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नाटक

हवालात : वैचारिक सौंदर्य का संवेदक परिदृश्य

नेमिचन्द्र जैन के नौ लघु नाटक संग्रह में एक नाटक ‘ हवालात’ है, जिसके लेखक हैं सर्वेश्वर दयाल सक्सेना। नेमिचन्द्र जी ने इस नाटक को लघु नाटक के नाम से संबोधन किया है लेकिन युवा निर्देशक पीयूष वर्मा ने कथ्य में बगैर कोई कांट- छांट किये बल्कि धूमिल की कुछ कविताएँ जोड़कर एक सम्पूर्ण नाटक का रूप दे दिया है।

आजकल नए या सीनियर निर्देशक जहां ऐसे नाटक से बचते हैं, ऐसे सवाल से कटते हैं, पीयूष वर्मा सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के नाटक को समसामयिक , प्रासंगिक बनाने से जरा भी नहीं चूकते हैं। जहां आज के निर्देशक ग्रांट लेने के चक्कर में संस्कृत नाटकों के जंगल में विचरने लगते हैं, मिथकों में डुबकी लगाने लगते हैं या पाश्चात्य के अतीत को छाती से लगा लेते हैं; पीयूष वर्मा सीधे सीधे अपनी बात रखने में विश्वास रखते हैं। नाटक के विचार और कला को जिस संजीदगी से प्रस्तुत किया कि दर्शकों को लगा कि यह नाटक उनका है। यह नाटक उनकी बात करता है। लगता ही नहीं है कि यह चार दशक पहले का नाटक है।

युवा लोगों की बेरोजगारी, व्यवस्था का दमन, गाय के बहाने मोब लिंचिंग को प्रोत्साहन देना और आजकल छाए फासीवाद के कोहरे पर निर्देशक ने बेबाकी से चुटकी ली है। अक्सर तथाकथित निर्देशक ऐसे सवालों से बचते हैं। सत्ता से पंगा लेने से परहेज़ करते हैं। लेकिन पीयूष वर्मा कहीं भी डरते हुए नज़र नहीं आते है।

इसका कारण भी है। जहां कोई भी नाटक बगैर सरकारी सहयोग के नहीं होते हैं, पीयूष वर्मा जन सहयोग से नाटक करते हैं। व्यावसायिक दवाब से जरा भी डगमगाते हुए नहीं दिखते हैं। न अर्थ के अभाव में कला में कुछ कमी दिखती है। नाटक में जो डिज़ाइन का काम है, वो अमूर्त नहीं है। न कथ्य के बीच रोड़ा है। बल्कि नाटक के प्रवाह को धार देते है। संप्रेषणा को बढ़ाते हैं।

कहने में कोई हर्ज नहीं कि युवा निर्देशक पीयूष वर्मा की यह प्रस्तुति लखनऊ रंगमंच का इस साल का बेहतरीन नाटक है। इस नाटक को राष्ट्रीय फलक पर ले जाने की जरूरत है। चारों अभिनेताओं ने अपने अभिनय को जमीन से जोड़े रखा था। उनका दर्द और संघर्ष दर्शको तक गया, इसमें कोई शक नहीं।

राष्ट्रीय नाट्य महोत्सवों के चयनकर्ताओं को अपने घेरे से बाहर निकलने की जरूरत है। उन्हें पता होना चाहिए कि रंगमंच पर कौन सा नया सौंदर्य गढ़ा जा रहा है, नया व्याकरण कैसा लिखा जा रहा है ? लेकिन वे निकले भी तो कैसे, उनके पांव में तो सत्ता की जंजीरें बंधी है।
लेकिन जिस निर्देशक के नाटक में जनता का वास है, प्रतिरोध की गूंज है…उन्हें ऐसे बिके, लिजलिजे चयनकर्ताओं की जरूरत भी नहीं है।
भविष्य में पीयूष वर्मा से बतौर निर्देशक और अभिनेता काफी संभावनाएं हैं।और लाजिम भी है।

 

( लेखक राजेश कुमार प्रसिद्ध नाट्य लेखक हैं)

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