Friday, July 1, 2022
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समर न जीते कोय-15

(समकालीन जनमत की प्रबन्ध संपादक और जन संस्कृति मंच, उत्तर प्रदेश की वरिष्ठ उपाध्यक्ष मीना राय का जीवन लम्बे समय तक विविध साहित्यिक, सांस्कृतिक, राजनैतिक हलचलों का गवाह रहा है. एक अध्यापक और प्रधानाचार्य के रूप में ग्रामीण हिन्दुस्तान की शिक्षा-व्यवस्था की चुनौतियों से लेकर सांस्कृतिक संकुल प्रकाशन के संचालन, साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों में सक्रिय रूप से पुस्तक, पोस्टर प्रदर्शनी के आयोजन और देश-समाज-राजनीति की बहसों से सक्रिय सम्बद्धता के उनके अनुभवों के संस्मरणों की श्रृंखला हम समकालीन जनमत के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं. -सं.)

मेरे पिता जी किसान थे। बहुत मेहनत करते थे। मेहनत उनकी अच्छाई थी लेकिन उनका गुस्सा उनकी कमजोरी थी।
 मुझे याद है पिता जी सुबह शाम खेत पर काम करने जाते थे। जब चकबंदी हुई तो सारा खेत एक जगह हो गया। फिर पिताजी वहां पंपिंगसेट लगाने के लिए कुंआ खोदवाए। मुझे याद है कि कुँए में जिस दिन जमोट ( नीचे कुँए की गोलाई में किनारे किनारे ईंट से पक्की जोड़ाई शुरु हुई) पड़ा, उस दिन मुहल्ले की औरतें गीत गाते हुए कुँए पर आईं थीं। कुछ पूजा पाठ भी हुआ था तभी तो प्रसाद मिलना याद है। ईंट और सारा सामान गिर चुका था। सामान की सुरक्षा के लिए बीरा भर वहां रात में सोते थे। सुबह आठ से 12 बजे तक मैं वहां रहती थी। दोपहर में विनय भइया। वहां रेडियो उन्हीं ईंटों के बीच छुपा दिया जाता था। छुपाने की जगह का हम सभी को पता था। उसके बाद पिता जी 3 बजे तक आते थे। फिर शाम में पिता जी के लिए हार्लिक्स की शीशी में चाय रख, शीशी को कपड़े में लपेट कर प्लास्टिक की टोकरी में लेकर मैं आती थी। जब काम शुरू हो गया तब तो पिता जी और भइया ही दिन भर रहते थे।
7.5 हार्स पावर का पंपिंग सेट लगा। उसके बाद पिताजी खेत की ऊंच-खाल जमीन को बराबर करने में लग गए। सुबह नाश्ता करके जाते तो खाने के लिए आते और शाम 3 बजे जाते तो अंधेरा होने पर आते। दोनों टाइम फावड़ा से खेत बराबर करते। उनका कहना था कि खेत बराबर रहेगा तो मशीन खोल दो, फिर खेत के हर कोने तक पानी पहुंच जाएगा। हम लोगों की तरफ़ खेत की मिट्टी काली है। (उससे बाल धोइए तो शैम्पू फेल हो जाएगा) एक बार जाड़े की रात थी, पानी गेहूं के खेत में जा रहा था। पिताजी इस अंदाज से देखने आए कि खेत में पानी सही जा रहा हो तो थोड़ी देर मैं भी आराम कर लूं । लेकिन नाली फूटने के कारण पानी दूसरे के खेत में जा रहा था। कई बार मिट्टी से नाली बन्द करें लेकिन थोड़ी देर बाद फिर नाली फूट जा रही थी। अंत में पिताजी पानी की तरफ पीठ करके नाली में लेट गए और अंदाजे से हटे कि अब खेत सिंचा गया होगा। उसके बाद मशीन बंद की और दूसरे खेत में पानी चलाकर तब घर आए।
बाद के दिनों में उन्हें साइटिका हो गया। रात भर सो नहीं पाते थे। इसके बावजूद उनका खेत में काम करना बंद नहीं हुआ। जब चकबंदी हुई थी तो एक खेत ऐसा मिला था जिसमें अगिया घास थी। इस घास की वजह से  इस खेत में फसल होती ही नहीं थी, जल जाती थी। इस घास की विशेषता है कि जितनी दूरी में रहती है उतना ही नहीं बल्कि अपने अगल-बगल की फसल भी जला देती है। धीरे धीरे इसका विस्तार होता जाता है और उस खेत में कोई उपज नहीं हो पाती। इसे निकालना भी मुश्किल होता है। इसकी जड़ पोरसा भर जमीन के अंदर होती है। पिताजी सुबह 8 बजे से बारह बजे तक और शाम में चार बजे से सात बजे तक गदाला ( रम्मा ) से खेत में खोद खोद कर घास की जड़ तक गड्ढा करके जड़ से घास निकाल देते थे। इस तरह उन्होंने धीरे-धीरे खेत की सारी घास निकाल दी और इसमें अच्छी फसल होने लगी‌। सबसे बड़ा फायदा इससे यह हुआ कि पिता जी के साइटिका का दर्द भी कम हो गया। अब केवल फिल्ली (पिंडली) के पास ही दर्द रहता था जो आजीवन रहा। जब एकदम थक गए, खेत पर नहीं जा पाते थे तो लाठी में भाला की तरह खुरपी सेट करवाए थे। जिससे कुर्सी पर बैठे बैठे दुआर पर और घर के बाहर वाले मैदान के घास की सफाई करते थे।
पिता जी खेती के माध्यम से ही आय बढ़ाने का हर संभव प्रयास करते रहे। लेकिन बाजार का हाल तब भी यही था। जब किसान को सामान बेचने का समय आता है तो बाजार का रेट एकदम डाउन हो जाता है। एक बार बाबू ने मंगरैल और लहसुन की खेती की। यह सोच कर कि मंगरैल का भाव 200 रूपया किलो है तो 100 रुपये किलो भी बिकेगा तो खाद की उधारी चुका ही दूंगा। लहसुन 60 रूपया है तो 30 में तो बिक ही जाएगा। हुआ ये कि मंगरैल 40 रुपया किलो बिका और उसका बीज का दाम भी मुश्किल से निकल पाया और लहसुन 40 रुपया मन यानी एक रुपया किलो बिका। मुझे अच्छी तरह याद है कि लहसुन रेवतीपुर का कोई कुजड़ा ले गया था और कई बार बाबू पैसे के लिए खबर भेजते रहे और शायद पैसा नहीं ही मिला।

श्रम के प्रति मेरा लगाव उन्हीं की देन है। प्रतिदिन चाय पीने के बाद बाबू पान मुंह में दबाए अपने दुआर से ब्रह्मदेव काका के दुआर तक खरहर ( अरहर की डंडी से बनी लम्बी झाड़ू , जिससे खड़े खड़े ही झाड़ू लगाया जाता है) से पूरी गली साफ करते थे। खेतों में मेहनत करने का तो कोई हिसाब ही नहीं कि उनके जैसा प्रेम से कोई उतनी मेहनत कर सकता है। खेती के प्रति एक जुनून था उनको। गांव में वे पहले किसान होते थे जो नये से नये बीज लाते थे और अपने हाथों से खेत में किनारे किनारे लगाकर अगले साल के लिए बीज तैयार करते थे। क्योंकि उनके पास इतना पैसा नहीं था कि पहले ही साल नया बीज खरीदकर ज्यादा खेती कर लें। अपने जीवन में उन्होंने बहुत संघर्ष किया। शौकीन बहुत थे लेकिन जिम्मेदारियों से दबे होने के कारण अपना मनमाफिक शौक न पूरा कर सके। खेती के दम पर उन्होंने एक भगिनी का गौना, अपने चारों बेटे की शादी, अपनी तीन बेटी और चाचा की तीन बेटियों की शादी, (जिसमें नकदी छोड़ सारा इंतजाम पिता जी ही करते थे) और एक पोते की शादी की। इसके अलावा बाबा, आजी और चाचा के मृत्योपरांत सारे क्रिया कर्म की जिम्मेदारी पूरी की। कभी कभार चाचा कुछ सहयोग कर देते थे। इतनी जिम्मेदारियों के बीच एक किसान की हालत आप सब समझ सकते हैैं।

चाचा मुहम्मदाबाद इंटर कालेज में टीचर थे। अशोक भइया और मुन्ना भइया वहीं पढ़ते थे। चाचा हर शनिवार की शाम गांव आते थे। दोनों भाइयों के बीच गजब प्रेम था। शनिवार को चाचा आते थे तो बस स्टैंड से सीधे खेत पर ही चले जाते थे। पता लग जाता था कि चाचा आ गए हैं तो मैं चाय तीन कप लेकर खेत पर जाती थी। पिताजी को चाय देती तब तक चाचा आ जाते थे उनको चाय पकड़ाते तब तक मेरा कान पकड़ लेते, पैर नहीं छुई? हाथ में चाय है तो चाय पकड़ाकर ही न पैर छूती लेकिन इतना बोलने की हिम्मत किसे थी। रात में पिताजी चाचा का बिस्तर लगाते और सुबह उनके लैट्रिन जाते ही बिस्तर उठाकर रख देते थे। चाचा 1984 में जब बीमार पड़े उस समय डाक्टर ने बोल दिया कि इनको BHU ले जाना पड़ेगा। उस समय पहली बार पिताजी के आंख में आंसू देखी। नहीं तो उनको कभी रोते नहीं देखा था। बाप की सबसे नाजुक स्थिति लड़की की बिदाई के समय होती है। तब भी जब दीदी लोग बिदाई के समय पैर छूने जाएं और रोएं तो कहते थे ‘जा ससुरे न जाए के बा, कवनों गमी (कोई मर गया हो) पड़ल बा कि एतना रोव तालू’। उस समय मैं अंकुर को लेकर गांव मेटरनीटी लीव पर गई थी। फिर पिता जी पैसे का इंतजाम करके चाचा के पास BHU चले गए। दिन भर उन्हीं के पास कुर्सी लगाए बैठे रहते थे। चाचा कहते- अब मेरा भाई आ गया है, किसी को यहां रुकने की जरुरत नहीं है। एक हफ्ते बाद चाचा बोले भी कि ‘घरे जा, कहिया तक एहिजा बइठल रहब? खेती बारी क समय बा, ना जइब त बर्बाद न हो जाई खेतिया।’ पिता जी बोले कि ‘हर साल खेतिया आबाद होला न ए साल बर्बाद होखे द, हम तोहके छोड़ के ना जाइब’। अंत में चाचा बीमारी से उबर न पाए और 14 फरवरी 1985 को चल बसे।
पिताजी इतने गुस्सैल थे कि मेरे और नन्हें के अलावा कोई भाई बहन उनसे बात नहीं कर पाते थे। यहां तक कि कोई  सामान मंगवाना हो तो मां भी हमीं से कहलवाती थीं। सभी लोग उनसे बहुत डरते थे। मैं तो कई बार उनसे मार खाई हूं। फावड़ा चलाते चलाते उनका हाथ इतना कड़ा हो गया था कि उनका झापड़ करेंट की तरह लगता था। मुझे बचपन से ही लड़कों वाले खेल पसन्द थे। खेलते समय ही पकड़ा जाते, फिर तो पिटना ही था। बाढ़ आने पर मां के साथ ‘खार तीर’ नहाने जाते थे। मां ने ही मुझे तैरना सिखाया था। 1971 में बहुत बाढ़ आई थी। बाढ़ के पानी से दुआर के पास वाला पोखरा भरकर सड़क पर छाती भर पानी हो गया था। मुहल्ले की लड़कियों सहित रेनू दीदी के साथ मैं नहाने चली गई। सभी लोग पोखरा पार कर रहे थे। सामने ब्रह्मदेव काका के दुआर का पिछवारा था। संयोगवस ब्रह्मदेव काका पिछवाड़े आए और सामने हमीं दिखे। वहीं से कहने लगे रुको रुको रामाधार (मेरे पिता जी) से बताता हूं। सभी लोग सड़क के पार चली गईं और बेहया के पौधों के आड़ से दिख नहीं रही थीं, मैंने सोचा कि जब तक पिता जी आएंगे तब तक मैं पोखरा पार कर किनारे आ जाऊंगी। अभी आधा पोखरा ही पहुंचे थे कि पिताजी आ गए और बोलने लगे कि- ‘आव आव हम नहवाईला तोहके’। मुझे आना ही था, क्या करती। फिर तो भीगे बदन इतनी पिटाई हुई कि आज तक याद है। घर आके कुछ नहीं बताए। रेनू दीदी जब आई तो मां से बताई कि बड़का बाबू आज मीना को बहुत मारे हैं। मां मुझसे पूछी तो मैं रोने लगी। बोली कि पागल हो तुम पोखरा में ही रुकी रहती, बाबू को तैरने थोड़े आता है कि तुम्हारे तक पहुंच पाते। शाम में मां के साथ फिर नहाने गए और हम दोनों पोखरा पार भी किए और एक घंटा नहाए।
मजदूर वर्ग उनसे बहुत डरते थे। छोटी छोटी बात पर हाथ उठा देते थे। गांव में फसल की कटाई के समय तब 12 या 16 बोझे पर एक बोझा बन्नी मिलती थी। 12 बोझे में से काटने वाले को कहा जाता था कि कोई एक बोझा तुम उठा लो। इसे बन्नी निबारना कहते थे। वही उनकी फसल काटने की मजदूरी होती थी। उन लोगों को पता होता था कि एक बोझा उठाना होगा तो उठाने वाले बोझे में आड़े बेड़े फसल रखकर ठोस बनाए रहते थे। देखने में बोझा छोटा लगता था, लेकिन फसल भरपूर रहती थी। पिताजी की किसानी यहां मजदूरों को नुकसान पहुंचाती थी। पिताजी उस बोझे को पहचान जाते थे और दूसरा बोझा देते थे। यही नहीं जो औरतें बच्चा लेकर कटाई करने आती थीं वे थोड़ा फसल काटकर उसी से बिस्तर बनाकर उसपर बच्चे को लेटाकर कटाई करती थीं और अंत में उस फसल को घर ले जाती थीं। पिताजी बच्चे वाली औरतों को काम से लौटा देते थे। छोटी छोटी गलती पर मजदूरों को पीट देते थे। सामन्तों वाला व्यवहार करते थे। बाद के दिनों में इतना बदल गए कि कभी ऐसे हो जाएंगे हम लोग सोच भी नहीं सकते थे। खैर! बदले न होते तो जैसे थे, आज के समय में उनकी हत्या हो गई होती।
किसी किसी बात पर उनका गुस्साना जायज लगता था। जैसे नौजवान और हट्ठे कट्ठे भिखमंगों को देखते ही गरम हो जाते कि चलो खेत पर काम करो, तुमको भर पेट खाना खिलाएंगे।  दिन भर धूप में मेहनत करने पर अनाज घर आता है, तुम लोग आराम से मांगकर पेट भर लेते हो। इतना कहने पर भिखमंगे आग बबूला हो जाते थे। भिखमंगे अगर उल्टा सीधा बोलें तो पिताजी हाथ भी उठा देते थे।

फिर पूजा पाठ और पंडितों पर गुस्साते थे। जब किसी रिश्तेदारी में जाएं तो माताजी कुछ करा पाती थीं। उनका कहना था कि जिनको पंडित बनाकर पैर छूती हैं वो बाहर कौन कौन करम करता है आपको पता है। फिर जो पंडित आता उसे बहुत गलियाते थे। शादी व्याह के अलावा कभी मेरे यहां सत्यनारायण की कथा नहीं हो पाती थी।

पूजा के नाम पर एक संगमरमर की शंकर भगवान की मूर्ति थी और आंगन में एक तुलसी का पौधा था। एक कैलेंडर था जिस पर ‘ओम जय जगदीश हरे’ पूरा लिखा था। दीपावली के दिन मां उसे पूरा गाती थी। बाद के दिनों में एक छोटी पुस्तिका माता जी पढ़ती थीं जिसमें केवल सीताराम लिखा था। ये सब पिताजी से छिपकर होता था।
एक बार मां शनिवार को रतन चक्की वाले की दुकान के सामने वाले पीपल की (बासुदेव जी की) पूजा करने गई थी। पेड़ की परिक्रमा करते हुए धागा लपेट रही थी। उसके बाद पेड़ का पैर दबा कर घर लौटी। सामने रतन के यहां पिता जी धान कुटवा रहे थे। जब घर आए तो माता जी पर गरम हुए, बोले-  ‘हम  दिन भर धूप मे फावड़ा चला के थक जाइला, कबो हमार पैर ना दबावेली, पिपरी के शोर दबावे जाली।’
पिताजी जी किसान के साथ पोस्टमास्टर भी थे। अंतर्देशीय, पोस्टकार्ड और लिफाफा लेने आने से भी लोग डरते थे। फिक्स टाइम के बाद कुछ नहीं देते थे। मेरी शादी के कुछ दिन बाद पोस्टमास्टरी छोड़ दिए थे। इंजेक्शन भी लगाना जानते थे। गांव में बहुत लोगों को इनकी सेवा की जरूरत पड़ती थी। काफी सफाई पसंद थे। कोई दुआर पर आ जाय और चप्पल से या जैसे भी कोई गन्दगी हुई तो उसकी खैर नहीं।
छोटे भाई नन्हें की शादी में मुन्ना भइया बंबई से टी वी लाए थे। दुआर पर टीवी लग गया। उस समय रामायण सीरियल आता था। सीरियल के समय से पहले किनारे किनारे बेंच और कुर्सी , बीच में बोरे का चट बिछाकर, परदा डालकर पूरा पिक्चर देखने का माहौल बनाए रहते थे और अपने एक बांस की लम्बी छड़ी लेकर किनारे बैठते थे। जो बीच में बोले उसे छड़ी से ठोकते थे कि चुप रहो नहीं भगा देंगे। बच्चे भी डर के मारे गन्दगी नहीं फैलाते थे कि बाबा फिर बैठने नहीं देगें।
पिताजी कभी रोते नहीं थे। अब सीरियल देखने में भी रोने लगते थे। अब जात पात का भेद भी कम हो गया था। अपनी परेशानी शायद अपने लड़कों से ज्यादा हमें बताते थे। एक बात  उनकी अच्छी थी कि लड़कियों से खुलकर बात करते थे। एक बार मां बीमार थीं। जाड़े का दिन था। बड़ी भाभी मायके गई थीं। सब लोग आ गए थे। अन्नू भी शायद बंबई से आया था।  मुहम्मदाबाद अशोक भइया का परिवार गाड़ी से आया था। मां को देखकर शाम में लौट गए थे। रात में बाबू खाना खाकर बैठे थे। कहने लगे कि माई को कभी भी कुछ हो सकता है तुमलोग आर्थिक रूप से तैयार रहना। मैंने कहा कि बाबू आपसे एक बात कहना है मुझे, अगर बुरा लगे तो माफी चाहती हूं। मैंने कहा कि हम लोग आर्थिक रूप से मदद के लिए हमेशा तैयार हैं लेकिन आपके लड़कों को इससे तकलीफ़ है। उनका कहना है कि तुम लोगों से बाबू कहते हैं, हम लोगों से क्यों नहीं कहते। बाबू लाठी पकड़े दोनों हाथों के बीच सिर झुकाए बैठे थे। मेरी बात सुनकर कुछ देर तक चुप रहे। फिर मैंने ही टोका। मेरी बात से आप चुप हैं तो सॉरी। बाबू बोले- ‘वो लड़के क्या जिनसे कहना पड़े’। फिर चुप। जाते जाते बोले – ‘कवन कवन बतिया देखबी रे अंखिया’। सुबह चाय पीने नहीं आए तो समझ में आ गया कि नाराज हो गए हैं। फिर दुआर पर ही हम गए तो बातचीत के दौरान नार्मल हो गए।
माई परेशान भी रहती थी लेकिन पूरा प्रबन्धन वही देखती थी। दोनों एक दूसरे को संभालते रहे। गांव में रहते हुए बाबू माई का जितना ध्यान रखते थे, उतना शायद ही आज के समय में कोई रखेगा। हां, राजेन्द्र सर को देखा है उन्हीं की तरह ध्यान रखते हुए।
मां एक बार नाना के यहां मुजफ्फरपुर गई हुई थी। तारा मौसी मां से बहुत छोटी थीं। मेरी मां की शादी के बाद पैदा हुई थीं। मौसाजी पी ए टू कमिश्नर थे। मौसी की सहेलियां आईं हुई थीं। मौसी ने मां का परिचय सहेलियों से कराया। उन लोगों ने मौसी से पूछा कि जीजाजी क्या करते हैं? मौसी सोचने लगी कि जीजाजी खेती करते हैं बता दिया तो दीदी कहीं नाराज न हो जाय। मौसी ने कहा कि दीदी से तुम लोग पूछो कि जीजाजी क्या करते हैं? उन लोगों के पूछने पर मां ने कहा कि जीजाजी कृषि विभाग में इंजीनियर हैं। मां का जबाब सुनकर मौसी मां सन्न रह गई।
मीना राय
मीना राय समकालीन जनमत पत्रिका की प्रबन्ध संपादक हैं।
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