समकालीन जनमत
कविता साहित्य-संस्कृति

‘ रेख्ता के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब, कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था ’

लखनऊ में ‘ब याद: मीर तकी मीर’ का आयोजन
‘रेख्ता के तुम ही नहीं हो उस्ताद ग़ालिब/कहते हैं अगले जमाने में कोई मीर भी था’.  गालिब के मुख से यह शायरी बेसाख्ता तब निकली जब उन्होंने किसी फकीर से मीर की एक नज्म सुनी. गालिब भी उनकी उस्तादी को मानते थे.  मीर तकी मीर आला दर्जे के शायर थे.  उनकी अपनी बात की अदायगी में बड़ी सादगी थी. गालिब की चर्चा तो आम रही. वे बहुत पढ़े गये पर मीर को कम जाना गया.
गौर किया जाय तो हम पायेंगे कि वे अट्ठारहवीं सदी के मुक्कमल शायर थे.  उन्होंने गज़लें लिखीं, रुबाइयां लिखीं. उनकी शायरी में सटायर है.  उन्हें शायरी का खुदा यानी ‘खुदा-ए-सुखन’ भी कहा गया. वे कोई रुमानी शायर नहीं थे. उनके यहां हुस्न व इश्क का जिक्र कम अपने आसपास के मसायल ज्यादा मिलेंगे. उन्होंने अपने दौर की हर चीज पर लिखा और कलम को तलवार की तरह इस्तेमाल किया.
उन्होंने लिखा ‘अमीरजादों से दिल्ली के न मिलाकर मीर/हम गरीब हुए हैं इन्हीं की बदौलत’. अमीरी और गरीबी की यह लड़ाई आज भी जारी है। इस मायने में वे जरूरी शायर हैं, इंकलाबी शायर हैं।
यह विचार लखनऊ में आज 6 फरवरी को ‘ब याद: मीर तकी मीर’ के आयोजन में उभर कर आया। कार्यक्रम वाइड ऐंगल वेलफेयर सोसायटी और जन संस्कृति मंच ने मिलकर किया था। माकपा कार्यालय, विधानसभा मार्ग हजरतगंज में आयोजित इस कार्यक्रम का आगाज मोमबती जलाकर किया गया। सदारत सोशल एक्टिविस्ट ताहिरा हसन  और प्रो खान आतिफ खान ने की. उर्दू के जाने माने लेखक इब्रााहिम अल्वी, उर्दू व हिन्दी के लेखक शकील सिद्दीकी, मशहूर शायर चरणजीत सिंह बशर, ओमप्रकाश नदीम, डा सुधीर भटनागर और युवा लेखक आशीष मिश्र ने इस मौके पर अपने विचार रखे और मीर के जीवन और उनकी शायरी के तमाम कोनों को रोशन किया. संचालन किया वाइड ऐंगल वेलफेयर सोसायटी के अली सागर ने तथा सभी अतिथियों का स्वागत जसम के भगवान स्वरूप कटियार ने किया.
वक्ताओं का कहना था कि आज का दौर नाउम्मीदी का दौर है जब हम मीर को याद कर रहे हैं. ऐसा ही दौर था मीर तक़ी मीर का जब उन्हें दिल्ली छोड़कर लखनऊ आना पड़ा. यहीं उनका इन्तकाल हुआ. लखनऊ जो उर्दू शायरी का बड़ा केन्द्र है, वह मीर के मजार को भी नहीं संभाल सका. उसका नामो निशान तक नहीं बचा. हम उनके मजार को सुरक्षित नहीं रख पाये लेकिन यह हमारा फर्ज है कि उनकी शायरी को संभाला जाय. मीर हमारी मिली-जुली विरासत है. वे हमारे बीच नहीं है पर ऐसे शायर नहीं होने पर भी होते हैं. वे चिरागों की तरह हमारे अन्तर को रोशन करते हैं.
वक्ताओं का यह भी कहना था कि मीर की शायरी से नई पीढ़ी बहुत परिचित नहीं. उन तक मीर जैसे शायर व अदीब कैसे पहुंचे, इस पर विचार हो. आज का दौर तो ऐसा है जब कोशिश है कि हिन्दी उर्दू से न मिले और उर्दू हिन्दी से. ऐसे में जिन लोगों ने मीर को याद करने तथा हिन्दी और उर्दू के रचनाकरों को इस आयोजन के माध्यम से जोड़ने का काम  किया है, उनका स्वागत किया जाना चाहिए. यह सिलसिला आगे बढ़ना चाहिए.  नफरत व सामािजक विभाजन के दौर में यह जरूरी काम है. जरूरत है कि मीर को लेकर लखनऊ में हिन्दी व उर्दू के रचनाकारों का बड़ा जलसा हो.  इससे हिन्दी और उर्दू को करीब लाया जा सकेगा.
‘ब याद: मीर तकी मीर’ का दूसरा स़त्र मुशायरा व कवि सम्मेलन का था. इसकी शुरुआत देवनाथ द्विवेदी से हुआ. उन्होंने गज़ल सुनाई जिसके शेर इस तरह थे – ‘ सबसे पहले खुद को यही सिखाते हैं/अपने हिस्से का हर बोझ उठाते हैं/मुश्किल राहें होंगी पर चलना भी है/मन के सारे पेंचोखम सुलझाते हैं/घर में सब कुछ है पर बहुत अंधेरा है/चलो चरागा करें रौशनी लाते हैं’।
सुभाष राय ने अपनी कविता में आज के हालात का बयान कुछ इस तरह किया ‘तुम्हें/तुम जैसे लोगों को/मेरे सामने झुकना होगा/मेरा सम्मान करना होगा/तुम्हारी कई गुस्ताखियां नजरअंदाज कर चुका हूं/मेरा कार्टुन बनाया/मेरे खिलाफ कविताएं लिखीं/पुतला जलाया….मैंने तब भी माफ किया तुम्हें…..मैं सबका कल्याण चाहता हूं…..तुम मेरी शरण में आओ…और चुनो मेरे पास हर तरह के तमगे हैं और हर तरह के पिंजड़े भी’.
हैदर अल्वी साहब ने शायरी कुछ इस तरह पढ़ी ‘अभी तो एक ही ठोकर लगी है जालिम को/सारा हिसाब थोड़े ही है’। आदियोग, ‘रिजवान फारुकी, प्रेम कुमार, आशीष मिश्र, अली सागर आदि ने भी अपनी शायरी सुनाई। मुशायरे का समापन किया मशहूर शायर चरणजीत बशर ने.  इस मौके पर उन्होंने कई शेर सुनाये. वो कुछ इस प्रकार थे ‘ऐसी मजलूम जबां से है ताल्लुक अपना/किताबें हों कि अखबार नहीं पढ़ सकते/शायरी अपनी जमाने के लिए कुछ हो बशर/मेरे बच्चे मेरे अशआर नहीं पढ़ सकते’। और भी ‘तू मुसीबत में अकेला है तो हैरत कैसी/हर कोई डूबती कस्ती से उतर जाता है आप/जिन्दगी जंग है और जंग में लड़ने के लिए/जीना नहीं आता, वह मर जाता है आप’.
इस मौके पर बड़ी संख्या में लोग हिन्दी व उर्दू के लेखकों व शायरों को सुनने के लिए जुटें जिनमें नाइश हसन, मेहदी अब्बास रिजवी, के के शुक्ला, डा रुबी सिंह, विमल किशोर, प्रताप दीक्षित, मोहम्मद शकील कुरैशी, सी एम शुक्ला, राजीव गुप्ता, वीरेन्द्र त्रिपाठी, मधुसूदन मगन, आर के सिन्हा, प्रमोद प्रसाद, आशीष सिंह, राजीव यादव, कौशल किशोर आदि प्रमुख थे.

Related posts

Fearlessly expressing peoples opinion

This website uses cookies to improve your experience. We'll assume you're ok with this, but you can opt-out if you wish. Accept Read More

Privacy & Cookies Policy