समकालीन जनमत
शख्सियत

प्रेमचंद और हिंदुस्तानी सिनेमा : जवरीमल्ल पारख

(31 जुलाई को प्रेमचंद की 140वीं जयंती के अवसर पर समकालीन जनमत 30-31 जुलाई ‘जश्न-ए-प्रेमचंद’ का आयोजन कर रहा है। इस अवसर पर समकालीन जनमत लेखों, ऑडियो-वीडियो, पोस्टर आदि की शृंखला प्रकाशित कर रहा है। इसी कड़ी में प्रस्तुत है जवरीमल्ल पारख का यह लेख: सं।)

प्रेमचंद (1880-1936) हिंदी और उर्दू साहित्य परंपरा के निर्विवाद रूप से श्रेष्ठ कथाकार हैं। बनारस के पास एक छोटे से गांव लमही में उनका जन्म हुआ था। आरंभिक उच्च शिक्षा प्राप्त कर उन्होंने शिक्षा विभाग में कार्य किया और नौकरी के दौरान ही बी ए की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने आरंभ में अपना लेखन उर्दू में किया और बाद में हिंदी में भी लिखने लगे। शुरुआती आदर्शवाद से मुक्त होते हुए उन्होंने में अपने समय के ग्रामीण और शहरी यथार्थ को उनमें निहित जटिल अंतर्विरोधों के साथ देखा और समझा था। उनके लेखन की प्रेरणा और शक्ति दोनों ही स्वाधीनता आंदोलन था। उनकी कहानियों का पहला संग्रह सोज़े वतन को अंग्रेज सरकार ने जब्त कर लिया था। लेकिन इस स्वाधीनता आंदोलन में अंतर्निहित अंतर्विरोधों की भी उन्होंने अनदेखी नहीं की और जहां ज़रूरी लगा उन्होंने अपने लेखन में उसे उजागर भी किया। गबन के एक प्रमुख पात्र देवीदीन खटिक के मुख से उन्होंने यह कहलाकर कि जॉन की जगह गोविंद के बैठने से व्यवस्था नहीं बदलती, एक तरह से उन्होंने आज़ादी किससे से ज्यादा ज़रूरी इस सवाल को माना कि आज़ादी किसके लिए। उनके संपूर्ण साहित्य के महत्त्व को इसी सवाल के इर्द-गिर्द रखकर समझा जा सकता है।

प्रेमचंद का जन्म एक निम्नमध्यवर्गीय परिवार में हुआ था, लेकिन शिक्षा, मेहनत और प्रतिभा के बल पर उन्होंने शिक्षा विभाग में उच्च पद हासिल किया था। लेकिन 1920 में महात्मा गांधी के आह्वान पर उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र देकर केवल लेख़न के बल पर जीवनयापन करने का निश्चय किया। यह एक मुश्किल निर्णय था। लेकिन उन्होंने न केवल पीछे मुड़कर नहीं देखा बल्कि इस पूरे दौर में स्वयं उन्होंने हंस, जागरण जैसी महत्त्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं का संपादन और प्रकाशन किया। हिंदी में किसी लेखक के लिए केवल अपने लेखन से जीवनयापन करना न तब आसान था और न अब आसान है। अपने समकालीनों को लिखे पत्रों से उनकी कठिन आर्थिक स्थिति का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। 1930 के दशक तक आते-आते एक लेखक के तौर पर उनकी ख्याति सारे देश में व्याप्त हो चुकी थी। उनकी यह ख्याति फ़िल्मकारों के बीच पहुंचना भी स्वाभाविक था। 1931 से जब सवाक फ़िल्मों की शुरुआत हुई, तो ऐसे कई फ़िल्मकार और फ़िल्म कंपनियां सामने आयीं जो मनोरंजन से इतर अपने समय के ज्वलंत सवालों को लेकर भी फ़िल्म बनाना चाहते थे। स्पष्ट ही अच्छी फ़िल्म के लिए अच्छे लेखक की भी ज़रूरत होती है और ऐसे में हिंदुस्तानी में फ़िल्म बनाने वाले फ़िल्मकारों का ध्यान प्रेमचंद की ओर जाना स्वाभाविक था। उस दौर में आज़ादी का आंदोलन भी एक ऐसे मुक़ाम पर पहुंच चुका था कि सेंसर व्यवस्था के बावजूद फ़िल्मकार चाहते थे कि उनकी फ़िल्मों में अपने समय और समाज का यथार्थ प्रतिध्वनित हो।

उस दौर के ऐसे ही एक महत्वपूर्ण फ़िल्मकार थे, मोहन भवनानी (1903-62) जिन्होंने हिंदी-उर्दू के महान लेखक प्रेमचंद को अपनी फ़िल्म निर्माण कंपनी अजंता सिनेटोन के लिए लेखक के रूप में आठ हजार रुपये प्रति वर्ष पर अनुबंधित किया। उन्होंने मुंबई में रहकर मोहन भवनानी की फ़िल्म मज़दूर (1934) की पटकथा लिखी। लेकिन फ़िल्मों का यह अनुभव प्रेमचंद को ज्यादा रास नहीं आया। प्रेमचंद इस आशा से मुंबई पहुँचे थे कि वे स्वतंत्र लेखन और पत्र-पत्रिकाओं के प्रकाशन द्वारा जिन आर्थिक दुश्वारियों में फंसे रहते हैं, उन्हें उससे कुछ हद तक मुक्ति मिलेगी।

मुंबई में रहते हुए उन्होंने अपने मित्रों को जो पत्र लिखे उससे ज़ाहिर है कि प्रेमचंद फ़िल्म वालों की व्यावसायिक मानसिकता से दुखी थे। उन्होंने इंद्रनाथ मदान को लिखे पत्र में लिखा था, ‘सिनेमा साहित्यिक आदमी के लिए ठीक जगह नहीं है। मैं इस लाइन में यह सोचकर आया था कि आर्थिक रूप से स्वतंत्र हो सकने की कुछ संभावनाएँ इसमें दिखायी देती थीं लेकिन अब मैं देख रहा हूँ कि मेरा भ्रम था और अब फिर साहित्य की ओर लौट रहा हूँ’ (कलम का सिपाही, हंस प्रकाशन, इलाहाबाद, 1976, पृ. 547)। जैनेंद्र कुमार को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा था, ‘ये प्रोड्युसर जिस ढंग की कहानियाँ बनाते आये हैं, उसकी लीक से जौ भर भी नहीं हट सकते। वल्गैरिटी को ये लोग एंटरटेनमेंट वैल्यू कहते हैं। अद्भुत ही में इनका विश्वास है। राजा-रानी, उनके मंत्रियों के षड्यंत्र, नकली लड़ाई, बोसेबाजी, यही उनके मुख्य साधन हैं। मैंने सामाजिक कहानियाँ लिखी हैं जिन्हें शिक्षित समाज भी देखना चाहे, लेकिन उनको फ़िल्म करते इन लोगों को संदेह होता है कि चले या न चले’ (वही, पृ. 547)। प्रेमचंद फ़िल्मी दुनिया पर टिप्पणी करते हुए अपनी पत्नी शिवरानी देवी को लिखते हैं, ‘यह एक बिल्कुल नयी दुनिया है। साहित्य से इसका बहुत कम सरोकार है। इन्हें तो रोमांचकारी सनसनीखेज कहानियाँ चाहिए। अपनी ख्याति को खतरे में डाले बगैर मैं जितनी दूर तक डाइरेक्टरों की इच्छा पूरी कर सकूँगा उतनी दूर तक करूंगा, मुझे करना पड़ेगा। ज़िन्दगी में समझौता करना ही पड़ता है। आदर्शवाद महँगी चीज़ है और बाज़ औक़ात उसको दबाना पड़ता है’ (वही, पृ. 539)। ठीक यही कारण था कि प्रेमचंद फ़िल्मों के आकर्षण को छोड़कर बनारस लौट आये।

यहाँ इस बात का उल्लेख करना ज़रूरी है कि प्रेमचंद को मजदूर फिल्म के निर्माता और निर्देशक मोहन भवनानी आग्रह कर मुंबई ले गये थे। यह फिल्म औद्योगिक मजदूरों के शोषण पर आधारित थी और अपने समय की एक महत्त्वपूर्ण और चर्चित फ़िल्म थी। स्वयं मोहन भवनानी, जिन्होंने फ़िल्म बनाने की शिक्षा जर्मनी जाकर हासिल की थी, एक प्रगतिशील विचार वाले फ़िल्मकार थे। औद्योगिक मज़दूरों के शोषण और उत्पीड़न पर फ़िल्म बनाना एक साहस का काम था जिसकी क़ीमत भी उन्हें चुकानी पड़ी। प्रेमचंद का ऐसी फिल्म के साथ जुड़ना उनके वैचारिक और साहित्यिक रुझानों के अनुरूप था। प्रेमचंद मनोरंजन प्रदान करने वाली बाजारू फिल्म लिखने नहीं गये थे। इसके बावजूद प्रेमचंद का निराश होना यही बताता है कि मुंबई में फिल्म बनाने का बुनियादी नज़रिया व्यावसायिक था क्योंकि फिल्म बनाने के लिए फिल्मकार जिन लोगों पर निर्भर थे, उनके लिए फिल्म महज व्यवसाय था। इसके बावजूद मजदूर फिल्म मजदूरों के उत्पीड़न को कुछ हद तक दिखाने में कामयाब हुई थी। और इसी वजह से इस फिल्म को मुंबई के सेंसर बोर्ड के पूंजीपति सदस्यों ने पारित होने से रोकने की कोशिश की। बाद में यह फिल्म पंजाब और दिल्ली में भी प्रतिबंधित कर दी गयी और फिर केंद्र ने भी इस पर यह कहते हुए रोक लगा दी कि यह फिल्म मजदूरों को भड़काती है (एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन सिनेमा, पृ. 259 और कलम का सिपाही, पृ. 541)। यह फ़िल्म इतनी बुरी भी नहीं थी। इसकी बहुत अच्छी रिव्यू अमेरिका की मशहूर पत्रिका ‘एशिया’ में निकली थी (कलम का सिपाही, पृ. 541)।

प्रेमचंद ने थोड़े समय में ही फिल्मी दुनिया की बुनियादी कमजोरियों को पहचान लिया था। बलराज साहनी सहित कई अन्य लेखकों का अनुभव भी फिल्मी दुनिया के बारे में इससे कुछ अलग नहीं थे। ऐसा नहीं था कि प्रेमचंद वहां नाकामयाब रहे थे। खुद मोहन भवनानी उनसे अपनी अगली फिल्म लिखवाना चाहते थे। उस दौर के बहुत बड़े अभिनेता, निर्माता और बॉम्बे  टॉकीज के मालिक हिमांशु राय ने भी उन्हें अपनी कंपनी के लिए लिखने के लिए आमंत्रित किया था। यहां तक कि उन्होंने प्रेमचंद की इस शर्त को भी स्वीकार कर लिया था कि वे चाहें तो कहानियां बनारस से लिखकर भेजें फिर भी प्रेमचंद तैयार नहीं हुए (कलम का सिपाही, पृ. 547)। कुछ अर्से बाद तो उनका देहांत ही हो गया।

यहां यह बात ज़रूर कही जानी चाहिए कि प्रेमचंद का फ़िल्मों के लिए लेखन करना एक असफल प्रयोग नहीं था। वे भले ही असंतुष्ट रहे हों बल्कि मुंबई में रहने के दौरान ही एक और अपने समय के ख्यात फ़िल्मकार नानूभाई वकील ने 1934 में ही उनके प्रख्यात उपन्यास सेवासदन पर इसी नाम की फ़िल्म बनायी थी। प्रेमचंद को यह फ़िल्म देखने का मौका भी मिला था, लेकिन उसे देखकर वे बहुत निराश हुए और उन्होंने यह मानने से इन्कार कर दिया कि यह उनके उपन्यास पर आधारित फ़िल्म है। दरअसल, मज़दूर की पटकथा एक कामयाब पटकथा थी, भले ही स्वयं प्रेमचंद को फ़िल्म के लिए लिखना रुचिकर न लगा हो। शायद इसलिए कि उन्हें फ़िल्मकार की दखलंदाजी उचित नहीं लगती थी जैसा कि उन्होंने अपने पत्रों में लिखा भी है। अब तक वे अपने लेखन में पूरी तरह स्वतंत्र रहे थे। उन्होंने कभी इस बात की परवाह नहीं की थी कि लोग उनकी रचना को पसंद करेंगे या नहीं। ज़ाहिर है कि फ़िल्म के लिए लिखना स्वतंत्र लेखन से पूरी तरह अलग बात है। वे इस बात को तो शायद ठीक से समझ पाये थे कि फ़िल्म एक दृश्य माध्यम है और उसके लिए अलग तरह के लेखन कौशल की आवश्यकता होती है। इसका प्रमाण यह है कि उन्हें मज़दूर के बाद भी फ़िल्मों के लिए लिखने के प्रस्ताव मिले थे।

फ़िल्मों के लिए लेखन करने का अनुभव प्रेमचंद का कितना ही निराशापूर्ण क्यों न रहा हो, लेकिन प्रेमचंद के जीवित रहते कई फ़िल्मकार उनकी रचनाओं पर फ़िल्म बनाने को उत्सुक थे। जैसाकि पहले कहा जा चुका है, प्रेमचंद का पहला महत्त्वपूर्ण उपन्यास सेवासदन ( उर्दू में नाम बाज़ारे हुस्न) जिसका प्रकाशन 1919 में हुआ था, वह पहली कृति थी, जिस पर हिंदी में 1934 में फ़िल्म बनी। प्रेमचंद को यह फ़िल्म पसंद नहीं आयी लेकिन इस उपन्यास की ख्याति सुदूर दक्षिण तक फैल चुकी थी। अपने समय के प्रख्यात तमिल फ़िल्मकार कृष्णस्वामी सुब्रह्मण्यम (1904-1971) ने 1938 में सेवासदन पर तमिल भाषा में इसी नाम से फ़िल्म बनायी। इस उपन्यास पर बनी हिंदी फ़िल्म के विपरीत यह तमिल फ़िल्म मूल कृति के प्रति ज्यादा ईमानदार थी। इसमें प्रसिद्ध गायिका एम. एस. सुब्बुलक्ष्मी ने नायिका सुमन की भूमिका निभायी थी। सुब्बूलक्ष्मी ने ही 1944 में तमिल और हिंदी में बनी फ़िल्म मीरा में मीरा की भूमिका निभायी थी। इस फ़िल्म में सुब्बूलक्ष्मी द्वारा गाये मीरा के भजन आज भी लोकप्रिय हैं। सेवासदन फ़िल्म का संगीत भी काफ़ी लोकप्रिय हुआ था। दरअसल, प्रेमचंद के इस उपन्यास का आर. एस. सुब्बूलक्ष्मी द्वारा तमिल में अनुवाद होकर पत्रिकाओं में उसी दौर में प्रकाशित हो रहा था। उसी अनुवाद से प्रेरित होकर के. सुब्रह्मण्यम ने यह फ़िल्म बनायी थी। दक्षिण में ब्राहृमण समुदाय ने ब्राह्मण विरोधी बताकर इस फ़िल्म् पर प्रतिबंध लगाने की मांग भी की थी।

आज़ादी के बाद प्रेमचंद की रचना पर पहली फ़िल्म 1959 में बनी। प्रेमचंद की अत्यंत लोकप्रिय कहानी दो बैलों की कथा पर 1959 में हीरा मोती नाम से हिंदी में फ़िल्म बनायी गयी। हीरा और मोती इन दो बैलों के ही नाम होते हैं जिनको झूरी नाम के किसान ने पाल रखा है। झूरी इन बैलों से बहुत स्नेह भी करता है और ये मूक जानवर भी उसके इस स्नेह को महसूस करते हैं। वे मेहनत से काम भी करते हैं लेकिन जब वे ऐसे मालिक के पास पहुंच जाते हैं जो उनको पूरा खाने को भी नहीं देता, काम भी ज्यादा लेता है और उनको मारता-पीटता भी है तो ये बैल विद्रोह कर देते हैं। दरअसल यह एक प्रतीकात्मक कथा है जो बताती है कि आज़ादी सबको प्रिय है और गुलामी किसी को भी नहीं। प्रेमचंद की यह कहानी इन दो बैलों के बारे में ही हैं। उन्हीं के इर्द गिर्द पूरी कथा चलती है। दोनों बैलों का प्रेमचंद ने मानवीकरण कर दिया था। दोनों बैल मनुष्य की तरह सोचते हैं, मनुष्य की तरह अनुभव करते हैं और मनुष्य की तरह आपस में बातें भी करते हैं। प्रेमचंद ने दोनों बेलो का चरित्र भी अलग-अलग ढंग से निर्मित किया है। हीरा सहनशील और शांत स्वभाव का है जबकि मोती उग्र और गुस्सैल। लेकिन दोनों में गहरा स्नेह है और एक दूसरे पर जान भी छिड़कते हैं और एक दूसरे के लिए जान भी दे सकते हैं।

प्रेमचंद की इस कहानी को फ़िल्मकार ने काफ़ी हद तक बदल दिया है। फ़िल्म हीरा और मोती के बारे में कम और झूरी तथा उसके परिवार के बारे में ज्यादा है। यह किसानों और ज़मींदार के बीच संघर्ष की कहानी के रूप में हमारे सामने आती है। फ़िल्म की इस कहानी का प्रेमचंद की कहानी से बहुत मामूली सा संबंध है। हालांकि फ़िल्म की कहानी प्रेमचंद की सोच से दूर नहीं है लेकिन दो बैलों की कथा के माध्यम से प्रेमचंद जो कहना चाहते हैं और जिस ढंग से कहना चाहते हैं, फ़िल्म में उसका थोड़ा सा भी संकेत नहीं है। फ़िल्म में प्रेमचंद की कहानी तो लगभग अनकही रह जाती है। हां, अगर प्रेमचंद की कहानी से इसे न जोड़ा जाय और एक बिल्कुल भिन्न कहानी पर बनी फ़िल्म के रूप में इसे देखा जाय तो, यह किसान जीवन पर बनी एक ठीक-ठाक फ़िल्म कही जा सकती है। दरअसल, प्रेमचंद की मूलकथा का रूपांतरण कहीं ज्यादा बड़ी चुनौती थी। फ़िल्मकार ने उस चुनौती को स्वीकार करने की बजाय आसान रास्ता चुनना बेहतर समझा है। इसके लिए लोकप्रिय सिनेमा की परंपरागत रूढ़ियों का पालन फ़िल्मकार ने किया है जिन्हें ग्रामीण जीवन पर बनने वाली अधिकतर फ़िल्मों में देखा जा सकता है। शायद इसी वजह से यह एक औसत फ़िल्म बन कर रह गयी है। इस फ़िल्म में बलराज साहनी और निरुपा राय ने मुख्य भूमिकाएं निभायी थीं। शैलेंद्र और प्रेम धवन ने गीत लिखे थे और रोशन ने संगीत दिया था। इसका संपादन ऋषिकेश मुखर्जी ने किया था। इसका निर्देशन कृष्ण चोपड़ा ने किया था।

कृष्ण चोपड़ा ने 1966 में एक बार फिर प्रेमचंद के उपन्यास गबन पर फ़िल्म का निर्माण और निर्देशन किया। लेकिन फ़िल्म के दौरान ही उनका देहांत हो गया जिस वजह से यह फ़िल्म ऋषिकेश मुखर्जी के निर्देशन में पूरी हुई। इस फ़िल्म के संवाद अख्तर उल ईमान और बैज शर्मा ने लिखे थे। संगीत शंकर जयकिशन का था और गीत शैलेंद्र और हसरत जयपुरी के थे। सुनील दत्त ने इसमें रमानाथ की और साधना ने जालपा की भूमिका निभायी थी। उपन्यास का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पात्र देवीदीन खटिक की भूमिका कन्हैया लाल ने निभायी थी। गबन प्रेमचंद का एक महत्वपूर्ण उपन्यास है जिसकी कथा का परास काफी विस्तृत है। स्त्री की गहनों के प्रति लालसा से शुरू होकर आज़ादी के आंदोलन तक की इसकी कथा फैली हुई है। अपने अन्य प्रमुख उपन्यासों के विपरीत इसकी कथा शहरी मध्यवर्ग की है। प्रेमचंद ने मध्यवर्ग के किसी क्रांतिकारी या स्वतंत्रता सेनानी को मुख्य पात्र बनाने की बजाय एक ऐसे पात्र को लिया है जिसका स्वाधीनता आंदोलन से कोई संबंध नहीं है। जो एक कमजोर चरित्र का दिखावा करने वाला, झूठ बोलने वाला और अपने लाभ-लोभ के लिए अपनों को भी धोखा देने वाला पात्र है। रमानाथ ऐसा ही पात्र है। वह अपनी पत्नी से झूठ बोलता है। उसे चंद्रहार दिलाने का वादा करता है और इसके लिए सरकारी खजाने से पैसा चुरा लेता है। दूसरे दिन वह जब सरकारी पैसा खंजाची के पास ज़मा नहीं करा पाता तो पुलिस के डर से शहर छोड़कर भाग जाता है। पत्नी जालपा अपना चंद्रहार बेचकर पति का पैसा जमा करा देती है। उसके चरित्र का यह दब्बूपन कलकत्ता में भी उसका पीछा नहीं छोड़ता। उस अनजाने शहर में देवीदीन खटिक नामक एक व्यक्ति उसकी मदद करता है जिसके दो बेटे देश के लिए शहीद हो गये थे। लेकिन वहां भी जेल जाने के डर से पुलिस के डराने-धमकाने पर स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध झूठी गवाही देने को तैयार हो जाता है। पत्नी जालपा के तिरस्कार से लज्जित होकर वह कोर्ट के सामने सच-सच बताने की हिम्मत जुटा पाता है।

गबन में उपन्यास की मूल कथा से ज्यादा विचलन नहीं है। हालांकि बहुत सी प्रासंगिक कथाएं और उपन्यास में चलने वाली महत्त्वपूर्ण बहसें इसमें नहीं है। जालपा और देवीदीन खटिक के चरित्र को भी विकसित होने का अवसर कम मिला है। लेकिन उपन्यास के मूल कथानक के प्रति काफ़ी हद तक ईमानदारी बरती गयी है। हीरा मोती की तरह इस फ़िल्म को भी सिनेमा के लोकप्रिय ढांचे में ही बनाया गया है। फ़िल्म में रोचकता बनी रहती है लेकिन उपन्यास की तुलना में फ़िल्म एक साधारण रूपांतरण ही बन पायी है।

प्रेमचंद की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रचना गोदान (1963) पर भी इसी नाम से फ़िल्म बनी। इस फ़िल्म के निर्देशक त्रिलोक जेतली थे जो स्वयं एक अभिनेता भी थे। इस फ़िल्म का संगीत प्रख्यात सितारवादक रविशंकर ने दिया था और गीत अनजान ने लिखे थे। फ़िल्म में होरी की भूमिका राजकुमार ने, धनिया की भूमिका कामिनी कौशल ने, गोबर की भूमिका महमूद ने और झूनिया की भूमिका शोभा खोटे ने निभायी थी। फ़िल्म देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि फ़िल्मकार ने अपनी तरफ से उपन्यास के मूल कथानक को ईमानदारी से पेश करने की कोशिश की है। लेकिन दो घंटे की फ़िल्म में एक महाकाव्यात्मक उपन्यास को पेश करना असंभव है। इस वजह से कई प्रासंगिक कथाएं या तो छोड़ दी गयी है या उन्हें संक्षिप्त कर दिया गया है। मसलन, मेहता और मालती का पूरा प्रसंग दो-तीन दृश्यों में समेट दिया गया है। फ़िल्मकार ने कोशिश की है कि मेहता और मालती का चरित्र ठीक वैसा ही उभरे जैसा उपन्यास में वर्णित है। इसी तरह मातादीन और सिलिया का पूरा प्रसंग फ़िल्म से गायब है। झुनिया जिससे गोबर प्रेम करने लगता है, वह विधवा स्त्री है लेकिन फ़िल्म में उसके विधवा होने के तथ्य को छोड़ दिया गया है। फ़िल्मकार ने होरी के गाय पालने की लालसा और महाजनों द्वारा शोषण से जुड़े प्रसंगों को ही कथानक के केंद्र में रखा है। होरी और धनिया का चरित्र वैसा ही गढ़ा गया है जैसा उपन्यास में है। लेकिन होरी के किरदार में राजकुमार का चयन बहुत उपयुक्त नहीं प्रतीत होता। काफी कोशिश के बावजूद भी राजकुमार अपने कंधे झुकाकर चलने की शैली से पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाये हैं। हां, संवादों की अदायगी कुछ हद तक ठीक है।

प्रेमचंद पर 1934 से लेकर 1966 तक बनी सभी फ़िल्मों के साथ विडंबना यह रही कि फ़िल्मकार प्रेमचंद की रचनाओं से प्रभावित तो नज़र आते हैं लेकिन उनके सामने फ़िल्म बनाने के लोकप्रिय ढांचे के अतिरिक्त कोई और विकल्प नहीं था। उन्होंने इसी ढांचे में प्रेमचंद की क्लासिक रचनाओं को फिट करने की कोशिश की, जिसमें वे नाकामयाब रहे। वे इस बात को नहीं समझ पाये कि प्रेमचंद की इन रचनाओं में कथानक से ज्यादा महत्त्वपूर्ण वह जटिल राजनीतिक-सामाजिक संरचना है जिसके बीच यें कथानक अवस्थित भी हैं और विकसित भी हुए हैं। इस संरचना के बाहर न कथानक और न चरित्र अपना प्रभाव छोड़ सकते हैं। अगर फ़िल्मकार इस संरचना को समझ पाते तो इन सभी फ़िल्मों की प्रस्तुति कुछ और ढंग से होती।

समानांतर सिनेमा के दौर में प्रेमचंद की रचनाओं की तरफ फ़िल्मकारों का ध्यान एक बार फिर से गया। सत्यजित राय ने इस दौर में पहली बार दो फ़िल्में हिंदी में बनायी और ये दोनों फ़िल्में शतरंज के खिलाड़ी (1977) और सद्गति (1981) प्रेमचंद की इन्हीं नाम की कहानियों पर आधारित थीं। इसी दौर में मृणाल सेन ने भी प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी कफ़न पर तेलुगु में ओका उरी कथा (1977) नाम से फ़िल्म बनायी थी। निश्चय ही तीनों फ़िल्में पहले बनी फ़िल्मों की तुलना में भिन्न तरह की हैं। ये दोनों फ़िल्मकार राजनीतिक-सामाजिक दृष्टि से अधिक प्रगतिशील और फ़िल्मकार के रूप में अधिक रचनात्मक और कलात्मक फ़िल्में बनाने के लिए जाने जाते थे।

शतरंज के खिलाड़ी एक छोटी लेकिन प्रख्यात कहानी है जिसमें प्रेमचंद ने वाजिदअली शाह के जमाने के सामंती लखनऊ की पतनशील संस्कृति को उजागर किया है। मीर रौशन अली और मिर्ज़ा सज्जाद अली नाम के दो ज़मींदारों के शतरंज खेलने की लत को केंद्र में रखकर उन्होंने इस विडंबना को उजागर किया कि जो सामंत शतरंज के बादशाह और वज़ीर के लिए एक दूसरे की जान ले लेते हैं वे अपने वतन की रक्षा के लिए एक बूंद खून बहाने को तैयार नहीं है। इसी विडंबना को सत्यजित राय ने प्रेमचंद की ही कहानी से संकेत लेकर अवध को हथियाने की लार्ड डलहौजी की चालों और वाजिदअली शाह द्वारा लखनऊ को बचाने की दयनीय कोशिशों के संदर्भ में प्रस्तुत किया है। कहानी को पढ़ने से यह साफ हो जाता है कि प्रेमचंद इस बात में यकीन करते थे कि लखनऊ की तत्कालीन दुर्दशा के लिए वाजिदअली शाह का शासन जिम्मेदार था। फ़िल्म में सत्यजित राय ने कमोबेश यही रवैया अपनाया है, हालांकि इतिहासकार अब इस मत से पूरी तरह सहमत होते नज़र नहीं आते। वे वाजिद अली शाह को एक खलनायक की तरह पेश करने की बजाय उस समय के हालात का ज्यादा गहरायी से जायजा लेते हैं। नये तथ्यों ने प्रेमचंद की कहानी के महत्त्व को कम नहीं किया था बल्कि और बढ़ा दिया था इसीलिए सत्यजित राय ने अवध के पतन के लिए एक स्वतंत्र फ़िल्म बनाने की बजाय प्रेमचंद की कहानी को ही आधार के रूप में चुना।

प्रेमचंद यदि कहानी में एक तरफ वाजिदअली शाह के शासन की आलोचना करते हैं, तो दूसरी तरफ वे मीर और मिरज़ा जैसे ज़मींदारों की आलोचना भी करते हैं। फ़िल्म में सत्यजित राय ने वाजिदअली शाह के हथियार डालने का विस्तार से चित्रण किया है। जिस समय मीर और मिर्ज़ा लखनऊ शहर से दूर गांव में बैठे शतरंज खेल रहे होते हैं, उस गांव में जिसके सारे बाशिंदे गौरों की फौज से डरकर भाग चुके होते हैं और ऐसे कई-कई गांव इस डर से खाली हो चुके हैं। रेजिडेंट ऑट्रम (रिचर्ड एटनबरो) अहदनामे पर दस्तखत करने लिए वाजिदअली शाह को तीन दिन की मुहलत देता है। वाजिदअली शाह दस्तखत नहीं करता और न ही वह अवध हथियाने की कोशिशों का विरोध करता है। नतीजतन उसे नज़रबंद कर लिया जाता है और लखनऊ से बहुत दूर कलकत्ता भेज दिया जाता है। दूसरी ओर शतरंज के खिलाड़ी मीर और मिरज़ा खेल के दौरान आपस में लड़ पड़ते हैं। मीर मिरज़ा पर अपनी पिस्तौल से गोली चला देता है, गोली मिरज़ा की बाहं से हल्की सी छूती हुई निकल जाती है। इस दौरान कंपनी की फौज लखनऊ पर कब्जा कर और वाजिदअली शाह को गिरफ्तार कर वापस भी लौट जाती है। मीर और मिर्ज़ा में भी सुलहनामा हो जाता है और वे दोनों वापस शतरंज खेलने बैठ जाते हैं।

फिल्म का यह अंत कहानी से अलग है। कहानी में मीर और मिर्ज़ा शतरंज को लेकर एक दूसरे से भिड़ जाते हैं। अपनी-अपनी तलवारें निकाल लेते हैं और इस तरह वे लड़ते हुए एक-दूसरे को मार डालते हैं। कहानी के इस अंत की व्याख्या प्रायः इस रूप में की गयी है कि प्रेमचंद ने इस मरणासन्न सामंतवाद की मौत को एक ऐतिहासिक सच्चाई के रूप में रखा है जबकि सत्यजित राय ने उन्हें दुबारा शतरंज खेलते हुए दिखाकर यह बताना चाहा है कि जिस सामंतवाद के मरने की भविष्यवाणी प्रेमचंद ने अपनी कहानी के ज़रिये की थी, वह दरअसल मरा नहीं था। आज़ाद भारत में भी यह सामंतवाद पूंजीवाद के साथ गठजोड़ कर अपने को बचाये और बनाये हुए है। यदि प्रेमचंद ने अपने ढंग से एक ऐतिहासिक सच्चाई को पेश किया था तो सत्यजित राय ने उसी सच्चाई को अपने वर्तमान संदर्भों में पुनर्व्याख्यायित करने का प्रयास किया है। इस दृष्टि से यह एक ऐतिहासिक महत्त्व की महाकाव्यात्मक कहानी है और सत्यजित राय ने कहानी में निहित इस महाकाव्यात्मकता को अक्षुण्ण रखा है।

सत्यजित राय ने प्रेमचंद की ही कहानी सद्गति पर दूसरी फ़िल्म बनायी थी। इस फ़िल्म में ओम पुरी, स्मिता पाटिल और मोहन अगाशे ने मुख्य भूमिका निभायी थी। फ़िल्म के संवाद लेखन में प्रेमचंद के पुत्र अमृतराय ने भी सहयोग दिया था और पटकथा स्वयं सत्यजित राय ने लिखी थी। फ़िल्म का संगीत भी उन्हीं का था। यह ब्राह्मणों द्वारा दलित उत्पीड़न पर लिखी एक अत्यंत मर्मस्पर्शी कहानी है। कहानी बस इतनी है कि बीमारी से उठा हुआ दुखी नामक दलित किसान अपनी बेटी के विवाह का शुभ लगन निकलवाने के लिए पंडित घासीराम के पास जाता है जो अपना अधिकार मानते हुए दुखी से कई तरह की बेगार लेने लगता है और एक ऐसी लकड़ी को चीरने के काम में लगा देता है जिसे चीरते-चीरते उसकी तबीयत खराब हो जाती है और वह वहीं मर जाता है। दुखी की लाश को दलित यह कहते हुए छूने से इन्कार कर देते हैं कि यह पुलिस का मामला है। विवश होकर स्वयं पंडित घासीराम दुखी की लाश को रस्सी से बांधकर दूर गांव के बाहर छोड़ आता है। यह फ़िल्म कहानी की अंतर्वेदना को और उससे नि:सृत होने वाली समझ को पूरी तरह से बरक़रार रखते हुए उसके मर्म को दर्शकों तक पहुंचाने में कामयाब रहती है। शतरंज के खिलाड़ी के विपरीत सत्यजित राय ने इस फ़िल्म के लिए कहानी में लगभग कोई परिवर्तन नहीं किया या कहना चाहिए कि सिर्फ़ उतने परिवर्तन किये जो एक माध्यम से दूसरे माध्यम में रूपांतरण के लिए ज़रूरी होते हैं। इसकी वजह शायद यह थी कि दलित उत्पीड़न पर आधारित इस कहानी का फ़िल्मांतरण करते हुए वे इस पर अपनी तरफ़ से कोई व्याख्या नहीं थोपना चाहते थे। यही नहीं कहानी की तल्खी को वे जितना मुमकिन हुआ उसे ‘डाइल्यूट’ नहीं होने देते। हालांकि विनोद दास ने कहानी के संवादों और फ़िल्म के संवादों की तुलना करके यह निष्कर्ष निकाला है कि ‘प्रेमचंद के यहां ब्राह्मणवाद के लिए नफ़रत और गुस्सा अपने प्राकृतिक और अपरिष्कृत रूप में आता है जिसे फ़िल्म में परिष्कृत और भद्रता की पोशाक में पेश किया गया है’ (भारतीय सिनेमा का अंत:करण, मेधा बुक्स, दिल्ली, पृ. 27)। इसके बावजूद सत्यजित राय यदि कहानी की आत्मा को अक्षुण्ण रख पाते हैं तो इसका कारण माध्यम में नहीं बल्कि उसके यथार्थ में निहित है।

सत्यजित राय की नज़र में स्वतंत्र भारत में भी दलित उत्पीड़न की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है। वह लगभग उसी रूप में मौजूद है जिस रूप में प्रेमचंद के समय में था। इस कहानी की विशेषता यह है कि यहां दलित उत्पीड़न ही नहीं है बल्कि दलितों द्वारा सामूहिक प्रतिरोध भी है। प्रतिरोध की गहरी चेतना ही प्रेमचंद की कहानी को अपने समय से आगे की रचना बनाती है। शायद यही कारण है कि सत्यजित राय यह कहानी अपने समय के लिए उसी रूप में प्रासंगिक प्रतीत हुई और उन्होंने उसे बिना कोई परिवर्तन किये यथावत प्रस्तुत कर दिया, लेकिन शब्दों से नहीं बल्कि दृश्यों से। फ़िल्म के दृश्य वह सब कुछ कह जाते हैं जो प्रेमचंद ने शब्दों के माध्यम से कहा है। आमतौर पर सत्यजित राय की फ़िल्म कला को कई फ़िल्म समीक्षक साहित्य की भाषा में प्रगीतात्मक मानते हैं। लेकिन यह फ़िल्म इस बात का उदाहरण है कि वे यथार्थवादी भी थे।

1977 में ही मृणाल सेन ने प्रेमचंद की प्रख्यात कहानी कफ़न पर तेलुगु भाषा में ओका उरी कथा नाम से फ़िल्म बनायी। इसके लिए मृणाल सेन ने कहानी में तेलंगाना क्षेत्र की विशिष्टता के अनुरूप बदलाव भी किये हैं। कहानी के पात्र घीसू और माधव यहां वैंकया और किस्टैया हैं जिनकी भूमिका दक्षिण के प्रख्यात अभिनेता वासुदेव राव और नारायण राव ने क्रमश: निभायी है। माधव की पत्नी बुधिया यहां किस्टैया की पत्नी निलम्मा है जिसकी भूमिका ममता शंकर ने निभायी है। प्रेमचंद की कहानी वहां से शुरू होती है जब घीसु और माधव घर के बाहर बैठे उबले आलू खा रहे हैं और अंदर बुधिया प्रसव वेदना से तड़प रही है। मृणाल सेन ने इस कहानी को विस्तार दिया है और कहानी में दिये संकेतों के आधार पर किस्टैया का पिता के विरोध के बावजूद निलम्मा से शादी करना और निलम्मा द्वारा घर को ढर्रे पर लाने की कोशिश करना फ़िल्म का हिस्सा बनाया गया है। मृणाल सेन ने इस कहानी का फ़िल्मांतरण कहानी की अपनी समझ के अनुसार किया है। इसे एक परिवार की कहानी तक सीमित न रखकर ग्रामीण व्यवस्था में गरीब किसानों और खेत मज़दूरों के शोषण और उत्पीड़न से जोड़ दिया है। लेकिन निलम्मा के प्रति उसके श्वसुर और पति के रवैये द्वारा पितृसत्ता को भी आलोचना में शामिल किया गया है। वैंकया (यानी मूल कहानी का घीसु) का चरित्र भी फ़िल्म में कफ़न से थोडा भिन्न है। वह ज़मींदारों को खरी-खोटी सुनाने से नहीं कतराता भले ही इस वजह से उसकी बहुत पिटाई भी हो जाती है। फ़िल्म के लिए कहानी में जो भी बदलाव किये गये हैं, वह मूल कहानी से बहुत दूर नहीं जाते बल्कि उसमें निहित संकेतों का विस्तार ही करते हैं। हां, यह अवश्य है कि कहानी में निहित विद्रुपता और विडंबना को फ़िल्म में काफ़ी हद तक व्यंग्य और विरोध में बदल दिया गया है। शतरंज के खिलाड़ी की तरह ओका उरी कथा के बदलाव भी विवादास्पद रहे हैं। इसके बावजूद यह फ़िल्म भी प्रेमचंद की कहानी का प्रगतिशील राजनीतिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य के साथ एक कलात्मक और रचनात्मक रूपांतरण है।

टेलीविजन माध्यम की बढ़ती लोकप्रियता के साथ-साथ समय-समय पर प्रेमचंद की कई रचनाओं का भी टेलीविजन के लिए धारावाहिक रूपांतरण होता रहा है। निर्मला, कर्मभूमि, गोदान आदि उपन्यासों के अलावा उनकी कई प्रसिद्ध कहानियों को भी टेलीविजन के लिए रूपांतरित किया गया है। प्रेमचंद की 125वीं जयंती के उपलक्ष में दूरदर्शन ने प्रेमचंद की रचनाओं के रूपांतरण का व्यापक कार्यक्रम बनाया था जिसका दायित्व फ़िल्मकार और लेखक गुलज़ार को दिया गया था। गोदान के धारावाहिक रूपांतरण में पंकज कपूर और सुरेखा सीकरी जैसे मशहूर कलाकारों ने काम किया था। गुलज़ार से जिस तरह की अपेक्षा लोगों की थी, वह उनके इन रूपांतरणों के माध्यम से पूरी नहीं हो पायी।

दरअसल प्रेमचंद ने अपना लेखन सिनेमा माध्यम को ध्यान में रखकर नहीं लिखा था। उनका लेखन सतह से देखने पर सरल लगता हो, लेकिन वह अपने समय के बहुत ही जटिल और अंतर्विरोधों से भरे सामाजिक यथार्थ का प्रतिनिधित्व करता है। उनके पात्र भी बहुत जटिल किस्म के हैं और उनमें इतने स्तर हैं कि उनमें से किसी की भी उपेक्षा चरित्र को कमजोर बना सकती है। किसी भी फ़िल्मकार के लिए प्रेमचंद की रचनाओं को सिनेमा के लिए रूपांतरित करना बहुत बड़ी चुनौती रहा है। प्रेमचंद जैसी प्रतिभा वाले लेखक के लिए वैसा ही प्रतिभाशाली फ़िल्मकार होना भी ज़रूरी है। शायद यही वजह है कि उनकी क्लासिक रचनाओं के उत्कृष्ट और चुनौतीपूर्ण रूपांतरण भी उन्हीं फ़िल्मकारों द्वारा संभव हुए हैं जिन्होंने इस काम को रचनात्मक चुनौती के रूप में ग्रहण किया था। आज भी फ़िल्मकारों के लिए प्रेमचंद वैसी ही रचनात्मक चुनौती बनकर उपस्थित हैं।

(जवरीमल्ल पारख, सेवानिवृत्त प्रोफेसर, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय, नई दिल्ली, पिछले चार दशक से साहित्य, सिनेमा, मीडिया और संस्कृति पर नियमित लेखन। साहित्य, सिनेमा और मीडिया पर अब तक दस से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। जनवादी लेखक संघ से संबद्ध मोबाइल: 9810606751)

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