समकालीन जनमत
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एस आई आर: जानी-बूझी पैंतरेबाजी

विशेष गहन पुनरीक्षण को कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ना भारतीय नागरिकों को धीरे-धीरे लाभार्थी में तब्दील कर दिये जाने की शुरुआत है
यामिनी अय्यर

चलते हैं 2006 में, महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून के संसद मे पारित हो जाने के बाद देश के कुछ भागों में एक अनोखा प्रयोग किया गया। इस कानून के अन्तर्गत नियमित सोशल ऑडिट किया जाना अनिवार्य था। महाराष्ट्र और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों ने सोशल ऑडिट की इस अनिवार्यता को संस्थागत बनाने के लिये नागरिक-समाज कार्यकर्ताओं और मजदूरों को साथ लाना शुरू कर दिया। सरकारी फाइलों को बगल में दबाये ये नागरिक-ऑडिटर मजदूरों के अनुभवों का सरकारी दस्तावेजों से मिलान करने लगे। इस ऑडिट की अन्तिम परिणति होती थी नागरिकों और सरकारी अधिकारियों की उपस्थिति में जन-सुनवाई में। सुनवाई में ऑडिट से प्राप्त आंकड़े मजदूरों के साथ साझा किये जाते थे और उनसे उनकी समस्याओं के समाधान के लिये आवेदन-पत्र प्राप्त किये जाते थे। कई बार इन सुनवाइयों में शामिल होना मेरे लिये बहुत प्रभावशाली हुआ करता था। इनमें न केवल असन्तुष्ट नागरिकों को अपनी बात कहने का मौका मिलता था (कइयों को तो पहली बार) बल्कि कई बार सरकार की ओर से भी उनकी समस्याओं का तात्कालिक समाधान निकाला जाता था, जिसमंे उनकी मजदूरी में से दोषी अधिकारियों द्वारा हड़पा गया धन वापिस कराया जाना भी शामिल होता था। इन ऑडिट्स की ताकत भ्रष्ट अधिकारियों को पकड़ने कहीं आगे निकल चुकी थी। इससे एक ऐसे तथ्य की स्थापना हुयी जिसने सबसे निर्धन नागरिक को भी एक-समान स्वर और उसके ‘अधिकार-होने के अधिकार’ को सक्रिय रूप से बरतने के लिये एक ठोस धरातल भी उपलब्ध कराया। यह एक ऐसा दुर्लभ क्षण था जब एक नागरिक सरकार के सामने राज्य के कृतज्ञ कृपाकांक्षी आवेदक के तौर पर नहीं, बल्कि उस राज्य से जवाबदेही की तलब करने वाले अधिकारों से लैस जाति, वर्ग और लिंग से परे इंसान के रूप में खड़ा हो पाया था जिसने उन्हें नियमित रूप से फेल किया था।

 

हाल के महीनों में, जब हमसे अपनी नागरिकता सिद्ध करने की लगभग नियमित माँग सरकार की ओर से आ रही है तो उसके निहितार्थ को समझने की कोशिश करती हुयी मैं बार-बार सोशल ऑडिट के उस दौर में चली जाती हूँ। मतदाता-सूचियों के विशिष्ट गहन पुनरीक्षण ने हममंे से अधिकांश को एल्गोरिद्म के ज़रिये तस्दीकशुदा काग़ज़ात हासिल करने की काफ्काई धक्कामुक्की में फँसा कर मतदान के अपने सबसे मौलिक राजनीतिक अधिकार को बचाये रखने कीे जद्दोजहद में झोंक दिया है। यह व्यापक नागरिक संवर्ग में हमारे अधिकारों के वितरण को भी नया आकार दे रहा है। विशिष्ट गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया की वास्तविकता, खासतौर पर पश्चिम बंगाल में ‘‘तार्किक विसंगति’’ के नाम पर अनुमानतः 27 लाख मतदाताओं के सक्रिय डिसएन्फ्रैंचाइज़मेंट (मतदाता-सूची से बाहर कर दिया जाना) से उजागर हुयी इस दानवी प्रकृति ने निर्लज्जतापूर्वक यह स्थापित कर दिया है कि विशिष्ट गहन पुनरीक्षण और काग़ज़ात की उसकी तलब का इस्तेमाल, नागरिकों के एक वर्ग- मुसलमान- को बहुसंख्यकों की नज़र में ‘सन्देहास्पद’ घोषित करते हुये उनपर घुसपैठिया होने का ठप्पा लगाने की सोच का साधारीकरण करके, उनके संस्थागत परायाकरण मंे कितनी सफलतापूर्वक किया जा सकता है। अब बंगाल चुनाव आइने में हम बहिष्करण के एक नये स्वरूप से दोचार हो रहे हैं, और इस बार वह है सामाजिक-आर्थिक अधिकारों के इर्द-गिर्द।

 

सत्ता में आने के कुछ ही दिनों के भीतर पश्चिम बंगाल की नव-निर्वाचित सरकार ने कल्याणकारी लाभों (खाद्य और नकदी) को एसआईआर से जोड़ने के आदेश जारी कर दिये। बिहार के मुख्यमंत्री इसमें पीछे नहीं रहे, उन्होंने भी घोषणा कर दी कि एसआईआर में बहिष्कृत व्यक्ति सरकारी लाभों के हकदार नहीं होंगे। रिपोर्टों के अनुसार पश्चिम बंगाल में अन्नपूर्णा योजना के 26 लाख आवेदन निरस्त कर दिये गये हैं और बिहार में 50 लाख राशनकार्ड-धारियों के नाम काट दिये गये हैं। इसके अलावा पार्टी एकता से इतर, अपेक्षाकृत कम ही सही, कर्नाटक और पंजाब के मुख्यमंत्रियों न भीे, जहाँ एसआईआर का काम अभी शुरू ही हुआ है, यह ‘चेतावनी’ जारी कर दी है कि मताधिकार से वंचित लोगों को कल्याणकारी लाभों से भी वंचित होना पड़ सकता है। उच्चतम न्यायालय ने अपने 27 मई के आदेश में यह स्पष्ट किया है कि एसआईआर के फैसलों और मतदाता-सूची से बहिष्करण का विस्तार दूसरे लाभों तक नहीं किया जा सकता। अपने इस आदेश की अनदेखी करते हुये न तो उच्चतम न्यायालय ने और न ही कलकत्ता उच्च न्यायालय ने सरकार द्वारा एसआईआर को जनकल्याण से जोड़ने के आदेश को चुनौती देनेवाली याचिकाओं को स्वीकार करने योग्य समझा। इसलिये व्यवहार मंे एक नयी राजनीतिक योजना को गतिशील बनाने में एसआईआर का बखूबी इस्तेमाल किया गया है। कल्याणकारी योजनाओं के लाभ उन लोगों के विशेषाधिकार बन गये हैं जिन्हें राज्य मतदान के योग्य समझता है। राज्य से अपने कल्याणकारी दायित्वों की पूर्ति की माँग करनवाले वे अधिकार-सम्पन्न नागरिक जिन्हें मैंने दो दशक पहले सोशल ऑडिट के दौरान देखा था इस समय पीछे धकेल दिये गये हैं और उनकी जगह सरकारी दान पानेवाले निरीह भिखारियों की एक नयी नागरिक-श्रेणी- लाभार्थी ने ले ली है।

 

कल्याण के इस रंगमंच पर नागरिकों के लाभार्थी में बदल दिये जाने को पूरी तरह समझने के लिये हमें समकालीन भारत में कल्याण-वितरण की बदलती प्रकृति को बारीकी से समझना पड़ेगा। स्वतंत्रता-प्राप्ति के प्रारम्भिक दशकों में कल्याण की अवधारणा बहुत सीमित थी, माई-बाप सरकार के रहमोकरम पर आश्रित तुच्छ दान मात्र तक महदूद। बाद में नागरिक-समाज के दशकों के कड़े संघर्ष के बाद जब सूचना, काम और पोषण के अधिकारों के कानून बने और सीधे दावा करने वाली तकनीक विकसित हुयी तब हमे सोशल ऑडिट जैसा हथियार मिला। हाँलाकि इन कानूनों के बन जाने के बाद भी उनसे कहीं आगे जाकर उनके द्वारा प्रदत्त अधिकारों के निर्बाध उपयोग की राजनीतिक प्रतिबद्धता सीमित ही रही। सहायता वितरण के दायरे में अधिकार-आधारित दावों का सामना तकनीक की उन आकर्षक सम्भावनाओं से हुआ जिसके चलते राज्य की भ्रष्ट और अक्षम परतों को दरगुजर कर देने के संसाधन मुहैया हुये और सिर्फ एक बटन दबाने से प्रयोजित लाभ सीधे नागरिक को मिलने लगे। तकनीक के विस्तार के साथ ही अधिकारों के विस्तार की परियोजना लाभ-वितरण के अपेक्षाकृत अधिक वैयक्तिक स्वरूप में सिमटती गयी।

 

नागरिकों को अब प्रायः भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों के सामने अपने लाभों के लिये गिड़गिड़ाना नहीं पड़ता। इसके बजाय कल्याण के लाभ सीधे उनके बैंक खातों में पहुँच जाते हैं। फिर भी दुविधा यह है कि इन लाभों की अब विधिवत ब्रैंडिंग करके पार्टी के नेताओं की तस्वीरों के साथ इसका प्रदर्शन किया जाता है और इसे पार्टी के नेता की दया के तौर पर ‘उपहार’ या ‘गारंटी’ कहकर प्रचारित किया जाता है। राजनीतिक-विज्ञानी नीलांजन सरकार और मैंने इन योजनाओं की इस प्रवृत्ति का अध्ययन किया है। हमने कल्याण के इस स्वरूप को ‘‘टेक्नो-पैट्रिमोनियलिज्म’’ की संज्ञा दी है। इस ढाँचे में कल्याण की अवधारणा ‘नागरिकों के प्रति राज्य के नैतिक दायित्व’ की नहीं होती। यह कोई समझौता या दायित्व निर्धारण का प्रतिफल नहीं बल्कि केवल ऐसा उत्पाद है जो राज्य को भाता है। यह पैट्रिमोनियल केवल इसलिये है कि इसको वैधता मिलती है लाभार्थी को किसी नेता की दरियादिली के चलते मिले दान से।

 

चुनावी नज़रिये से इसकी अपील मारक है। मतदाताओं के ग्रहणबोध के आंकड़े बताते हैं कि जनकल्याण का यह ढाँचा कितने प्रभावशाली ढंग से पार्टी के नेता की साख में केन्द्रित हो जाता है और यह केन्द्रण मतदान में चयन से किस प्रकार सम्बद्ध होता है। हाँलाकि उसी प्रतीक के सहारे नेता बिना किसी नुकसान के उस लाभ से हाथ खींच भी पाते हैं। ठीक यही चीजें एसआईआर से भी परिलक्षित हुयी हैं। तकनीक ने जनकल्याण के लेन-देन एवं पैट्रिमोनियल ढाँचे का प्रयोग लोगों को उनके अधिकारों से वंचित करने में कर लिया। जब लेन-देन की शर्तें कठिन हो जाती हैं तब एक बार चुनाव जीत जाने के बाद अधिकांश मुख्यमंत्रियों के लिये जनकल्याण को एसआईआर के साथ सम्बद्ध कर दिया जाना लाभकारी हो सकता है- राजनेता लोग सन्देह के दायरे में लाकर लाभार्थियों के अधिकारों को छीनने में अपनी सत्ता का इस्तेमाल करते हैं।

 

यह कोई अमूर्त सिद्धान्त नहीं है। यह अधिकांश संवेदनशील भारतीयों के दैनन्दिन जीवन को सक्रिय रूप से आकार देता है। 2024 के चुनाव के दौरान आगरा में एक दलित मतदाता ने ठीक ही कहा था ‘‘देनेवाला नहीं हमें माँगनेवाला बना दिया है।’’ एसआईआर को जनकल्याण से सम्बद्ध किया जाना भारतीय नागरिकांे को धीरे-धीरे लाभार्थी में परिवर्तित कर दिये जानेवाला आखिरी कदम है। अधिकार-सम्पन्न सक्रिय दावेदार होने की अवधारणा अब बहुत दूर की याददाश्त बन चुकी है। पर इस संकल्पना को पुनः सक्रिय किया जाना भी लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का एकमात्र मार्ग है।

 

यामिनी अय्यर ब्राउन विश्वविद्यालय में सीनियर विज़िट्रिग फेलो हैं।

‘द टेलीग्राफ’ दिनांक 14.07.2026 से साभार

अनुवादः दिनेश अस्थाना

फ़ीचर्ड इमेज गूगल से साभार 

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