Image default
शख्सियत

वीरेन डंगवाल: आधुनिकता का लोककवि

हिंदी के महत्वपूर्ण कवि वीरेन डंगवाल का आज जन्मदिन है। वह आज हमारे बीच होते तो 73 बरस के होते। वीरेन डंगवाल के जन्मदिन पर समकालीन जनमत उनकी स्मृति में विभिन्न विधाओं में सामग्री प्रकाशित कर रहा है। इसी कड़ी में प्रस्तुत है रवींद्र त्रिपाठी का यह लेख:सं।)


वीरेन डंगवाल (जिनका संपूर्ण काव्य संकलन `नवारुण’ से `कविता वीरेन’ नाम से प्रकाशित हुआ है) को अगर `आधुनिकता का लोककवि’ कहा जाए तो कइयों के मन में सवाल और संदेह पैदा होंगे। कुछ कारणों से ऐसा स्वाभाविक भी होगा। खासकर इस वजह से कि हिंदी की दुनिया में आधुनिकता अपने में समस्यामूलक अवधारणा है। हालांकि इसका साहित्य की आलोचना में काफी इस्तेमाल होता है पर इसके कई आशय हैं। कुछ सहृदयों के लिए कबीर भी आधुनिक हैं, जयशंकर प्रसाद भी और मुक्तिबोध भी। तीनो के समय अलग अलग हैं। इसका तात्पर्य ये हुआ कि आधुनिकता कोई समयबद्ध अवधारणा नहीं है। कम से कम हिंदी में। पश्चिम में आधुनिकता मोटे तौर पर औद्योगिक क्रांति के बाद की अवधारणा मानी जाती है। पर हिंदी में आप चाहे जिस काल के कवि को आधुनिक कह दीजिए कोई बवाल नहीं खड़ा होगा। अपने अपने तर्क हैं। इसके बावजूद आधुनिकता हमारे लिए एक सकारात्मक मूल्य है। क्योँ? इसलिए कि वह हमें तरह तरह की जड़ पारंपरिक धारणाओं से मुक्त करती है। चाहे कोई आलोचक किसी प्रसंग में उसका उल्लेख करे, कहीं न कहीं उसमें ये अर्थ निहित रहता है कि आधुनिकता जड़  हो चुके पारंपरिक मूल्यों के खिलाफ है।

फिर भी आधुनिकता में लोकतत्व का मेल कराने से कुछ लोगों को परहेज हो सकता है। आखिर लोक साहित्य, लोक कला या लोक संगीत पूर्व औद्योगिक समाज की चीजें मानी जाती हैं। इसलिए किसी को `आधुनिकता का लोककवि’ कहना शब्दों की जुगाली भी माना जा सकता है। इसके बावजूद अगर मैं वीरेन डंगवाल को `आधुनिकता का लोककवि’ कह रहा हूं तो उसके कारण हैं।

शब्दों में निहित अर्थों और अवधारणों का विकास भी होता है। वीरेन इस अर्थ में `आधुनिकता के लोककवि’ हैं कि उनके यहां जिसे आम तौर पर लोकस्वर या लोक परंपरा कहा जाता है, उसकी नई छटाएं है। यानी वे किसी लोक स्वर, लोक कविता या लोक परंपरा को नए समकालीन और आधुनिक सांचे में ढालकर वर्तमान से जोड़ देते हैं। इस तरह कि हमारे मौजूदा समय और समाज की पेचीदगियां भी वहां उपस्थित हो जाती हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो लोक मिजाज आधुनिक मिजाज में घुल जाता है। पर दोनों घुल कर एक नहीं हो जाते। दोनों की अपनी इयत्ता भी बनी रहती है। इसे पूरी तरह तो नहीं लेकिन कुछ कुछ बर्टोल्ट ब्रेष्ट वाली प्रक्रिया कह सकते है। ब्रेष्ट के यहां अनुभूति की प्रगाढ़ता भी रहती है और उससे अलगाव भी रहता है। पूरी तरह तो नहीं लेकिन कहीं कहीं वीरेन की कुछ कविताओं में भी ऐसा होता है।

लोक स्मृति और आधुनिक समय के इस अतर्संबंध की कई कविताएं वीरेन के यहां है। लंबे नाम वाली उनकी एक लंबी कविता, `परिकल्पित कथालोकांतर काव्य नाटिका नौरात, शिवदास और सिरी भोग वगैरह’ ( जो हिंदी के दिवंगत लेखक शैलेश मटियानी और उत्तराखंड के लोक गायक गिरीश तिवाड़ी `गिर्दा’ को समर्पित है) एक लोक परंपरा का पुनराख्यान भी है और उसकी निर्मम पड़ताल भी। कविता तीन हिस्सों में है। पहले में उस कर्मकांड की झलक है जो नवरात्र पर होता हैं पर यहीं पर कवि उस बकरे की व्यथा और चाहत को दिखाता है जिसकी बलि दी जानेवाली है। बकरा भागकर उस `रशीद मियां के बाड़े में’ पहुंचना चाहता है जहां से उसे खरीदकर लाया गया था। `क्षेपक-1’ वाले अंश में उस लखूदास दर्जी की कहानी है जिससे एक रानी प्यार करने लगती है और उसे एक नौलखा हार देना चाहती है; ये देखकर राजा आगबबूला हो जाता है और उसे मारना चाहता है। लखूदास वहां से भाग जाता है। `क्षेपक-2’ वाले हिस्से में उसी लखूदास का बेटा शिवदास नौरात (नवरात्र) के आयोजन में दमामे पर बैठा है और एक नया गीत गाने को सोचना है और फिर गाता भी है। उस नए गीत बोल इस तरह के हैं-
राज्जो, बजीरों का, शास्त्रों-पुरानों का नाश हो
जिन्होंने हमें गुलाम बनाया।
इन तैंतीस करोड़ देवताओं का नाश हो
जो अपनी आत्मा जमाएं बैठे हैं
हिमालय की बर्फीली चोटियों में,
और हमारे मनों में।
अरे सुनो डूमो, धुनारो, लुहारो, दर्जियो, कारीगरो, मजरो
कितना सताया तुम्हे- हमें
इन पोथियों-पोथियारों, ताकतवालों ने
इनका नाश हो
चलो मिलकर करते हैं इन पर घटाटोप

इस पर अलग से बल देने की आवश्यकता नहीं रह जाती कि वीरेन डंगवाल बिल्कुल लोक कवि के अंदाज में पुराने रीति रिवाजों के ढकोसलों को ध्वस्त करने का आह्वान करते हैं। ऐसे कवि को `आधुनिकता का लोककवि’ न कहा जाए तो और क्या कहा जाए?
ऐसी भंगिमाएं वीरेन की कई अन्य कविताओं में हैं। जैसे `घुटनो घुटनों भात हो मालिक’ में वे उत्तराखंड के एक पुराने लोकगीत को नया मोड़ दे देते हैं। `ऊधो, मोहि ब्रज’ को भी लीजिए। हालांकि ये लोक कविता से संबंधित नहीं है और सूरदास की एक कविता का अंश है। लेकिन ये लोक चेतना में घुली हुई है। इसके शीर्षक से ही ये व्यंजित हो जाता है कि जैसे कृष्ण मथुरा जाकर ब्रज को नहीं भूल पा रहे थे वैसे कवि भी अपने `ब्रज’ को विस्मृत नहीं कर पा रहा है। कवि का `ब्रज’ वृंदावन नहीं इलाहाबाद है। ये कविता भोजपुरी के किसी पुराने लोकगीत की तरह शुरू होती है :

गोड़ रहीं माई ओ मउसी ऊ देखो
आपन-आपन बालू के खेत
कहां को बिलाए ओ बेटवा बताओ
सिगरे बस रेत ही रेत
अनवरसिटी हिरानी हे भइया
हेराना सटेशन परयाग
जाने केधर गै ऊ सिविल लैनवा
किन बैरन लगाई ई आग
इलाहाबाद, कई अन्य शहरों की तरह, बदल गया। ये किस तरह का बदलाव है? वीरेन कहते हैं-
अब बगुले हैं या पंडे हैं या कउए हैं या हैं वकील
या नर्सिंग होम, नए युग की बेहूदा पर मुश्किल दलील

जैसे- जैसे कविता आगे बढ़ती है कवि की भाषा और स्वर बदल जाते हैं। शुरूआती अंश में वीरेन लोककवि की शैली में अपनी बात कहते हैं पर आगे चलकर वे तथ्य़ात्मक हो जाते हैं, एक पत्रकार या समाजशास्त्री के रिपोर्ट की तरह कविता वस्तुस्थिति का बयान करने करती है। ये दोनों अंश कहन की दो शैलियां भर नहीं हैं बल्कि यहां नगरीय बदलाव की प्रकृति का बयान भी है। जिस शहर में कभी (तुलनात्मक रूप से सही) सहजता संभव थी वहां भयाक्रांत कर देने वाली चालाक संश्लिष्टता ताकतवर हो गई है।

जिसे `सेंस ऑफ ह्यूमर’ कहते हैं, यानी हास्यबोध, वह भी वीरेन डंगवाल का अलबेला है। कई बार ऐसा होता है कि एक संजीदा सी लगने वाली बात कही जा रही होती है, फिर अचानक ही कवि उसमें हास्य की छौंक लगा देता है। और इसके साथ ही कविता का मिजाज बदल जाता है। हालांकि इससे कविता की गंभीरता में फर्क नहीं पड़ता लेकिन उसमें एक विडंबना बोध पैदा होता है। दो अंसबद्ध भाव एक दूसरे को काटते हुए और साथ ही एक दूसरे को समृद्ध करते हुए नया भावबोध रचते हैं। `कवि’ की ये पंक्तियां देखिए-

मैं ग्रीष्म की तेजस्विता हूं
और गुठली जैसा
छिपा शरद का ऊष्म ताप
मैं हूं वसंत का सुखद अकेलापन
जेब में गहरी पड़ी मूंगफली को छांट कर
चबाता फुरसत से
मैं चेकदार कपड़े की कमीज हूं

अब देखिए न, जो अपने को `ग्रीष्म की तेजस्विता’ और `शरद का ऊष्म ताप’ कह रहा है वही आगे की पक्तियों में `मूंगफली चबाने’ की बात कर रहा है और अपने को `चेकदार कपड़े की कमीज’ के साथ प्रस्तुत कर रहा है। ये है वीरेन डंगवाल का विडंबनायुक्त हास्य बोध जिसमें गंभीरता का लबादा फेंक कर कवि अपनी आत्मछवि को ही खंडित कर देता है। यहां कुछ लेखकों-कवियों में पायी जानेवाली आत्मरति की प्रवृत्ति पर करारा चोट भी है कि काहे अपने को तीसमार खां समझते हो। वीरेन के पास जो विनोद प्रियता है वह समकालीन हिंदी कविता में नितांत मौलिक है। असद जैदी अकेले अपवाद हैं जिन्होंने इस तरह की विडंबना मिश्रित हास्यबोध की कुछ कविताएं लिखी हैं।

वीरेन कुछ कविताओं में हास्य का एक खांचा भी विकसित करते हैं और उसके सहारे कोई चाहे तो हंसी के अपने निजी संस्करण भी बना सकता है। जैसे `कुछ नयी कसमें’। इसमें कई तरह की कसमें हैं-

कविता लिखना न आया न कभी आयेगा ही मुझे
फिर भी लेता हूं फूलमती तिराहे की कसम
चमेली की बगिया की कसम
पुल बंगश की कसम
सिविल लैन इलाहाबाद की कसम
सेमल की रुई जैसे फुरफुर कोहरे से भरे
नैनीताल की कसम
जो चीज तू हैं कोई और नहीं।

इनके आधार पर आप चाहें तो अपनी मौलिक कसमें भी बना सकते हैं। या खा सकते हैं। ऐसे में कोई आलोचक ये पूछ भी सकता है कि `भैये, इममें कविता किधर विराजमान है? यहां तो कसमें ही कसमें है’। इस सवाल के जवाब में मैं `अकविता’ की कसम खाकर कह सकता हूं कविता कभी कभी आवारा भी बन जाती है और इधर उधर चली जाती है। मगर ये आवारापन कविता से कवित्व को नहीं छीन लेता। शायद ये कहना भी प्रासंगिक होगा कि कविता का एक गुण उसका यदाकदा आवारा या शरारती होना भी है।

कविता को समझने और उसका आस्वाद लेने का एक स्रोत कवि का जीवन भी है। चित्रकार और कथाकार अशोक भौमिक (जिनका वीरेन ने एक कविता में उल्लेख भी हुआ है) के जनसत्ता अपार्टेमेंट्स वाले आवास पर हुई एक गोष्ठी में वरिष्ठ पत्रकार और वीरेनजी के मित्र रहे मनोहर नायक (जिनको कुछ लोगों के साथ याद करते हुए वीरेन ने एक कविता भी लिखी है) ने एक संस्मरण सुनाया था। ये कवि की अनौपचारिक जीवन शैली के बारे में था। ये तब का किस्सा है जब वीरेन इलाहाबाद में अपने शोध (पीचडी) के सिलसिले में रहते थे। तब मनोहर नायक इलाहाबाद से निकलने वाले अखबार `अमृत प्रभात’ ( जो अब बंद हो गया है) में काम करते थे। दोनों की जबर्दस्त दोस्ती थी। उस दौरान वीरेन जी कभी कभार ही सही, पर निरंतरता के साथ, मनोहर नायक को साथ लिए मटरगश्ती के लिए रेलवे स्टेशन पर चले जाते थे और रात भर वहीं रहते। इलाहाबाद शहर में तीन रेलवे स्टेशन हैं – इलाहाबाद, प्रयाग और रामबाग। मटरगश्ती और रात्रिभ्रमण अलग अलग रातों में तीनों स्टेशनों पर क्रमश: होते रहते थे। यानी कभी एक स्टेशन पर तो कभी दूसरे औऱ तीसरे पर। घर से दोनों लोग कमीज और लुंगी पहने निकलते और स्टेशन पर आती-जाती पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनों को और उनसे उतरती और उन पर चढ़ती सवारियों का अवलोकन करने के बाद किसी बेंच या फुटपाथ पर सो भी जाते थे। सबेर वहीं दातौन करते और किसी गुमटी पर चाय पीते। नाश्ता वगैरह भी। एक बार ऐसा हुआ कि दोनों जब इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर सबेरे के समय यानी जागने के बाद खोमचे वाले के यहां चाय पी रहे थे तभी वीरेन जी के बड़े साढ़ू स्टेशन पर नीलांचल एक्सप्रेस से उतरे। वीरेन जी ने बड़े साढ़ू को देखा और बड़े साढू ने छोटे को। वीरेन जी झेंपे और वहां होने के बारे मे उधर उधर की बातें करते हुए सफाई दी। पर खुलासा हो गया कि वीरेन वहां मटरगश्ती कर रहे थे।

अत: ये सिर्फ संयोग नहीं है कि वीरेन ने रेल और रेलवे स्टेशनों से जुड़ी कई कवितां लिखी हैं; जैसे `रात गाड़ी’ `स्टेशन पर फेरी वाले की आवाजें’,`भाप इंजन’, `डीजल इंजन’, `रेल का विकट खेल’ `चारबाग स्टेशन : प्लेटफॉर्म नं 7’। रेल उनके लिए सामान्य लोगों की जिंदगी को देखने और अनुभव करने का एक अहम माध्यम भी था। और उनकी काव्यचेतना का एक अविभाज्य हिस्सा भी। कई चित्रकार जनजीवन के दृश्यात्मक पहलुओं को देखने- समझने के लिए पेंसिल तथा स्केचबुक लेकर उन स्थानों पर जाते हैं जहां आम लोग रुटीन में नहीं जाते। वीरेन भी उनकी ही तरह रेलवे स्टेशनों पर जाते थे जहां से उनको जीवन के पर्यवेक्षण के नए नए अवसर मिलते हैं। `चारबाग स्टेशन प्लेटफॉर्म नंबर 7’ (चारबाग स्टेशन लखनऊ में है) की ये पंक्तियां एक लड़की को लेकर हुए स्टेशन-अनुभव को इस तरह दर्ज करती हैं-
`तुम झूठे ओ’
.यही कह रही बार बार प्लाटफार्म की वह बावली
`शुद्ध पेयजल’ के नलके से एक अदृश्य बरतन में पानी भरते हुए
घंटे भर से नलके टोंटी को छोड़ा नहीं उठने
क्या वह मुझसे कह रही थी
या सचमुच लगातार बहते हुए जल से?
`शोषिता और व्यभिचारिता’
जैसे मैल की एक परत लिपी हुई है
उसके वजूद पर
वह भी पैदा हुई थी एक स्त्री के पेट से
उसका भी घर होना था
अभी तो अपना कंटर बजाता
शकल से ही मुश्टंड
एक दूध वाला
जा रहा है उसकी तरफ
चेहरे पर शराब-भरी फुसलाहट लिए।

वीरेन के यहां रेल संबंधी कई और अनुभव और दृश्य है। इसी क्रम में मुझे भारतीय अंग्रेजी के वरिष्ठ लेखक रस्किन बॉन्ड द्वारा संपादित किताब `पेंग्विन बुक ऑफ रेलवे स्टोरीज’ का स्मरण होता है जिसमें कुछ भारतीय लेखकों की रेल अनुभव संबंधित कहानियां और संस्मरण हैं। इस पुस्तक की शुरुआत में 1917 में लिखित एजी वैल्स की कविता `ट्रैवेलर्स टेल’ भी शामिल है।) बॉन्ड ने खुद रेलयात्रा के अनुभवों पर कहानियां लिखी हैं। यहां इस सब का उल्लेख इस कारण भी किया जा रहा है कि सामान्य भारतीय जनजीवन में रेल एक महत्वपूर्ण घटक बन गया है और ये भारतीय समाज को जानने का एक बड़ा संदर्भ स्रोत है। भीष्म साहनी की कहानी `अमृतसर आ गया है’ भी इस सिलसिले मे याद की जा सकती है। भारत के विभाजन ने जिस तरह की मानसिकताओं को जन्म दिया उसे दिखानेवाली ये एक सशक्त कहानी है जो एक रेलयात्रा का वृतांत है। वीरेन अपने तरीके से रेल और प्लेटफॉर्म को हिंदी की काव्य चेतना का हिस्सा बनाते हैं।

समकालीन हिंदी साहित्य में वीरेन डंगवाल की एक बड़ी पहचान जनपक्षधर कवि के रूप में रही है। स्वाभाविक है कि ऐसा कवि राजनैतिक होगा। और इसमें संदेह नहीं कि वीरेन प्रखर राजनैतिक चेतना के कवि हैं। उनकी कई कविताएं भिन्न प्रकार के वामपंथी और संघर्षकामी समूहों के बीच लोकप्रिय रही है। उनकी राजनीतिक पक्षधरता को लक्षित करते हुए हिंदी कवि मंगलेश डबराल ने `कविता वीरेन’ की भूमिका में वीरेन के पहले संग्रह `इसी दुनिया में’ पर विचार करते हुए लिखा है-`ये कविताएं जिस दौर में लिखी गईं वह नेहरू युगोत्तर मोहभंग की सामाजिक-बौद्धिक- राजनैतिक उथलपुथल, नक्सलबाड़ी की `वसंत गर्जना’ और उसके क्रूर दमन, विश्व स्तर पर वियतनाम युद्ध के विरोध, अमेरिका की विद्रोही बीट पीढ़ी की अराजकता और काली या अश्वेत चेतना से उबलता हुआ था। वीरेन की संवेदना पर भी इस वैश्विक उभार की गहरी छाप पड़ी।‘ मंगलेश डबराल इस प्रसंग में वीरेन की `रामसिंह’ कविता का उल्लेख और उसकी व्याख्या भी करते हैं। यहां ये भी ध्यान रखना होगा कि `रामसिंह’ वीरेन की आरंभिक कविताओं में है और उसमें तथा उस जैसी कुछ अन्य राजनैतिक कविताओं में तत्कालीन युगीन राजनैतिक बोध का प्रभाव है।

किंतु समय बदलता रहता है और उसी क्रम में राजनीति भी। इसी कारण राजनैतिक शत्रु भी। समाज और देश में नई सत्ताएं आती व उभरती हैं जो नए औजारों के साथ वर्चस्व और सर्वाधिकार की प्रक्रिया शुरू करती है। इसी कारण राजनैतिक चेतना संपन्न कवि को अपने बोध का भी विकास और परिष्कार करते रहना पड़ता है। `वसंत गर्जना’ के दौर के बाद भारतीय राजनीति में कई बदलाव आए। भारतीय राजनीति के एक पक्ष ने संस्कृति का मुखौटा पहन लिया और इस सांस्कृतिक मुखौटे ने विकास के नाम पर विध्वंस आरंभ कर दिया। `विकास’ और विध्वंस सिर्फ धार्मिक स्थलों या अकादमिक संस्थानों का ही नहीं बल्कि इतिहास और सोच का भी। परंपरा का अतिशय गुणगान करने वाला ये मुखौटा उसे ही (यानी परंपरा को ही) क्षत विक्षत करने लगा और अभी भी लगातार किए जा रहा है। मुखौटे की इस चालाकी, धूर्तता और क्रूरता की राजनीति को वीरेन अपनी एक कविता `परंपरा’ में इस तरह सामने लाते हैं-
पहले उसने हमारी स्मृति पर डंडे बरसाये
और कहा- `असल में यह पुरानी स्मृति है’
फिर उसने हमारे विवेक को शून्य किया
और कहा- `अब जाकर हुए तुम विवेकवान’
फिर उसने हमारी आंख पर पट्टी बांधी
और कहा- `चलो, अब उपनिषद पढ़ो’
फिर उसने अपनी सजी हुई डोंगी हमारे रक्त की
नदी में उतार दी
और कहा- `अब अपनी तो यही है परंपरा’

हर देश और प्रत्येक भाषा में कविता एक और काम करती रही है। पारंपरिक मिथकों में तोड़फोड़ और उनकी पुनर्रचना। सिर्फ हिंदी तक ही सीमित रहें तथा कृष्णभक्ति काव्य परंपरा को ही लें तो इस बात को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। सूरदास जैसे भक्त कवियों ने कृष्ण को कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि से निकाल कर ब्रज की खोरी में खड़ा कर दिया और उनको माखनचोर बना दिया। उनके और कुछ अन्य भक्त कवियों के कृष्ण योगेश्वर नहीं थे। वे माखनचोर और राधा के संग रास रचाने वाले बन गए। बाद के कवि उनसे भी आगे बढ़ गए। एक रीतिकालीन कवि की गोपियां कहती हैं- `लट उऱझी है कन्हाई नकबेसर संभाल दे।‘ ये भी कृष्ण के मिथक का युगीन पुनराविष्कृत संस्करण है। रीतिकाल की गोपी इस बात की चिंता नहीं करतीं कि कृष्ण कितने बड़े है या भगवान हैं। उसकी तो यही चिंता है उनके बालों की लट उलझ गई हैं और कृष्ण का ये काम है कि नकबेसर से उसके जो बाल उलझे हुए हैं उसे वे संवार दे। (हिंदी में रीतिकाल के कवियों के साथ बड़ा अन्याय प्राध्यापकीय आलोचना ने किया है और उनको पतनशील संस्कृति के साथ जोड़ दिया है। यद्यपि ये एक अलग बहस है)। वीरेन कोई भक्त नही है लेकिन अपनी एक कविता में उन्होंने कृष्ण को मिथक को जिस तरह समकालीन बनाकर अनौपचारिक रूप दे दिया है उसे बिना सराहे नहीं रहा जा सकता है। ( ये भी एक प्रमाण है कि वीरेन में लोकतत्व भरपूर है)। `कन्हाई के दिन का प्रारंभ’ शीर्षक कविता यहां पूरी तरह इसलिए उद्धृत की जा रही है कि इस प्रसंग में इसका भरपूर आस्वाद किया जा सके-
कान में दांतौन खोंसे
पीत पट लुंगी लगाए
मींजते आंखें चले धोने नहाने
छरहर पुष्ट श्यामल देह
चिपकी अब भी कुछ यहां थोड़ी वहां पर
रमण रेती झरझराती भोर के आलोक में
टूटे बदन मन में मोद भरी कुटिलता
से देखते भर आंख
वृषभान की ऊंची अटारी को
दुहते गाय हमजोली ग्वाले ने मारा लंबा खंखार
पहुंचे तीर अति गंभीर जगमग श्मामला नदी का चित्त।
स्वच्छ रेत पर रखा पीत पट
भइया फिर उतर पड़े जल में
चबाते दांतौन।
स्वच्छ शीतल- गुनगुना जल धक्के से लगाए
उखड़े चले जाते पैर।
फिर चित लेट गए गुदगुदाती धार में
बहे. जाते बमय दांतौन
किसी शव की तरह प्रसन्न।
यों कन्हाई का एक दिन शुरू हुआ
गोपालक दिनों में

वीरेन डंगवाल के यहां लोकध्वनियों से साथ साथ दूसरे हिंदी- उर्दू कवियों की ध्वनियां भी हैं। आनंदवर्धन ने `ध्वन्यालोक’ में ध्वनि का गुण बताते हुए कहा है कि जो अनुरणन होता है वही ध्वनि है। आप दूसरे की कविता पढ़ते हैं और अगर वह अच्छी हुई तो आपके मन में हमेशा उसकी गूंज होती रहती है। ध्वनि के इस पक्ष को और विस्तारित करें तो एक अच्छी कविता में दूसरे कवि की कविता की गुंज भी सुनाई सकती है। हालांकि ये कोई नियम नहीं है क्योंकि हर कवि की रचना प्रक्रिया अलग होती है। पर किसी कवि के यहां अन्य कवियों या उनकी की रचनाओं की ध्वनि आए तो ये एक विशिष्टता तो है ही। और वीरेन डंगवाल के यहां तो अन्य कवियों की रचनाओं की आवाजें और यादें इतनी हैं कि वह एक अलग अध्ययन का विषय हो सकता है। कालिदास से लेकर गालिब और निराला से लेकर भवानी प्रसाद मिश्र तक की रचनाओं की स्मृतियां उनके यहां हैं। कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं अप्रत्यक्ष तरीके से और बेहद मौलिक अंदाज में। `अयोध्या फैजाबाद’ कविता में वीरेन वाल्मीकि या तुलसीदास के राम को नहीं बल्कि `निराला’ और उनके के राम को याद करते हैं-
वह एक और मन रहा राम का
जो न थका
इसलिए रौंदी जाकर भी
मरी नहीं अयोध्या
इसीलिए हे महाकवि, टोहता फिरता हूं मैं
इस
अंधेरे में
तेरे पगचिन्ह।
ऊपर की पंक्तियों में `निराला’ की प्रत्यक्ष याद है लेकिन`मेट्रो महिमा’ में कालिदास और ग़ालिब की कविताओं की अप्रत्यक्ष यादें है। इस कविता के पांचवे अंश की इन पंक्तियों को देखिए जो दिल्ली के मेट्रो ट्रेन को संबोधित हैं-
जब तुम राजीव चौक पहुंचो
हे अत्यंत चपलगामिनी
तो कनाटप्लेस की समस्त नैसर्गिक तथा अति प्राकृतिक सुगंधियों को
मंगवा लेना अवश्य
तुम्हारा कोई भी भक्त किंवा दास
यह कार्य सहर्ष कर देगा बिना किसी उजरत के
मध्य रात्रि के बाद जब मोटे मोटे पाइपों की गुनगुनी धारा से भरपूर नहला
दिए जाने के बाद
(ऐसे पाइप अब पुलिस के पास भी होने लगे हैं दंगा निरोधन के लिए)
जब तुम्हे टपटपाता हुआ और एकाकी छोड़ दिया जाय
उस नीरव रंगशाला में
तब तुम बिना झिझक अपनी सुघड़ बाहें उठा कर
कांख और वक्ष में जमकर लगा लेना उन सुगंधियों को
ऊपरी तौर पर ये पंक्तियां दिल्ली में मेट्रो रेल सेवा के बहाने एक महानगरीय अनुभव की मीमांसा है। दिल्ली के मशहूर कनॉट प्लेस ऊर्फ राजीव चौक की चर्चा के क्रम में। अगर यहां कहा जाए कि इस मीमांसा का तरीका कालिदास से जुड़ा है तो कुछ लोगों को अचरज होगा। हां, आप यदि कालिदास के `मेघदूत’ को याद कीजिए तो अचरज नहीं होगा। जैसे कालिदास का यक्ष मेघ को दिशा निर्देश देता रहता है और राह की संभाविक दृश्यावलियों के बारे मे बताता रहता है, उसी शैली में वीरेन भी मेट्रो को कुछ निर्देश देते हैं। उनकी कई और कविताएं दो लोकों का एक साथ साक्षात्कार कराती है। एक लोक आज का भौतिक समय यानी वर्तमान है और दूसरा लोक कवितालोक है जिसमें सारी कविताएं मौजूद हैं। दोनों एक दूसरे से मिलती हैं और नए काव्य रस का सृजन करती है। इसी `मेट्रो महिमा’ श्रृंखला के तीसरे अंश में वीरेन तब ग़ालिब की याद दिला देते हैं जब वे कहते हैं-
अस्पताल की खिड़की से भी
उतनी ही शानदार दिखती है मेट्रो
गोया धूप में चमचमाता एक तीर
या शाम में खुद ही ही रोशनी से जगमगाता
एक तीर दिल को लगा कि हाय- हाय
बेहतर हो चावड़ी बाजार उतरना और रिक्शा लेकर बल्लीमारान गली
कासिमजान के लिए
इस काव्यांश में तीन अवयव हैं। एक तो है वो अस्पताल जहां वीरेन अपने इलाज के दौरान रहे थे। कैंसर के इलाज के लिए। वहीं अस्पताल के कमरे में पड़े पड़े उनको मेट्रो की याद आती है। और सिर्फ मेट्रो की याद नहीं आती है, ग़ालिब  भी याद आते हैं। ग़ालिब आज की पुरानी दिल्ली के बल्लीमारान इलाके के गली कासिमजान रहते थे। (उस मकान का एक हिस्सा अब एक स्मृति-संग्रहालय में तब्दील हो गया है।) इस काव्यांश की पक्ति `एक तीर दिल को लगा जो कि हाय हाय’ ग़ालिब  की एक गजल के करीब ले जाती है। इस गजल में एक खूबसूरत शेर इस तरह से है
हाथ ही तेग़-आज़्मा का काम से जाता रहा
दिल प इक लगने न पाया जख़्म-ए- कारी हाय हाय
(`तेग़- आज़्मा’ का मतलब तलवार वाला और `जख़्म-ए-कारी’ की अर्थ है – गहरा घाव)
कहते हैं कि ग़ालिब  ने ये गजल अपनी एक प्रेमिका के लिए लिखी थी और इसे ध्यान में रखें तो वीरेन की कविता गली कासिमजान के अलावा प्रेम की गली में भी चली जाती है। कह सकते हैं कि उनकी कई कविताएं उस `तिमिर दारण मिहिर’ कविता का शीर्षक तो निराला की एक काव्यपंक्ति ही है। `अब बात हुई प्राचीन’ कविता में कहीं भवानी प्रसाद मिश्र का जिक्र नहीं है लेकिन इसे पढ़ते हुए उनकी `सन्नाटा’ कविता सहज रूप से आ जाती है। वीरेन की एक और लंबी और उत्कृष्ट कविता `कटरी की रूक्मिनी और उसकी माता की खंडित गद्य कथा’, जो भारतीय ग्रामीण समाज में नए नए अपराधों और अपराधियों की व्याप्ति की परिघटना को सामने लाती है, बांग्ला के कवि सुकांत भट्टाचार्य की कविता `क्षुधार राज्य पृथ्वी गद्यमय’ के उल्लेख से ही शुरू होती है। `रामदास-2’ तो रघुवीर सहाय की कविता चिरस्मरणीय कविता .`रामदास’ के महत्त्व का ही स्वीकार है।`बांदा’ में केदार नाथ अग्रवाल को याद किया गया है। हरिवंश राय `बच्चन’ और शमशेर बहादुर सिंह भी वीरेन के काव्यलोक में उपस्थित हैं।

वीरेन स्वाद के भी कवि है। देसी भारतीय स्वाद के। किसी समकालीन हिदी कवि ने स्वाद को लेकर इतनी शानदार कविताएं नहीं लिखीं है। वैसे वीरेन के पूर्ववर्ती `निराला’ ने पकौड़ी पर इतनी अच्छी कविता लिखी है (गर्म पकौड़ी’ नाम से) कि पढ़ते हुए भी जीभ पर पानी आ जाता है। काव्यशास्त्रियों ने रस का संबंध रसना से जोड़ा है। इस हिसाब से भी वीरेन की कविताओं का रस लिया जाना चाहिए। और हां, वीरेन सिर्फ स्वाद तक सीमित नही रहते। वे खाद्य पदार्थों के रूप पर रीझते हैं। जैसे `समोसा’ और `जलेबी’ कविताएं। रूप के बाद वे गंध के भी दीवाने हो जाते हैं। जैसे `पोदीना’। फिर इसी क्रम में वे इतिहास में भी पहुंच जाते हैं। अपनी `लहसुन’ कविता में वे उसकी खशुबू का बखान करते हुए उसके सौंदर्य की तुलना अपनी प्रेमिका के दांत से करते हैं-
हाय, तूझ ही लूं, तुझे कांटू बारीक- बारीक
तेरी खुशबू में खो जाऊं, हाय
जब मेरी प्रिया के दांत भी ऐसे ही सुंदर थे
ऐसे ही सुगठित, पंक्तिबद्ध, चमकीले,
हां, वह दिव्य सुगंध तब भी न थी उनमें
यह उन दिनों की बात है
जब सुगंधों की महातलाश शुरू ही की थी हमने

वीरेन लहसुन को ऐसा मादक बना देते हैं जैसा शायद आज तक किसी और कवि ने न बनाया होगा। प्रेम के दौरान सुगंध की तलाश तो हर प्रेमी जोड़ा करता है। पर उस तलाश के दौरान लगे कि लहसुन की सुगंध तो प्रेमिका से अधिक मादक है तो इसे कवि की विलक्षणता ही समझिए। कवि की माने तो इस तरह का नशीला गंध किसी फूल में भी नहीं है। कवि ने इस कविता में लहसुन का सिर्फ नशीलापन ही नहीं दिखाया। वे इतिहास में भी जाते हैं और कुछ शोधात्मक टिप्पणियां भी करते हैं जिसके कारण कविता एक निबंध भी बन जाती है-
मुझे पता लगा
कि हिमालय के पठारी हिस्सों में
जहां तेज धूप में
नमकीन भूरी चट्टानों के पसीने और गोंद की तरह
निकलते हैं हींग और शिलाजीत
वहीं दरारों के बीच जमी रहस्यमय मिट्टी से
इसकी जड़ो के खोद निकाला था
लामा-थोघपा-पा-था ने ईसा से एक शताब्दी पहले
xxx xxx xxx
इसके प्रसार में
बौद्धों की महती भूमिका के कारण ही
ब्राह्मणों ने इसे अपवित्र और सदगृहस्थों में
निषिद्ध घोषित किया
वह भला हो जनवेद आय़ुर्वेद का
जिसने द्वारांतर में खुले रखे इसके लिए कपाट
यह सारा विवरण वस्तुत: एक लंबे
स्वप्न पर आधारित है जो अपनी
रूग्ण तंत्रावस्था में पिछले दिनों धारावाहिक मैंने देखा
संभव है निकट भविष्य में
इसी कोटि का इतिहास आपको पाठ्यपुस्तकों में भी दिखाई पड़े

`कानपूर’ वीरेन की एक लंबी कविता है। एक बड़ा शहर (और छोटा भी)) अपने भीतर कई तरह की सिलवटें लिए रहता है। `कानपूर’ (कानपुर नहीं) उत्तर भारत के एक बड़े शहर पर लिखी गई कविता तो है ही ये अन्य शहरों को जानने व महसूस करने का एक मॉडल भी है। यानी दो धरातलों पर आप इस कविता का आस्वाद ले सकते हैं और दोनों जायज होंगे।
ये तो सर्वविदित-सा है कि अंग्रेजों के जमाने से लेकर आजाद भारत के आरंभिक वर्षों तक कानपुर एक बड़ा औद्योगिक केंद्र रहा। यहां के कपड़ा उद्योग के कारण कभी इसे `पूर्व का मैनचेस्टर’ कहा जाता था। फिर वो वक्त आया जब यहां के बड़े उद्योग बंद होने लगे। कई हो भी गए। वीरेन डंगवाल अपने पत्रकारीय दायित्व के निर्वहन के क्रम में कुछ साल कानपुर में भी रहे। इसलिए बतौर कवि ही नहीं बतौर पत्रकार भी उन्होंने इस शहर को करीब से देखा और महसूस किया होगा। ये सब तो इस लंबी कविता में है ही यहां वह दृष्टि भी है जिसे हम समाजशास्त्रीय- सह- सांस्कृतिक कह सकते हैं। समाजशास्त्री भी शहरों का अध्ययन करते हैं और वह भी प्रामाणिक ही होता है। लेकिन एक सांस्कृतिक दृष्टि भी होती है जो शायद समाजशास्त्री से छूट जाए। वीरेन का `कानपूर’ शहर के उस लोक में प्रवेश करता है जिसमें गमकता हुआ वसंत भी है और एस्बेस्टस की छप्परे भी, जिसमें रमजान की पवित्र रातें भी हैं और जहां शहर के सबसे भीषण अपराधी रहते हैं- वो इलाका भी। यहां की बंद हुई मिलों को कवि इस तरह दर्ज करता है-
पूरे शहर पर जैसे एक पतली-सी परत चढ़ी है धूल की
लालइमली एल्गिन म्योर ऐलेनकूपर-
ये उन मिलों के नाम हैं
जिनकी चिमनियों ने आहें भरना भी बंद कर दिया है।
इनसे निकले कोयले के कणों को
कभी बुहारना पड़ता था
गर्मियों की रात में
छतों पर छिड़काव के बाद बिस्तरे बिछाने के पहले।
इन मशीनों की धक-धक
इस शहर का अद्वितीय संगीत थी।

कानपुर शहर गंगा के किनारे है। होना तो ये चाहिए था कि यहां की गंगा को भी साफ किए जाने का संकल्प लिया जाना चाहिए था क्योंकि पतितपावनी कही जानेवाली ये नदी सिर्फ हरिद्वार, प्रयाग या वाराणसी से होकर ही नहीं बहती, दूसरे शहर (और गांव) भी इसके अपने हैं। कानपुर भी इनमें एक है। इसी से जुड़ी बात ये भी है कि गंगा को गंदा करने का बड़ा सिलसिला कानपुर में शूरू होता है क्योंकि यहां का चमड़ा उद्योग अपने प्रदूषित अवशेष इसी में डालता है। ये आश्चर्य है कि कानपुर शहर में सक्रिय. राजनैतिक दलों से लेकर स्वयंसेवी संस्थाएं भी इसे लेकर बहुत सजग और जागरूक नहीं रहीं। यहां के साहित्यकारो ने भी इसे लेकर बड़ी चिंता नहीं जताई है। हो सकता है कि स्थानीय स्तर पर कुछ होता रहा हो परंतु वह राष्ट्रीय संज्ञान में नहीं रहा। मगर वीरेन कानपुर पर लिखते हुए इसे नजर अंदाज नहीं करते-
गंगाजी गई सुकलागंज
घाट अपरंच भरे-भरे
भैरोंघाट में बिराजे हैं भैरवनाथ लाल-काले
चिताओं और प्रतीक्षारत मुर्दों की सोहबत में
परमट में कन्नौजिया महादेव भांग के ठेले और आलू की टिक्की,
सरसैयघाट पर कभी विद्यार्थी जी भी आया करते थे
अब सिर्फ कुछ पुराने तख्त पड़े हैं रेत पर, हारे हुए गंगा सेवकों के,
जाजमऊ के गंगाघाट पर नदी में सीझे हुए चमड़े की गंध और रस
माघ मास की सूखी हुई सुर सरिता के ऊपर समानांतर
ठहरी ठहरी सी बहती है
गंधक सरीखे गाढ़े- पीले कोहरे की
एक और गंगा

कहने की जरूरत नही कि ये जो `एक और गंगा’ है वह चमड़ा उद्योग के प्रदूषित अवशेषों की है। इस कविता में गद्यात्मकता तो है ही साथ ही वह लोकस्वर भी है जिसकी बात पहले की जा चुकी है। और वह कालिदास के `मेघदूत’ वाले संदेशात्मक लहजे में। –
ककड़ी जैसी बांहें तुम्हारी झुलस झूर जाएंगी
पपड़ जाएंगे होठ गदबदे प्यासे- प्यासे
फिर भी मन में रखा घड़ा ठंठे- मीठे पानी का
इस भीषण निदाख में तुझको आप्लावित रक्खेगा
अलबत्ता,
लली घाम में जइये, तौ छतरी ले जइये
आखिरी पंक्ति में लोकस्वर के साथ साथ विनोदवृत्ति भी है। गंगा पर कवि की एक और उत्कृष्ट कविता `गंगा स्तवन’ भी है जो इस नदी से जुड़े कई संदर्भों की तरफ ले जाती है।

पिछले कुछ बरसों से हिंदी में विश्व-कविता के अनुवाद आने शुरू हुए। कई कवियों ने समकालीन और आधुनिक विदेशी कवियों के अनुवाद किए हैं। वीरेन ने भी `पहल’ पत्रिका के लिए तुर्की कवि नाजिम हिकमत (1902- 1963) के हिंदी अनुवाद किए थे जो एक पुस्तिका के रूप भी प्रकाशित भी हुई थी। `वीरेन कविता’ में वो अनुवाद भी संकलित है।
अनुवाद को लेकर दुनिया में कई तरह के सिद्धांत हैं कि उसे कैसा होना चाहिए। उस बहस में जाने का यहां कोई औचित्य नहीं है। फिलहाल इतना मानना ही पर्याप्त होगा कि अनुवाद भी एक रचनात्मक प्रक्रिया है। विश्व कविता के अनुवाद ने हिंदी को अधिक लोचदार बनाया है। कोई भी भाषा सिर्फ मौलिक सृजन से ही अभिव्यक्ति-संपन्न नहीं होती, अनुवाद से भी होती है क्योंकि दूसरी भाषाओं-संस्कृतिओं के प्रत्ययों से भी हमारा परिचय होता है। हालांकि अनुवाद बनावटी भी नही होने चाहिए। जिस भाषा के अनुवाद हो रहा है उसकी प्रकृति का भी खयाल रखा जाना चाहिए। इस परिप्रेक्ष्य में हिकमत की कविताओं के इन अनुवादों का आकलन भी रोचक होगा। वीरेन इस तुर्की कवि की कविताओं को, उसके शब्दों और वाक्यों को, अपनी भाषा के मुहावरे में इस तरह ढाल देते हैं कि लगता ही नहीं कि ये हिंदी की कविताएं नहीं हैं।
हिकमत जब 1945 में जेल में थे तो रात के नौ बजे सिर्फ अपनी पत्नी को याद करके कविताएं लिखते थे। ऐसा उन्होंने जेल जाने से पहले अपनी पत्नी से वायदा भी किया था। ऐसी ही कविताएं है यहां `रात्रि की कविताएं’ नाम से अनूदित हैं। उसका ये अंश अनुवाद में भी इतना अच्छा है कि लगता हिंदी के किसी कवि ने लिखी है-
वही पोशाक निकालो जिसमें पहले पहल देखा था मैंने तुम्हें
सुंदरतम सजो,
सजो वसंत वृक्षों की तरह..
अपने बालों में लगाओ
वह गुलाबी कार्नेशन फूल जो मैंने भेजा था जेल से
अपने पत्र मे तुम्हें
उठाओ अपना चूमने काबिल रेखा-खिंचा चौड़ा गोरा माथा
आज टूटी हुई उदास नहीं हरगिज नहीं।
आज नाजिम हिकमत की स्त्री को लगना चाहिए
एक बाग़ी झंडे की तरह
क्या अनुवाद करने के क्रम में कोई अनुवादक उस कवि या लेखक से जीवन दर्शन के निकट भी जाता है जिसका वह अनुवाद कर रहा होता (या होती) है? इस बारे में भी कोई सर्वमान्य नियम को नहीं बनाया जा सकता। पर हिकमत की कविताओं के अनुवाद पर विचारते हुए वीरेन के साथ उनके संवेदना-साम्य के उस विंदु को महसूस तो किया जा सकता है। इस संकलन में `जीने के बारे में’ नाम से हिकमत की एक कविता है जिसमें वे ये जीवन दर्शन प्रतिपादित करते हैं कि हर परिस्थिति में आदमी के भीतर जीने की लालसा बनी रहनी चाहिए। इस कविता का (अनुवाद में)) सूत्र वाक्य है- `मेरा मतलब है जिंदा रहना आपका मुकम्मिल काम होना चाहिए।‘ क्योंकि `जीवन सबसे ज्य़ादा वास्तविक; सबसे सुंदर चीज है’। आगे एक पद में हिकमत कहते हैं-
मान लीजिए हम बहुत बीमार हैं-ऑपरेशन की जरूरत है
जिसका मतलब है कि हो सकता है कि हम उठ भी न सकें
उस सफेद मेज से

गो कि असंभव है अफसोस महसूस न करना
थोड़ा जल्दी ही चले जाने के बारे में
हम फिर भी हंसेंगे चुटकुले सुनते हुए
हम देखेंगे खिड़की के बाहर कि बारिश तो नहीं हो रही,
.या चिंतातुर प्रतीक्षा करेंगे,
ताजा समाचार प्रसारण की
क्या वीरेन के जीवन दर्शन पर भी इन पंक्तियों और इस कविता का कोई प्रभाव था? ये प्रश्न दिमाग मे तब आता है जब हम याद करते हैं कि वीरेन डंगवाल ने अपने आखिरी कैंसरग्रस्त दौर में भी कई बड़ी नायाब कविताएं लिंखी जिनमें से कुछ का उद्धरण इस लेख में पहले दिया जा चुका है। जो एक और कविता इस बारे में याद की जा सकती है वह है `रॉकलैंड डायरी’.। ये एक लंबी कविता है इसका रचनाकाल है 23 मार्च-2 अप्रेल 2007। ये दस दिनों के अस्पताली अनुभव पर है जब कैंसरग्रस्त वीरेन वहां इलाज करा रहे थे। कविता में चमकीले अस्पताली माहौल के बीच मौजूद भयावहता का चित्रण तो है ही, जीने के बारे में वह नजरिया भी है जिसकी बात हिकमत की कविता `जीने के बारे में’ की जा चुकी है। `रॉकलैंड डायरी’ का अंत इस तरह होता है-
मेरे चेहरे पर
गोया मुहल्ले के नाई की गंदगी फव्वारा बोतल से
एक सुहानी फुहार।
मेरे गालों और पेड़ में एक चीरती हुई पीड़ा।
मेरी बंद आंखों में
छूटते स्फुलिंग।
मेरे दिल में वही बसी जिद बसी कसी हुई
किसी नवजात की गुलाबी मुट्ठी की तरह
मेरी रातों में मेरे प्राणों में
वही वही पुकार
`हजार जुल्मों से सताये मेरे लोगो
तुम्हारी बददुआ हूं मैं
तनिक दूर पर झिलमिलाती
तुम्हारी लालसा….’
झासी-झीनी चादर बुनता
जाता जाता भादों
चलो ओढ़ कर ये चादर
हम छत पर गानें गायें
सतहत्तर तक दौड़ लगाएं

कई और निगाहों से भी वीरेन की कविताओं को पढ़ा जा सकता है। उनके यहां कई तरह की अनुभूतियां और एहसास है। वसंत ऋतु भी उनका प्रिय विषय है। कुछ कविताएं इस ऋतु पर भी हैं और अन्य कविताओं में भी वसंत अकस्मात आ जाता है। वीरेन `पर्जन्य’. वरुण’, `इंद्र जैसी कविताओं में पौराणिक-वैदिक प्रसंगों से भी जुड़ते हैं। लेकिन धार्मिक अर्थ में नहीं। सहज काव्य़-स्मृति के साथ। वहां भी वैदिक-पौराणिक प्रसंगों का अनुरणन होता है।

आखिर में वीरेन की उन काव्य पंक्तियों का उल्लेख जिनका व्यावहारिक व साक्षात दर्शन हम आम तौर पर रोज की जिंदगी में तब करते हैं जब तर्क और कुतर्क का भेद मिटाने की कोशिश की जाती है-
यहां सब कुछ
एक क्रम और कायदे के साथ घटित होता है,
हर चीज के लिए है सिद्धांत और तर्क
यहां हर बात है व्याख्येय
हर स्थिति के पक्ष और विपक्ष में बरोबर आश्वस्त करने वाली बातें …

आज कविता का सहृदय ही नहीं सामान्य व्यक्ति भी महसूस करता है कि हम एक लफ्फाजीयुक्त समय में जी रहे है। अच्छे-बुरे का भेद मिटाने का प्रयास ही नहीं हो रहा है बल्कि बुरे को अच्छा साबित करने के कई अभियान चल रहे हैं। ऐसे वक्त में भी वीरेन डंगवाल की कविता मानवीय सरोकारों और नैतिक बोध को याद दिलाती है।

 

‘अनहद’ के नौवें अंक, जून 2020 से साभार.

(रवीन्द्र त्रिपाठी हिंदी के वरिष्ठ प्रिंट-मीडिया और टीवी पत्रकार, सांस्कृतिक आलोचक, नाटककार, व्यंगकार, डॉक्यूमेंट्री फिल्मकार, स्तंभ लेखक, और संपादक हैं। उन्होंने पांच मौलिक नाटक, लिख हैं- `पहला सत्याग्रही’ महात्मा गांधी के जीवन पर आधारित) `शिकागो मे विवेकानंद’ (स्वामी विवेकानंद के जीवन पर आधारित), `कथा शिवपालगंज की’ (श्री लाल शुक्ल के उपन्यास `राग दरबारी’ पर आधारित), `राग विराग’ (श्रीलाल शुक्ल के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित) और `अज्ञातवास’ (श्रीलाल शुक्ल के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित)। ये पांचो नाटक प्रतिष्ठित रंग-निर्देशकों द्वारा निर्देशित किए गए हैं)। इनके अलावा वरिष्ठ रंगकर्मी प्रसन्ना ने जब रानावि (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय) के लिए `सोचो जब सब उल्टा हो’ नाटक किया तो उसके एसोसिएट स्क्रिप्ट- निदेशक रवीन्द्र त्रिपाठी ही थे। और जब वरिष्ठ रंगकर्मी बंसी कौल ने रानावि के लिए `खेल मंडली खेल’ निर्देशित किया तो उसके सह-स्क्रिप्ट लेखन का काम भी रवीन्द्र त्रिपाठी ने किया। श्री त्रिपाठी द्वारा निर्देशित गए दो डॉक्यूमेंट्री फिल्मो में से एक भानु भारती द्वारा किए नाटक `तुगलक’ (लेखक- गिरीश कारनाड) के निर्माण प्रक्रिया पर है। ये फिल्म दिल्ली की साहित्य कला परिषद के लिए बनी थी। दूसरी डॉक्यूमेंट्री फिल्म साहित्य अकादेमी के लिए बनाई थी जो हिंद महासागर से जुड़े देशों के कविता- उत्सव पर केंद्रित थी। श्री त्रिपाठी फिलहाल स्वराज एक्सप्रेस टीवी से बतौर कंसलटेंट जुड़े हुए हैं।
रवीन्द्र त्रिपाठी हिंदी के वरिष्ठ साहित्य-फिल्म-कला और रंगमंच आलोचक हैं। वे प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक `जनसत्ता’ के लिए साप्ताहिक फिल्म समीक्षा लिखते हैं और दूसरे प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक राष्ट्रीय सहारा के लिए नियमित और साप्ताहिक कला और रंग समीक्षा भी। उनकी व्यंग्य- पुस्तक `मन मोबाइलिया गया है’ एक चर्चित व्यंग्य कृति है। दिंवगत हिंदी कथाकार राजेंद्र यादव के साथ मिलकर उन्होंने `ब्रेक के बाद’ का संपादन किया जिसमें हिंदी के टीवी पत्रकारों की कहानियां संकलित हैं। हिंदी अकादमी, दिल्ली ने उनको साहित्यकार सम्मान 2000-2001) से सम्मानित किया है। वे राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के लिए ग्यारहवीं और बारहवीं की हिंदी पाठ्य पुस्तकों के संपादक मंडल के सदस्य भी रहे।)

Related posts

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Privacy & Cookies Policy