‘ यह तश्ना की है गज़ल, इस शायरी में गाने-बजाने को कुछ नही ’

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तश्ना आलमी की याद में लखनऊ में सजी गज़लों की शाम

लखनऊ । तश्ना आलमी की शायरी गहरे तक छूती है। ऐसा लगता है कि एक शायर वंचितों की पीड़ा देख रहा है और उन तक पहुंचा रहा है। हम उस सबसे बड़े लोकतंत्र में हैं जहां आज भी न जाने कितने गरीब एक वक्त का फांका करके सोते हैं। यहां आज भी महिलाएं सर पर मैला उठाने को विवश हैं। ऐसे माहौल में चुप रहना भी जालिम की मदद करने जैसा है। अगर हम तश्ना को सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो हमे प्रतिरोध की आवाज उठानी होगी। भले ही वो आवाज मामूली हो लेकिन हमें आवाज उठानी होगी। हमे साम्प्रदायिक हिंसा, जातिवाद, अस्पृश्यता और आर्थिक असमानता के खिलाफ बोलना पड़ेगा जो कि आज के दौर में कवि के ऊपर बड़ी जिम्मेदारी है।

यह बातें उर्दू के मशहूर शायर तश्ना आलमी की याद में जन संस्कृति मंच की ओर से शनिवार शाम 3 फरवरी को राजधानी लखनऊ के हजरतगंज स्थित माकपा कार्यालय में ‘गजलों की एक शाम’ के अवसर पर बतौर मुख्य अतिथि बोलते हुए सोशल एक्टिविस्ट ताहिरा हसन ने कहीं।

इस मौके पर सुल्तानपुर से आये डी एम मिश्र ने कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए सबसे पहले तश्ना आलमी को याद करते हुए गजल ‘मिट्टी का जिस्म है तो ये मिट्टी में मिलेगा’ सुनाई। आगे उन्होंने अपनी नज्म ‘बुझे न प्यास तो फिर सामने नदी क्यों है, अंधेरा जब मुकद्दर बनके बैठ जाता है’ सुनाकर खूब वाहवाही पायी । आगे उन्होंने ‘ झोपड़ी हो या किसी हवेली में, सभी उलझे हैं किसी पहेली में ’ और ‘ झूठ को भी सच बताया जा रहा है ’ सुनाकर महफिल को तालियां बजाने को मजबूर कर दिया।

 

इसी क्रम में जलेस के राज्य सचिव, कवि-आलोचक नलिन रंजन ने अपनी रचना ‘जिधर देखिये धोखे का बाजार सजा है भाई जी’ सुनाई तो रिजवान फारुखी ने ‘ दिल में जो जख्म है वो सबको दिखाएं कैसे ’ सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।

 

कार्यक्रम आगे बढ़ा तो संजय मिश्रा शौक ने अपनी गजल- किसी भी दिन वो झूठी शान से बाहर नही आते तथा तू कहेगा तो तेरी राह से हट जाऊंगा सुनाई। आगे मेहंदी अब्बास रिजवी ने उदासियों में सिसकता हुआ समा देखा तो   नदीम ने  जिसकी जानिब हैं, उसके ही जानिबदार रहें सुनाई। बाद में जब वरिष्ठ कवि डंडा लखनवी ने क्या देश का नजारा, लाहौल विला कूवत ’ सुनाई तो माहौल बदल गया। उन्होंने अपनी एक और नज्म जहां व्यवस्था लंगड़ी लूली होती है  सुनाकर महफिल को वापस मूल विमर्श पर ला खड़ा किया।

मुशायरे में साबिरा हबीब, गजाना अनवर, तुकाराम वर्मा, युवा शायर संदीप व नूर आलम के साथ-साथ अनिल श्रीवास्तव ने भी अपनी रचनाओं से खूब समा बांधा। कार्यक्रम का संचालन अली सागर ने किया।

कार्यक्रम की शुरुआत में जसम के प्रदेश अध्यक्ष कौशल किशोर ने तश्ना आलमी को याद करते हुए कहा कि तश्ना आलमी मुशायरों के नहीं आम लोगों के शायर थे। वे दुष्यन्त, अदम और गोरख पाण्डेय की परम्परा में आते हैं। उनकी शायरी प्रेम, संघर्ष व श्रम से मिलकर बनी है। इसमें श्रम का सौंदर्य है। उन्होंने समाज की बुराइयों, शोषण की दारुण स्थितियों, गरीबी, जातिगत भेदभाव, सांप्रदायिकता जैसी समस्याओं को उभारा है। उनकी शायरी आम आदमी की दशा व दुर्दशा से ही नहीं, उसके अन्दर की ताकत से परिचित कराती है। यह तश्ना की ‘तश्नगी’ है जो पाठक व श्रोता को तश्ना के सफर का हमराह बनाती है। उनकी शायरी में सहजता ऐसी कि वह लोगों की जुबान पर बहुत जल्दी चढ जाती। इसमें एक तरफ इंकलाब है तो वहीं उसमें प्रेम व करुणा भी भरपूर है। वे इन्हें जीते हैं और अपनी शायरी में रचते हैं।

भगवान स्वरूप कटियार ने सभी को धन्यवाद ज्ञापित किया और कहा कि यह हिन्दी व उर्दू के रचनाकारों की एकता तथा उसकी साझी रिवायत को आगे बढ़ाने की दिशा में एक शुरुआत है। इस अवसर पर सुभाष राय, अजय सिंह, उषा राय, विमल किशोर, रामकठिन सिंह, अनीता श्रीवास्तव, कल्पना पाण्डेय, आशीष सिंह, श्याम अंकुरम, मधुसूदन मगन, के के शुक्ल, राजीव गुप्ता सहित राजधानी के तमाम साहित्यप्रेमी उपस्थित रहे।

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