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रिहाई मंच ने आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तारी पर उठाए सवाल, जांच की मांग

लखनऊ। रिहाई मंच ने लखनऊ में आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार मिनहाज, मसीरुद्दीन और शकील के परिजनों से मुलाकात के बाद इन गिरफ्तारियों पर सवाल करते हुए जांच की मांग की है।

रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब ने एक बयान में कहा कि हर चुनाव के मौके पर मुसलमान नौजवानों को आईएसआई, हूजी, इंडियन मुजाहिदीन का एजेंट या आतंकवादी और कभी-कभी आईएसआईएस के लिए काम करते हुए दिखाकर गिरफ्तार किया जाता है और उनका मीडिया ट्रायल शुरू कर दिया जाता है. चुनाव के समय वोटों के ध्रुवीकरण के लिए ये सब किया जाता है और वर्तमान गिरफ्तारी भी उसी सृंखला की कड़ी है. इस समय जन साधारण महंगाई की मार झेल रहा है, लॉकडाउन से परेशान है।  बेरोजगारी और लॉक डाउन के कारण काम धंधा छूट जाने के कारण लोग भूखा रहने को बेबस है. इन समस्याओं से जनता का ध्यान हटाने के उद्देश्य से तथा वोटों का ध्रुवीकरण करने के उद्देश्य से सरकार ने फर्जी गिरफ्तारियों का सिलसिला शुरू किया है.

रिहाई मंच एक प्रतिनिधिमंडल ने अदनान पल्ली दुबग्गा के मिनहाज के पिता शेराज और फातिमा नगर, मोहिबुल्लापुर निवासी मसीरुद्दीन की पत्नी सईदा और बच्चों से मुलाकात की. प्रतिनिधिमंडल में रिहाई मंच के अध्यक्ष मुहम्मद शुऐब, रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव, हाफिज मोहम्मद, वसी, अजय तोरिया, टीनू बिंद्रा, मुराद शामिल रहे.

रिहाई मंच के प्रतिनिधि मंडल को मिनहाज के पिता शेराज ने बताया कि उस दिन जब एटीएस उनके घर आई तो वे नहा रहे थे. एटीएस के लोग मिनहाज के कमरे में गए और बोरी में बरामदगी का दावा किया। यह तकरीबन सुबह के दस बजे के आसपास का वाकया है. पहले मालूम चला कि मिनहाज को उठाकर ले गए। बाद में पता चला घर के बाहर सड़क पर किसी गाड़ी में उसे बिठाए थे. शाम 6-7 बजे के करीब एटीएस वाले मीडिया से दूर अपने अमौसी स्थित हेड क्वार्टर ले गए जहां एक फार्म नुमा कागज पर दस्तखत करवाया. वहां से पुलिस चौकी दुबग्गा उनको और उनकी पत्नी को लाया गया फिर रात 9 बजे के करीब घर पर छोड़ दिया गया.

मिनहाज का डेढ़ साल का बेटा माज़ है और उनकी पत्नी शिक्षिका हैं. मिनहाज अपने माता-पिता के इकलौते बेटे हैं और एक बहन है जिसकी शादी हो गई है. मिनहाज इलेक्ट्रिक ट्रेड से डिप्लोमा हैं. उन्होंने 7-8 महीने पहले बैटरी की दुकान खोली है.

प्रतिनिधि मंडल मसीरुद्दीन के घर पहुंचा तो उनकी 12 साल की बेटी जो दो साल से शुगर की पेशेंट है, बीमारी के हालत में मिली। पिता की गिरफ़्तारी के सदमें से उसकी तबियत और खराब हो गई है। मसीरुद्दीन की तीन बेटियां और एक बेटा है. मसीरुद्दीन बैटरी रिक्शा चलाते थे. करीब सात महीने पहले इनके पिता का देहांत हो गया था.

मसीरुद्दीन की पत्नी सईदा ने बताया कि सुबह 11 बजे के करीब एटीएस आयी और मसीरुद्दीन को पकड़ कर ले गयी। सईदा रोते हुए बताती हैं कि मसीरुद्दीन उस दिन देर से उठे थे और चाय पीकर बैठे थे कि दो-तीन लोग आए और दरवाजा खड़खड़ाया। मसीरुद्दीन कमरे से निकलकर बाहर गए तो दरवाजा खड़खड़ाने वालों ने पूछा कि मसीरुद्दीन कौन है तो वे बोले कि हम है. मसीरुद्दीन उस वक्त  सिर्फ बनियाइन और तहमत पहने थे। उन लोगों ने उनको कपड़े भी नहीं पहनने दिया और लेकर चले गए. फिर हमने पैंट-शर्ट दिया तो जाकर पहनें. उसके बाद हम उन्ही के साथ थाने चले गए। एक बेटी भी साथ गई. उसके बाद कमांडों लोग आकर घर की तलाशी लिए. सब कुछ निकालकर फेंक दिया. घर में बिखरे सामानों को देख आसानी से समझा जा सकता है. एक कूकर था, उसे भी अपने साथ लेकर चले गए. हमारा कुछ कागज और आईडी सब एक डिब्बे में रखा था जिसे निकालकर ले गए। दोनों बेटियों को घर से भगा दिया गया था। मेरी सास घर में बैठीं रहीं. हम जब तक थाने पर रहे मसीरुद्दीन को गाड़ी में बैठाकर रखा गया था.

सईदा ने बताया कि उनसे कहा गया कि मसीरुद्दीन के पाँच भाई हैं, उनको बुलाकर लाइए और मसीरुद्दीन को लेकर चले जाइए. हम आए और अपनी बीमार सास को रिक्शे से बैठाकर ले गए. तब तक उनको वहां से हटा दिया गया था. हमने पूछा कि कहां गए पर हमको कुछ सही पता नहीं दिया गया. कहा गया कि ठाकुरगंज थाने, काकोरी थाने देख लीजिए. हम आठ बजे तक ठाकुरगंज, काकोरी थाने गए पर हमको कुछ नहीं पता चला. कहने लगे एटीएस वाले वहीं ले गए होंगे. हमारे साथ बहुत ज्यादती हो रही है। मेरी शुगर की पेशेंट बेटी कह रही है कि मेरे अब्बू को मिला दो. अब इसकी दवाई कौन लाएगा. इनको इन्सुलिन कौन देगा. मुहल्ले वालों से पूछ लीजिए उन्हें कोई गलत नहीं कहता.

एटीएस उनके बच्चों की किताबें भी ले गई है. मिनहाज के बारे में पूछने पर सईदा ने बताया कि 14 हजार की बैटरी आती है. हमारी इतनी हैसियत नहीं है कि एक साथ पैसा देकर बैटरी खरीद लें। ऐसे में क़िस्त पर बैटरी लेते थे. जब कभी क़िस्त नहीं पहुंचा पाते थे तो मिन्हाज क़िस्त लेने आते थे. घर की हालत दिखाते हुए कहती हैं कि मसीरुद्दीन को इतना बड़ा आतंकवादी कहा जा रहा है और घर के नाम पर तीन शेड में रहने को मजबूर हैं. वो तो बिटिया की बीमारी में ही परेशान थे कि कैसे उसकी दवा हो सके और हम सबको दो जून की रोटी मिल सके.

मेहरून निशा कहती हैं कि मुसलमान होने की वजह से इतना दबाया जा रहा है. वो मेरा छोटा भाई है। रिक्शा चलाकर मजूरी कर रहा था। इस तरह आकर घर से ले गए।  मेरे घर में कोई सामान बरामद नहीं हुआ। टीन शेड का घर है और आप कह रहे हैं कि आतंकवादी का घर है. मोहल्ले वालों से पूछ लीजिए कि कभी किसी से लड़ाई हुई हो. मीडिया वाले पूछते हैं कि घर कहां से बना है. आप देख लीजिए कि घर कहां बना है ? घर में क्या है ?  देखिए दीवार तक नहीं उठी है। सब खुला पड़ा है. यह जमीन हमारे पिता ने तीस साल पहले खरीदी जो तीन भाइयों की है. पूरा परिवार भूखे-प्यासे मर रहा है.

आतंकवाद के नाम पर गिरफ्तार किए गए शकील के के बड़े भाई इलियास ने कहा कि मेरा भाई निर्दोष है। उसे फर्जी तरीक़े से फंसाया जा रहा है। वह सालों से ई-रिक्शा चलाकर अपने परिवार का किसी तरह  भरण-पोषण कर रहा था। जब घर से कहीं गया नहीं तो कैसे और कब आतंकवादी हो गया।

इलियास ने बताया की रोज की तरह आज भी वह सुबह रिक्शा लेकर चला गया। सुबह 9 बजे के करीब किसी साथी रिक्शा वाले ने शकील की पत्नी के मोबाइल पर फ़ोन करके बताया कि शकील को पुलिस ने पकड़ लिया है। शकील की पत्नी ने मुझे फोन कर बताया। जब मैं घर आकर देखा तो पूरी गली को पुलिस ने घेर रखा था। इलियास ने बताया की जब पुलिस वालों से हमने पूछा तो उन्होंने हमें डांट दिया। फिर भी हमने कहा कि साहब ऐसा कुछ नहीं है। आप हमारे घर की तलाशी ले लो। उसके बाद हम घर में ले जाकर खुद एक-एक समान चेक कराए जिसके बाद एक पुलिस वाले ने खुद कहा कि हमें मालूम है कुछ नहीं है।

इलियास ने बताया कि बाद में जब हम पता करने के लिए वज़ीरगंज थाने गए तो तो एक पुलिस वाले ने कहा मास्क हटाओ। जब हमने मास्क हटाया तो उसने कहा भाग यहां से।  तुम ही जैसे लोग आतंकवादी होते हो।

इलियास ने रिहाई मंच की टीम को रिक्शा की हालत दिखाते हुये सवाल किया कि आप लोग ही बताएं कि अगर मेरा भाई आतंकवादी होता तो उसे घर चलाने के लिये सुबह से शाम तक यह टूटा-फूटा रिक्शा क्यों चलाना पड़ता ?

रिहाई मंच अध्यक्ष एडवोकेट मुहम्मद शुऐब ने कहा कि चुनाव के नजदीक आते ही इस तरह की गिरफ्तारियां पहले भी होती रही हैं  जिससे बहुसंख्यक समाज को दहशत जदा करके उनके वोट हासिल किए जा सकें। इसकी उच्च स्तरीय जाँच हो जिससे हकीकत सामने आए। पुलिस और मीडिया तो खुद जज बनकर फैसला सुनाती रही है जिसके नतीजे में बेगुनाहों को अपनी जिन्दगी के बेशक़ीमती वक्त निर्दोष होते हुये भी जेल की काल कोठरियों में गुजारनी पड़ी। इस तरह के कई मुकदमों को हमने लड़ा है जिसको पुलिस खूंखार आतंकवादी बता रही थी वह अदालत से निर्दोष साबित हुए।

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