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देसवा

गाँव की औरतों का कुबूलनामा- दो

कीर्ति

(कीर्ति, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में बी.ए. अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रही हैं। कोरोना और लाॅकडाउन के दौरान उन्होंने गाँव की औरतों के जीवन को जानने-समझने की कोशिश को शब्दबद्ध किया है। प्रस्तुत है इसकी दूसरी कड़ी)

मेरे गाँव की दलित बस्ती, जिसे यहाँ ‘चमरौटी’ कहा जाता है, 60-65 घरों का संकुल(cluster) है। गाँव के निकास में या यूँ कहा जाए, गाँव के प्रवेश द्वार के दाएँ तरफ गाँव की चौड़ी,पक्की सड़क का मोह छोड़ते हुए मुझे उनसे मिलने के लिए ऊबड़-खाबड़, पगडण्डी का सहारा लेना पड़ा। देखने में यह बस्ती 15-20 घरों का समूह लगता है, क्योंकि यहाँ घर के नाम पर एक-दो कमरे की घास- फूस की बनी झोपड़ी है और यह सघन बस्ती सड़कों के अभाव में और भी छोटी दिखाई देती है। इतने छोटे घर में स्नानघर जैसी सुविधा की कल्पना नहीं की जा सकती। मैंने खुद देखा है, महिलाओं को भी हैंडपंप के आसपास खुले में नहाना पड़ता है, जिससे इनकी गरिमा को ठेस पहुँचती है। शौच के लिए भी ये बाहर जाती हैं। जिससे इनके साथ बलात्कार जैसी घटनाएं भी हो जाती हैं। बिजली और पानी की सुविधा तो किसी तरह यहाँ पहुँच गयी है, लेकिन रात को सबसे अधिक अंधेरा गाँव के इसी हिस्से में होता है। इतने घरों के बीच केवल 4-5 हैंडपंप ही हैं। इन कमियों का खामियाजा सबसे अधिक इनकी महिलाओं को भुगतना पड़ता है। धूप में महिलाओं की कतार हैंडपंप के पास देखी जा सकती है। अंधेरे में महिलाओं के साथ दुर्घटनाओं की संभावना भी अधिक रहती है। चूँकि मेरा स्कूल इन्हीं की बस्ती के पास था, जिससे ब्राह्मण जाति का होते हुए भी इनकी अलग- थलग पड़ी बस्ती के आस-पास मुझे लम्बा समय बिताने का अवसर मिल गया। वैसे विद्यालय जैसी सुविधा का इनके इतने करीब होने का कारण केवल इतना ही है, कि वह इनकी ही जमीन पर बना है, जो उन्हें गरीबी के कारण बेचनी पड़ी। लेकिन, विद्यालय के इतना पास होते हुए भी इनकी महिलाएं शिक्षा से काफी दूर हैं।

दलित महिलाओं को जाति, वर्ग और गरीबी के कारण तिहरे दमन का शिकार होना पड़ता है। दलित और दलित महिला होने के कारण इन्हें विभिन्न वर्गों द्वारा शोषित किया जाता है, साथ ही; महिला होने के कारण इन्हें इनके समाज के पितृसत्तात्मक सोच से भी शोषित होना पड़ता है। गरीबी इन पर तिहरा आघात करती है। इस स्थिति को रजनी तिलक की पंक्तियाँ स्पष्ट करती हैं-

“सभी औरतें सर्वहारा हैं संस्कृति में?

एक सतायी जाती है स्त्री होने के कारण

दूसरी सतायी जाती है स्त्री और दलित होने पर

एक तड़पती है सम्मान के लिए

दूसरी तिरस्कृत है भूख और अपमान से”

हालाँकि, दलित वर्ग की महिलाएं खेतों में , ईंट के भट्टे आदि स्थानों पर पुरुषों के साथ बराबरी में काम करती हैं, लेकिन अगर इनकी आजादी के विभिन्न पहलुओं को देखा जाए तो ये महिलाएं भी पितृसत्ता के विषबेल से जकड़ी दिखाई देती हैं। इन्हें कार्यस्थल पर शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ता है। इनकी मजदूरी में कटौती करके भी इनके साथ प्रायः अन्याय होता है। गाँव में स्थिति तो यह है, कि प्रशासन भी इनके साथ न्याय करता नहीं दिखाई देता, क्योंकि उस पर किसी प्रभावशाली वर्ग का वर्चस्व होता है। घर में भी इन्हें पुरुषों के आधिपत्य में ही रहना पड़ता है। इनकी स्थिति को और अधिक समझने के लिए मैंने अपने गाँव की दलित बस्ती की महिलाओं से बातचीत की। जिसमें, एक बुजुर्ग महिला से बातचीत के अंश इस प्रकार हैं-

” दादी आपकी शादी किस उम्र में हुई?”

“मुझे तो पता ही नहीं कब हुई।(दो साल की बच्ची की तरफ इशारा करते हुए) इसी उम्र की थी शायद ,गोद में बिठाकर खेलने के लिए खिलौने देकर करवा दी गयी शादी। लेकिन गवना बाद में हुआ।”

“आपकी कितनी लड़कियाँ और कितने लड़के हैं?”

“मेरे कई बच्चे लगातार हुए, पता नहीं कितने मर गए, अब छे लड़कियां और दो लड़के हैं।”

“आठ बच्चे!..लड़के बड़े हैं कि लड़कियाँ?”

“लड़कियाँ पहले हुईं तभी तो इतने बच्चे पैदा करने पड़े।”

“आपका काफी पैसा खर्च हुआ होगा ईलाज में?”

“मैं आजतक कभी अस्पताल ही नहीं गयी, कभी दवा नहीं लिया।”

” सभी महिलाएं और पुरुष खेत में बराबर काम करते हैं तो घर का काम कौन करता है?”

“महिलाएं ही करेंगी और कौन करेगा!”

“ये खेत जिनमें आप काम करती हैं ये आपके हैं?”

“नहीं, हमारी नसीब कहाँ इतनी अच्छी है …वो तो पण्डितों और ठाकुरों के खेत हैं।”

“खेतों में काम करते वक्त मालिकों के या किसी और पुरूष की बुरी नजर का शिकार नहीं होना पड़ता?”

“किसी औरत के जीवन में ऐसा न हो ये असम्भव है, वैसे तो चमारों को अछूत मानते हैं ये लोग लेकिन चमार औरतों को छूने में अपवित्र नहीं होते।”

“तो इसका मतलब चमार औरतों को अपने बर्तन छूने देते होंगे और मंदिर में जाने देते होंगे?”

“अरे बाप रे इनके बर्तन छू लें तो बर्तन फेंक दें और हम भी क्यूँ छुए भला, काम पर नहीं रखेंगे तो हम खाएंगे क्या?इसीलिए मंदिर भी हम खुद ही नहीं जाते और नीम के पेड़ में “संसारी देवी” का थान बनाकर उसी की पूजा करते हैं।”

“इसका मतलब काम से निकाले जाने के डर से किसी औरत के साथ कुछ दुर्घटना होगी तो उसे छिपा लेंगी?”

“हाँ, 6-7 साल पहले मेरे रिश्तेदारी में एक लड़की का उसके मालिक ने बलात्कार किया था तो उसके पिता खुद भी उस पर ही उंगली उठा रहे थे,आखिर उसे चुप ही रहना पड़ा।”

“और अगर उसके पिता साथ देते तो?”

“तब भी कुछ न होता। पुलिस मामले को रफा-दफा कर देती है।”

“गर्भावस्था में महिलाएं काम करने जाती हैं?”

“हाँ, मेरा तो खेत में ही प्रसव हो गया था, प्रसव के पांच-छे दिन बाद फिर हम काम पर चले जाते हैं। माहवारी के समय भी हम एक भी दिन आराम नहीं करते।”

“आप किसी त्योहार पर अपने लिए साड़ी लेती हैं या कुछ खर्च अपने ऊपर करती हैं?”

“मैं क्या ख़र्च करूँगी.. बहू की पुरानी साड़ी पहन के काम चला लेती हूँ।”

“मैंने सुना है आप लोगों में देवी भी आती हैं लोगों के शरीर में? कैसे पता चलता है और कैसे जाती हैं देवी?”

“हाँ, जब देवी जी आती हैं तो पूरे शरीर में लाल दाने निकल आते हैं और बुखार आ जाता है। माली से पूजा करवाने पर चली जाती हैं, डॉक्टर को दिखाने पर गुस्सा हो जाती हैं और आदमी पागल हो सकता है।”

” आप कहाँ तक पढ़ी हैं?”

“पढ़ी नहीं हूँ, अँगूठा लगाती हूँ।”

“आप खेत जाती हैं, तो बाजार भी खुद ही जाती होंगीं?”

“नहीं जब तीन लड़के हैं, तो मुझे क्या जरूरत।”

जाति-भेद और पितृसत्ता की दोहरी शिकार इन औरतों की और अधिक परख करने के लिए मैंने एक 18 साल की लड़की से भी बात की। बातचीत के अंश इस प्रकार हैं-

“आपने कहाँ तक पढ़ा है?”

“12 तक पढ़ा है।”

“आगे क्यूँ नहीं?”

“मेरा मन पढ़ने में नहीं लगता था, सिलाई में लगता था। मेरी दीदी पढ़ने में बहुत तेज थी लेकिन जब वो हाईस्कूल में थी तभी उनकी शादी हो गई, मैं सबसे छोटी हूँ इसलिए अभी तक नहीं हुई मेरी।”

“आपको पढ़ने के लिए कोई नहीं कहता था क्या?”

“नहीं। दादी तो कहती थी ये लड़कियों का काम नहीं है, आखिर करना तो चूल्हा-चौका ही पड़ेगा तो क्या मतलब पढ़ने से!”

“तुम्हारे पढ़ने के दौरान घर का काम कौन करता था?”

“घर का काम तो मैं ही करती थी, थोड़ा बड़ी हुई तो खेत में भी काम करने जाने लगी। उससे फुर्सत मिलती तो स्कूल जाती, पढ़ने का समय ही नहीं मिलता था।”

“खेत में काम करते हुए आपको ऊंची जाति के पुरुषों के द्वारा शोषण का भी शिकार होना पड़ा है?”

“सभी जातियों के पुरुष एक ही तरह के होते हैं। गलत तरीके से छूने का शिकार होना आम बात है। इसीलिए मेरे पापा लड़कियों की जल्दी -जल्दी ही शादी कर दिए।”

“सिलाई से भी पैसे कमाती हैं तो अपने ऊपर कितना खर्च करती हैं?”

“उन पैसों से मैं भाई को पढ़ाती हूँ, अपने ऊपर मैं कम खर्च करती हूं, दो साल से मैं यही सूट पहन रही।”

“भाई कैसा है पढ़ने में?”

“दिन भर घूमता रहता है, सभी से मार खाता है पढ़ने के लिए।”

” घर वाले बाजार जाने देते हैं?”

“जल्दी नहीं, कभी जाती भी हूँ तो पापा के साथ।”

“सेनेटरी पैड उपलब्ध हो जाता है आपको?”

“नहीं इतने पैसे कहाँ हैं..कपड़े का प्रयोग करती हूँ।”

“तो उन दिनों स्कूल जाने में असुविधा नहीं होती?”

“स्कूल नहीं जाती थी उस दौरान”

“आपकी बहनों की शादी के पहले उन्हें होने वाले पति से मिलाया गया?”

“नहीं, फ़ोटो आयी थी।”

“उन्हें शादी के पहले जानने का मन नहीं हुआ कि जिसके साथ पूरा जीवन बिताना है वो कैसा है?”

“जो माता पिता करते हैं वो अच्छा ही होता है, बाकी किस्मत में जो लिखा है वही मिलेगा!”

इस तरह से हम देखते हैं कि जिस लड़की का मैंने विवरण दिया उसके पढ़ने में मन न लगने तथा सिलाई में मन लगने का कारण ये पितृसत्तात्मक समाज ही है जो इस वर्ग की महिलाओं के लिए भी कार्यक्षेत्र के अलग पैमाने निर्धारित कर देता है। विवाह के मामले में भी या किसी भी मामले में चयन का अधिकार महिलाओं को नहीं दिया जाता। महिलाओं के निजीपन की सीमा का निर्धारण पुरूष समाज ही करता है। पुरुषों के बराबर काम करने के बावजूद, प्रत्येक मामले में निर्णय पुरुष का ही मान्य रहा।

इस जाति की महिलायें घरेलू हिंसा की भी अधिक शिकार दिखाई देती हैं। मैं एक ऐसी महिला से भी मिली, जिनके पति शराब पीकर आते हैं और उन्हें मारते-पीटते हैं उनसे पता चला कि दलितों की इस बस्ती में यह आम बात हैैं। लेकिन कहीं न कहीं प्रशासन की नाकामी के कारण ही इस तरह के मामले दर्ज कराने में महिलायें डरती हैं। यहाँ तक कि वह समाज से भी अपनी बदनामी के डर से छिपाती रहती हैं। वैवाहिक सम्बन्धों में भी यौनगत परतंत्रता इनके यहाँ भी है।एक महिला ने बातचीत करते हुए मजाक ही मजाक में मुझे एक लोकगीत सुनाया जिससे इनके पुरुषों की लोलुपता और इनकी यौनगत स्वतंत्रता के बीच संघर्ष दिखायी देता है-

“मोरे परदेसी छैला

दिनवा में धनवा कुटउले, रतिया में सथवा सुतउले

हमसे न सपरै दुइनौ काम

मोरे परदेसी छैला।”

स्त्री को केवल उपभोग की वस्तु के रूप में देखने की प्रवृत्ति का विरोध इनके इस लोकगीत में मजाक में ही सही, लेकिन स्पष्ट दिखाई देता है।

दलितों की इस बस्ती के लोगो में, खेतों की घटती संख्या के कारण शहरों की ओर पलायन की प्रवृत्ति भी बढ़ गई है। लेकिन, वहाँ भी बहुत कम आय होने तथा महंगाई होने के कारण यह प्रवास केवल पुरुषों का हो रहा है। जिससे महिलाएं यहीं रहती हैं और बहुत सारी चुनौतियां अचानक उनके सामने आ जाती हैं।

दलित महिलाओं की स्थिति को देखने के बाद दलित महिला विमर्शकार रजनी तिलक की पंक्तियाँ याद आती हैं-

“औरत,औरत होने में जुदा फर्क नहीं क्या?

एक भंगी तो दूसरी बामणी

एक डोम तो दूसरी ठकुरानी

दोनों सुबह से शाम खटती हैं

बेशक,एक दिन भर खेत में

दूसरी घर की चार दिवारी में

शाम को एक सोती है बिस्तर पे

तो दूसरी काँटों पर!

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