स्मृति

महाद्वीप के अवाम की एकता की आवाज थीं फहमीदा रियाज

लखनऊ, 24 नवम्बर। ‘ स्मरण फहमीदा रियाज ’ में लखनऊ के साहित्यकारों व संस्कृतिकर्मियों ने फहमीदा को याद किया तथा उनके साथ बिताए दिनों को साझा किया। स्मृति सभा का आयोजन यहां के प्रगतिशील व जनवादी संगठनों ने मिलकर इप्टा कार्यालय में किया था। इस मौके पर उनके साहित्यिक व सामाजिक अवदान पर चर्चा हुई।

वक्ताओं का कहना था कि वो जितना पाकिस्तान की थी, उससे कम हिन्दुस्तान की नहीं थी। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि वे इस महाद्वीप के हुक्मरानों व तानाशाहों के खिलाफ अवाम की आवाज थी। उन्होंने ‘आवाज’ नाम से जो रिसाला निकाला उनकी इसी आवाज का वह प्रतिनिधि था। इसीलिए उनका दमन हुआ। पाकिस्तान छोड़ना पड़ा। कई वर्षों तक भारत में रहीं। कई इलाकों में घूमी। वहां के जीवन का अध्ययन किया। उनका ‘गोदावरी’ उपन्यास इसी जीवन की कथा कहता है। वे सिर्फ शायरा व अफसानानिगार नहीं थी बल्कि वे सामाजिक व राजनीतिक कार्यकर्ता भी थीं। उनके खयालात तरक्की पसन्द थे। उनका संघर्ष जम्हूरियत, इंसानियत और औरतों के अधिकारों के लिए था। उनमें मर्द समाज के खिलाफ बोल्डनेस था।

शकील सिद्दीकी ने उनके साहित्य यात्रा पर और उनके लखनऊ प्रवास के दौरान कवि कुंवरनारायण के घर पर हुई गोष्ठी की विस्तार में चर्चा की। उन्होंने उनकी कई कविताएं सुनाई। जसम की ओर से उन्हें याद करते हुए कौशल किशोर ने उनकी चर्चित नज्म का पाठ किया जिसमें बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद यहां बढ़ी धार्मिक कट्टरता पर तंज कसा था ‘तुम बिल्कुल हम जैसे निकले/अब तक कहां छिपे थे भाई/वो मूरखता, वो घामड़पन/जिसमें हमने सदी गंवाई/आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे/अरे बधाई, बहुत बधाई’।

कवि अजय सिंह ने उनकी नज्म सुनायी जिसमें वे हवा के उन्मुक्त बहने की बात है। उन्होंने कहा कि वे हवा की तरह स्वतंत्र थी, उनके खयालात स्वतंत्र थे। उन्हें सरहदों में नहीं बांधा जा सकता।

स्मृति सभा का संचालन करते हुए जलेस की ओर से नलिन रंजन सिंह ने श्रद्धा सुमन अर्पित किया। अमिट की ओर से वन्दना मिश्र, अर्थ की ओर से रमेश दीक्षित, आलोचक वीरेन्द्र यादव तथा नाटककार राजेश कुमार ने भी उनके साहित्यकार रूप के साथ उनके सोशल एक्टिविस्ट के रूप में उनके किये अवदान पर बातें की और कहा कि ऐसे समय में जब हुक्मरानों द्वारा भारत और पाकिस्तान के बीच शत्रुता और आपस में नफरत और युद्ध जैसी स्थिति पैदा की गयी है, फहमीदा दोनों देशों के अवाम के बीच पुल थीं। वे अवाम की एकता को मजबूत करने वाली शख्सियत थीं।

कार्यक्रम की अध्यक्षता इप्टा के महासचिव राकेश ने की। उन्होंने अपनी पाकिस्तान यात्रा के दौरान उनके साथ की यादों और उनके व्यक्तित्व की सहजता व असाधारण गुणों को साझा किया। इस स्मृति सभा में हिमांशु जोशी, श्याम कश्यप, काजी अब्दुल सत्तार आदि को भी याद किया गया तथा दो मिनट का मौन रखकर सभी को श्रद्धांजलि दी गया। इस अवसर पर श्रद्धासुमन अर्पित करने वालों में जसम लखनऊ के संयोजक श्याम अंकुरम, इप्टा के प्रदीप घोष, कल्पना पांडेय, कलम के रिषी श्रीवास्तव आदि प्रमुख थे।

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