समकालीन जनमत
स्मृति

‘गाओ कि जीवन गीत बन जाए’ लिखने वाले कवि, गीतकार महेन्द्र भटनागर नहीं रहे

जब जग में आग धधकती है, लपटों से दुनिया जलती है
अत्याचारों से  पीड़ित  जब भू-माता  आज  मचलती है
ये दुख मिटाने वाले हैं,  जग को  शीतल  कर जाएंगे !
ये हिम  बरसाने  वाले हैं,  ये अग्नि  नहीं बरसाएंगे !

आज जब दुनिया धधक रही है, मानवता अत्याचारों से पीड़ित है, भू-माता मुक्ति के लिए छटपटा रही है, ऐसे में महेन्द्र भटनागर अपनी कविताओं और गीतों से दुख हरने और जग को शीतलता प्रदान करने की बात करते हैं। कविता का काम यही है। वह लोगों को उनका अधिकार नहीं दिला सकती लेकिन उसे पाने की चेतना जरूर जाग्रत कर सकती है, मनुष्य की संवेदना के तारों को झंकृत कर सकती है, दुखी व अशान्त मन में ऐसे भावों-विचारों की गंगा बहा सकती है जिससे मन शीतलता से भर जाए, उसे सुकून व शान्ति मिले। महेन्द्र भटनागर की कविताएं यही काम करती हैं।उनका जन्म 26 जून 1926 को झांसी में हुआ। ग्वालियर उनकी कर्मभूमि थी। 94 वर्ष की उम्र में उन्होंने हम लोगों का साथ छोड़ा। इस उम्र में भी उनके मन-मस्तिष्क में नौजवानों सा कुछ करने की उमंग थी, कलम में वैसी ही रवानी थी। लिखते हैंः

हंसी पर खून के छींटे
कभी पड़ने नहीं देंगे
नये इन्सान के मासूम सपनों पर
कभी भी बिजलियां गिरने नहीं देंगे।

उनके अन्दर इन्सान की खुशियों, अरमानों और उसके सपनों को बचाने का जज्बा है। जीवन में इतनी गहरी आस्था है कि वे मृत्यु को चुनौती देते हुए कहते हैं:

मृत्यु के भी सामने वह
मग्न होकर देखता है स्वप्न !
सपने देखना, मानो जीवन की निशानी है
यम के पराजय की कहानी है।

महेन्द्र भटनागर ने जब काव्य सृजन का आरम्भ किया, वह छायावाद का काल था। उसके बाद हिन्दी कविता में प्रगतिवाद से लेकर आधुनिक काव्य के कई दौर आये। इन सभी दौर में महेन्द्र भटनागर रचनाशील रहे। इनकी कविताओं पर रामविलास शर्मा, मुक्तिबोध, शिवमंगल सिंह सुमन, शिवकुमार मिश्र, विद्यानिवास मिश्र जैसे प्रसिद्ध साहित्यकारों ने आलेख लिखे, उनकी पुस्तकों की भूमिकाएं लिखीं। इनकी पचास से अधिक पुस्तकें अब तक प्रकाशित हो चुकी हैं। इनका अधिकांश साहित्य ‘महेन्द्र भटनागर समग्र’ के छ: खण्डों तथा काव्य सृष्टि ‘महेन्द्र भटनागर की कविता गंगा’ के तीन खण्डों में संकलित है।

‘सृजन यात्रा’ इनकी कविता संचयिता है जो वर्ष 2016 में आई है। इसमें इनकी 220 कविताएं संकलित हैं जो ‘सामाजिक यथार्थ की कविताएं’, ‘जीवन-राग’, ‘प्रणय-प्रेम की कविताएं’, प्रकृति-प्रेम की कविताएं’, ‘मृत्यु बोध-जीवन बोध’ तथा ‘जीवन-त्रासदी’ उपशीर्षकों से छ: खण्डों में बंटी है। यह संचयिता महेन्द्र भटनागर की कविता की जीवन यात्रा है जो समय के विभिन्न पड़ावों से होकर गुजरती है तथा हर्ष-विषाद, सुख-दुख, जीवन-मरण, जय-पराजय, प्रकृति-प्रेम, त्रासदी-संघर्ष के बीच जीवन का राग रचती है।

‘सृजन यात्रा’ में महेन्द्र भटनागर की कविताएं जीवन के विविध रंगों में सराबोर है। वह सामाजिक यथार्थ को समाज में व्याप्त अन्तर्विरोधों में देखती है तथा इस सच्चाई से परिचित कराती है कि यह समाज दो ध्रुवों में बंट गया है जहां ‘एक ओर – भ्रष्ट राजनीतिक दल/और उनके अनुयायी खल/सुख-सुविधा-साधन-सम्पन्न-प्रसन्न’ तो ‘दूसरी तरफ – जन हैं/भूखे-प्यासे दुर्बल, अभावग्रस्त…..त्रस्त’। मानव मूल्यों में ऐसी गिरावट आई है कि मनुष्य स्वार्थी हो गया है। उसकी आस्थाएं संकुचित हो गई हैं। वह अपने धर्म, जाति, प्रान्त, भाषा, लिपि के बारे में इतना संकीर्ण होकर सोचता है कि अपने भाई का रक्त बहाने से उसे गुरेज नहीं। वह बहशी, आदमखोर व हिंसक होता जा रहा है। यह गांधी का देश है जहां की संस्कृति शान्ति, अहिंसा, प्रेम,  परमार्थ की रही है। पर उस महात्मा के साथ क्या सलूक हो रहा है, महेन्द्र भटनागर अपनी कविता में कहते हैं:

मुंह में
यथा पूर्व विराजमान हैं – गांधी
बंगलों और कोठियों में
दीवारों पर
टंगे हैं गांधी
या सलीब पर लटके हैं गांधी !

अर्थात गांधी का अपने मतलब के लिए तो खूब इस्तेमाल हुआ और हो रहा है पर हकीकत में उनके आदर्शों को भुला दिया गया, उन्हें सलीब पर लटका दिया गया।

महेन्द्र भटनागर की ‘सृजन यात्रा’ मात्र सामाजिक विद्रूपताओं, विसंगतियों का ही बोध नहीं कराती बल्कि वह प्रणय-प्रेम व प्रकृति-प्रेम के बीच से गुजरती है। यह प्रणय मांसल नहीं आत्मिक है। इनकी कविता ‘राग-संवेदन’ में उनका स्नेह-सिंचित भाव इस रूप में अभिव्यक्त होता है

उम्र यों ढलती रहे
उर में

धड़कती सांस यह चलती रहे
दोनों हृदय में
स्नेह की बाती लहर बलती रहे
जीवन प्राणों में परस्पर
भावना-संवेदना पलती रहे!
 

इसी तरह महेन्द्र भटनागर का प्रकृति के प्रति भी अदम्य अनुराग है। वे ‘बरखा रात’, ‘शिशिर की रात’, ‘हेमन्त’ और इसकी धूप के साथ ‘सुहानी सुबह’, ‘बसन्त’ का वर्णन ही नहीं करते बल्कि कविता में ‘मेघ-गीत’ गाते हैं। प्रकृति कैसे मन से लेकर तन-बदन को रोमांचित कर देती है, ‘अहलाद’ से भर देती है, यह भाव द्रष्टव्य है:बदली छायी, बदली छायी
दिशा-दिशा में बिजली कौंधी
मिट्टी महकी सोंधी-सोंधी
दुलहिन झूमी, घर-घर घूमी
मनहर स्वर में कजरी गायी
बदली छायी, वर्षा आयी !

महेन्द्र भटनागर का मानव प्रेम मनुष्य तक सीमित नहीं है। वे इस प्रेम में जो निहित स्वार्थ का भाव है, उस पर चोट करते हैं। उनकी कविता ‘गौरैया’ को देखें। इसके प्रति उसका प्रेम कैसा है ? मनुष्य ऐसा कला प्रेमी है कि वह अपने ड्राईंग रुम की शोभा बढ़ाने के लिए दीवारों पर गौरैया के चित्र टांगता है। वे कहते हैं : ‘गौरैया ! यह आदमी है/कला का बड़ा प्रेमी है, पारखी है/इसके कमरे की दीवारोें पर/तुम्हारे चित्र टंगे है’ पर उसकी वास्तविक दुनिया में ? वहां से गौरैया विलुप्त हो रही है। कोई और नहीं, यह मनुष्य है जो गौरैया को उजाड़ रहा है। इस सच्चाई को व्यक्त करती  कवि की संवेदना गौरैया से जुड़ती है:

गौरैया, भाग जाओ
इस कमरे से भाग जाओ
अन्यथा यह आदमी
उजाड़ देगा तुम्हारी कोख
एक पल में खत्म कर देगा
तुम्हारे सपनों का संसार’।

इस तरह महेन्द्र भटनागर की कविताएं बाहर की दुनिया के साथ भीतर की दुनिया में उतरती हैं। प्रणय और प्रकृति प्रेम पर लिखी  इनकी कविताएं हमें केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, शील, त्रिलोचन जैसे प्रगतिशील कवियों की इन्हीं विषयों पर लिखी कविताओं की याद दिला देती हैं। इनकी विशेषता है कि इन्होंने जो जिया, भोगा, देखा उसे सहज-सरल तरीके से व्यक्त किया। इसीलिए इसमें कृत्रिमता नहींं सादगी है, देशज भाव-संवेदना से संपृक्त भारतीय ठेठपन है और कविता इन्हीं संस्कारों से लैस मिट्टी व भाषा की सुगन्ध से भरी है। इन्होंने गीत लिखे, छन्द में रचनाएं कीं, मुक्त छन्द और छन्द मुक्त शैली में कविताएं लिखीं। इस मायने में महेन्द्र भटनागर हमारी जातीय चेतना के कवि है। इनकी कविताएं संघर्षधर्मी होने की जगह जीवन धर्मी ज्यादा है। मृत्यु में भी वे जीवन को देखते हैं। इस विषय पर संग्रह में कई कविताएं हैं। कैसे देखते हैं वे मृत्यु को, उन्हीं के शब्दों में:

मृत्यु – आना, एक दिन जरूर आना
और मुझे उ़ड़नखटोले में बैठाकर ले जाना
दूर….बहुत दूर… नरक में
जिससे मैं नरक-वासियों को
संगठित कर सकूं
उन्हें विद्रोह के लिए ललकार सकूं
जिन्दगी बदलने के लिए
तैयार कर सकूं।

यह ‘जिन्दगी बदलने की’ अदम्य इच्छा मृत्यु के साथ भी समाप्त नहीं होती। दुख-दाह व ताप-त्रास के बीच जीवन को कैसे बचाया जाय, यह चिन्ता और इसे कैसे बदला जाय, यह चाह महेन्द्र भटनागर को काव्य सृजन के लिए प्रेरित करती है। उनकी बढ़ती उम्र कोई बाधा नहीं रही और वे पूरे मनोयोग से जीवन के सांध्यकाल में भी कविता रचते रहे। किसी साधक की तरह उसमें डूबते और आस्था का गीत गाते रहे:

गाओ कि जीवन गीत बन जाए !
हर तरफ छाया अंधेरा है घना,
हर हृदय हत, वेदना से है सना,
संकटों का मूक साया उम्र भर
क्या रहेगा शीश पर यों ही बना ?
गाओ पराजय-जीत बन जाए !
गाओ कि दुख संगीत बन जाए !

जन संस्कृति मंच कवि व लेखक महेंद्र भटनागर को अपना श्रद्धा सुमन और उनके प्रति शोक संवेदना प्रकट करता है। उनके बृहद परिवार और साहित्य समाज के दुख में हम सभी शामिल है।

 

 

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