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शख्सियत साहित्य-संस्कृति

पूर्वांचल के जातीय कथाकार हैं विवेकी राय

(कथाकार विवेकी राय का जन्मदिन 19 नवम्बर को और पुण्यतिथि 22 नवंबर को होती है । विवेकी राय की स्मृति में प्रस्तुत है युवा आलोचक दुर्गा सिंह का यह आलेख: सं )

दुर्गा सिंह

विवेकी राय पूर्वाञ्चल के जातीय कथाकार हैं।शिवप्रसाद सिंह के बाद पूर्वी उत्तर प्रदेश की सामाजिक-सांस्कृतिक अवस्थिति को इतने व्यापक ढंग से कथा-साहित्य में उन्होंने ही प्रस्तुत किया।इस अंचल की आबोहवा का निर्माण प्रायः किसान जातियों के द्वारा हुआ है।इसमें दया, करुणा, सहानुभूति और सरलता है, तो ईष्या-डाह और पाखण्ड भी है।विवेकी राय का कथाकार इसी में निर्मित हुआ है।वे इसमें से कुछ चुनते या छांटते-बराते नहीं हैं, बल्कि उसे पूरा का पूरा प्रस्तुत कर देते हैं।जो कहीं कहानी-उपन्यास तो कहीं निबन्ध का रूप धर लेता है।
विवेकी राय का लेखन आजादी के बाद शुरू होता है।1952 के आस-पास का यह समय है।नई कहानी के प्रायः कहानीकार इसी समय के इर्द-गिर्द लिखना प्रारम्भ करते हैं।नये आजाद हुए देश की रूमानियत और हहाती वास्तविकताएं एक साथ प्रकट होती हैं।एक राष्ट्र बनना शुरू होता है।इसमें कई परम्पराएं, रूढ़ियां, दुर्बलताएं मौजूद हैं।मूल्य और नैतिकता के स्तर पर इस बनते राष्ट्र में पिछड़ापन अधिक है।वह प्रायः वर्णवादी है।आधुनिक मूल्य-बोध से इसकी गहरी टकराहट है।द्वन्द्व, अंतर्विरोध, विसंगतियां इसी टकराहट में जन्म लेती हैं।इस दौर के अन्य कहानीकारों की भांति विवेकी राय भी इससे गुजरते हैं, दर्ज करते हैं।वे उतने व्यवस्थित भले न हों, जितने कि पूर्वाञ्चल के उनके समकालीन अमरकान्त, मार्कण्डेय और शिव प्रसाद सिंह थे।विवेकी राय अंत तक इनके जैसी कथा-भाषा भी प्राप्त नहीं कर पाये, लेकिन पूर्वाञ्चल के जीवन-जगत का व्यापक फलक वे कहीं अधिक छूते हैं।
आजादी की लड़ाई के दौरान ग्रामीण आबादी और किसानों ने भी एक सपना देखा था।इस सपने में विदेशी गुलामी के साथ देशी गुलामी के भी दृश्य और विचार थे।जीवन की बेहतरी की आकांक्षा थी।ध्यान देने की की बात है कि विवेकी राय पूर्वी उत्तर प्रदेश के जिस इलाके से आते हैं, उसमें सहजानन्द सरस्वती और राहुल सांकृत्यायन के चलाए किसान आन्दोलन, मजदूरों के कम्युनिस्ट आन्दोलन और जातीय सुधार आन्दोलनों की धमक हो चुकी थी।इन आन्दोलनों ने पूर्वाञ्चल के छोटे काश्तकारों, खेतिहर मजदूरों और दलितों-पिछड़ों में नयी चेतना को जगाया था।जीवनगत बदलाव के सपने इसी प्रक्रिया में पलने लगे।लेकिन आजादी आयी तो सिर्फ सत्ता बदल कर रह गयी।विवेकी राय ने इस पहलू से ढेरों कहानियां लिखीं हैं।एक कहानी है ‘दीप तले अंधेरा’। बदलाव चुनाव और सरकार से आयेगा, ऐसा दूरस्थ गांव के दलितों, खेतिहर मजदूरों के मन में पैठा है।लेकिन चुनाव के बाद से कोई आया नहीं।संयोग से उस इलाके में एक दिन खद्दर पहने एक शिक्षक राह भटक जाने से पहुंच गये।लोगजन बड़े खुश हुए।आव-भगत की और अंत में एक चिट्ठी लायी गयी और पढ़ने को दी गयी, क्योंकि उस पूरे इलाके में कोई स्कूल नहीं था, और अक्षर पढ़ने वाला नहीं कोई।अक्षर यानी कि आधुनिक ग्यान और शिक्षा का प्रवेश द्वार।अक्षर यानी कि दीपक-अशिक्षा का अंधेरा दूर करने वाला।यह आजादी के ठीक बाद का दृश्य है।कहानी के नैरेटर/नायक की टिप्पणी है- “दीपक का तेल चुक गया है और जो अंधेरा नीचे था, अब वह चारों ओर फैल जाएगा।”
शिक्षा की राष्ट्र निर्माण में क्या भूमिका है, इसे भारत से दो साल बाद आजाद हुए चीन के उदाहरण से समझा जा सकता है।1949 के टाइम्स ऑफ इण्डिया में एक लेख छपा।यह चीन की सरकार के तत्कालीन निर्णय को ले कर था।चीन की सरकार ने पहला काम किया प्राइमरी शिक्षा के क्षेत्र में।इसमें उस देश की महिलाओं को बड़े पैमाने पर नियोजित किया गया।भारत में आज तक ऐसा न हो पाया।भारत ने जो संस्थानिक मशीनरी निर्मित की वह वर्णवादी विभाजन का आधार छोड़ न पायी।इसे उसी पूर्वांचल से आये उसी दौर के कहानीकार मार्कण्डेय की कहानी ‘हलयोग’ से बखूबी समझा जा सकता है।
विवेकी राय की एक और कहानी है, ‘बेइमानों के देश में’।यह कहानी एक रूपक कथा के माध्यम से आजादी के बाद की शासन व्यवस्था के भीतर पनपते भ्रष्टाचार को प्रकट करती है।यह कहानी इस पंक्ति के साथ खत्म होती है-कहानी समाप्त होते-होते आधुनिक शासन की आलोचना बन गयी।
राष्ट्र निर्माण में भाषा का सवाल भी प्रमुख होता है।विवेकी राय ने भाषा के सवाल पर एक कहानी लिखी है, ‘ए.बी.सी. की बैठक’।यह कहानी भी संस्थानिक निर्माण के भीतर मौजूद औपनिवेशिक दास संस्कृति व वर्णवादी वर्चस्व को उद्घाटित करती है।
यही वर्णवादी वर्चस्व, कृषि संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी है।इसे उनकी कहानी, ‘रावण’, ‘मरछिया’ आदि में देखा जा सकता है।आजादी के बाद अपनाए गये लोकतन्त्र का मुख्य अंतर्विरोध आधुनिकता और वर्णवादी विरासत के द्वन्द्व से उपजता है।नागार्जुन की एक कविता की पंक्ति, तामझाम है लोकतंत्र का/लटका है सामन्ती ताला, से इस अंतर्विरोध को समझना आसान होगा।विवेकी राय  की कहानियों में लोकतंत्र के तामझाम पर लटके सामन्ती ताले के कई सामाजिक-राजनीतिक व सांस्कृतिक सन्दर्भ मौजूद हैं। ‘मांग नहीं सका सोना’, ‘कानून का दिवाला’, ‘अपना सपना’, ‘दमरी की खोज में, ‘अतिथि’, ‘चुनाव-चक्र’, ‘सामलगमला’ आदि कहानियों में यह अच्छे से अभिव्यक्त हुआ है।
गाजीपुर को पूर्वाञ्चल का केरल कहा जाता था।इसे यह विशेषण कम्युनिस्ट व किसान आन्दोलनों के सामाजिक प्रसार के चलते मिला था।कम्युनिस्ट यहां के लिए सिर्फ एक शब्द भर नहीं था, बल्कि यहां के जन-जीवन के यथार्थ में शामिल था।पूर्वाञ्चल की ग्रामीण सामाजिक, राजनीतिक वास्तविकता।विवेकी राय की कहानियों में अभिव्यक्त यथार्थ इसकी ताकीद करता है।विवेकी राय इस मामले में फणीश्वरनाथ ‘रेणु’ से आगे बढ़े हुए किस्सागो हैं।वे इस वास्तविकता को तटस्थ हो कर नहीं देखते, बल्कि सत्ता संस्थानों के भीतर कम्युनिस्टों को ठिकाने लगाने की दुरभि सन्धियों को भी व्यक्त करते हैं।सरकारी राहत लेने जाते गरीबों, दलितों, किसानों को अधिकारी इस बात के लिए दबाव डालते हैं।इस दुरभि सन्धि में अधिकारियों का साथ बड़ी किसान जातियां करती हैं।विवेकी राय की कहानी, ‘चुनाव चक्र’ इस वास्तविकता को बेहद साफगोई से पेश करती है।यह बिना लेखकीय इमानदारी के सम्भव नहीं।इस कहानी का आखिरी संवाद है- ठाकुर राम सिंह कहना चाहते थे कि साहब दौरा पर आये थे पर कह नहीं सके और अनियंत्रित भाव से अचानक उनके मुंह से निकला-
“ये पता लगाने आये थे कि इस गांव में कौन-कौन कम्युनिस्ट पार्टी में है।”
घुरहू ठक रह गया।
विवेकी राय किसान समाज की पिछड़ी चेतना, उसके भीतर के विभाजन, पाखण्ड, आडम्बर आदि को भी इसी इमानदारी की कसौटी से पकड़ पाते हैं।अपने दौर की विकास की राजनीति को भी वे अपने सहज इतिहास बोध से पहचानते हैं और इसे सत्ता की लूट की आड़ बताते हैं।उनकी कहानी ‘सामलगमला’ का यह अंश दृष्टव्य है-
“यह प्रजातंत्र के धोखे की टट्टी एक भारी सामलगमला।चुनाव एक सड़ा हुआ सामलगमला।…खूब खाओ, खूब विकास करो, खूब विनाश करो।एक भारी सामलगमला चक्र।कहां जाओगे बच कर? सारे विकास का निचोड़ लो भूखमरी, लो अकाल, लो महंगाई।…छल, लूट, प्रवंचना, अनैतिकता, घूस…लोग शीशियां ले कर अन्न की दुकानों पर जा पहुंचे।राजा ने उनमें बढ़िया इत्र भरवा दिया।शीशियां भभक उठीं।मशाल जल उठी तब कबीरदास आसमान से उतर आये और मेघ गरज उठे-
कबिरा खड़ा बाजार में लिये लुकाठी हाथ।
जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ।।
सामलगमला दरअसल यथार्थ को एक उलटबासी में बुनती है।इस नाते भी इसमें कबीर आखिर में उतरते हैं, दूसरे जाग्रत विवेक के प्रतीक के रूप में भी आते हैं।विवेकी राय के पास यह जाग्रत विवेक है, जिसकी रौशनी में वे अपने समय और समाज को देखते-परखते हैं।उनके हाथ में यही वह लुकाठा है, जिसे वे आखिर तक थाम्हे रखते हैं।उनकी यह थाती किसी भी सच्चे प्रगतिशील आधुनिक राष्ट्र के निर्माण का सपना देखने वालों के लिए परायी नहीं, बल्कि अपनी है।

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