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जनमत साहित्य-संस्कृति

आक्रोश और साहित्य: बजरंग बिहारी तिवारी

आक्रोश पुराना शब्द है| पाणिनि के यहाँ (अष्टाध्यायी, 6.3.21) इसका प्रयोग मिलता है- ‘षष्ठया आक्रोशे’| इसका आशय है कि यदि भर्त्सना का भाव हो तो षष्ठी तत्पुरुष समास करने में विभक्ति का लोप नहीं होता| आक्रोश गम्यमान हो तो उत्तरपद रहते षष्ठी विभक्ति का अलुक् होता है जैसे ‘चौरस्य कुलम्’ चोर का खानदान, और अगर आक्रोश गम्यमान न होकर प्रतीत हो अर्थात् सामान्य अर्थ में हो तो अलुक् नहीं होता जैसे ‘ब्राह्मण कुलम्’|
पुराने कोशों में ‘नामलिंगानुशासन’ जिसका प्रचलित नाम ‘अमरकोश’ है में आक्रोश दोष देने के अर्थ में है – ‘तत्वाक्षारणा यः स्यादाक्रोशो मैथुनं प्रति|’ (1.15) –अविहित यौन संबंध विषयक दोष देने का एक नाम आक्षारणा है| आक्रोशन (और अभीषंग) शाप देने के अर्थ में हैं- ‘आक्रोशनमभीषंगः’ (3.6)| ‘अभिधानरत्नमाला’ अर्थात् हलायुधकोश में भी शाप देने, धिक्कारने, गाली देने के अर्थ में आक्रोश की प्रविष्टि है- ‘शाप आक्रोश आक्षेपः क्षारणा…’ (1.149)| आचार्य हेमचन्द्र के ‘अभिधानचिंतामणि’ में ‘आक्षेप’ के चार पर्याय हैं- ‘आक्रोशाभीषंगाक्षेपाः शापः सा क्षारणा रते’ (2.186)| आप्टे के संस्कृत-हिंदी कोश में ‘आक्रोश’ के लगभग सभी अर्थों का संकलन कर दिया गया है| आक्रोश के पुराने प्रयोगों में ‘याज्ञवल्क्यस्मृति’ का यह श्लोक उल्लेखनीय है-“राज्ञोऽनिष्टप्रवक्तारं तस्यैवाक्रोशकारिणम्| तन्मन्त्रस्य च भेत्तारं छित्वा जिह्वा प्रवासयेत||” (प्रकीर्ण प्रकरण, 302) –राजा का अनिष्ट बोलने वाले, राजा की निंदा (आक्रोश) करने वाले तथा उसकी गुप्त बातों को प्रकट करने वाले की जिह्वा काटकर राज्य से निकाल देना चाहिए|
आक्रोश के साथ यह राजनीतिक आशय बाद में भी जुड़ा रहा| कोश से निकलकर आंदोलन के सम्पर्क में आने पर आक्रोश पारिभाषिक पद बनने लगा| यह न्याय की क्षति की रचनात्मक प्रतिक्रिया के प्रकटन का माध्यम हुआ| न्याय की क्षति होता देख पुराना रचनाकार क्षुब्ध होता था| वह अन्याय के तात्कालिक कारण तो समझता था लेकिन इसके ऐतिहासिक कारणों को समझने की पद्धति उसके पास नहीं थी| जाति की जकड़न, वर्गीय शोषण और जेंडरगत उत्पीड़न संस्थागत अन्याय के मुख्य रूप हैं| मार्क्सवादी विचारधारा के आने के बाद अन्याय के स्रोतों का वैज्ञानिक विश्लेषण संभव हुआ| विचारधारा की उपस्थिति या उपलब्धता ने अन्याय के प्रति प्रकट होने वाले क्षोभ को विक्षोभ में परिवर्तित किया| अब न्याय के लिए किसी पराशक्ति से गुहार लगाना बेमानी हो गया| रचनाकार के सामने अन्याय का तंत्र स्पष्ट-सा हो गया और इस तंत्र से मुक्ति की राह अबूझ-अज्ञात न रही| क्रांति के संकेत रचनाओं में उभरने लगे| युग विप्लव गान से गूँज उठा| विक्षोभ काव्य ने न्याय से वंचित उत्पीड़ित समुदाय को भरपूर सांत्वना दी| समस्त उत्पीड़ितों के हृदय से होकर गुजरे पीड़ा के अन्तःसूत्र को पहचानने की दृष्टि दी और अन्यायी तंत्र की समाप्ति का विश्वास जगाकर सर्वहारा की एका की अपरिहार्यता रेखांकित की| इसके बाद उभरे अस्मिताजन्य साहित्यान्दोलन में विक्षोभ काव्य की बहुत सी विशेषताएं बरकरार रहीं| जिस अन्याय को देखकर पूर्ववर्ती रचनाकार विक्षुब्ध होता था अब आक्रोशित होने लगा| विचारधारा की फलश्रुति होने के कारण विक्षोभ का उदय किसी भी संबंधित रचनाकार की चेतना में हो सकता है मगर अस्मिता से निसृत आक्रोश स्वानुभव से बाहर उद्भूत नहीं हो सकता| एक भिन्न प्रसंग में इस दावे की बड़ी अच्छी व्याख्या संत कवि दादू की एक साखी में है- ‘जेहि लागी सो जागि है, बेध्या करै पुकार| दादू पिंजर पीड़ है, सालै बारंबार|’ विचारधारा ‘डिक्लास’ होने की संभावना को ना केवल मान्य करती है वरन इसे प्रोत्साहन भी देती है| अस्मिता ‘डिकास्ट’ होने को लेकर हमेशा सशंकित रहती है और इसे सैद्धांतिक मान्यता देने के पक्ष में नहीं दिखती| ऐसा करने के उसके अनुभवप्रसूत आधार हैं| कंवल भारती की कविता ‘चिड़िया जो मारी गई’ आक्रोश और विक्षोभ के अंतर को भलीभांति प्रस्तुत करती है| कवि विक्षोभी धारा के (मार्क्सवादी) रचनाकार गोरख पाण्डेय की एक कविता के हवाले से स्पष्ट करता है कि संवेदना और दृष्टि का अंतिम निर्धारक जन्म होता है, रचनाकार की सामाजिक-जातिगत श्रेणी ही उसका पक्ष तय करती है- “वह चिड़िया भूख से नहीं/ चिड़िया होने से पीड़ित थी/ कवि इस अनुभव से गुजरा नहीं था/ उसकी श्रेणी जन्म से पूज्य थी/ वह कैसे जानता/ गरीबी नहीं/ सामाजिक बेइज्जती अखरती है?” एक दूसरी कविता ‘पिंजड़े का द्वार खोल देना’ में कंवल भारती यह मानते हैं कि आक्रोश ‘अन्य’ (दलितेतर) के हृदय में पैदा हो सकता है लेकिन वह आक्रोश टिकाऊ नहीं होगा- “शायद ऐसा हो कि तुम्हारे हृदय में/ धधकी हो कोई ज्वाला/ भस्म करने को वर्जनाएं/ कि तभी कोई बदली मर्यादा की/ बरस गयी होगी/ और, तुम्हारा अंतर्मन शीतल हो गया होगा|”
आक्रोश के उद्भव के कारण विक्षोभ-काव्य में मौजूद थे| क्षोभ-कविता में मुक्ति की जो संभावनाएं रची गईं थीं वे वायदे की शक्ल में नहीं थीं| रविदास-कबीर के बेगमपुर या तुलसी के रामराज्य का इंतजार अनंत काल तक किया जा सकता था| विक्षोभ-काव्य के वायदों की प्रकृति कुछ ऐसी थी कि मुक्ति की प्रतीक्षा में बरस-पर-बरस नहीं गंवाए जा सकते थे| तत्काल और सम्पूर्ण मुक्ति का सपना मानवता ने पहली बार देखा था| क्रांति एक परिकल्पना के साथ वास्तविकता भी थी और तमाम देशों में इस क्रांति को साकार होते देखा जा चुका था| उद्विग्नता स्वाभाविक थी| ‘युग की गंगा’ में केदारनाथ अग्रवाल ने लिखा था, “जल उठे हैं तन-बदन से/ क्रोध में शिव के नयन से/ खा गए निशि का अंधेरा/ हो गया खूनी सबेरा|” वास्तविक और आकांक्षित सबेरे में पसरती दूरी बेचैनी का सबब बनी| सबेरा सबके लिए है- यह ‘विश्वास’ मुक्ति चाहने वाले सभी तबकों तक पहुँचा| बहुत जल्दी इस विश्वास की सीमाएं भी प्रकट होने लगीं| दलित और स्त्री के ‘अपने’ प्रश्न यहाँ प्राथमिक नहीं हो सकते थे| क्रांति में इन अस्मिताओं की भूमिका बमुश्किल विचार का विषय बनी| उनकी नेतृत्वकारी भूमिका पर तो स्पष्टता का अभाव था| विप्लव-भाव से आपूरित रचनाकार भी अपने संस्कारों से अभी मुक्त न हो पाए थे| फैज़ की मशहूर नज़्म ‘मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’ का एक मिसरा है- ‘लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजै| अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजै|’ रचनाकार यहाँ स्त्री को (जो उसकी महबूबा है); ‘पारंपरिक’ भूमिका में ही देख रहा है| यथार्थ को देखने और उसे बदलने का सारा जिम्मा क्रांतिकारी पुरुष का है| स्त्री इस मुक्ति-संघर्ष में भागीदार भी हो सकती है, शायर के यहाँ इसकी संभावना नहीं है| प्रगतिवादी आंदोलन के प्रारंभिक दौर में स्त्रियों की बहुत कम मौजूदगी का सवाल बाद में उठाया भी गया| उधर, दलितों को संघर्ष की पहली कतार में होना है मगर उनका प्रतिनिधित्व कोई और कर रहा है| इस प्रतिनिधित्व की विकट सीमाएं हैं| बड़ी ईमानदारी से मुक्तिबोध ने स्वीकारा- “…वह मेहतर मैं हो नहीं पाता/ पर, रोज कोई भीतर चिल्लाता है/ कि कोई काम बुरा नहीं/ बशर्ते कि आदमी खरा हो/ फिर भी मैं उस ओर अपने को ढो नहीं पाता|”
जिस पर दासता का बोझ जितना ज्यादा है उसे उतनी अधिक तवज्जो चाहिए| अपने को प्राथमिकता में न पाकर स्त्री और दलित की ऐसी दबी अस्मिताएं अपना स्वर अलग से बुलंद करती हैं| आक्रोश का कोशगत अर्थ ही है- जोर से बोलना| अस्मिता-आंदोलन ‘आक्रोश’ को नया अर्थ देता है, उसे अवधारणात्मक पद बनाता है| आक्रोश दलित अस्मिता का निर्धारक बिंदु बन जाता है| तात्विक रूप से क्षोभ के मूल में अंतर्दृष्टिपूर्ण विचार है, विक्षोभ के मूल में क्रांतिकारी विचारधारा और आक्रोश के मूल में परिवर्तनकामी चिंतन| क्षोभ बेगमपुरा, कबिलास जैसे स्वप्नलोकों की सृष्टि करता है, विक्षोभ वर्गहीन समाज का यूटोपिया पेश करता है और आक्रोश वर्ण-जातिरहित समाज का खाका सामने रखता है| अपने नए पड़ाव पर आक्रोश डायवर्सिटी वाले समाज की कामना करता दिख रहा है| डायवर्सिटी का आशय है सत्ता-संरचना में अपनी भागीदारी| क्षोभ अपने उद्देश्य-प्राप्ति में प्रेम को सहायक बनाता है, विक्षोभ अपरिहार्य स्थिति में हिंसा का सहारा लेने पर सैद्धांतिक सहमति व्यक्त करता है और आक्रोश अहिंसक आंबेडकरी प्रतिरोध में यकीन करता है|
आक्रोश का स्वरूप समझने के लिए पहली पीढ़ी के तीन प्रमुख दलित रचनाकारों को ध्यान से पढ़ा जाना अपेक्षित है-, मलखान सिंह (1948), ओम प्रकाश वाल्मीकि (1950) और डॉ.सी.बी. भारती (1957)| तीनों के प्रथम कविता-संग्रह थोड़े-थोड़े अंतर पर प्रकाशित हुए| इनका प्रकाशन-काल कवियों के वरिष्ठता-क्रम के अलग रहा| वाल्मीकिजी के संग्रह ने बीते युगों के संचित अनुभवों से साहित्य-जगत को जोड़ा, डॉ.भारती के काव्य-संग्रह से युगांतर की सूचना मिली और मलखान सिंह के संग्रह ने संताप के हेतु को सार्वजनिक किया| इन संग्रहों के शीर्षक ही बहुत-कुछ कह देते हैं- ‘सदियों का संताप’ (1989, ओमप्रकाश वाल्मीकि), ‘आक्रोश’ (1996, डॉ.सी.बी. भारती) और ‘सुनो ब्राह्मण’ (1997, मलखान सिंह)| अपने संग्रह के दूसरे संस्करण की भूमिका में वाल्मीकिजी ने लिखा- “दलित कविता का आक्रोश उसकी पहचान बना|… दलित कविता में आक्रोश उस भोगी हुई वेदना, अपमान और यातना के विरोध में है जिसे दलित समाज हजारों साल की संघर्ष-यात्रा में वहन करता रहा है|” ‘आक्रोश’ की भूमिका डॉ.एन. सिंह ने लिखी है| संग्रह की कविताओं को उन्होंने ‘अग्नि आखर’ कहा है| यह अग्नि ज्वालामुखी की धधकती आग है, बहता हुआ लावा है, दीर्घावधि में संचित अनुभव-खंडों का विस्फोट है| ‘आक्रोश’ के मुखपृष्ठ पर ज्वालामुखी का चित्र है तो वाल्मीकिजी की कविता का शीर्षक ही ‘ज्वालामुखी’ है| यह उनके संग्रह की सबसे पुरानी (मई 1975 में रचित) कविता है| मलखान सिंह के दूसरे संग्रह का शीर्षक ‘ज्वालामुखी के मुहाने’ है| जैसे ज्वालामुखी दाहकता का सीमांत है वैसे दलित ‘आक्रोश’ अनुभवजन्य ताप का| आक्रोश का निर्माण जिन अनुभवों से हुआ है उसके तीन स्तर हैं| पहले स्तर पर भौतिक-सामाजिक हिंसा है| दलित बस्तियों की लूट, बलात्कार और आगजनी जैसे हिंसा के क्रूरतम रूप इसमें शामिल हैं| दूसरे स्तर पर वह अपमान के रूप में है| बल-प्रयोग किए बगैर सरे आम बेइज्जती करना, नीचा दिखाना इसके अंतर्गत आते हैं| पहले कमर में झाड़ू और गले में लटकी हांड़ी इसी उद्देश्य की पूर्ति करती थी| आज इसका स्थान अपमानजनक संबोधनों और जातिसूचक गालीगलौज ने ले लिया है| तीसरे स्तर के अनुभव अवमानना के हैं| जब संकेतों, प्रच्छन्न गतिविधियों और ‘हैसियत’ का अहसास कराने वाले इशारों से अस्मिता पर आघात किया जाता है तो अवमानना का अनुभव होता है| तथाकथित आधुनिक, सभ्य और प्रगतिशील लोग इसके अभ्यासी होते हैं| शहरों की सफेदपोश कालोनियाँ, उच्च शिक्षा संस्थान अवमानना के मुख्य स्थल हैं| सूक्ष्म कायिक चेष्टाओं के साथ ‘परिष्कृत’ भाषिक व्यवहारों में अवमानना के प्रसंग घटित होते हैं| शेष दोनों स्तरों के बरक्स अवमानना के अनुभवों को कानूनी दायरे में लाना खासा मुश्किल होता है| यह आक्रोश का सर्वाधिक प्रसरणशील स्रोत है और नई पीढ़ी के दलित रचनाकारों के सामने कठिन चुनौती का क्षेत्र|
आक्रोश काव्य स्वानुभूति से उपजा है| आंदोलन के साथ स्व की संगति नहीं बैठती इसलिए अस्मिता की भावभूमि पर स्व का अर्थ परिवर्तित है, विस्तारित है| यहाँ स्व स्वायत्त नहीं, वह अपनी सामाजिक अस्मिता के साथ नाभिनालबद्ध है| अस्मिता पर होने वाले हमले उस स्व पर होते हैं| अस्मिता के अनुभव उसके खाते में भी दर्ज होते हैं| यही कारण है कि उस स्व का आक्रोश गहन और व्यापक होता है| इस आक्रोश को वर्तमान में हो रही सवर्ण हिंसा से ईंधन मिलता है| सामुदायिक दमन का दर्द, जुल्म की भट्ठी में झोंक दी गई अस्मिता की दाहकता कवि के आक्रोश को असह्य और असीम बना देती है| मराठी के प्रखर आंबेडकरी कवि वामन निंबालकर की एक कविता का अंश है-
मैंने संभालकर रखे हैं,
गाँव के बाहर की, आँखों में न समाने वाले
फटे हुए अनंत हृदय,
कान के पर्दे फाड़ने वाले माँ-बहनों के
आक्रोश, मैंने संभालकर रखे हैं|
और उन नन्हें बालकों की चीखें,
चिरे हुए पिताओं के चेहरे
सब कुछ मैंने संभालकर रखे हैं हृदय में|
विचारशीलता से पोषित, संवेदनशीलता से निर्मित और आंदोलनधर्मिता से संवलित आक्रोश प्रसरणशील, संक्रामक होता है| ऐसा आक्रोश रच सकने वाले कवि भाषा और वर्चस्व के अंतर्ग्रथन को, इस अंतर्ग्रथन के परिणामों की गहरी समझ रखते हैं| पूर्वग्रहों से भरी भाषा का ‘न्यूट्रलाइजेशन’ हिंसामुक्त समाज की दिशा में निर्णायक कदम होता है| उदात्त आक्रोश के सर्जक यशवंत मनोहर कहते हैं-
मैं शब्दों से उगलने वाला जहर और
जहर भरे शब्दों को पहचानता हूँ
मैं शोषण व्यवस्था का आवरण हटा देता हूँ
जलाता हूँ पहाड़ी अहंता
मैं सशस्त्र वेदना पीड़ितों के निर्णायक संग्राम की
मैं जीवित तड़पती नाड़ी इस बेचैन युग की|
आक्रोश के कवि अपने पुरखों से निरंतर संवाद करते हैं| पुरखौती की अनुभव-संपदा उन्हें समृद्ध करती है लेकिन उनके आक्रोश के ताप को अनगिन गुना बढ़ा भी देती है| ‘मुट्ठी भर चावल’ शीर्षक कविता में ओम प्रकाश वाल्मीकि लिखते हैं- “ओ, मेरे अज्ञात, अनाम पुरखो/ तुम्हारे मूक शब्द/ जल रहे हैं/ दहकती राख की तरह/ राख : जो लगातार काँप रही है/ रोष में भरी हुई|” पुरखौती सामुदायिक स्मृति में समायी हुई है| यह स्मृति विगत अनुभव ही नहीं है, ऐन आज का घटित होता वाकया भी है| यह जिम्मेदारी कवि पर आयद है कि जो अनुभव अब तक शब्द नहीं पा सकें हैं, मुखर हों; जो पुरखे सुने नहीं गए हैं, ध्यान से सुने जाएं| वाल्मीकि जी की चर्चित कविता ‘बस्स! बहुत हो चुका’ की पंक्तियाँ हैं- “गहरी पथरीली नदी में/ असंख्य मूक पीड़ाएं/ कसमसा रही हैं/ मुखर होने के लिए, रोष से भरी हुई|”
आक्रोश का एक प्रमुख स्रोत मिथक हैं| ये मिथक भेदभाव, उत्पीड़न और षड्यंत्र की वर्चस्वी कारस्तानियों को बखूबी दर्शाते हैं| अस्मिताएँ अपने निर्माण और विस्तार के लिए, अपने लक्ष्य-निर्धारण और उनकी वैधता के लिए इन मिथकों का खूब उपयोग करती हैं| लेखन और भाषण दोनों में मिथकों के भरपूर संदर्भ आते हैं| आक्रोश का चरम इन मिथकीय प्रसंगों के पुनर्कथन में नजर आता है| तीक्ष्ण मराठी कवि त्रयंबक सपकाले की एक कविता में भारतीय तथा यूरोपीय मिथक मिलकर प्रतिबद्ध रचनाकार के विस्फोटक आक्रोश को इस तरह व्यक्त करते हैं-
जनम देते ही तूने अपने जीवन प्रवाह से मुक्त किया,
हे भारत माँ! तूने मुझे प्रेम वात्सल्य कब दिया?
इस काल के प्रवाह में मैं कर्ण न बनकर,
इडीपस होकर तुम्हारी शैया पर आ गया
… … तो मैं क्या करूँ?”
क्षोभ-काव्य आत्म-ग्लानि पैदा करके आत्म-प्रक्षालन के उद्देश्य से संचालित था| विक्षोभ कविता में यह ग्लानि-बोध के रूप में जारी रहा| मेहतर न हो पाने की मुक्तिबोध की पीड़ा ग्लानिबोध से उपजी है| जब मेहतर स्वयं लिखने लगे तो वह ग्लानि की सृष्टि क्यों करेगा? आक्रोश का साहित्य इसीलिए अधिकार बोध को जन्म देता है| उसे कतई उम्मीद नहीं कि ‘सवर्ण’ अपना हृदय परिवर्तन करेंगे| वह शिक्षा, संगठन और संघर्ष के जरिए अधिकार बोध पैदाकर अपने समुदाय को अधिकारसम्पन्न बनाने के उद्देश्य से लिखता है| आक्रोश के कवि को पता है कि प्रभुत्वशाली लोग अपना कब्ज़ा नहीं छोड़ेंगे इसलिए वह अधिकारों को छीन लेने का आह्वान करता है- “मेरी पीढ़ी ने अपने सीने पर/ खोद लिया है संघर्ष/ जहाँ आंसुओं का सैलाब नहीं/ विद्रोह की चिंगारी फूटेगी/ जलती झोपड़ी से उठते धुएँ में/ तनी मुट्ठियाँ/ तुम्हारे तहखानों में नया इतिहास रचेंगी|” (वाल्मीकि)
अपनी अभिव्यक्ति के संबंध में क्षोभ के कवि हमेशा सशंकित प्रतीत होते हैं| जो कहना है, जो कहा जा सकता है और जो कहा जा रहा है इन तीनों स्तरों पर उन्हें अपने असामर्थ्य का, भाषा की अक्षमता का और रचना-प्रक्रिया की पेचीदगियों का बोध है| ‘ऐसो कछु अनुभौ कहत न आवै’ (रविदास) ‘हरुआ कहूँ तो बहु डरूं, गरुआ कहूँ तो झूठ|’ (कबीर), ‘जिमि मुँह मुकुर मुकुर निज पानी| गहि न जाय अस अदभुत बानी|’ या ‘उर अनुभवति न कहि सक सोई| कवन प्रकार कहै कबि कोई||’ (तुलसी)| जो कहना है उसे ठीक-ठीक कहा नहीं जा सकता- क्षोभ-काव्य में यह बोध बहुत गहरा था| विक्षोभ कवियों में यह बोध क्षीण हुआ| विचारधारा उन्हें अभिव्यक्ति के असमंजस में पड़ने से बचाती है| तब भी ‘परम अभिव्यक्ति’ को लेकर मुक्तिबोध जैसे कवियों में दुविधा देखी जा सकती है| आक्रोश के कवि में अपनी अभिव्यक्ति को लेकर कोई शंका नहीं है| कारण यह कि वे अनुभूति नहीं, अनुभव के रचनाकार हैं| अनुभव को किसी प्रक्रिया से गुजारे बगैर व्यक्त किया जाना है| प्रक्रिया से गुजारना ही ‘कलात्मक अभिव्यक्ति’ है| इससे आक्रोश के कवि दूरी बनाकर चलते हैं| वे आत्मकथा लिखते हैं| उस विधा के अतिरिक्त अन्य विधाएँ भी आत्मकथा का ही वहन करती हैं| स्वकथन का क्षेत्र ऊहापोह से परे है| यह निर्द्वंद्व और निर्भ्रांत अभिव्यक्ति का क्षेत्र है|
क्षोभ कविता को किसी काव्यशास्त्र की आवश्यकता नहीं है| उसका शास्त्र उसी में घुला हुआ, समाया हुआ है| विक्षोभ-काव्य साहित्यशास्त्र के प्रति उदासीन दिखता है| उसे भूख, गरीबी और शोषण का यथार्थ चित्रण करते हुए क्रांति की तरफ बढ़ना है| यह विचित्र लग सकता है कि आक्रोश का लेखक प्रारंभ से सौंदर्यशास्त्र की जरूरत महसूस करने लगता है, उसकी माँग करने लगता है और किसी ‘शास्त्री’ की प्रतीक्षा किए बगैर स्वयं ही सौंदर्यशास्त्र की रचना करने लगता है| दोनों शुरुआती कवियों डॉ. सी.बी. भारती और ओमप्रकाश वाल्मीकि ने दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र लिखा है| अगर इसे जल्दबाजी माना जाए तो इसकी बड़ी वजह जातिवादी कुपाठ या अपपाठ से दलित रचनात्मकता को बचाना है| अंतस में पैठे पर बाहर से न दिखते वर्णवादी संस्कारों से दलित रचनाकारों का खूब साबका है| वे बाहरी कसौटियों से जाँचे जाने को कतई प्रस्तुत नहीं हैं|

शक्ति या सत्ता के संदर्भ में तीनों युगों की तुलना विचारणीय विषय है| सत्ता से टकराते हुए क्षोभ-काव्य शक्ति के अंत की कामना करता है| वह सत्ता का विसर्जन चाहता है| सत्ता का उच्छेद ही न्याय की गारंटी है| विक्षोभ-काव्य सत्ता केंद्रों का समापन कर श्रमशील जनता में शक्ति के विलय का कामना करता है| सत्ता-प्रतिष्ठानों की निरंतरता शोषण और अन्याय का सातत्य है| अकूत निजी संपत्ति का अधिकार न्याय की संभावना को छिन्न-भिन्न करता चलता है| विक्षोभी विचारधारा निजी संपत्ति से लेकर वृहत्तर या सांस्थानिक केन्द्रीकरणों के विरुद्ध खड़ी होती है| राज्य के अंत की कामना इसी का प्रतिफल है| आक्रोश-काव्य भी अन्याय के मूल में शक्ति का केन्द्रीकरण पाता है| हाशिए की अस्मिताओं का दमन इसलिए होता रहा है कि सत्ता ‘उनके’ हाथों में, उनकी संस्थाओं में केन्द्रित रही है| आक्रोश काव्य चाहता है कि इस अपमानकारक संरचना को यथाशीघ्र बेदखल किया जाए| समतामूलक संरचना का निर्माण हो| जब तक यह नहीं होता तब तक शक्तितंत्र में दलितों की हिस्सेदारी सुनिश्चित की जाए| संक्रमण के दौर में आक्रोश के कवि को सत्ता का संचय काम्य है| इस समय उसे सत्ता का अधिग्रहण और शक्ति का केन्द्रीकरण करना है| शक्ति-प्रणाली के विघटन की जगह फिलहाल वह उस प्रणाली की बागडोर अपने हाथों में रखना चाहता है| इस ‘फिलहाल’ की समय सीमा का अभी कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता| डायवर्सिटी की कामना ने यूटोपिया को ओझल कर रखा है| सत्तातंत्र राजनीति का अनुगामी प्रतीत होता है| तब, सत्ता की राजनीति को ही क्यों न साधा जाए! मुक्तिद्वार पर लगे तमाम तालों को खोलने के लिए ‘गुरु किल्ली’ यही है| अपने पूर्ववर्ती युगों से आक्रोश युग का यह उल्लेखनीय अंतर है|
हाशिए की अस्मिताएं अपमानित की जाती रही हैं| इन अस्मिताओं के प्रतिनिधि रचनाकार दृश्य-अदृश्य अपमान से निरंतर जूझते हैं| वे अपनी अस्मिता के लिए भरपूर सम्मान चाहते हैं| अपने सृजन की प्रतिष्ठा चाहते हैं| यह प्रतिष्ठा प्रकारांतर से उनके समुदाय का सम्मान भी है| दलित आत्मकथाओं के प्रथम भाग में अपमान के ब्योरे भरे पड़े हैं तो दूसरे भाग में परिवर्तन की प्रक्रिया आकार लेती हुई दिखाई देती है| इस परिवर्तन में उनकी लिखे का सम्मान, उनके लेखकीय व्यक्तित्व की प्रतिष्ठा भी शामिल है| आत्मकथाओं में वे स्थल थोड़े आत्मसंतोष के साथ लिखे गए हैं जहाँ उनकी बात सुनी गई, उनके लिखे का सम्मान हुआ या उन्हें पुरस्कार आदि मिले| अपनी उपलब्धियों को दर्ज़ करने की यह प्रवृत्ति आत्मकथा विधा के अनुकूल भी है| इस धारा की कुछ कविताओं में भी यह बात दिखाई देती है| विक्षोभ-काव्य के रचनाकारों ने आत्मप्रतिष्ठा का प्रश्न पर प्रायः मौन अख्तियार किया है| इसका एक कारण उनकी सामाजिक, जातिगत पृष्ठभूमि है| दूसरा बड़ा कारण साम्यवादी विचारधारा है जो वैयक्तिक प्रतिष्ठा को वर्जनीय मानती है| मुक्तिबोध कीर्ति-व्यवसायी नहीं होना चाहते| वे यश की व्यर्थता का रेखांकन करते हैं| केदारनाथ अग्रवाल सृजन की शक्ति को इस तरह देखते हैं- “मुझे प्राप्त है जनता का बल, वह मेरी कविता का बल है|” शमशेर मजदूर-किसान की आवाज को ही कवि ठहरा देते हैं और आत्मकेन्द्रित कवि को सलाह देते हैं- “वह मजदूर किसानों के स्वर कठिन हठी/ कवि है, उनमें अपना हृदय मिलाओ!/ उनके मिट्टी के तन में है अधिक आग,/ है अधिक ताप!/ उसमें कवि है,/ अपने विरह मिलन के पाप जलाओ!” आत्मप्रतिष्ठा के मुद्दे पर क्षोभ-काव्य के रचनाकार सर्वाधिक स्पष्ट और मुखर हैं| इनमें सबसे ओजस्वी स्वर संत रविदास का है| वे कहते हैं कि उनकी भक्ति प्रतिष्ठा की आकांक्षा, बड़ाई की कामना का निवारण करने वाली है- “आइ भगति तब गई बड़ाई|” लोकप्रतिष्ठा को तो उन्होंने पतन का हेतु माना है- “अब मेरी बूड़ी रे भाई, ताते चढ़ी लोक बड़ाई|” बड़े काव्यात्मक लहजे में कबीर कहते हैं कि प्रतिष्ठा, सम्मान, प्रशंसा कूड़े की तरह है| यह कूड़ा जितना बढ़ता जाता है उसमें बूड़ने की आशंका उतनी बलवती होती जाती है- “कूड़ बड़ाई बूड़िसी भारी पड़िसी काल्हि|”

 

(बजरंग बिहारी तिवारी भारतीय दलित आंदोलन और साहित्य के गंभीर अध्येता के रूप में चर्चित हैं. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख. वर्ष 2004 से दिल्ली से प्रकाशित हिंदी मासिक ‘कथादेश’ में दलित प्रश्न शीर्षक स्तंभ लेखन. दिल्ली के देशबंधु महाविद्यालय में अध्यापन. बजरंग जी का उपरोक्त लेख हाल ही में ‘कथादेश’ में भी प्रकाशित हुआ है. )

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