साम्प्रदायिक मनोवृत्ति से मुक्ति की तलाश

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लखनऊ। समाज में बढ़ते साम्प्रदायिक मनोवृत्ति को कैसे रोका जाये? कैसे नई पीढ़ी में भरी जा रही हिन्दू-मुस्लिम विभाजन, नफरत और भेद-भाव को कम किया जाये, इसी बिन्दु के इर्द-गिर्द शीरोज बतकही की 11वीं कड़ी में रविवार को चर्चा हुई।

बतकही की शुरुआत के पूर्व सुभाष चन्द्र कुशवाहा ने समाज के सामाजिक ताने-बाने की पुरानी समरसता, भाईचारा और मनुुष्यता को कुतरने वाले साम्प्रदायिक जहर पैदा करने वाली कुछ मूल प्रवृत्तियों को सामने रखते हुए बातचीत में शामिल वक्ताओं से अपेक्षा की कि बातचीत को मुख्यतः इस जहर को रोकने के संभव उपाय सुझायें। साम्प्रदायिकता के बदलते स्वरूप से मुकाबला का स्वरूप क्या हो ? या हर संप्रदाय की अलग-अलग कालोनियां और फ्लैट्स, क्या भविष्य के शहर की कई अजनबी दुनिया का निर्माण नहीं करने जा रहे ? और ऐसे में वह दिन सदा के लिए अविश्वास की अंतहीन गुफा ने नहीं समाता दिखता। क्या तब कुछ लोग हमारी बुनियादी जरूरतों को निगल कर अपनी आर्थिक और राजनैतिक हितों को पूरा नहीं कर रहे होंगे? सवाल और भी हैं मगर समाधान ?

बतकही का प्रारम्भ, प्रभात त्रिपाठी ने साम्प्रदायिक मनोवृति के फैलाव पर चिंता व्यक्त करते हुए किया और कहा कि बेहतर दुनिया का निर्माण, देश में धार्मिक प्रवृत्ति के सार्वजनिक प्रदर्शन पर रोक से ही संभव है। धार्मिक प्रदर्शनों का सार्वजनिकीकरण दरअसल राजनैतिक नफा-नुकसान की कुंजी बना लिया जा रहा है । ऐसे में दो विरोधी समुदायों के बीच, एक-दूसरे के प्रति भ्रम, नफरत, अफवाह फैलाकर दूरियां बढ़ाई जाती हैं। दूरियां बढ़ने से सामाजिक एकता टूटती है और सामाजिक एकता टूटने से एक-एक से निबटना आसान होता है । लोगों की आंखों में सवाल नहीं नफरत पनपने लगते हैं। इसे रोकने की दिशा में साम्प्रदायिक मनोवृत्ति को घर में ही नहीं पैदा होने देना है।

उन्होंने कहा कि आज स्कूलों में भी बच्चों को मुसलमानों के प्रति नफरत सिखाई जा रही है। बच्चे घर आकर मुसलमान बच्चों के बारे तमाम विद्वेषभरी बातें करते हैं। आज का मीडिया इस प्रवृत्ति को सुलगा कर अपने बहस को सतही और सनसनीखेज बनाने का काम करता है।

अजय कुमार शर्मा ने कहा कि साम्प्रदायिक समस्या का हल कैसे निकाला जाये, इसका उत्तर समस्या को पैदा करने वाले कारणों से ही तलाशा जाना चाहिए। यह अजीब मनुष्यता विरोधी समय और समाज बनाया जा रहा कि एक-दूसरे समुदाय के प्रति पूर्व धारणाएं तैयार कर ली गई हैं जैसे वे फैक्ट्रियों के उत्पाद हों। यह बहुत ही खतरनाक समय है । ऐसी धारणा का निर्माण करने वाले आसानी से आम जनता का इस्तेमाल अपने हित में करते हैं। हमारी पूरी शिक्षा व्यवस्था साम्प्रदायिक विचारों को पुष्ट करती जान पड़ती है। वहां धर्मांधता, अवैज्ञानिकता और कट्टरता पैदा की जा रही है। आजादी के बाद लगातार इस प्रवृत्ति को बढ़ाया जा रहा है । हमारी जनता प्रबुद्ध, सचेत और विश्लेषण करने की क्षमता से युक्त नहीं हो पाई । यह अकारण नहीं है कि इस देश में बारह वर्ष तक संघर्ष करने वाली एक महिला को उसकी धरती पर महज नब्बे वोट मिलते हैं।

अजय शर्मा के अनुसार साम्प्रदायिकता का मूल मसला सरकारों के हाथ में है। इस कठपुतली की डोर राजनीति के हाथों में है। वे ही साम्प्रदायिकता को फैलने पर रोक लगा सकती हैं मगर खेद का विषय है कि ऐसा नहीं किया जा रहा अपितु इसे और धधकाया जा रहा है। क्या अजीब नहीं लगता कि हमने ऐसा समाज बना दिया है कि एक साथ रहने वाले अचानक दंगों में एक-दूजे के खून के प्यासे बना दिये जाते हैं ? हिन्दू-मुस्लिम लड़के-लड़की का प्यार भी नफरत और हिंसा को हवा देता है। यह कबिलाई समाज, मनुष्यता की डगर पर जाने के पहले ही हिंसा के गड्ढे में गिरा दिया गया है।

उन्होंने कहा कि यह सही है कि आपसी मेल-मिलाप साम्प्रदायिक सौहार्द को मजबूत करता है मगर सवाल तो फिर वही कि यह मेल-मिलाप करेगा कौन ? छुटभैया से लेकर बड़े नेता तक, आपसी मेल-मिलाप के खिलाफ हों तो साम्प्रदाकिता से लड़ना कठित हो जाता है। उनका मानना है कि तमाम दंगों में उन्होंने देखा है कि निम्न जाति के मुसलमानों और निम्न जाति के हिन्दुओं का ही कत्लेआम हुआ है, उन्हीं का विस्थापन भी हुआ है। उच्च वर्ग के हिन्दू और मुसलमान ज्यादातर साम्प्रदायिक दंगों में बचे रहते हैं और बाद में दंगा राहत के नाम पर यही वर्ग सद्भावना कमेटियां बना कर सहायता स्वरूप मिलने वाली धनराशि का दोहन करते हैं।

हसन उस्मानी ने मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र करते हुए बताया कि वहां एक मौलाना से कहा गया कि आप साम्प्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए कुछ कीजिए तो उन्होंने कहा कि जाने दीजिए, आखिर किन मुसलमानों की बात करते हैं ? इनमें से किसी को कलमा पढ़ना तो आता नहीं ? आखिर धर्म गुरुओं की यह सोच अपने वजूद को मजबूती देने के अलावा इंसानियत पसंद नहीं कही जा सकती। उन्होंने कहा कि वहां दंगों में जितने भी राहत कैम्प बने, उन्हें ज्यादातर पीड़ितों ने ही बनाये।

अजय कुमार शर्मा ने उस्मानी जी की बात का समर्थन करते हुए जोड़ा कि मलिकपुरा कैम्प का संचालन उच्च जाति के मुसलमानों के हाथों में था जहां दंगा पीड़ितों के लिए सबसे ज्यादा सहायता आयी। सरकार ने यह घोषणा की कि जो भी दंगा पीड़ितों से शादी करेगा, उसे एक लाख रुपए दिए जायेंगे। इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि तमाम शादियां पैसों के लालच में हुईं और बाद में टूट गईं।

अजय शर्मा का मानना था कि हमारी फिल्में साम्प्रदायिक मानसिकता तैयार करती हैं। आतंकवाद के नाम पर हजारों निर्दोष युवकों को जेल में जाना पड़ा है। इनमें से कुछ, दशकों बाद सबूत के अभाव में मुक्त तो किए गए मगर जो उनका अमूल्य जीवन जेलों में सड़ गया, उसके लिए कौन जिम्मेदार होगा ? हम उन्हें मुआवजा भी नहीं देते। उन्होंने हाल ही में बरेली के दो गांवों के मुसलमानों के पलायन की घटना का उल्लेख किया और बताया कि माल-मवेशियों को दूसरों के भरोसे छोड़कर अपनी सुरक्षा के लिए अन्यत्र पलायन कर जाने की त्रासदी, समाज को कहां ले जा रही है ? उन्होंने बताया कि विस्थापन करने वालों में गर्भवती महिलाएं, विकलांग, बूढ़े और बीमार सभी शामिल थे। उन्होंने कहा कि व्यवस्था के प्रति पूरी तरह अविश्वास पैदा हो जाना, साम्प्रदायिकता को रोकने का विश्वास कैसे पैदा कर पायेगी ? आज मीडिया और तंत्र, जब चाहे, जहां चाहे साम्प्रदायिक हिंसा भड़का सकते हैं। ऐसे में उसे रोकना बहुत आसान नहीं रहा। बुद्धिजीवी और प्रगतिशील समाज, फिलहाल कोई कारगर पहल कर पाने की स्थिति में नहीं है।

हसन उस्मानी ने एक बार फिर अपनी बात को आगे बढ़ाया और कहा कि धर्म के अंदर प्रवेश कर के ही हम साम्प्रदायिक सोच को दूर करने का प्रयास कर सकते हैं। समाज से अलग-थलग पड़कर बहुत कुछ संभव नहीं है। उनका कहना था कि गांधी वाला हिंदू समाज ही साम्प्रदायिकता को रोकने में कारगर होगा। गाय की वर्तमान विस्फोटक स्थिति और संप्रदायिक दंगा भड़काने में उसकी भूमिका जो रची गई है, उस पर चिंता हो रही है।

शिव कुमार मौर्य पहली बार बतकही का हिस्स बने थे। उन्होंने सिलसिलेवार कई महत्वपूर्ण बिन्दुओं को रखा और कहा कि साम्प्रदायिकता का मुख्य कारण धार्मिक ही है। प्रशासनिक और राजनैतिक कारण दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। उनका कहना था कि साम्प्रदायिकता एक सामंती सोच है। जैसे सामंत अपने को राजा, स्वामी और शासक समझते हैं  वैसे ही वे साम्प्रदायिकता के सहारे अपनी ऐंठ बनाये रखना चाहते हैं। उनका श्रेष्ठताबोध, जहर घोलने की राजनीति के लिए उकसाता है। वे उसे अपना हथियार बनाते हैं । आर्थिक कारणों में बेरोजगारी, गरीबी-अमीरी में बहुत बड़ा अंतर, बेकार हाथों को हिंसा भी एक काम सदृश्य बता दिया जा रहा है। धर्मनिरपेक्ष होकर ही साम्प्रदाकिता से लड़ा जा सकता है। यूरोप में जब चर्चों की भूमिका को राजनीति से अलग कर दिया गया तब, साम्प्रदायिक सोच का फैलाव रुका।

उन्होंने कहा कि हमारे यहां यह अजीब बिडंबना है कि हम पंथनिरपेक्ष तो हो सकते हैं मगर धर्मनिरपेक्ष नहीं बन पाते। धर्म एक कड़वी सच्चाई है। लोग सभ्य और वैज्ञानिक रूप से शिक्षित नहीं हो पा रहे। कांवड़ और मुहर्रम जैसे जुलूसों में अशिक्षित या कम पढ़े-लिखों का ही बोलबाला है।
आशा कुशवाहा ने सामाजिक समरसता को बढ़ाने, आपसी सद्भाव बढ़ाने के लिए हिन्दू-मुस्लिमों को एक -दूसरे के घर आने-जाने, बातचीत, मिलना-जुलना शुरु करने की जरूरत पर बल दिया। उनका कहना है कि यह काम नागरिक समाज को करना होगा। राजनैतिक पार्टियां तो नफरत ही फैलायेंगी। स्कूलों में या घरों में बच्चों को यह सिखाना कि मुसलमान आतंकी होते हैं या वे मांस खाते हैं इसलिए हिंसक होते हैं, सामान्य मनोवृत्ति देखी जा रही है। इसे तुरंत बंद किया जाना चाहिए । एक-दूसरे के साथ न घुलने-मिलने से दुर्भावना बढ़ती है। हमें दोनों समुदाय के दुख-दुख में शामिल होना चाहिए । उनके यहां के पर्व-त्योहारों, शादी-ब्याह में भाग लेना चाहिए, इससे साम्प्रदायिक सद्भाव पैदा किया जा सकता है। राजनैतिक पार्टियां, इसके ठीक विपरीत आचरण कर रही हैं और करती रहेंगी। नफरतों के खिलाफ, सामाजिक आंदोलनों के बिना समाज को जोड़ा नहीं जा सकता।

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