव की धड़कन थे। उनमें हक की माँग थी, पर उससे भी अधिक एकजुटता की गरिमा थी।
पहले दिन का सूर्यास्त—धीरे-धीरे ढलती रोशनी में पेड़ों की छायाएँ लंबी होती गईं। लगा जैसे हर छाया अपने भीतर कोई अधूरा प्रश्न समेटे है। और फिर अगली सुबह—कोहरे को चीरती हुई धूप, चूल्हों से उठता धुआँ, और फिर से एकत्र होते लोग—जैसे हर सूर्योदय इस संकल्प को फिर से जन्म देता है।
यह लड़ाई आज की नहीं है। यह उन पीढ़ियों के लिए है जो अभी यहाँ नहीं हैं, पर जिनके हिस्से का जंगल, जमीन और जीवन यहीं तय हो रहा है। टूटुवापानी में हर वर्ष यह संकल्प केवल दोहराया नहीं जाता—उसे फिर से जिया जाता है, थोड़ा और गहरा, थोड़ा और अडिग। जो संकल्प लिया जाता है वह अक्षरातः इस प्रकार है – “हम पायलट प्रोजेक्ट नेतरहाटफील्ड फायरिंग रेंज के प्रभावित लोग, अपने पूर्वजों की धरोहर, जल जमीन, जंगल की रक्षा करने हेतु, जब तक पायलट प्रोजेक्ट फील्ड फायरिंग रेंज की अधिसूचना रद्द नहीं हो जाती है, तब तक अहिंसात्मक सत्याग्रह जारी रखेंगे।”
. लुरगुमी कला दिनांक 24 मार्च 2026 – सुबह 02 मार्च 2026
24 मार्च – 1 अप्रैल 2026
लुरगुमी कला, लोहरदगा का एक छोटा-सा गाँव—पर अपने भीतर बहुत कुछ समेटे हुए। यह बिज्जू टोप्पे का गाँव था। उनके घर ही हम सबने डेरा डाला। घर मिट्टी का था। घर में घुसने से पहले बरामदे में गोड-धुलाई इस रस्म के बारे में सुन रहे थे। यहाँ यह रस्म हमारे साथ हुई। पैर में तेल लगाना, परात में धोना, फिर गमछे से पोंछना। इतनी शर्म आ रही थी, पर मेजबानों की जिद थी—हम तो करेंगे ही करेंगे। इसी बरामदे में झारखंडी गमछा गले में डाला गया विदा के समय।
जहाँ लोग अपने-अपने कैमरा से हार्ड डिस्क से हार्डडिस्क में सामान ट्रांसफ़र कर रहे थे, उसी बड़े से कमरे में एक ओर धान के बोरे रखे थे, बीचों-बीच ढेर सारे आलू लुढ़के-पुड़के पड़े थे और उसी आलू वाले कमरे में फिल्मकार लोग अपना काम भी कर रहे थे। तीनों दीवारों पर तीन मांदरलटके थे। बाबा विक्टर दरवाज़े के ठीक सामने वाले सोफ़े पर बैठे हम सबको देखते, पूछ-खबर लेते—“चाय पी? खाना खाया?”
उनकी आवाज़ में अपनापन ऐसा था जैसे हम कोई बाहर से आए लोग नहीं, घर के ही सदस्य हों। उस कमरे में, जहाँ आलू बिखरे थे, एक टेबल था, दो कुर्सियाँ थीं और कैमरे चल रहे थे, मुझे लगा क्या कमरा है, जहाँ हर चीज़ अपनी जगह पर है और हर व्यक्ति अपने हिस्से की कहानी बुन रहा है।
लुरगुमी कला में बिज्जू टोपे ने पहले फ़िल्म दिखाई, फिर सवाल उठाए। हम सस्ते लेबर के रूप में चले गए। अधिकार मिलना चाहिए, नहीं मिले। सौ साल हो गया, कोई अधिकार मिलना चाहिए। कोई सुनता नहीं। जो हक़ की बात करे, कैसे डायलाग आगे बढ़ेगा? टापू राजी फ़िल्म दिखाई गई, जो दिखाती है सौ साल पहले झारखंडी गिरमिटिया मजदूर की तरह अंडमान गए, वहाँ जी-तोड़ मेहनत की, वहाँ अपने हक़ के लिए आज भी संघर्ष कर रहे हैं।
अगली सुबह जब घूमकर लौटी, तो बिज्जू दादा ने पूछा, “कहाँ गई थी?”
मैंने कहा, “मचान के उस तरफ, जहाँ स्मिता का परिवार मछली पकड़ रहा था।”
उन्हें यक़ीन नहीं हुआ कि मैंने दिशा ठीक बताई—“वहाँ तो हमारे खेत हैं।”
अपनी ज़रूरत भर ही जंगल से लाना—इसे मैंने अपनी आँखों से देखा। फुतकल की पत्तियाँ चुन लेना और उन्हें पूरे साल के लिए सहेज कर रखना भी देखा। पर लुर्गामी में एक और दृश्य था—तीन फेरों में माँ और बच्चे महुआ बीनने जाते।
मैं स्मिता के साथ हो ली। वह सुबह छह बजे दातून और बोतल में लिपटा पानी लिए जा रही थी। पूछने पर उसने बताया—घर के सब लोग मछली पकड़ने गए हैं, उनके लिए दातून और पानी लेकर जा रही हूँ। मैंने सोचा, कोई बड़ा तालाब होगा, जाल-काँटा लेकर गए होंगे।
पर वहाँ जो देखा, वह मेरी कल्पना से बिल्कुल अलग था। एक छोटा-सा पोखर—लगभग सूख चुका, दलदली, थका हुआ। पानी बस नाम भर का। उस सूखते जीवन में मछलियाँ अब पानी की नहीं, मिट्टी की प्राणी बनती जा रही थीं—मिट्टी में लथपथ, छटपटाती हुई। लोग उन्हें उसी मिट्टी से बटोर रहे थे, जैसे धरती अपनी आख़िरी देन सौंप रही हो।
गर्मी तेज़ हो चली थी, पोखर सूखने लगे थे, और मछलियाँ मृत्यु के कगार पर थीं। उस क्षण, मिट्टी में सनी उन मछलियों को इकट्ठा करते हुए मैंने सिर्फ़ एक दृश्य नहीं देखा—मैंने आदिवासी जीवन का वह सत्य देखा, जहाँ प्रकृति के साथ एक गहरा, अनकहा समझौता है।
और फिर, उस सुबह की एक और सुंदर परंपरा मेरे सामने आई—जो मछलियाँ पकड़ी गई थीं, उनमें से एक हिस्सा विक्टर दादा को भी मिला। “आपका हिस्सा,” कहकर उन्हें दिया गया। दरअसल, वह पोखर भी विक्टर दादा का ही था, पर बुढ़ापे की वजह से वे अब खेतों तक नहीं जा पाते, मछली पकड़ना तो दूर की बात थी। इसलिए स्मिता के परिवार ने उनके हिस्से को अपने हिस्से में शामिल रखा—और समय आने पर ससम्मान उन्हें लौटा दिया। अब जाकर बिज्जू दादा को समझ आया मेरी सुबह की बात पर। आदिवासियत जहाँ संग्रह केवल अपने लिए नहीं होता—यह साझा जीवन का विस्तार है।
यहीं से हम लोध जलप्रपात भी देखने गए। नेतरहाट गए। सुग्गा डैम गए। महुआ बीनने वाले जंगल गए।
बिज्जू दादा की बुआ के घर, घर की छत डालने की ख़ुशी में दावत खायी।
लुरगुमी में सगीर अंसारी का हथकरघा वाला काम एक मिसाल था। यह सब देखते हुए महात्मा गांधी याद आए। उन्होंने चरखे को आत्मनिर्भरता और स्वाभिमान से जोड़ा था। यहाँ लुरगुमी कला में वह बात अब भी बची हुई लगती है—जहाँ कई परिवार अपने हाथों से, अपने श्रम से जीवन चलाने की कोशिश करते हैं। चरखा यहाँ सिर्फ धागा नहीं कातता, एक तरह से जीवन की लय बनाए रखता है। मुझे कबीर का ताना-बाना याद आया और देर रात तारों भरे आकाश में “झीनी-झीनी बीनी चदरिया” का एक अलग ही अर्थ खुला, उस दृश्य के साथ जहाँ फराज और उसके जैसे कई युवाओं जैसे बुनकरों को अपने काम में लय देख कर आई थी। जसके तस रख दीन्हीं चदरियाँ।
एक तरफ पाम सन्डे होने से चर्च की ओर हलचल, शिव के आलय में आरती और पाँच वक्त मस्जिद की अजान लुरगुमी के घेरे में गूँजती रही। यह गाँव गंगा-जमुनी तहज़ीब का भी उदाहरण पेश करता है। गुलाम सरवरने जितने दिन हम रहे, अम्मी के हाथ की सेवइयाँ खिलाईं। उनका स्टेट बैंक का “मिनी बैंक” ही हमारे फोन चार्ज करने और लैपटॉप चलाने का अड्डा था। बिजली कटौती से हम लुरगुमी कला में भी जूझे। एक शाम गुलाम सरवर ने सुग्गा बाँध की सैर कराई। कर्क रेखा से गुज़रे, वहाँ कुछ वक्त ठहरे।
सगीर और उनके साथियों से बात करते हुए साफ लगा—वे इसे सिर्फ काम नहीं, अपनी पहचान मानते हैं। “चाहे कुछ हो जाए, हम वस्त्र बनाना नहीं छोड़ेंगे”—उन्होंने कहा। जाते समय उन्होंने एक गमछा भेंट दिया। उसी समय सगीर की एक बात भीतर तक रह गई—“हम मेहनत से कपड़ा बुनते हैं, पर खुद बाज़ार की खरीदी बुशर्ट पहनते हैं।” उनके बेटे ने अपने तरीके से कुछ नया जोड़ने की कोशिश की है—उन्हें भरोसा है कि ऑर्डर मिलते रहेंगे। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती। कुछ व्यावहारिक मुश्किलें साफ दिखती हैं—
बाज़ार में मशीन से बने सस्ते कपड़े हैं, उनके सामने हाथ का बुना कपड़ा टिक नहीं पाता। मेहनत ज़्यादा है, दाम कम मिलते हैं। धागा महँगा पड़ता है। बिजली की कटौती काम को धीमा कर देती है। और सबसे बड़ी बात—नई पीढ़ी इस काम में टिकना नहीं चाहती। बीच में जो लोग माल उठाते हैं, वही ज़्यादा कमाते हैं। इन सबके बीच भी लुरगुमी कला में हथकरघा चल रहा है—धीमे सही, पर रुका नहीं है। यहाँ काम सिर्फ रोज़गार नहीं, एक भरोसा है—कि अपने हाथ से बनाया हुआ अभी भी अर्थ रखता है। यही बात इस गाँव को अलग बनाती है।
कार्यक्रम में ‘रोपनी’, ‘गाड़ी लोहरदगा मेल’, ‘मुंडारी सृष्टि कथा’ तथा ‘गाँव छोड़ब नाहीं’ और ‘बिजय बिंगुल’ (नेतरहाट आंदोलन), ‘कोरा राजी’ और ‘तापु राजी’ प्रदर्शित की गईं।
राँची 01 मार्च –
कार्यशाला का समापन सायं 6:00 बजे से आदिवासी बालक छात्रावास (हॉल), मोराबादी, राँची, झारखंड में किया गया। कार्यशाला के बारे में मार्कोस कहते हैं कि – “बिज्जू टोप्पो के साथ जाना हमारे लिए उनके आदिवासी ग्रामीण जीवन की दुनिया में प्रवेश का माध्यम था, और फिल्म निर्माताओं के बीच रहकर मुझे प्रस्तुतीकरण के नए तरीकों की प्रेरणा मिली।”
अपने अनुभव साझा करते हुए अमृता कहती हैं कि – “इस अनुभव ने मुझे आदिवासियों के बारे में एक ऐसा विशिष्ट दृष्टिकोण दिया, जो पहले कभी नहीं मिला था, जबकि अपने कार्यक्षेत्र में मुझे देश के अन्य हिस्सों में भी उनसे संवाद करने का अवसर मिला है। मुझे लगता है कि यहाँ के लोग अपने अधिकारों के प्रति अधिक जागरूक हैं।”
मैंने अपने अनुभव साझा करते हुए बाहर से ज्यादा अपने अंतर की यात्रा बताया। वर्कशॉप में सबके सहयोग के प्रति धन्यवाद व्यक्त किया। सबने इस कार्यशाला में बनाई गई डॉक्यूमेंट्री का प्रशंसा के साथ स्वागत किया। उसके बहाने अनेक संवाद खुले, अनुभव साझा हुए, प्रश्न उठे, उत्तर खोजे गए।
तीन तारीख को मैं Ranchi Women’s College गई। वहाँ डॉ. उर्वशी, प्रो. प्रज्ञा गुप्ता और करुणा से मिलना हुआ। आत्मीय बातचीत के बीच कांसके फूलों ने कहा ज़ोहार! काव्य-संग्रह भी साथ हुआ। यात्राएँ किताबों और यादों के सहारे भी चलती रहती हैं।
चार अप्रैल की सुबह जब मैंने अखरा से विदा ली और हवाई जहाज़ ने उड़ान भरी, तब मन में यही भाव साथ था कि आदिवासियत में समय और जीवन को चक्रीय माना जाता है—जहाँ आगे बढ़ना, दरअसल लौटना भी है; और लौटना, एक नई शुरुआत। मेरी इस यात्रा से कोई नई शुरुआत हो—ज़ोहार।

श्रद्धा श्रीवास्तव -जनवरी 1971 को रीवा मध्यप्रदेश में जन्म.  केंद्रीय विद्यालय संगठन से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति. कथादेश, नया ज्ञानोदय,आजकल, हंस, अन्विति जैसी पत्रिकाओं में कहानियाँ प्रकाशित और चर्चित रहीं हैं. लद्दाख में स्टोरी टेलिंग फेलोशिप प्राप्त, भोपाल में निवास.

 

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