Monday, October 3, 2022
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समर न जीते कोय-21

(समकालीन जनमत की प्रबन्ध संपादक और जन संस्कृति मंच, उत्तर प्रदेश की वरिष्ठ उपाध्यक्ष मीना राय का जीवन लम्बे समय तक विविध साहित्यिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक हलचलों का गवाह रहा है. एक अध्यापक और प्रधानाचार्य के रूप में ग्रामीण हिन्दुस्तान की शिक्षा-व्यवस्था की चुनौतियों से लेकर सांस्कृतिक संकुल प्रकाशन के संचालन, साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों में सक्रिय रूप से पुस्तक, पोस्टर प्रदर्शनी के आयोजन और देश-समाज-राजनीति की बहसों से सक्रिय सम्बद्धता के उनके अनुभवों के संस्मरणों की श्रृंखला हम समकालीन जनमत के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. -सं.)

ससुराल


सुबह कक्कन छूटने के बाद मुंहदिखाई की रस्म शुरु हुई। बड़े वाले ननदोई और बड़ी सास के अलावा किसी ने एक पैसा मुझे मुंहदिखाई नहीं दिया। यह कहते हुए कि दहेज नहीं लेना चाहिए तो ये भी नहीं करना चाहिए। मुझे एकदम बुरा नहीं लगा। मुझे तो बस इतना लगा कि हमें कुछ मिले न मिले, हमारे बाप को तो आर्थिक परेशानी नहीं हुई। उसके अगले ही दिन मैंने बखीर बनाई जिसे हांड़ी छुवाई कहा जाता है। इस दिन भी बहुओं को पहली बार खाना बनाने पर नेग दिया जाता है। मेरा ये नेग भी दहेज के नाम भेंट चढ़ गया। इसका मर्म मैं समझ रही थी।
मेरे मायके में नई बहू से इतना जल्दी खाना नहीं बनवाते हैं। कम से कम एक महीने बाद ही खाना बनवाते हैं। एक महीना थोड़ा घर और लोगों को समझने का समय मिल जाता है । मुन्ना भाभी के आने पर मैंने खुद अपने दम पर उनको एक महीने बाद ही खाना बनाने दिया जबकि दोनों भाभी मायके चली गईं थी। बर्तन धोते समय तवा, कढ़ाई ईंट के छोटे छोटे टुकड़ों से रगड़ना पड़ता था। ईंट से रगड़ने पर किर-किर की आवाज आती थी। भाभी अगर आंगन में बैठी रहें तो कहें कि तवा, कड़ाही बाद में मांजिएगा किर-किरा रहा है। भाभी चावल धोने के बाद साबुन से हाथ धोती थीं। बाद में जब खुद पर पड़ा तो सब किरकिराना भूल गया और सब कुछ बड़ी जिम्मेदारी से करने लगीं। लगता ही नहीं कि वही भाभी हैं।
ससुराल में बिजली का कनेक्शन नहीं था। मार्च का महीना था इसलिए बहुत गर्मी नहीं लग रही थी। दीदी लोग को बतियाते सुने थे कि ससुराल जाने पर शुरू में किसी की बोली नहीं समझ में आती और जमीन ऊबड़ – खाबड़ (ऊंचा-नीचा) लगती है। मैं सोचती थी ऐसा कैसे हो सकता है? लेकिन जब अपने पर पड़ा तब समझ में आया। चलने पर बार-बार ठोकर लग जाया करती थी। छोटी वाली जेठानी इतना जल्दी जल्दी बोलती थीं कि मैं पकड़ ही नहीं पाती थी कि वे कह क्या कह रही हैं। धीरे-धीरे समझ में आने लगा। दरअसल, मायके की जमीन पर चलने का पैर अभ्यस्त था इसलिए यहां की जमीन ऊबड़ खाबड़ लगती थी। लड़की को हर तरह से ऐडजस्ट होने में तो समय लग ही जाता है। पौधा नहीं पेड़ होती हैं लड़कियां। एक पेड़ को अपनी जगह से उखाड़ कर दूसरी जगह लगाने पर  जड़ जमा लेने की कूबत औरत के बूते का ही है। चाहे जितना समय लगे, जड़ जमा ही लेती हैं। लेकिन कुछ पेड़, सही मिट्टी पानी, पर्यावरण न मिलने से जड़ नहीं जमा पाते और धीरे-धीरे पुरानी जड़ भी सूख जाने से खत्म ही हो जाते हैं/या कर दिए जाते हैं।
घर में नई दुल्हन आने पर बच्चे किसी न किसी बहाने दुल्हन के पास ही बने रहना चाहते हैं। दिन भर कोई न कोई बच्चे आते ही रहते थे। रामजी राय के ही दो बहन और एक भाई तथा दो चचेरे बड़े भाइयों के कुल 18 छोटे और पांच बड़े बच्चे थे। सबका आंगन एक ही था। शाम में बहुत चहल पहल रहती थी। जब बच्चे सो जाते तो लगता था जैसे स्टोव बंद हो गया हो। इसी में से शाम को कुछ बच्चों को पढ़ाने का भी जिम्मा मिला था। लेकिन जबसे खाना बनाने लगे, बच्चों को पढ़ाने का समय ही नहीं मिलता। रसोई घर का दरवाजा बहुत छोटा था। 90 डिग्री झुककर ही जाना पड़ता था। फिर भी अक्सर सिर में चोट लग ही जाती थी।
सिलाई मशीन रहना भी एक अलग ही समस्या थी। दोपहर में सिलाई मशीन पर काम करना पड़ता था। पुराना काम ही लोगों का नहीं पूरा हो पाता था कि नया काम जमा हो जाता। अगर मशीन पर कथरी , रजाई सिल पाती तो वो भी सिलना पड़ता। मना कर नहीं सकते थे। हम तो मना रहे थे कि मशीन ही खराब हो जाती तो दोपहर में तो चैन रहता। क्योंकि मुझे पता है कि मशीन पर जितना भी सिलवा रहे हैं लोग, लेकिन मशीन खराब होने पर कोई नहीं बनवाएगा। लेकिन नई मशीन थी, वो हमें भी मशीन ही बना रही थी।
हफ्ते भर बाद अपने से बड़ों का पैर दबाने वाला काम भी शुरू हो गया। उस समय गांव में दुलहन द्वारा अपने से बड़ों का पैर दबाने की प्रथा थी। मायके में भाभी लोगों को देखे ही थे। मैं मां का पैर कम, पिता जी का पैर ज्यादा दबाई थी। पिताजी का पैर खड़े होकर दबाते थे। मेरी सास न के बराबर पैर दबवाती थीं। वो कहती थीं, मेरा पैर न दबाओ लेकिन बाकी लोगों का पैर दबा देना। मैं उस समय 19 बरस की दुबली पतली थी और बड़ी सास, बड़ी जेठानी, बड़ी दो ननदें काफी स्वस्थ ( इस समय जैसी मैं हूं ) थीं। एक ननद दुबली पतली थीं। ससुराल में अगर मुझसे कोई पैर नहीं दबवाया तो मेरी छोटी जेठानी ने। ये मुझे हर काम में सहयोग करती थीं। जो काम मुझे भारी लगता, इनसे बता देती थी, तो भरसक हमको नहीं करने देतीं। एक दिन शाम को खाना बनाने के बाद वो बोलीं कि- मैं खाना सबको खिला दूंगी, तुम पैर दबाने वाला काम निपटा लो नहीं तो रोज रात के 10 बज जाते हैं। मैंने कहा मैं खाना खिला दूंगी आपही दबा दीजिए न। मैं सबका पैर दबाने में थक जाती हूं। मेरे हाथ छोटे हैं न, उसमें उन लोगों का पैर आता ही नहीं है। उन्होंने कहा पागल हो क्या? मेरे पैर दबाने के बाद भी तुम्हें पैर दबाना ही पड़ेगा। मैंने कहा, अगर ऐसा ही है तो मैं ही जाती हूं पैर दबाने। एक दिन बड़ी वाली सास कहीं बाहर से आईं और दालान में बैठते ही कहने लगीं कि शिवपूजन बो कह रही थीं कि तीन तीन बहुएं हैं तब भी आप का शरीर चिकना नहीं दिख रहा है। जबकि दिन में उबटन से छोटी जेठानी मालिस करती थीं और रात में तेल से हम। सुनकर बुरा तो लगा कि- अब क्या तेल से नहला दिया जाय कि शरीर चिकना दिखे। लेकिन ठीक है, ये सब गांव में चलता रहता है। बाद के दिनों में उनका दूसरा र

रूप भी दिखा। मेरी तबीयत खराब थी। सर्दी ज़ुकाम और बुखार भी था। पूरा बदन दर्द कर रहा था। कमरे में सिर बांधकर लेटी थी। कमरे में आईं और मुझे इस हाल में देखकर दरवाजा बंद कर मेरे मना करने के बावजूद मेरा सिर और कंधा, पीठ आदि दबाईं।

मेरा छोटा भाई नन्हें मेरे साथ आया था। यहां चाय की लत किसी को नहीं थी। लेकिन सबको पता था कि मैं चाय पीती हूं। नई दुलहन के लिए बनाया ही जाता। लेकिन नन्हें सुबह मंजन करके चाय मांगने लगा, और नहीं तो चूल्हे के पास रखा हरेठा ( अरहर की सूखी डंडी) जला कर चाय बनाने के लिए बरतन मांगने लगा। चीनी, दूध, चायपत्ती मांगकर चाय बनाने लगा। फिर किसी दूसरे ने चाय बनाई। उसको चाय मिली तो रोटी मांगने लगा। हमारी नन्द दालमोट दीं और नन्हें से बोलीं रोटी बनाने में समय लगेगा न। नन्हें बोला समय क्यों लगेगा? हमें तो  बासी रोटी चाहिए। बासी रोटी थी नहीं या देना नहीं चाहते होगें लोग, इसलिए ताजी रोटी सेंक कर दिया गया। उसने ताजी रोटी नहीं खाई, ऐसे ही चाय पी ली। मेरे कमरे में भी नहीं आ रहा था कि समझाऊं। चाय पीकर बोला कि कल से मेरे लिए तीन बासी रोटी जरूर रखिएगा। मैं सुबह चाय के साथ बासी रोटी ही खाता हूं, ताजी नहीं। ये लोग सोच रहे थे कि बासी रोटी मेहमान को देने पर बेइज्जती होगी।
होली के दिन मैं खाना बना रही थी‌। दोनों ननद मुझे रंग लगाना चाहती थीं। मैंने बोला भी कि खाना बना लूं तब लगाइएगा। नहीं मानीं और पीछे से मेरे चेहरे पर रंग लगाना चाहीं। मैंने चेहरे पर साड़ी लपेटकर कस के पकड़ लिया। दोनों लोगों को मेरे ऊपर झुका देख नन्हें को लगा कि ये दोनों मुझे मार रही हैं। वह रोते हुए दौड़ा आया और बड़ी वाली ननद की पीठ पर चढ़ कर उनको मारते हुए रोते रोते बोल रहा था-हमरा दीदिया के मरबू जा, छोड़ दीदिया के – छोड़। जेठानी उसको बताईं कि ये लोग तुम्हारी दीदी को रंग लगा रही हैं, मार नहीं रही हैं। तब जा के चुप हुआ। होली बाद नन्हें गांव चला गया।
नन्हें के जाने के हफ्ते भर बाद बाबू और बबुआ भइया आए। रुके नहीं लोग, एक घंटे बाद ही चले गए। उसके हफ्ते भर बाद ही मुन्ना भइया आए और कहे कि अपनी सास को बुलाओ, विदाई के लिए बात करना है। मैं यह सुनकर बहुत खुश हुई और आश्चर्यचकित भी। मुझे उम्मीद नहीं थी कि इतना जल्दी मुझे बुलाएंगे, क्योंकि बड़ी बहन पहली बार चार साल बाद ससुराल से आई थी। उससे छोटी दो साल बाद और चाचा की बड़ी बेटी साल भर बाद आयी थी। उस हिसाब से मैंने सोचा था कि 6 महीने से पहले नहीं बुलाएंगे। दरअसल, पहले के समय में लड़कियां ससुराल से तभी बुलाई जाती थीं जब मायके में कोई शादी या अन्य आयोजन हो। लेकिन मेरी सभी बहनें गौना के बाद ससुराल गईं थीं। मेरा गौना नहीं हुआ, शादी में ही विदा होकर ससुराल आ गई थी। मैंने सास को बुला लिया। भइया उनसे बात किए तो बोलीं – बड़का लड़का से बात करनी पड़ेगी। (चूंकि रामजी राय के पिता जी बहुत पहले ही साधू हो गए थे। बड़े पिताजी ही सभी भाई बहनों की देख रेख किए। एक तरह से रामजी राय के बड़े भइया ही मालिक थे)। उसी दिन बड़ी वाली जेठानी एक हफ्ते के लिए मायके चलीं गईं। छोटी जेठानी की तबियत खराब थी। इसलिए मेरा मायके जाना संभव नहीं था। सारी खुशी धरी की धरी रह गई। बहुत रोए लेकिन कुछ कर नहीं सकते थे।
 हफ्ता दस दिन बाद मुन्ना भइया विदाई के लिए इक्का लेकर खुद आ गए। विदाई के लिए सास से बात कर लिए कि- मेरी मां मंडप ही नहीं हटाने दे रही है कि जब मेरी लड़की मंडप में सो लेगी तभी हटाने देंगे। भइया हमसे बोले कि सुबह तैयार रहना। घर में विदाई के लिए एक दूसरे से पूछने के लिए लोग टाल रहे थे। खैर.. मैं कर ही क्या सकती थी, रोते- धोते सो गई। सुबह भइया आए तो कहने लगे तुम तैयार नहीं हो? मैंने कहा कोई कुछ बोल ही नहीं रहा। तब भइया सबसे पूछे। अंत में बड़े ससुर बोले ऐसे कहीं विदाई होती है। दिन तय करके आते तो तैयारी से विदाई करते। क्या कहेंगे लोग। इस घर की बहू ऐसे मायके जाएगी? भइया बोले- माफ करिएगा आपलोग, हम न दिन देखने वाले हिसाब से शादी किए हैं न विदाई कराएंगे। आज हम ले जाएंगे, आपलोग कल ही विदाई चाहते हों तो आ जाइएगा हम भेज देंगे। रही बात इस घर की बहू का ऐसे जाने की तो इस घर की बहू की विदाई में जो कुछ देना चाहते हैं भिजवा दीजिएगा, वो और अच्छा लगेगा।

उसके बाद विदाई की तैयारी होने लगी। ननद लोग ही मायके में सबको देने के लिए मेरे बक्से से साड़ियां निकालीं। मैंने ननद से ही कहा कि पहली बार मायके जा रही हूं तो जेवर भी ले जाना चाहती हूं, उसके बाद नहीं ले जाऊंगी। मुझे जेवर पहनने का कोई शौक भी नहीं है। मां भइया से कहलवाई है कि पहली बार लोग देखते हैं। ननद जाकर मां से बोली होगीं। माता जी और ननद मेरे कमरे में आईं और बताईं कि उधर तुम्हारे भइया को तिलक पर पैसा चढ़ाने से मुन्ना ने रोक दिया और इधर तुम्हारे लिए जेवर बनवाने से भी उसी ने मना कर दिया। मैंने कहा ठीक ही किए, जब पैसा ही नहीं मिला तो जेवर कहां से बनता। कोई बात नहीं दीदी। जो मायके से मिला है वही लेकर चली जाऊंगी। आपलोग परेशान न हों।

करते कराते हमलोग दोपहर बाद निकल पाए। विदाई के समय मास्टर साहब 40/- दिए थे कि रास्ते में मिठाई ले लेना। उस समय तो लग रहा था जैसे भी हो यहां से तो निकलें, मां के पास तो चली जाऊ। रास्ते में भइया खुद ही मिठाई खरीदने के लिए रुके। मैं मिठाई के लिए पैसा देने लगी तो वो पैसा नहीं लिए कि रखी रहो मैं ले लूंगा। उन्होंने मेरा पैसा देखा भी नहीं था। वहीं से ससुराल की इज्जत भी मेरी इज्जत है का भाव मेरे अंदर जग गया। गांव पहुंचने पर दुआर से आगे बढ़ते ही मां आ गई थीं, गले लग हम रोने लगे और उसी समय मेरी मां कान में कही कि मेरी बात ध्यान से सुनो, अगर कोई कहेगा कि तुम्हारा गला क्यों खाली है तो कह देना जंजीर अटैची में है। मैंने लोगों से कह दिया है कि मुंह दिखाई में सास ने जंजीर दिया है। बाकी लोग पैसा दिए जिसे मैंने अपनी सास को दे दिया। रात को मैं मंडप में सोई। सुबह मंडप बांस सहित निकाला गया। साड़ियां तो मेरे पास थी हीं। सबके लिए साड़ी ले आई थी, बाकी का लेन देन मां ने संभाल लिया था।
हमको आए कुछ ही दिन बीता था कि बड़े वाले जेठ मेरे गांव आए। गाजीपुर मेरे छोटे ननदोई और रामजी राय के ममेरे भाई के साझे के कोयले की दुकान के लिए पैसे की जरूरत थी तो बड़े वाले जेठ (मास्टर साहब) ने पिताजी से कहा कि मुझे पैसे की बहुत जररूरत है। मीना अपना जेवर लेकर आई है, उसमें से मुझे उसका कंगन चाहिए, मैं बाद में उसके लिए कंगन बनवा दूंगा। पिता जी घर आकर मां से बताए। मां नहीं तैयार हो रही थी। फिर हमसे बताई कि तुम्हारे जेठ कंगन बेचने के लिए मांग रहे हैं। कह रहे हैं बाद में बनवा देंगे। मेरा मन नहीं है तुम क्या कह रही हो। मैंने कहा दे दो, अब उसपर तुम्हारा अधिकार नहीं है। इससे पहले कि और लोग बेमतलब की बात करें, दे दो। पिताजी मास्टर साहब को कंगन दे दिए। मेरे यहां आने से पहले ये चर्चा घर में चल रही थी कि कोयले वाली दुकान खुली तो पैसे का इंतजाम करना पड़ेगा। हो सकता है कुछ गहना बेचना पड़े। हमें क्या पता मेरे ही गहने बेचने की बात कर रहे हैं लोग। बाद में पता चला कि मास्टर साहब की नौकरी स्थाई होते समय हुई कुछ पैसे देने पड़े थे। जो दुकान के लिए रखे हुए पैसे में से दिया गया था। जिसकी भरपाई के लिए मेरा कंगन बेचा गया जिसको बाद में बनवा देने का वादा हमारे जेठ (मास्टर साहब) अन्ततोगत्वा नहीं ही पूरा किए।
मां एक दो महीने बाद मेरा दोंगा ( शादी के बाद दूसरी बार विदाई) भी कर दी। ससुराल में उतना पर्दा नहीं था। गांव में तो उस समय सबके सामने पति से भी पर्दा करना होता था। लेकिन पति से पर्दा करने की प्रथा तो मेरी छोटी जेठानी ही तोड़ चुकी थीं। छोटी जेठानी जब गौना आई थीं, तो एक दिन छोटे वाले जेठ आंगन में बैठे थे, वो बिना पर्दा किए उनके सामने आंगन में आकर अपना काम करने लगीं। शायद मेरी छोटी वाली ननद उनसे जाकर बोलीं कि भइया बैठे हैं और आप बिना पर्दा के उनके सामने निकल आईं। इस पर जेठानी ने कहा कि क्यों -पति के सामने दिन में पर्दा किया जाता है क्या? यह सुनकर सब चुप रह गए। बचा खुचा मेरे समय में खतम हुआ। हम तो सिर पर ललाट तक साड़ी करके सबके सामने निकलते थे। कोई कुछ बोला भी नहीं।
एक और बहुत बड़ी समस्या हमारी छोटी जेठानी ही निपटा चुकी थीं। उनके समय में गेहूं चक्की पर नहीं जाता था। घर में जांता से पीसा जाता था। उन्होंने अपने पति से कहा कि इतना भी नहीं कमाते हो कि गेहूं की पिसाई दे सको! हमें कुछ न देना, घर में गेहूं की पिसाई का पैसा दे दिया करो। इस तरह से  पीसने का काम न के बराबर ही रह गया था।
बड़ी वाली जेठानी से बहुत डर लगता था। सुबह खाना बनाने की पूरी तैयारी करके, चूल्हे में आग सुलगा कर नहाने जाते थे, कभी नहाकर आते आते आग जल जाय तो सुनना पड़ जाता था कि इंतजाम करना हो तो पता चले। किचेन में कई मिट्टी के बरतनों में कुछ न कुछ अनाज रहता था। अंत में किचेन से जाते समय याद करके उसको ढक कर जाते थे। कभी गलती से छूट जाय या पता नहीं चूहा ढक्कन हटा दे, तब भी सुनना पड़ता था कि हमलोग तो अपने समय में इतना काम करते थे, अब लोग सुकुमार हो गए हैं। सास का रोल यही अदा करती थीं। सबसे ज्यादा गुस्सा उनके ऊपर तब लगती थी जब हफ्ते भर पहले से रोज कहते रहते थे कि गेहूं पीसने को भेज दीजिए। लेकिन समय से नहीं भेजवाती थीं जिसके कारण कभी कभी गेहूं पीसना पड़ता था। उसी में गीत भी गाने लगती थीं “उड़ति आवेले प्रेम चिरइया, बइठेले लवंगिया की डार” जिसे जतसार कहते हैं। वो गातीं थीं और हमारे मुंह से आइहो माई, आइहो बाबू ही निकलता था। उसके बाद खाना बनाना फिर शेष काम करना पड़ता था। रात को गिरने पर होश नहीं रहता था। इन सबके बावजूद मैंने कभी उन्हें ज़बाब नहीं दिया। गांव में उस समय ज़बाब देना सबसे बड़ा गुनाह माना जाता था। सुबह अंधेरा रहते बहरी ओर भी जाना होता था। हमेशा डर लगा रहता था कि कहीं नींद न लग जाय तो कैसे जाएंगे। एक दिन मेरी नींद खुली तो मुझे लगा कि सुबह होने वाली है, सबलोग बहरी ओर हो आए हैं। मुझे बुलाए होंगे तो मैं न जग पाई हूंगी। मैं अकेले ही चली गई। आने के बाद समय देखी तो अभी 3 बजा था। अंजोरिया रात के चलते लगा कि सुबह हो रही है। ऐसे ही एक दिन बहरी ओर गई तो देखी कि मेरे एक पैर की बिछिया नहीं दिख रही है। दूसरे पैर की बिछिया भी निकाल कर रख लिए। घर आकर बहुत ढूंढ़े, नहीं मिली तो दूसरे वाले को भी खेत में फेंक दिए कि लोग पूछेंगी तो कह देगें की कहीं रख दिए हैं मिल नहीं रही है, ऐसे एक पैर का देखेंगी तो कहने लगेंगी- गिरा दी, गिरना अच्छा नहीं माना जाता आदि आदि सुनना पड़ता। उसके बाद से फिर कभी हम बिछिया पहनें ही नहीं। और यह सब पहनना और पहने रहना मुझे अच्छा भी नहीं लगता था।
मीना राय
मीना राय समकालीन जनमत पत्रिका की प्रबन्ध संपादक हैं।
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