समकालीन जनमत
व्यंग्य

आख़िर क्यों? दी नेशन वॉन्ट्स टू नो!

( एक तरफ़ महामारी और दूसरी तरफ़ सरकारी तंत्र की नाकामी के कारण मानव जीवन की हाड़ कंपा देने वाली ऐसी भयानक बेक़दरी को उसके पीछे के राजनीतिक-सामाजिक  यथार्थ के साथ इस दौर के कवियों और लेखकों ने भी बख़ूबी कलमबंद किया है। समकालीन जनमत पर आज पढ़िए लोकेश मालती प्रकाश का यह राजनीतिक व्यंग्य)-सम्पा. 

लोकेश मालती प्रकाश


पलायन या राष्ट्र की अन्तरात्मा के ख़िलाफ़ साज़िश!

लाखों मज़दूर सड़कों पर हैं। ऐसे ही कुछ मज़दूर औरंगाबाद में रेल की पटरी पर सो रहे थे कि ट्रेन उनको रौंदते हुए गुज़र गई। इस मसले पर किसी ने देश की सबसे बड़ी अदालत में गुहार लगाई। सबसे बड़ी अदालत मतलब शाही दरबार नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट। कानूनन अभी सुप्रीम कोर्ट ही देश की सबसे बड़ी अदालत है।

याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने कहा है कि अगर मज़दूर ख़ुद ही रेल की पटरी पर सोएँगे तो कोई इस तरह की घटना कैसे रोक सकता है। कोर्ट ने इस मामले में दखल देने से इंकार कर दिया है।

कोर्ट सही है। अगर कोई व्यक्ति नौकरी चले जाने की वजह से या काम-धन्धा बन्द होने की वजह से अपने घर की छत से कूदने का फ़ैसला कर ले तो सरकार उसे कैसे रोकेगी। गलती सरकार की नहीं है। उस आदमी की है।

सरकार कह-कह कर थक गई है कि उसने मज़दूरों के लिए सारी व्यवस्था कर दी है मगर इसके बावजूद मज़दूर रुकने की बजाय अपने घर की तरफ़ चल पड़े हैं तो इसमें सरकार की क्या गलती? सरकार ने अपनी ज़िम्मेदारी कह-कह कर पूरी कर दी है, अब जनता को धीरज रख कर अपना कर्त्तव्य पूरा करना चाहिए।

सरकारी वक़ील ने कहा कि मज़दूर धैर्य रख कर अपनी बारी का इन्तज़ार नहीं करना चाहते तो सरकार क्या करे। सरकार सबको एक साथ उठा कर उनके घर तो नहीं पहुँचा सकती? बिल्कुल नहीं पहुँचा सकती। इतनी बड़ी संख्या को सरकार एक बार में सिर्फ़ स्वर्ग पहुँचा सकती है उनके घर नहीं।

एक तो मज़दूरों ने सरकार के सारे आश्वासनों के बावजूद अपनी जगह पर रुक कर अपनी बारी आने का इन्तज़ार नहीं किया और दूसरे नींद आने पर पटरी पर ही सो गए!

क्या उनको नहीं मालूम था कि रेल की पटरी पर रेलगाड़ी आ सकती है? अपने घर-गाँव से दूर शहर आकर काम-धन्धा करने वालों को इतना तो पता होगा ही। लेकिन फिर भी वे मज़दूर पटरी पर सो गए।

आख़िर क्यों? दी नेशन वॉन्ट्स टू नो!

राष्ट्र यह भी जानना चाहता है कि आख़िर अचानक ऐसा क्या हो गया कि जो लोग सत्तर साल से अपनी बारी का इन्तज़ार कर रहे हैं उनका धैर्य तीस-चालिस दिन में जवाब दे गया?

मेरी कोर्ट से यह शिकायत है कि उसने इस पूरे मामले को गम्भीरता से नहीं लिया है।

यह कोई साधारण बात नहीं है कि मज़दूर जानबूझकर कर पटरी पर सो गए और उनको रौंदने के लिए ट्रेन भी आ गई! इसमें किसी गहरी साज़िश की बू आ रही है।

कहीं ऐसा तो नहीं कि जिनको मज़दूर बताया जा रहा है वे दरअसल ‘अर्बन नक्सल’ थे जो सोच-समझकर किसी साज़िश के तहत पटरी पर सो रहे थे?

हो सकता है वे ट्रेन पलटने के लिए पटरी खोलने की कोशिश कर रहे हों और इस बीच ट्रेन आ गई हो। या यह भी हो सकता है कि वे ‘मानव बम’ हों जो इसलिए पटरी पर ठीक उसी समय लेटे जब ट्रेन आने वाली थी।

मुझे लगता है कि वे असल में हमारी कर्मठ व देशभक्त सरकार को बदनाम करना चाहते थे। कुछ हद तक वे अपने मक़सद में कामयाब भी हुए हैं। मुझे पता चला है कि कई ऐसे लोग जो इस सरकार के मुरीद हुआ करते थे वे भी मज़दूरों को सड़कों पर और रेल की पटरियों पर चलता देख कर दुखी हो रहे हैं। कल को वे सरकार से सवाल पूछ सकते हैं!

लोगों को सवाल पूछने के लिए उकसाना सरकार के ख़िलाफ़ साज़िश नहीं तो और क्या है?

यह बेवजह तो नहीं कि सरकार के लाख आश्वासन देने के बावजूद, श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाने के बावजूद मज़दूर अपनी जगह पर रुकने की बजाय पैदल, रिक्शा पर, ट्रकों में और न जाने कैसे-कैसे सड़क पर निकल पड़े हैं।

और तो और बच्चों, महिलाओं और बूढ़ों तक को नहीं बख़्शा है – उनको भी तपती सड़क पर उतार दिया है। भूखे-प्यासे। इससे इनके ख़तरनाक मंसूबों का पता चलता है।

यह सब एक बहुत बड़ी साज़िश के तहत हो रहा है। सरकार के ख़िलाफ़ असंतोष फैला कर देश को अस्थिर करने की साजिश। राष्ट्र को तोड़ने की साजिश। हमारे कोमल हृदय प्रधानमंत्री को ठेस पहुँचा कर उनकी सेहत ख़राब करने की साजिश।

इसमें चीन या पाकिस्तान का हाथ भी हो सकता है। हो सकता है वे इन मज़दूरों के ज़रिए देश के कोने-कोने तक कोरोना फैला देना चाहते हों।

यह कपोल कल्पना नहीं है। आख़िर ऐसा क्या हो गया है कि लाखों-करोड़ों लोग इतनी बड़ी तादाद में सड़क पर उतर आए हैं? जबकि देश में लॉकडाउन है।

लेकिन हमारी भोली-भाली सरकार यह सब समझ ही नहीं पा रही है और अपने ही ख़िलाफ़ साज़िश करने वालों के लिए लगातार पैकेज पर पैकेज लुटा रही है। मुफ़्त का अनाज न्योछावर कर रही है।

अफ़सोस की बात यह है कि कोर्ट ने भी मामले की गम्भीरता को नहीं समझा। इस मामले में कोई दखल देने से इंकार करने की बजाय कोर्ट को इसकी जाँच का आदेश देना चाहिए था।

अभी भी वक़्त है। सरकार कड़े कदम उठा कर देश तोड़ने पर आमादा इन मज़दूरों की साज़िश को बेनक़ाब कर सकती है।

मेरा सुझाव है कि इन सभी मज़दूरों के खातों की जाँच कराई जानी चाहिए। हवाला चैनलों की जाँच होनी चाहिए – क्या पता इनको सीधे नगदी पहुँचाई गई हो? बसों-ट्रकों को देने के लिए, साइकिल ख़रीदने के लिए हज़ारों रुपए इन लोगों के पास कहाँ से आए जबकि कल तक खाने को कुछ नहीं था?

इसके अलावा वे सभी लोग जो इन मज़दूरों को राहत देने का काम कर रहे हैं उनकी भी जाँच होनी चाहिए। मुझे यक़ीन है कि कुछ भोले-भाले लोगों को छोड़ कर राहत देने वालों में भी बड़ी संख्या में राष्ट्र-विरोधी तत्व होंगे जो इस भयानक साज़िश में शामिल हो सकते हैं।

अंत में, मैं यह भी कहूँगा कि उस मीडिया पर भी अंकुश लगाया जाना चाहिए जो एक महा-षड्यंत्र को महा-पलायन बता कर देश की नाज़ुक अन्तरात्मा का ब्लड प्रेशर बढ़ा रहा है। वह भी इस महामारी में जबकि देश में न पर्याप्त आइसीयू हैं न वेंटिलेटर।

(लोकेश मालती प्रकाश, भोपाल के रहने वाले हैं। लेखक, कवि, अनुवादक और शिक्षा के सवालों पर एक कार्यकर्ता के रूप में जाने जाते हैं)

तस्वीर: सीमा कुरूप

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